
विश्व की आर्थिक और सुरक्षा व्यवस्था पश्चिम एशिया में रुक-रुककर चलते संघर्ष, रूस-यूक्रेन के लगातार जारी युद्ध और अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के ‘पल में तोला पल में माशा’ वाले रवैए की वजह से तार-तार होती जा रही है.
ऐसे में भारत की विदेश नीति का मतलब रहा है अपने पैंतरों और बाजीगरी के लिए जगह बनाना. भारत बहुत-से देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हुए रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने का जतन कर रहा है. इसका अर्थ है अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के साथ साझेदारी को गहरा करना, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखना, चीन के साथ पेचीदा रिश्तों को संभालना और ग्लोबल साउथ में अपनी आवाज और मजबूत करना.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल में कहा था, “होड़, टकराव और आर्थिक तथा सामरिक ताकत का लगातार बढ़ता इस्तेमाल” दुनिया की नई इबारतें गढ़ रहा है. यह वह हकीकत है जिसकी वजह से भारत को व्यावहारिक रवैया अपनाना पड़ा ताकि वह एक या दूसरे खेमे को चुनने से बच सके और अपने हितों की रक्षा कर सके.
इसे इंडिया टुडे के देश का मिज़ाज सर्वे की भी स्वीकृति मिली है, जिसमें 51 फीसद से ज्यादा लोगों ने विदेश नीति को संभालने के मोदी सरकार के तौर-तरीके की सराहना की. हालांकि 28 फीसद लोगों की राय इस पर नकारात्मक थी.


डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान भारत-अमेरिकी रिश्तों में उतार-चढ़ाव आए. भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ और ट्रंप की जबान से निकली पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व की तारीफों ने ‘रणनीतिक साझेदारी’ को कसौटी पर कस दिया.
अलबत्ता, भारत-अमेरिकी रिश्ते साझा हितों और ठोस नतीजों से गढ़े गए हैं. अमेरिका की तरफ से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को अपने मून बेस कार्यक्रम से जुड़ने का न्योता गहरे होते अंतरिक्ष सहयोग का संकेत है, तो भारत की तरफ से 1,943 करोड़ रुपए में 30 महीने की लीज पर दो एमक्यू-9बी सीगार्जियन ड्रोन लेना इस साझेदारी के सुरक्षा पहलू को सामने रखता है.
भारत-अमेरिकी संबंधों की सबसे अच्छी बात के बारे में देश का मिज़ाज सर्वे के 36 फीसद लोगों को लगता है कि अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत अपने हितों की रक्षा करने में सफल रहा, तो 35 फीसद ने विपरीत राय देते हुए कहा कि भारत ने जोर-जबरदस्ती के आगे अक्सर घुटने टेके.
इस हफ्ते की शुरुआत में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने बीजिंग में सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि स्तर की 25वें दौर की बातचीत में हिस्सा लिया. यह बैठक ऐसे समय हुई जब चंद हफ्तों बाद 12-13 सितंबर को भारत दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है, जिसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आने की उम्मीद है.
इससे संकेत मिलता है कि भारत बीजिंग के साथ बातचीत को तैयार है, लेकिन इस शर्त पर कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता सामान्य रिश्तों की बुनियाद बनी रहे. वित्त वर्ष 2025-26 में 151 अरब डॉलर (14.4 लाख करोड़ रुपए) के दोतरफा व्यापार के साथ चीन अब भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.
हालांकि 112.6 अरब डॉलर (10.8 लाख करोड़ रुपए) का भारी-भरकम व्यापार घाटा चीन के पक्ष में है. ऐसे में जब पूछा गया कि चीन के प्रति सबसे अच्छा रुख क्या होगा, तो 24 फीसद लोगों ने बातचीत के साथ आर्थिक रिश्ते बनाए रखने में विश्वास जताया.



पाकिस्तान से सीमित वार्ता
ऑपरेशन सिंदूर भारत के इस नए सिद्धांत का ऐलान था कि कोई भी आतंकी हमला नपी-तुली सैन्य कार्रवाई को दावत देगा और उसके बाद से ही भारत और पाकिस्तान के रिश्ते नाजुक बने हुए हैं. अंदरूनी तनाव—आतंकवाद का पुराना अभिशाप, सिंधु जल संधि का स्थगन और गहरा कूटनीतिक अविश्वास—अब भी अनसुलझे हैं.
यह पूछे जाने पर कि क्या भारत को पाकिस्तान के साथ आतंकवाद, पानी और व्यापार पर सीमित बातचीत शुरू करनी चाहिए, देश का मिज़ाज सर्वे के 24 फीसद से ज्यादा लोगों ने कहा, ‘हां, बिना किसी पूर्व शर्त के’, इससे कुछ ही कम 23 फीसद आतंकवादी धड़ों के खिलाफ सत्यापित की जा सकने वाली कार्रवाई के बाद ही सीमित बातचीत चाहते थे, तो 16 फीसद केवल सैन्य अधिकारियों और कूटनीतिज्ञों के जरिए ही बातचीत के पक्ष में हैं.
ईरान संघर्ष के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से ऊर्जा की लागतें काफी बढ़ गईं. इसने भूराजनीतिक झटकों के प्रति भारत की बेबसी को उघाड़कर रख दिया. इससे ऊर्जा सप्लाइ में विविधता लाने की जरूरत सामने आई और ऊर्जा सुरक्षा भारत की रणनीतिक मजबूती का स्तंभ बनकर उभरी.
लगातार जारी इस संकट के दौरान ईंधन की कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा के सवाल पर 30 फीसद लोग मानते हैं कि मुश्किल हालात में भारत ने इस मामले को अच्छी तरह संभाला. 26 फीसद के मुताबिक कीमतें बढ़ीं पर सप्लाइ को संभाल लिया गया. 35 फीसद का कहना है कि इस मसले से खराब ढंग से निबटा गया.
मोदी सरकार के लिए चुनौती अब यह नहीं रह गई है कि वह अपने रिश्तों के जरिए दुनिया के प्रतिद्वंद्वी गुटों के साथ संतुलन हासिल करे, बल्कि चुनौती यह पक्का करना है कि भारत की रणनीतिक युक्तिकौशल देश में स्थिरता और खुशहाली लाए.

