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कब्जाए कश्मीर में कैसी आजादी

पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर (पीओजेके) में आर्थिक और राजनैतिक न्याय की मांग को लेकर जारी विरोध-प्रदर्शनों को पाकिस्तान बलपूर्वक कुचल रहा.

पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर की नीलम घाटी में 21 जून को जेएएसी के कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन करते हुए
अपडेटेड 10 अगस्त , 2026

शरत सभरवाल

पाकिस्तान की ताकतवर पंजाबी सत्ता बगावती ‌‌हिंसा से हलकान है. पहले बलूचिस्तान, कबाइली इलाके और अब हाल ही कथित आजाद जम्मू एवं कश्मीर/एजेके (भारत जिसे पाकिस्तानी कब्जे वाला कश्मीर/पीओजेके कहता है) में.

27 जुलाई को एजेके में चुनाव से ऐन पहले वहां जोरदार हिंसक प्रदर्शन शुरू होने से सुरक्षा व्यवस्था इतनी बिगड़ गई कि पाकिस्तान सरकार को चुनाव तीन चरणों में कराने को बाध्य होना पड़ा, जो अब 10 अगस्त तक चलेंगे.

वैसे तो प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र रावलकोट है, लेकिन क्षेत्र के बड़े हिस्सों में जम्मू ऐंड कश्मीर जॉइंट अवामी ऐक्शन कमेटी (जेएएसी) के धरने, विरोध मार्च और काम बंद हड़ताल का खासा असर दिखाई दिया. जेएएसी वकीलों, व्यापारियों, ट्रांसपोर्टर्स और छात्रों के नागरिक अधिकार समूहों का एक साझा संगठन है, जो 2023 में प्रशासनिक सुधारों, जवाबदेही, सस्ती बिजली और गेहूं तथा कुलीन वर्ग के विशेषाधिकारों के खात्मे की मांग के लिए एक मंच पर आया था. सरकार ने इसके प्रदर्शनों का जवाब बर्बरता के साथ दिया है.

विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सरकारी बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाईं, जेएएसी नेताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया, इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाया और तमाम मुख्य सड़कों को बंद कर दिया. किसी तरह से जो थोड़ी-बहुत जानकारी सामने आ रही है, उससे पता चलता है कि नागरिक और सुरक्षा बल दोनों हताहत हुए हैं.

जेएएसी के एक नेता ने दावा किया है कि मुजफ्फराबाद की ओर कूच की घोषणा के बाद 27 और 28 जुलाई को पुलिस की गोलीबारी में 25 नागरिक मारे गए. फिलहाल आंदोलन खत्म होता नजर नहीं आ रहा.

पाकिस्तान ने 1947 में अवैध रूप से कब्जाए गए जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों को जब से दो इलाकों ‘एजेके’ और तथाकथित गिलगित-बल्तिस्तान में बांटा है, तभी से व्यावहारिक तौर पर दोनों के साथ उपनिवेश जैसा सलूक किया जा रहा है. ‘एजेके’ को 1974 में संसदीय प्रणाली के साथ मिला संवैधानिक शासन का अधिकार महज एक दिखावा था. हालांकि, इसकी 53 सदस्यीय विधानसभा के चुनावों में हमेशा धांधली होती रही है.

भारत के हिस्से वाले जम्मू-कश्मीर के तथाकथित शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों का इस्तेमाल पाकिस्तानी सत्ता हमेशा विधानसभा में संख्याबल में हेरफेर के लिए करती रही है. विधानसभा चुनाव से पहले जेएएसी की मांगों में से एक इन 12 ‘शरणार्थी’ सीटों को खत्म करना भी था.

तथाकथित ‘एजेके काउंसिल’ की अध्यक्षता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री करते हैं, और यह क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों समेत शासन के सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर नियंत्रण रखती है. प्राकृतिक संसाधनों का बुरी तरह दोहन किया जा रहा है और स्थानीय लोगों को इसका शायद ही कुछ लाभ मिलता है. ‘एजेके’ के शीर्ष पदाधिकारियों को पाकिस्तान के प्रति निष्ठा जतानी पड़ती है और जम्मू-कश्मीर को उसका हिस्सा मानने की घोषणा करनी पड़ती है. ‘एजेके’ पर अपना कड़ा नियंत्रण बनाए रखने के लिए पाकिस्तान ने हमेशा कठोर रवैया अपनाया है, जिसमें गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन भी शामिल हैं

‘एजके’ में अपने संवैधानिक अधिकारों और बेहतर शासन की मांग को लेकर लोगों का आंदोलन करना कोई नई बात नहीं है. लेकिन अपनी मांगें पूरी कराने के लिए पिछले तीन वर्षों में जेएएसी के नेतृत्व में लगातार चल रहे विरोध प्रदर्शन हाल के इतिहास की सबसे सबसे गंभीर घटना कहे जा सकते हैं. आंदोलन का ताजा दौर रावलकोट में सुरक्षा बलों के साथ झड़प में एक व्यापारी की मौत और जून के शुरू में जेएएसी पर लगाए गए प्रतिबंध के बाद शुरू हुआ था.

जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआइ) पार्टी के लोगों के चुनाव का बहिष्कार कर देने के बाद अब सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएलएन) और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) ही मुख्य रूप से मैदान में बची हैं. ये दोनों पार्टियां सेना से निकटता के लिए जानी जाती हैं. बहरहाल, व्यापक अशांति और धांधली के आरोपों के कारण इस चुनाव की विश्वसनीयता लगभग खत्म हो चुकी है.

पाकिस्तान के प्रति जनता के आक्रोश का यह मतलब कतई नहीं है कि उन्हें भारत से प्रेम है. कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं की भारत से मदद की गुहार लगाने वाली अपीलों के सोशल मीडिया फुटेज से यह कतई साबित नहीं होता है. प्रशासनिक सुधार ही इस आंदोलन का मुख्य एजेंडा है. जेएएसी के नेताओं ने भारत से संबंध के पाकिस्तानी आरोपों को खारिज कर दिया है.

भारत ने नपी-तुली प्रतिक्रिया देते हुए पीओजेके पर अपने दावे को दोहराया, उथल-पुथल में अपनी किसी भी संलिप्तता के पाकिस्तान के आरोप को खारिज किया, पुलिस बर्बरता को गंभीर बताया. साथ ही, उम्मीद जताई कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को उसकी करतूतों के लिए जवाबदेह ठहराएगा. भारत ने वहां हो रहे चुनावों को पाकिस्तान के अवैध कब्जे और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को छिपाने का एक दिखावटी प्रयास भी बताया है.

बदलती स्थिति के मद्देनजर भारत के सतर्क रुख को सही ही माना जाएगा. वैसे, भारत के पास यह एक अच्छा मौका भी है कि वह पाकिस्तान के संदिग्ध कश्मीर एजेंडे के घोर पाखंड को उजागर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘एजेके’ में जारी घटनाओं को प्रभावी ढंग से उठाए.

(शरत सभरवाल पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त और 'इंडियाज पाकिस्तान कॉनंड्रम: मैनेजिंग ए कॉम्प्लेक्स रिलेशनशिप' पुस्तक के लेखक हैं.)

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