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साथी बन संभालते श्वानों का जलवा 

हमारे चौपाया दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती कहानियों के साथ 2026 भारतीय सिनेमा में पालतू जानवरों का साल बना. प्यार और जज्बात पर मरहम लगाने की उनमें कितनी क्षमता; और उन्हें हमारी हमदर्दी की कितनी जरूरत, फिल्मों का फोकस इसी के इर्द-गिर्द

cinema animals in films
cinema animals in films
अपडेटेड 4 नवंबर , 2026

कोरोना महामारी का असर घटने के दौरान 2022 में फिल्मकार अमित राय ने फेसबुक पर एक कुत्ते को गोद लेने के संबंध में अपील देखी. उन्हें इसकी परवाह नहीं थी कि वह किसी खास नस्ल का नहीं था या वह पिछले पैर से लंगड़ाकर चलता था. वह कहते हैं, “मुझे अपने पर गर्व हुआ कि मैं उसकी देखभाल करूंगा.’’

मगर यह भावना कुछ ही दिनों में हवा हो गई. उन्होंने पाया कि ‘‘वह मुझको पाल रहा है!” राय ऑस्कर के आने को जिंदगी बदलने वाला अनुभव बताते हैं. इसी ने उन्हें ऐसी पटकथा लिखने के लिए प्रेरित किया जो उसके प्रति उनकी भावनाओं को समेट सके. नतीजा था ओह माय डॉग (ओएमडी), जिसमें ऑस्कर ने खोए पालतू कुत्ते मोमो का किरदार निभाया.

उसे खोजते हुए टेक्नोलॉजी का माहिर बच्चा भ्रष्ट पुलिसकर्मियों और अवैध कुत्ता-मांस माफिया से भिड़ता है. मगर बाजी मार लेता है ब्रूनो—प्रशिक्षित देसी कुत्ता जो मानव अंग तस्करी गिरोह के अगवा किए बच्चे को खोजने के लिए दौड़ता, सूंघता, भौंकता और हुंकारता है.

ओएमडी की कहानी में भटकाव और लंबा खींचे जाने जैसी खामियां हैं, फिर भी चार पैरों वाले उसके नायक दर्शकों को प्यार से मुस्कराने और कई बार आहें भरने पर मजबूर करते हैं लेकिन 2026 में इंसान और जानवरों के रिश्ते पर बनी यह अकेली भारतीय फिल्म नहीं है. ओएमडी से कुछेक हफ्ते पहले जुलाई के आखिर में मैक्स, मिन ऐंड म्याऊजाकी आई थी.

इसमें एक बिल्ली टूटे दिल वाले नायक की जिंदगी में हलचल मचाकर आखिरकार उसका जख्म भरती है. सितंबर में गुजराती फिल्म असंभाऊ एक आदमी और उसके कुत्ते के भाई जैसे रिश्ते पर केंद्रित थी. हालांकि निर्देशक पार्थ त्रिवेदी ने बेहतर नस्ल के कुत्तों के साथ काम किया, बस एक देसी कुत्ते को छोड़कर. और, वह क्लाइमैक्स में नेक काम करता नजर आता है.

सचिन पिलगांवकर 23 अक्तूबर को मराठी फिल्म कापुसकोंडा के साथ कुत्तों वाली फिल्मों की दुनिया में शामिल हुए. इसमें कुत्तों से चिढ़ने वाला उनका किरदार धीरे-धीरे उनसे प्यार करने लगता है. हालांकि पालतू कुत्तों पर केंद्रित कहानियों की इस लहर के बीच नई नवेली (2026) सरीखी नई फिल्मों में भी उनकी थोड़ी मगर ध्यान खींचने वाली मौजूदगी है. नई नवेली फिल्म में झबरीला सफेद कुत्ता परिवार का लाडला और बराबरी का सदस्य है.

पॉ-जिटिव बने रहें
असल में त्रिवेदी के लिए असंभाऊ एक सामाजिक सचाई दर्ज करने की जरूरत से निकली. यही कि लोग अब पालतू जानवरों को परिवार का सदस्य मानते हैं. वह कहते हैं, “यह अब महानगरों या किसी खास सामाजिक-आर्थिक वर्ग तक सीमित नहीं. तेजी से तनावपूर्ण होती जिंदगी में निस्वार्थ और प्यार करने वाले साथी की चाह बढ़ी है, इसलिए बिल्लियों और कुत्तों को गोद लेना भी बढ़ा है.”

त्रिवेदी की फिल्म महाभारत के उस मशहूर प्रसंग को आज के दौर में लाती है जिसमें युधिष्ठिर कठिन यात्रा में साथ रहे वफादार आवारा कुत्ते को स्वर्ग के द्वार पर छोड़ने का इंद्र का आदेश नहीं मानते. वे कहते हैं, “मेरी फिल्म देखती है कि इंसान के प्रति वफादारी और प्यार में कुत्ता कहां तक जा सकता है और इंसान कुत्ते के लिए कहां तक जा सकते हैं.”

आम तौर पर बिल्लियों को कुत्तों की स्नेही नहीं माना जाता या वफादारी से नहीं जोड़ा जाता, लेकिन इससे पद्मकुमार नरसिंहमूर्ति का अपने दिवंगत पालतू बिल्ली के प्रति कोई प्यार कम नहीं हुआ. अपनी फिल्म मैक्स, मिन ऐंड म्याऊजाकी में उन्होंने पालतू बिल्ली का नाम मशहूर जापानी एनिमेशन फिल्मकार हयाओ मियाजाकी के नाम पर मियाजाकी रखा.

हयाओ मियाजाकी की फिल्मों में बिल्लियां प्रमुखता से दिखती हैं. फिल्म के नायक मैक्स की तरह उन्हें भी बिल्लियों से एलर्जी थी. फिर एक दोपहर उनकी साथी की बिल्ली ने उनकी गोद में सिर रखकर दिल जीत लिया.

अब वे बिल्लियों की चतुराई से अच्छी तरह वाकिफ हैं. वह कहते हैं, “बिल्ली रिश्तों के बारे में बहुत कुछ सिखा सकती है...जगह कैसे दें और मांगें, और किसी का दम घोंटे बिना प्यार कैसे जताएं. बिल्लियां गरिमामय होती हैं, आपको नजरअंदाज करना जानती हैं और आपकी जिंदगी में अपनी जगह पहचानती हैं.” ‌

फिल्म मैक्स, मिन ऐंड म्याऊजाकी में देसी बिल्ली राधा ने बिल्ली का किरदार निभाया है और उसका इस्तेमाल मैक्स की बढ़ती परिपक्वता दिखाने के लिए खूबसूरती से हुआ है.

हम साथ-साथ हैं
हम सब जानते हैं कि हिंदी सिनेमा में कुत्ते काफी समय से नैरेटिव का हिस्सा बनते आए हैं.‌ मशहूर फिल्म हम आपके हैं कौन...! (1994) में टफी प्रेम और निशा को मिलाता है, जबकि संतोष सिवन की हैलो (1996) में सात साल की बच्ची अपने लापता पालतू को खोजने के रोमांचक सफर पर निकलती है.

लेकिन, आवारा कुत्तों की समस्या को चिल्लर पार्टी (2011) ने प्रभावी तरीके से सामने रखा. इस फिल्म में कॉलोनी के बच्चे अपने देसी कुत्ते को मारने का इरादा रखने वाले भ्रष्ट राजनेता से उसे बचाने के लिए एकजुट होते हैं. बाद में, फिल्म दिल धड़कने दो (2015) में आमिर खान ने मेहरा परिवार के साथ सफर करने वाले बुलमास्टिफ प्लूटो मेहरा को आवाज दी. वहीं, इट्स एंटरटेनमेंट (2014) फिल्म में अभिनेता अक्षय कुमार के साथ एक कुत्ते की अहम भूमिका थी.

दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी कुत्तों ने परदे पर खूब धूम मचाई है. कन्नड़ फिल्म 777 चार्ली (2022) ने ब्रीडिंग इकाइयों में कुत्तों की दुर्दशा को बखूबी दिखाया. वहीं, मलयालम फिल्म एको (2025) में बुजुर्ग महिला दुर्लभ नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल अपनी हिफाजत करने के साथ-साथ बदला लेने के लिए भी करती है. तमिल फिल्म परियेरुम पेरुमल (2018) में दुबला काला कुत्ता जातीय हिंसा का शिकार बनता है.

मुंबई स्थित वेलफेयर ऑफ स्ट्रे डॉग्स के सीईओ अबोध अरस के लिए यह सुखद है कि कुत्ते, खासकर देसी आवारा, फिल्मों में जगह बना रहे हैं. वे चर्चित मराठी फिल्म तिघी (2026) की मिसाल देते हैं. इस फिल्म में बचाकर घर लाया गया पिल्ला बीमार मां और उसकी दो बेटियों के टूटे रिश्ते को कुछ समय की राहत देता है.

अरस की राय में, “यह दिखाता है कि कुत्ते जैसा साथी मुश्किलें भुलाकर कितनी खुशी दे सकता है.” वह कहते हैं, “इससे देसी कुत्तों को पालतू बनाने को लेकर लोगों की सोच बदलती है.” हालांकि वे फिल्मांकन के दौरान भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआइ) के दिशा-निर्देश मानने की जरूरत पर भी जोर देते हैं.

एडब्ल्यूबीआइ की सदस्य अंजलि गोपालन ज्यादातर गुरुवार को इसी पर काम करती हैं. वह सहकर्मियों के साथ बैठकर तय करती हैं कि किस फिल्म को इस डिस्क्लेमर वाला अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मिले कि ‘इस फिल्म के निर्माण के दौरान किसी पशु को नुक्सान नहीं पहुंचाया गया’.

शूटिंग से पहले कहानी और जानवरों के इस्तेमाल का ब्योरा देकर एडब्ल्यूबीआइ से मंजूरी लेना जरूरी है. गोपालन के मुताबिक, “हम बताते हैं कि क्या स्वीकार्य है और हम पशु क्रूरता वाले दृश्य हटाने को कहते हैं, चाहे वे सीजीआइ (कंप्यूटर-जेनरेटेड इमेजरी) या एआइ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से क्यों न बने हों.”

ओएमडी के लिए राय ने एडब्ल्यूबीआइ के दिशा-निर्देशों का पालन किया. उन्होंने सुनिश्चित किया कि कुत्तों को रेबीज-रोधी टीके लगे हों, और सेट पर एक कुत्ता-प्रशिक्षक मौजूद था. इसके साथ ही, उन कुत्तों को मुंबई से बिहार और असम ले जाने के लिए उचित व्यवस्था भी की गई थी.

क्रूरता नहीं, करुणा
मजे की बात यह है कि हॉलीवुड में पहले से ही कुत्ते-बिल्लियों को कहानी का अहम हिस्सा बनाने की समृद्ध परंपरा रही है, जबकि भारत धीरे-धीरे अब उसकी बराबरी कर रहा है. निर्देशक पद्मकुमार का कहना है, “भारत में अभी उस स्तर की हमदर्दी नहीं है.” हालांकि, उनका मानना है कि क्रिस्टल पीढ़ी यानी साल 2000 के बाद जन्मे लोग जानवरों के प्रति खास तौर पर संवेदनशील हैं.

यही वजह है कि राय को ओएमडी बनाना बेहद जरूरी लगा, खासकर जब अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों सरीख संस्थागत परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाने के सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले के बाद देसी कुत्तों के प्रति रवैया बेहद नकारात्मक है.

वह कहते हैं, “हम सब एक ही धागे से जुड़े हुए हैं. हम इंसानों ने ही सोचना शुरू किया कि दुनिया हमारी है और हमने सीमाएं बना दीं. दुनिया के जानवर हमें वफादारी और रहमदिली दिखाने तथा हमदर्दी सिखाने के लिए हैं.” 

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