
अगस्त की सात तारीख को आध्यात्मिक गुरु नीब करौरी बाबा पर बनी एक गुमनाम-सी फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई. ऐसा भी नहीं कि यह 2026 में उन पर बनी पहली हिंदी फिल्म थी; श्री बाबा नीब करौरी महाराज मई में आई और बिना कोई हलचल पैदा किए उतर भी गई. शुरू में हनुमान अंश भी उसी राह पर जाती दिखी और पहले हफ्ते महज 90 लाख रुपए कमा पाई. दूसरे हफ्ते में वह सिर्फ 27 सिनेमाघरों में चल रही थी.
लेखक-निर्देशक विशाल चतुर्वेदी और मुख्य अभिनेता शोभिनव सत्या, दोनों ही इस क्षेत्र में नए थे. वे जानते थे कि फिल्म को पूरी तरह हवा हो जाने से बचाने के लिए कुछ करना होगा. वे सड़क के रास्ते निकल पड़े और गुजरात, राजस्थान तथा दिल्ली में आखिरी बचे कुछ शो देख रहे दर्शकों से मिले और उनसे अपील की कि वे फिल्म के बारे में लोगों को बताएं. दर्शकों ने वैसा ही किया.
तीसरे हफ्ते में हनुमान अंश ने अपने नायक की तरह चमत्कार कर दिखाया. उसने 10 करोड़ रु. कमाए. यह बस शुरुआत थी. महज 1.7 करोड़ रु. के मामूली बजट में बनी फिल्म रिलीज के दो महीने बाद भी सिनेमाघरों में चल रही है और अब तक 400 करोड़ रु. से ज्यादा कमा चुकी है. इस साल की अब तक सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म धुरंधरः द रिवेंज की तरह हनुमान अंश भी एक सांस्कृतिक परिघटना बन गई है. सिनेमाघरों में दर्शकों के जूते उतारकर प्रार्थना करने या रोने के वीडियो ऑनलाइन घूम रहे हैं.
पेशे से आरजे जतिन मिश्र भी इसके आस्थावान प्रशंसकों में से हैं. वे तीन बार फिल्म देख चुके हैं और इसकी “ईमानदारी और सादगी” के मुरीद हैं. वे कहते हैं, “मुझे अच्छा लगा कि बुखार की शिकायत लेकर आए भक्त को बाबा डॉक्टर के पास जाने की व्यावहारिक सलाह देते हैं. ऐसा नहीं कि उन्हें कोई चमत्कारी पुरुष बताया गया है. कुछ दृश्यों ने तो रोंगटे खड़े कर दिए और मुझे खासा जज्बाती कर दिया.”


फिल्म की कामयाबी का जबरदस्त असर हुआ है. उत्तराखंड में बाबा के स्थान कैंची धाम में अब पर्यटकों की भीड़ उमड़ रही है, हालांकि इससे स्थानीय लोग नाराज हैं. शोभिनव को इसमें ऐन मौके पर सहायक निर्देशक से मुख्य अभिनेता की भूमिका अख्तियार करनी पड़ी थी. अब वे मास्क और टोपी के बिना सड़कों पर निकल नहीं सकते. पहचान लिए जाने पर लोग पहले उनके पैर छूते हैं, फिर सेल्फी मांगते हैं.
उनकी इतनी ही प्रतिक्रिया होती है, “सीता राम, सीता राम.” बड़ा मौका भांपकर सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन ने हाल ही नीब करौरी बाबा पर धारावाहिक का ऐलान किया. बड़े पैमाने पर धार्मिक टाइटल दर्ज कराने के लिए निर्माता कतार में लग गए हैं.
आध्यात्मिक गुरुओं पर धड़ाधड़ बायोपिक घोषित हो रही हैं. इनमें नई फिल्में रामदेव पीर और देवरहा बाबा पर हैं. साफ है, बॉलीवुड पर आस्था का जादू छाया है. लेकिन सबसे बड़ी फिल्म अभी आनी बाकी है. पूरे 4,000 करोड़ रु. के अपनी कथा जितने ही विराट बजट वाली रामायण इस दीपावली का सबसे बड़ा आकर्षण बनने को तैयार है.

हिंदुओं के सबसे प्रिय देवों में से एक भगवान राम की यह कथा दर्शक कभी सुनते नहीं थकते. नमित मल्होत्रा की प्राइम फोकस और अभिनेता यश की मॉन्स्टर माइंड क्रिएशंस की यह प्रस्तुति भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी फिल्म है.
आस्था निस्संदेह बड़ा आकर्षण होगी, लेकिन निर्माता शानदार विजुअल इफेक्ट्स और सितारों से सजे कलाकारों पर भी दांव लगा रहे हैं—राम बने हैं रणबीर कपूर, सीता के रूप में हैं साई पल्लवी, हनुमान बने हैं सनी देओल, रावण के रूप में यश और राजा दशरथ बने हैं दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक रामायण के मूल राम अरुण गोविल.
यह सिर्फ पहला भाग है. दूसरा भाग अगले साल आएगा. आस्था पर आधारित और भी फिल्में कतार में हैं—हनुमान पर दो फिल्में, जिनमें एक पूरी तरह एआइ निर्मित; एक फिल्म काली पर, परशुराम पर एनिमेटेड फीचर. कई अन्य भी.

वर्ष 2026 की इस सरप्राइज सुपरहिट फिल्म की कहानी मार्वल कॉमिक्स के लोगो वाली एक नोटबुक पर लिखी गई थी. मुंबई के अंधेरी स्थित अपने छोटे-से ऑफिस में हनुमान अंश के लेखक-निर्देशक और सह-निर्माता विशाल चतुर्वेदी उस किताब के पन्ने पलटते हैं.
उन्हें इस पर हैरानी होती है कि एक आध्यात्मिक गुरु पर बनी उनकी कम बजट की फिल्म कमाई के मामले में किसी सुपरहीरो वाली फिल्म को भी टक्कर दे रही है.
इसी ऑफिस से उनकी टीम ने फिल्म की एडिटिंग की, पोस्टर डिजाइन किए और आधे से ज्यादा विजुअल इफेक्ट्स का काम किया. चतुर्वेदी कहते हैं, “हनुमान अंश बनाने को लेकर मैं एक तरह से अड़ गया था.”
एक डॉक्टर से फिल्ममेकर बने विशाल ने पहली बार 2006 में उत्तराखंड में दोस्तों के साथ रोड ट्रिप के दौरान आध्यात्मिक गुरु नीब करौरी बाबा के बारे में जाना. घने कोहरे के बीच उनकी कार सड़क से फिसली और कैंची धाम के गेट के सामने जा रुकी.
यहीं से गुरु के बारे में और जानने का उनका सफर शुरू हुआ. धीरे-धीरे उन्हें यकीन हो गया कि बाबा का जीवन फिल्म बनाने के उपयुक्त है. स्क्रिप्ट लिखने से पहले उन्होंने गुरु पर एक किताब द डिवाइन डिटूर भी खुद पब्लिश की थी.


अब प्रोड्यूसर ढूंढ़ना बड़ी चुनौती थी. ये अलग बात है कि उनके पास कई फिल्मों में क्रिएटिव प्रोड्यूसर के तौर पर काम करने का अनुभव था. एक ओटीटी प्लेटफॉर्म ने तो चतुर्वेदी को यह कहकर मना कर दिया कि “हम इस तरह की कहानियां नहीं ढूंढ़ रहे.”
हनुमान अंश की सफलता इसकी साफ-सुथरी कहानी में छिपी है. बाबा के जीवन के कुछ किस्सों को उनके विचारों के साथ अच्छे से पिरोया गया है. चतुर्वेदी कहते हैं, “वे लोगों को यह कहकर बेहतर बनाने की कोशिश नहीं कर रहे कि मुझे सोना दो या मेरे पैर छुओ. वे कहते हैं, सबसे प्यार करो, राम राम लिखो और बोलो, भूखों को भोजन दो, भक्तों को प्रसाद दो.”
चतुर्वेदी को अगली फिल्म के लिए पहले ही प्रोड्यूसर मिल गया है, जो संत-कवि तुलसीदास पर आधारित भक्ति ड्रामा होगी. हनुमान अंश के प्रोड्यूसर इसका दूसरा पार्ट बनाने के लिए भी उत्साहित हैं. वे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को डिजिटल राइट्स के लिए अभी इंतजार करा रहे हैं, उस प्लेटफॉर्म को भी जिसने पहले उन्हें मना कर दिया था.

आस्था की लंबी छलांग
हनुमान अंश की कामयाबी आध्यात्मिक सिनेमा के लिहाज से पहले से ही खास रहे साल की अगली कड़ी है. जनवरी में लालोः कृष्ण सदा सहायते 100 करोड़ रु. से ज्यादा कमाकर अब तक की सर्वाधिक कमाई वाली गुजराती फिल्म बनी. निर्देशक अंकित सखिया, मुख्य अभिनेता करण जोशी, संगीतकार स्मित जय और गीतकार प्रेम दवे, सभी की यह डेब्यू फिल्म थी.
इसका विचार सखिया की अच्छाई को बढ़ावा देने और ईश्वर को रोजमर्रा की बातचीत में लाने की चाह से निकला. हिंदी में डब संस्करण के मुंबई में प्रचार के दौरान उन्होंने इस साल की शुरुआत में इंडिया टुडे से कहा था, “मैंने पाया कि दोस्तों के बीच भगवान की बात नहीं कर पाता. इसे कूल नहीं माना जाता, आपको पुराने ख्याल का समझा जाता है.” फिल्म में कृष्ण गुस्सैल और शराबी नायक लालो को बचाकर आध्यात्मिक सफर पर ले जाते हैं.
मई में कृष्ण पर बनी एक और फिल्म कृष्णावतारम पार्ट 1: हृदयम ने 40 करोड़ रु. कमाए. हनुमान अंश के शोभिनव की तरह कृष्ण बने सिद्धार्थ गुप्त की भी बतौर अभिनेता यह पहली फिल्म थी. वे कहते हैं, “फिल्म मिली तब मुझे अध्यात्म की जानकारी तो थी पर उस ओर झुकाव नहीं था. भगवद्गीता और दूसरे धर्मग्रंथ पढ़ने पर समझ आया कि कितनी बड़ी जिम्मेदारी मिली है. यह प्रक्रिया आपको नतीजे की फिक्र से दूर कर देती है.” अब गुप्त के दोस्त उनके सामने गाली नहीं देते कि कहीं कान्हाजी नाराज न हो जाएं.
इसकी शुरुआत पिछले साल ही हो गई थी. होम्बाले फिल्म्स की महावतार नरसिंह 2025 की चौंकाने वाली ब्लॉकबस्टर बनी. महज 15 करोड़ रु. में बनी फिल्म ने सिनेमाघरों से करीब 250 करोड़ रु. कमाए और अकेले के बूते पर भारतीय एनिमेशन उद्योग को खासा बढावा दिया. पहली बार फिल्म बनाने वाले आश्विन कुमार को लगता था कि हिंदू पौराणिक कथाओं और संस्कृति का उत्सव मनाने वाली कहानियों की कमी है.
यह फिल्म उसी कमी को पूरा करने की कोशिश थी. वे कहते हैं, “अगर एक करोड़ लोग कुंभ मेले में जा सकते हैं तो साफ है कि आस्था की कहानियां पसंद करने वाला बहुत बड़ा जनसमूह है. हमें बस उनके सामने वे कथाएं लानी हैं जिनमें वे लोग सचमुच विश्वास करते हैं, और यह काम आत्मविश्वास से करना होगा.”

होम्बाले फिल्म्स कुमार के साथ दशावतार फ्रैंचाइज बनाने का वादा कर चुकी है. होम्बाले फिल्म्स के सह-संस्थापक चालुवे गौड़ा कहते हैं, “भारत में लोककथाओं, पौराणिक कथाओं और परंपराओं की अद्भुत संपदा है. हमारा मानना है कि इन कहानियों को वैसा ही भव्य और सिनेमाई रूप मिलना चाहिए जिसकी वे हकदार हैं.”
विष्णु के अलग-अलग अवतारों पर छह और फिल्में दो-दो साल के अंतराल पर बनाते हुए कुमार बच्चों को यह भी दिखाना चाहते हैं कि हिंदू देवता मार्वल सुपरहीरो से किसी तरह कम नहीं, शायद बेहतर ही हैं.
वे कहते हैं, “अगर हम अपने देवताओं को बड़े परदे पर वापस नहीं लाए तो बच्चों को स्पाइडर-मैन, सुपरमैन और बैटमैन जैसे पश्चिमी किरदारों की आदत पड़ जाएगी. पश्चिम को आदर्श बनाने के लिए नायक गढ़ने पड़े. हमें ऐसा नहीं करना. हमारे पास अपने बहुत से नायक हैं.” उनके मुताबिक, यह फ्रैंचाइज हमारे देवताओं की “वीरता” दिखाने के साथ जेन अल्फा और जेन ज़ी को धर्म, न्याय, त्याग और परिवार के महत्व से भी परिचित कराएगी.
भारतीय देवता पर फ्रैंचाइज बनाने वाली होम्बाले अकेली कंपनी नहीं है. कृष्णावतारम बनाने वाले क्रिएटिवलैंड स्टूडियोज के राज कुरुप ने हाल ही कृष्ण की “कालजयी कथाओं, ज्ञान और भावना” को पेश करने वाले ‘ट्रांसमीडिया यूनिवर्स’ का ऐलान किया. द आर्ट ऑफ लिविंग के वर्ल्ड फोरम फॉर आर्ट्स ऐंड कल्चर के समर्थन वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना में फिल्मों के अलावा मर्चेंडाइज, थीम पार्क, म्यूजिकल, वीडियो गेम और बच्चों के शैक्षिक शो की योजना है.
मीडिया के एक कार्यक्रम में कुरुप ने कहा, “यह धर्म या देवताओं की बात नहीं. ये हमारी कहानियां हैं. मैं संस्कृति को मजेदार और सबकी पहुंच में लाना चाहता हूं. हमारी समृद्ध विरासत केवल बुजुर्गों के लिए नहीं, बच्चों के समझने के लिए भी है.”


जड़ों की ओर वापसी
पौराणिक कथाओं को कमाऊ शैली मानने का फिल्म उद्योग का बढ़ता भरोसा और हिंदू आस्था पर आधारित फिल्मों की बाढ़ भारतीय सभ्यता को फिर अपनाने तथा उसके इतिहास को गर्व के स्रोत के रूप में पेश करने की बड़ी कोशिश को जाहिर करती है. सद्गुरु के साथ ‘रामायण लिव्ज ऑन’ बातचीत में रामायण के निर्माता मल्होत्रा ने कहा कि स्कूलों में यह महाकाव्य न पढ़ाए जाने से वे “परेशान” हैं.
उन्होंने कहा, “हमने ब्रिटिश इतिहास और उन्होंने हमारे साथ क्या किया, यह पढ़ा. मुगल इतिहास भी पढ़ा...लेकिन हम यह नहीं पढ़ रहे कि हम सबकी शुरुआत कहां से हुई.” वे कई बार कह चुके हैं कि रामायण वाली फिल्में भारतीयों को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व कराने और “पीड़ित मानसिकता” मिटाने की उनकी इच्छा से निकली हैं.
अब तक सात ऑस्कर जीत चुकी विजुअल इफेक्ट्स कंपनी डीएनईजी स्टूडियोज के सीईओ मल्होत्रा रामायण को अपना जुनूनी प्रोजेक्ट बताते हैं, जिससे वे भारतीय सिनेमा को वैश्विक मंच पर ऊंचा उठाना चाहते हैं. इस साल एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, “हमें ऐसा कुछ लाना है जो दुनिया को पहले कभी न देखे अंदाज में बताए कि हम कौन हैं, कहां से आए हैं और हमारा इतिहास कितना समृद्ध है. रामायण में वह सब कुछ है जो हॉलीवुड की सबसे भव्य फिल्मों में होता है.”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित संगठन भारतीय चित्र साधना इस भावना से आसानी से सहमत होगा. 2016 में बना संगठन ‘भारतीय’ मूल्यों को बढ़ावा देने वाली फिल्मों को प्रोत्साहित और सिनेमा के जरिए ‘भारतीय’ लोकाचार को फिर स्थापित करना चाहता है. संघ के एक अंदरूनी सूत्र कहते हैं, “इतिहास की व्याख्या, धार्मिक समूहों और कई ऐतिहासिक घटनाओं पर साहित्य की कमी जैसे मुद्दे हैं. हम फिल्मकारों को सभ्यता के लिए अहम विषय उठाने को कहते हैं.”
विश्व हिंदू परिषद के एक शीर्ष प्रचारक के मुताबिक, पश्चिम हिंदू संस्कृति को “मिथक” की श्रेणी में रखता है लेकिन ‘भारत’ में ये मूल्य “परंपरा” या “धार्मिक” आख्यानों—कथाओं, दर्शन, किंवदंतियों और सांस्कृतिक ज्ञान—का हिस्सा हैं. इस शैली की लोकप्रियता और कमाई बढ़ने के साथ चित्र साधना संगठन देवताओं को पर्दे पर दिखाने का मानक बनाना चाहत है जबकि निर्माण फिल्मकारों पर छोड़ता है.


हालांकि, कुछ लोग पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों की इस बाढ़ को चिंताजनक मानते हैं. न्यूकैसल की नॉर्थम्ब्रिया यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ डिजाइन, आर्ट्स ऐड क्रिएटिव इंडस्ट्रीज में असिस्टेंट प्रोफेसर संघिता सेन कहती हैं, “शुरुआती भारतीय सिनेमा में पौराणिक कथाओं ने फिल्म निर्माताओं को पहले से स्थापित कहानियां और जाने-पहचाने पात्र दिए. साथ ही इसके माध्यम से ब्रिटिश औपनिवेशिक सेंसरशिप से निबटने, परोक्ष रूप से उपनिवेशवाद-विरोधी भावनाओं को व्यक्त करने और भारत की सांस्कृतिक विरासत पर गर्व का भाव जगाने में भी मदद मिली.”
वे आगे जोड़ती हैं, “लेकिन हमें इन ऐतिहासिक उपयोगों और आज के उन प्रयासों के बीच फर्क करना होगा, जिनमें पौराणिक कथाओं को एक 'सत्यापन योग्य इतिहास' के रूप में पेश किया जा रहा है. आज कुछ फिल्में एक व्यापक राजनीतिक ढांचे के भीतर हिंदुत्व की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए पौराणिक कथाओं का इस्तेमाल कर रही हैं. ये फिल्में भारत की मूल रूप से बहुलवादी और विविध सांस्कृतिक पहचान के बजाय, एक एकसमान, जातीय-राष्ट्रवादी और बहुसंख्यकवादी पहचान को प्राथमिकता देती हैं. समस्या पौराणिक कथाओं से नहीं है, बल्कि उनके राजनीतिकरण और प्रोपेगेंडा के रूप में उनके इस्तेमाल से है.”
सेन इसका उदाहरण देते हुए अक्षय कुमार की फिल्म राम सेतु का जिक्र करती हैं, जो भारत और श्रीलंका के बीच पौराणिक सेतु पर भगवान राम की यात्रा से जुड़ी है.

दर्शकों के लिए दैवी हस्तक्षेप देखना उनके विश्वास को मजबूत करता है और पूरे परिवार के साथ देखने लायक मनोरंजन भी देता है. मुंबई के प्रमुख मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी के मुताबिक, महावतार नरसिंह, लालो और हनुमान अंश जैसी फिल्मों की ओर बढ़ता झुकाव बिखराव से जूझती दुनिया में मन का गुबार निकालने और उम्मीद पाने की भीतरी जरूरत से निकला है.
वे कहते हैं, “दुनिया भर में उथल-पुथल है और कोई उद्धारक नहीं दिखता. भारतीय ऐसा ‘चेहरा’ देखना चाहते हैं जो उन्हें पाप और पीड़ा से बचाए. वे मानो कह रहे हैं कि विष्णु का ग्यारहवां अवतार आए और कुछ करे. लोग चमत्कार खोज रहे हैं.”


देवों को नाटकीय बनाना
भक्ति सिनेमा हिंदी फिल्मों के लिए नया नहीं है. फिल्मकारों ने कैमरा थामकर मूक फिल्में बनानी शुरू कीं तो यह उनकी कल्पना को लुभाने वाली शुरुआती शैलियों में था. भारतीय सिनेमा की शुरुआत करने वाली दादासाहेब फाल्के की राजा हरिश्चंद्र (1913) से लेकर प्रभात स्टूडियोज की 1930 और 1940 के दशक की गोपाल कृष्ण, संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम जैसी फिल्मों तक, सिनेमा आम लोगों में धार्मिक मूल्य फैलाने का जरिया था.
नाट्यशास्त्र में बताए नौ रसों में से एक भक्ति को सिनेमा ने अपनाए रखा. यह सिलसिला 1970 के दशक में जय संतोषी मां (जेएसएम) और शिरडी के साईं बाबा के साथ शिखर पर पहुंचा. 1975 में रिलीज जय संतोषी मां ने बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर शोले को भी कड़ी टक्कर दी. फिल्म की देवी एक महिला को जालिम ससुरालवालों को सहने की ताकत देती है और उसे मौत के मुंह से भी वापस लाती है.
अस्सी के दशक तक पौराणिक कथाएं टेलीविजन पर चली गईं और बी.आर. चोपड़ा की महाभारत तथा रामानंद सागर की रामायण के जरिए करोड़ों घरों में पहुंचीं. दोनों राष्ट्रीय जुनून बन गए और अभूतपूर्व दर्शक जुटाए. अमित खन्ना ने अपनी 2019 की किताब वर्ड्स, साउंड्स, इमेजेज: अ हिस्ट्री ऑफ मीडिया ऐंड एंटरटेनमेंट इन इंडिया में लिखा है, “प्रसारण के दौरान लगभग पूरा देश ठहर जाता था.
करीब 90 फीसद की असंभव-सी दर्शक संख्या हासिल करने वाले ये धारावाहिक कारोबारी ब्लॉकबस्टर थे और विज्ञापनों से करोड़ों रुपए कमाते थे.” फिल्म उद्योग ने मानो पौराणिक कथाएं टेलीविजन के लिए छोड़ दी थीं.
इस बीच बॉलीवुड ने देवताओं से नजर हटाकर ‘धर्मगुरुओं’ पर डाली और उनकी ताकत, प्रभाव तथा धोखा देने की क्षमता की पड़ताल की. राजकुमार हीरानी की 2014 की सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म पी.के. में आमिर खान का एलियन किरदार धर्म को कारोबार बनाने पर व्यंग्य का जरिया बनता है, जहां फर्जी बाबा मुनाफे के लिए आस्था का फायदा उठाते हैं.
वह खलनायक तपस्वी महाराज (सौरभ शुक्ल) के झूठ उजागर करता है. हालांकि कुछ धर्मगुरुओं ने अपने उपदेश फैलाने की सिनेमा की ताकत पहचानी और खुद फिल्मकार बन गए. अब दोषी ठहराए जा चुके गुरमीत राम रहीम सिंह ने एमएसजी: द मैसेंजर ऑफ गॉड से शुरू करके चार फिल्में बनाईं, जिनके केंद्र में वे खुद और उनके प्रति भक्ति थी.

चतुर्वेदी धार्मिक गुरुओं का “ढोंगी-पाखंडी” रूप दिखाने वाली फिल्मों के बढ़ते चलन से परेशान हैं. वे कहते हैं, “खासकर वेब सीरीज के खलनायकों की वेशभूषा और भाषा देखिए तो वे तिलक और कलावा पहने मिलेंगे. तिलकधारी व्यक्ति फिल्म का नायक क्यों नहीं हो सकता?”
उनका इशारा सैक्रेड गेम्स, लीला, आश्रम और हुंकार: द रोर जैसे शो तथा महाराज और सिर्फ एक बंदा काफी है जैसी फिल्मों की ओर है, जिनमें हिंदू धर्मगुरुओं को यौन शोषक या खतरनाक इरादों वाले रहस्यमय व्यक्ति की तरह दिखाया गया. हालांकि हाल ही बॉलीवुड ब्रह्मास्त्र (शिव) जैसी फिल्मों से देवताओं को फिर आकर्षक बनाने की कोशिश कर रहा है.
देवताओं का आकर्षण केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं. तमिल और तेलुगु सिनेमा में भी महाभारत और रामायण से प्रेरणा लेकर ब्लॉकबस्टर बनाने का अच्छा-खासा समृद्ध इतिहास है. इनमें अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु और बलराम की बेटी शशिरेखा पर केंद्रित पौराणिक फिल्म मायाबाजार (1957) शामिल है.
एस.एस. राजमौलि और नाग आश्विन दोनों इसे अपनी पसंदीदा फिल्मों में गिनते हैं और अपनी कहानियों में हिंदू देवताओं को असरदार ढंग से पिरोते हैं—चाहे आरआरआर के अब प्रतिष्ठित बन चुके ऐक्शन दृश्य में राम चरण की राम-प्रेरित छवि हो या साइ-फाइ कल्कि 2898 एडी में अमिताभ बच्चन के अश्वत्थामा और प्रभास के कर्ण.
तेलुगु फिल्मकार प्रशांत वर्मा ने भी भारतीय पौराणिक कथाओं से प्रेरित सिनेमाई संसार का ऐलान किया है. हनु-मान (2024) के बाद उनकी अगली फिल्म महाकाली जनवरी में आएगी, फिर ऋषभ शेट्टी और राणा डग्गुबाती के साथ जय हनुमान.


भक्ति की लहर
महाकाव्यों और देवताओं पर फिल्में बनाना नया चलन हो सकता है, लेकिन धार्मिक भावनाएं आहत करने का खतरा पुराना है. आश्विन कुमार कहते हैं, “यह दोधारी तलवार है. हमें मूल भावना, शास्त्र और कथा के प्रति सच्चा रहना होगा, वरना दांव बुरी तरह से उलटा पड़ सकता है.” चतुर्वेदी भी फिल्मकारों की जिम्मेदारी पर जोर देते हैं—सिर्फ भक्तों के प्रति नहीं, बल्कि पर्दे पर दिखाए गए धर्मगुरुओं के परिवारों के प्रति भी.
रामायण का पहला टीजर आने पर निर्माताओं को सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना झेलनी पड़ी थी. बारीक नजर वाले दर्शकों ने सीजीआइ के कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर सवाल उठाए. इससे एक बात साफ हुई: दर्शक पौराणिक महाकाव्य परदे पर देखना चाहते हैं लेकिन उन्हें जीवंत बनाने के तरीके को लेकर उतने ही सख्त हैं.
मीडिया और मनोरंजन रिसर्च तथा कंसल्टिंग एजेंसी ऑरमैक्स के सह-संस्थापक शैलेश कपूर भी उभरते चलन को जरूरत से ज्यादा भुनाने की बॉलीवुड की आदत से आगाह करते हैं. वे कहते हैं, “हिंदी सिनेमा में उभरते मौके को पहचानने और फिर जरूरत से ज्यादा सप्लाइ करके उसे खत्म करने की गजब क्षमता है.” उनके मुताबिक, हनुमान अंश की कामयाबी दिखाती है कि दर्शकों का दिल छूने के लिए आध्यात्मिक फिल्म का “बहुत भव्य तमाशा” के रूप में होना जरूरी नहीं.
वे चेताते हैं कि धार्मिक या आध्यात्मिक रंग वाली हर फिल्म को दर्शक मिलेंगे, ऐसा मानना निर्माताओं को महंगा पड़ सकता है. कपूर कहते हैं, “दूसरी शैलियों के मुकाबले इसमें फिल्म की कामयाबी का अंदाजा लगाना सबसे मुश्किल है. पता नहीं होता कि भक्त समाज फिल्म को अपनाएगा या नहीं. या इस पर किस तरह से प्रतिक्रिया करेगा. आस्था पर बनी शैली शायद दिखावे को सबसे जल्दी पहचान लेती है.”



चतुर्वेदी आध्यात्मिक जड़ों में बढ़ती दिलचस्पी का स्वागत करते हैं, लेकिन उन्हें इस बात की चिंता है कि फिल्मकार आस्था को कमाई का पक्का नुस्खा और सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझने लगे हैं.
वे कहते हैं, “मायने यह रखता है कि आप विषय को कितनी ईमानदारी और संवेदनशीलता से बनाते हैं. जब तक आपको खुद विश्वास नहीं होगा, फिल्म नहीं चलेगी.” बाबा की दूसरी कड़ी शुरू करने से पहले उनकी एक और आध्यात्मिक फिल्म आने वाली है संत और कवि तुलसीदास पर आधारित राम बोला.
ये फिल्में भारतीय सिनेमा में आध्यात्मिक जागरण लाती हैं या नहीं, यह देखना बाकी है. मगर इतना साफ है कि बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के लिए अब आसमान छूता बजट और भव्य सेट जरूरी नहीं. बड़े सितारे भी नहीं. हनुमान अंश के मुख्य अभिनेता शोभिनव का रातोरात उभार इसकी मिसाल है. लखनऊ में एक शिक्षक के बेटे शोभिनव ने मुंबई में करीब एक दशक तक संघर्ष किया, फिर संयोग से यह भूमिका मिली.
फिल्म रिलीज होने के दो महीने बाद भी वे उसी रूप और अपने किरदार जैसे व्यवहार के साथ प्रचार में जुटे हैं. वे हंसते हुए कहते हैं, “बाबा तो बन गया हूं.” उन्हें एक ही तरह के किरदार मिलने की चिंता नहीं, न आगे की बेचैनी. वे कहते हैं, “मैं एकदम अलग कुछ नहीं करूंगा. सिर्फ वही प्रस्ताव लूंगा जो मेरी मर्यादा के भीतर है.”
वे अपना फिल्मी सफर उस ईश्वर और गुरु के हाथों में छोड़कर संतुष्ट हैं, जिन्हें वे यहां तक पहुंचने का श्रेय देते हैं. उन्हीं के शब्दों में, “पहले मेरे पास कुछ नहीं था. अब लालच कैसे कर सकता हूं? अगर बाबा से इतना भी नहीं सीखा तो फिर इस तरह का रोल करने का फायदा ही क्या?”

