
यह लड़ाई कुछ वर्ग सेंटीमीटर जगह के लिए है लेकिन इससे तय हो सकता है कि करोड़ों भारतीय क्या खाने का फैसला कैसे करते हैं. हम बात कर रहे हैं खाद्य उत्पादों के ऊपर छपने वाले लेबल की.
सुपरमार्केट में रंगीन पैकेटों के सामने ‘हाइ प्रोटीन’, ‘नो ऐडेड शुगर’, ‘मल्टीग्रेन’, ‘हार्ट हेल्दी’ या ‘विटामिन से भरपूर’ जैसे लुभावने दावे दिखते हैं. लेकिन उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा आम तौर पर पैकेट के पीछे पोषण तालिका में छोटे और अबूझ लगने वाले शब्दों में लिखी होती है, जिसे ठीक से पढ़-समझ पाना तक मुश्किल होता है.
कई अध्ययनों में यह बार-बार सामने आया है कि इनमें किसी भी चीज की ज्यादा मात्रा सेहत के लिए बेहद नुक्सानदेह हो सकती है. दशकों तक इस व्यवस्था पर बहुत कम ध्यान गया. लेकिन अब इसका बचाव करना मुश्किल हो गया है क्योंकि देश में बीमारियों की तस्वीर चिंताजनक ढंग से बदली है.
पैकेटबंद और ज्यादा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ने के साथ डायबिटीज, मोटापा, हाइ ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियां भारी नुक्सान पहुंचा रही हैं. इसीलिए पैकेट के ऊपर चेतावनी देने यानी फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (एफओपीएल) का तकनीकी दिखने वाला विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा.
अदालत गैर-लाभकारी संस्था 3एस ऐंड आवर हेल्थ सोसाइटी की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है. इसमें ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर मोटी चेतावनी देने की मांग की गई है. इससे नियामकों, खाद्य कंपनियों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तक सीमित बहस अचानक राष्ट्रीय मुद्दा बन गई है.
क्या भारतीय उपभोक्ताओं को अपने खाने में सेहत के लिए नुक्सानदेह सामग्री की ज्यादा मात्रा के बारे में साफ और दो-टूक चेतावनी पाने का अधिकार है? और देश के 140 अरब डॉलर (13.3 लाख करोड़ रु.) के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के साथ इंसाफ करते हुए ऐसी चेतावनी कैसे दी जाए?

सेहत की चेतावनी
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) को यह श्रेय तो दिया जा सकता है कि उसने भ्रामक विज्ञापनों, झूठे दावों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन को लेकर कई खाद्य कंपनियों को 150 से ज्यादा नोटिस भेजे हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत आने वाले इस नियामक की कार्रवाई के दायरे में नेस्ले, पेप्सिको, कोका-कोला और रेड बुल इंडिया जैसी बड़ी एफएमसीजी कंपनियां शामिल हैं.
हाल ही साफ-सफाई के नियमों के उल्लंघन पर सीजी फूड्स इंडिया को भुजिया नमकीन बनाना बंद करने को कहा गया. लेकिन कुछ सामग्रियों के खतरों से उपभोक्ताओं को आगाह करने वाली एफओपीएल पर एफएसएसएआइ ने मसौदों और सलाह-मशविरे में कई साल लगा दिए. इस देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई. शीर्ष अदालत ने 10 सितंबर की सुनवाई में कहा, “हमें लोगों, खासकर बढ़ते बच्चों की सेहत की चिंता है. सभी को आगे आकर राष्ट्रीय हित में सहयोग करना चाहिए.”
कोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में एफएसएसएआइ और केंद्र से प्रस्तावित एफओपीएल व्यवस्था के कई पहलुओं पर दोबारा विचार करने को कहा है. न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के. विनोद चौहान की पीठ ने एफएसएसएआइ से 13 सीधे सवाल पूछे हैं. अगली सुनवाई 28 सितंबर को रखी गई है.
अलग-अलग स्वास्थ्य अध्ययनों के नतीजे इस मामले को और जरूरी बनाते हैं. इनमें भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) समर्थित अध्ययन भी है, जो 2023 में द लैंसेट में प्रकाशित हुआ था. उसके मुताबिक, देश में 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज और 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज के साथ जी रहे थे.
अध्ययन में मोटापे की दर 28.6 फीसद और हाइ ब्लड प्रेशर की दर 35.5 फीसद बताई गई. समस्या इतनी बड़ी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोटापे और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का बढ़ता बोझ घटाने के लिए भारतीयों से चीनी और तेल की खपत 10 फीसद कम करने की अपील की.
खतरा इसलिए बढ़ा है क्योंकि मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) जैसे एडिटिव और प्रिजर्वेटिव पर पुरानी चिंताओं के अलावा अब पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के पीछे नई सामग्रियों की लंबी सूची दिखने लगी है (देखें: दर्जन भर नए खलनायक). इनमें माल्टोडेक्सट्रिन, ग्लूकोज-फ्रुक्टोज सिरप, प्रोटीन आइसोलेट, इमल्सिफायर, मॉडिफाइड स्टार्च, अनजाने स्वीटनर और प्रोटीन सप्लीमेंट जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड एडिटिव शामिल हैं.
अब वक्त की जरूरत है कि खाद्य नियामक ज्यादा सक्रियता दिखाएं, जैसा महाराष्ट्र के खाद्य और औषधि प्रशासन (एफडीए) आयुक्त तुकाराम मुंढे गंदे हालात में खाना बनाने या परोसने वाले रेस्तरां के खिलाफ फटाफट कार्रवाई करके कर रहे हैं (साथ में देखें: कान कसते ही तमतमाए).’’
फ्रंट लेबल की लड़ाई
जानकारों का कहना है कि खाने के बारे में सोच-समझकर फैसला लेने के लिए उपभोक्ताओं को साफ और काम की लेबलिंग चाहिए. सभी पैकेटबंद खाद्य पदार्थ नुक्सानदेह नहीं होते, न ही उनकी सामग्री की जानकारी पूरी तरह गायब होती है. देश में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर पोषण संबंधी जानकारी देना जरूरी है और कंपनियां ऐसा करती भी हैं. बहस इस पर है कि जानकारी कहां और कितनी साफ दिखाई देती है.
उपभोक्ता सुपरमार्केट में खड़े होकर आम तौर पर चीनी या सोडियम के ग्राम की तुलना रोजाना की सुझाई गई सीमा से नहीं करते. न्यूट्रिशनल एडवोकेसी इन पब्लिक इंटरेस्ट (एनएपीआइ) के संयोजक डॉ. अरुण गुप्ता बताते हैं कि खरीदार कोई उत्पाद चुनने में सिर्फ चार से 20 सेकंड लगा सकता है. इसलिए पैकेट के सामने लिखा ब्योरा बेहद अहम है.
उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के पूर्व सचिव रोहित कुमार सिंह कहते हैं, “पैकेट पर लिखा ब्योरा महत्वपूर्ण है. कोई पीछे लिखे छोटे अक्षर नहीं देखता.” यही एफओपीएल बहस का मूल है. खाद्य कंपनियां सामने वाले हिस्से की ताकत लंबे समय से समझती हैं. इसीलिए उनके सबसे आकर्षक चित्र और लुभावने दावे वहीं होते हैं.
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इन दावों को परखने के लिए जरूरी जानकारी को भी उतनी ही प्रमुख जगह मिलनी चाहिए. सिंह इससे सहमत हैं. उनके मुताबिक, पोषण की विस्तृत जानकारी पैकेट के पीछे रह सकती है या क्यूआर कोड से दी जा सकती है. लेकिन वे कहते हैं, “बड़ा सिद्धांत यह होना चाहिए कि सामने का लेबल इतना सरल हो कि उपभोक्ता एक पल में समझ सके कि उत्पाद में चीनी, वसा या कोई दूसरी चीज ज्यादा है या नहीं. वहीं, इसके नियम वैज्ञानिक आधार पर बिल्कुल मजबूत होने चाहिए.”
सबूत बताते हैं कि ऐसी चेतावनियां असर डाल सकती हैं. मल्टीडिसिप्लिनरी डिजिटल पब्लिशिंग इंस्टीट्यूट (एमडीपीआइ) के 2022 में प्रकाशित एक रैंडमाइज्ड फील्ड प्रयोग में 2,869 भारतीय उपभोक्ताओं को एफओपीएल के कई प्रारूपों में से चुनना था.
उनमें छह कोनों वाला चेतावनी लेबल, हेल्थ स्टार रेटिंग और हरे, पीले तथा लाल रंग वाला ट्रैफिक लाइट सिस्टम शामिल था. ज्यादातर लोगों ने ‘चीनी अधिक’ या ‘नमक अधिक’ लिखे सीधे छह कोनों वाले चेतावनी चिह्न को पसंद किया. एफएसएसएआइ अब चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की तय सीमा पार करने वाले उत्पादों के लिए छह कोनों वाले लाल चेतावनी लेबल की ओर बढ़ा है. सिद्धांत रूप में यह सरल लगता है, लेकिन उसे लागू करने पर बहस जटिल है.
पहला सवाल हैः किस उत्पाद पर चेतावनी लगे? एफएसएसएआइ ने पहले प्रस्ताव दिया था कि तीन पोषक तत्वों—अतिरिक्त चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट—में से कम से कम दो की मात्रा तय सीमा से ज्यादा होने पर ही चेतावनी दी जाए. एनएपीआइ के गुप्ता इसे “बहुत बड़ी खामी” बताते हैं. मसलन, कोला या किसी दूसरे मीठे उत्पाद में बहुत ज्यादा चीनी हो सकती है जबकि वसा और नमक कम हो सकता है. ऐसे नियम में वह चेतावनी से पूरी तरह बच सकता है.
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का सीधा सवाल हैः कोई एक सामग्री ही नुक्सानदेह स्तर पर है तो लोगों को आगाह करने के लिए दूसरी सामग्री का ज्यादा होना क्यों जरूरी है? इसी तरह एफएसएसएआइ के चरणबद्ध अमल के प्रस्ताव पर भी ऐसी ही चिंता है. शुरुआत में प्रस्ताव था कि पहले चरण में उन उत्पादों को शामिल किया जाए, जिनमें दो या ज्यादा पोषक तत्व तय सीमा से ज्यादा हैं.
सिर्फ एक पोषक तत्व की सीमा पार करने वाले उत्पादों को अगले चरण में शामिल किया जाता. लेकिन दूसरे चरण की कोई समयसीमा तय नहीं थी. हैदराबाद की बाल रोग विशेषज्ञ और 3एस ऐंड आवर हेल्थ सोसाइटी की प्रवक्ता डॉ. शिवरंजनी संतोष को अंदेशा है कि दूसरा चरण अनिश्चित समय तक टल सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने भी 10 सितंबर की सुनवाई में पूछा कि एफएसएसएआइ दो चरणों में नरम नियम लागू करने की ओर क्यों बढ़ रहा है, जिसमें पहले चरण में छह कोनों वाली लाल चेतावनी के लिए दो पोषक तत्वों का सीमा पार करना जरूरी है.
जवाब में एफएसएसएआइ ने कहा कि वह पहले प्रस्तावित नियमों से ज्यादा सख्त एफओपीएल मानक अपनाएगा और दो चरणों में अमल छोड़ने के लिए भी तैयार है. पीठ एफएसएसएआइ से यह भी जानना चाहती है कि उन्होंने चिंता वाले प्रत्येक पोषक के लिए अलग छह कोनों वाला चिह्न क्यों नहीं अपनाया.

अदालत ने नियामक से प्रस्तावित लाल रंग के लेबल पर पुनर्विचार करने को कहा क्योंकि यह रंग गैर शाकाहारी सामग्री होने का भ्रम पैदा कर सकता है. अतिरिक्त और कुल चीनी तथा वसा के बीच फर्क के भी बड़े नतीजे हैं.
संतोष के मुताबिक, भारतीयों के लिए आइसीएमआर-एनआइएन आहार दिशानिर्देश 2024 में प्रति 100 ग्राम कुल चीनी और कुल वसा की सीमा तय है. इसके उलट एफएसएसएआइ का प्रस्ताव अतिरिक्त चीनी और अतिरिक्त सैचुरेटेड फैट पर केंद्रित है. इसलिए प्राकृतिक रूप से ज्यादा मीठा जूस चेतावनी से बच सकता है, बशर्ते उसमें अलग से चीनी न मिलाई गई हो.
सितंबर 2026 में देश के 328 जिलों के 20,525 लोगों पर हुए लोकलसर्किल्स सर्वे में 53 फीसद ने कहा कि चेतावनी सिर्फ मिलाई गई मात्रा के बजाए चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की कुल मात्रा पर आधारित होनी चाहिए. अक्षरों का आकार भी विवाद का विषय बन गया है. एफएसएसएआइ ने चेतावनी के अक्षरों को पीछे लिखी पोषण जानकारी से सिर्फ एक पॉइंट बड़ा रखने का प्रस्ताव दिया. पोषण जानकारी आमतौर पर छह से आठ पॉइंट के अक्षरों में छपती है. गुप्ता के मुताबिक, इससे मकसद पूरा नहीं होगा.
वे कहते हैं, “बड़े अक्षर न सिर्फ ज्यादा आसानी से पढ़े जाते हैं, बल्कि पाठक को यह भी बताते हैं कि पहले क्या पढ़ना जरूरी है.” अभियान चलाने वालों का कहना है कि मेक्सिको और कई दूसरे देशों में चेतावनियां जानबूझकर ध्यान खींचने वाली बनाई गई हैं. भारत जैसे भाषाई विविधता वाले देश में यह सवाल भी है कि चेतावनी किस भाषा में हो. कार्यकर्ता कनाडा की अंग्रेजी-फ्रेंच व्यवस्था की तरह कम से कम हिंदी और अंग्रेजी में लेबल देने की मांग कर रहे हैं.


चिंतित क्यों है फूड इंडस्ट्री
भारत के पैकेटबंद खाद्य उद्योग की इस बात को लेकर वाजिब चिंताएं हैं कि लाल चेतावनी चिह्न से क्या संदेश जाएगा. बिजनेस टुडे टीवी के साथ हाल ही एक बातचीत में एफएसएसएआइ के सीईओ रजित पुन्हानी ने माना कि पैकेजिंग और लेबल के नियमों को लेकर उद्योग का दबाव है.
हालांकि उन्होंने कहा कि इस दबाव को नकारना आसान है क्योंकि उन्हें उपभोक्ताओं का समर्थन हासिल है. उन्होंने यह भी कहा कि नए नियम बनाने में समय लगता है क्योंकि हाल के समय में उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ी है और एफएसएसएआइ खुद सिर्फ 18 साल पुरानी संस्था है.
उद्योग से जुड़े पक्ष पोषण जानकारी देने का विरोध नहीं कर रहे. उनका ऐतराज किसी उत्पाद की जटिल पोषण रूपरेखा को सिर्फ चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट तक सीमित करने पर है. उनमें से किसी एक की अपेक्षाकृत ज्यादा मात्रा वाला उत्पाद प्रोटीन, फाइबर या दूसरे पोषक तत्व भी दे सकता है.
उद्योग संगठन पीएचडीसीसीआइ की खाद्य प्रसंस्करण समिति के अध्यक्ष अनिल राजपूत कहते हैं कि नमक, चीनी और वसा की जरूरत उम्र, पेशे, शारीरिक गतिविधि, भौगोलिक स्थिति और जलवायु के मुताबिक हर व्यक्ति में काफी अलग हो सकती है. वे कहते हैं, “भारत जैसे विविधता वाले देश में इन जरूरतों के लिए समान मानक तय करना जरूरी नहीं कि उपभोक्ताओं के हित में हो.”
उद्योग को यह भी डर है कि उपभोक्ता छह कोनों वाले प्रमुख लाल चिह्न को “इस पोषक तत्व का सावधानी से सेवन करें” की चेतावनी के बजाए, जैसा एक विशेषज्ञ ने कहा, सीधे यह समझें कि “यह खाना आपके लिए खराब है.”
हल्दीराम, कोका-कोला और आइटीसी समेत 600 से ज्यादा एफएमसीजी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन (एआइएफपीए) ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर प्रस्तावित ढांचे की और वैज्ञानिक समीक्षा की मांग की है. उसका तर्क है कि एफओपीएल की सीमा प्रति 100 ग्राम या 100 मिलीलीटर के बजाए सर्विंग साइज—यानी एक बार में आम तौर पर खाई जाने वाली मात्रा—पर आधारित होनी चाहिए.
लागत खर्च भी एक मुद्दा है. डिजिटल फूड लेबलिंग समाधान कंपनी लेबलब्लाइंड की संस्थापक रशीदा वापीवाला कहती हैं कि हजारों उत्पादों की पैकेजिंग बदलना सिर्फ कंप्यूटर डिजाइन बदलने का काम नहीं है. नई प्रिंटिंग प्लेट, सिलिंडर या डाइ की जरूरत पड़ सकती है.
पैकेट का आकार बदला तो निर्माताओं को नए सांचे भी बनवाने पड़ सकते हैं. फिर भी वापीवाला मानती हैं कि सिर्फ लागत को स्पष्ट जानकारी देने के खिलाफ दलील नहीं बनाया जा सकता. निर्माता और उपभोक्ता के बीच खाद्य लेबल संवाद का पहला जरिया हैं, इसलिए उन्हें सटीक और भरोसेमंद होना चाहिए.
वे कहती हैं, “इसे सिर्फ नियमों की जरूरत नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य की बेहद जरूरी मांग के नजरिए से देखा जाना चाहिए.” लेबलब्लाइंड के 227 ब्रांडों के 586 पैकेटबंद उत्पादों पर किए अध्ययन से भी ज्यादा जांच की जरूरत सामने आती है. इसमें हर पांच में से एक दावा और स्वास्थ्य से जुड़े आधे से ज्यादा दावे खाद्य लेबलिंग दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं मिले.
नियमों की यह लड़ाई एक दशक से ज्यादा पुरानी है. एफएसएसएआइ के 2022 के मसौदे में आधे से पांच स्टार तक की हेल्थ स्टार रेटिंग पर आधारित भारतीय पोषण रेटिंग का प्रस्ताव था. स्वास्थ्य विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका तर्क था कि फायदेमंद पोषक तत्व ज्यादा चीनी, नमक या वसा के नकारात्मक अंक की भरपाई करके उत्पाद को कुल अच्छी रेटिंग दिला सकते हैं. इससे नुक्सानदेह खाद्य पदार्थों को सेहतमंद होने की भ्रामक छवि मिल सकती थी.

ज्यादा सरलीकरण का खतरा
अब रुख चेतावनियों की ओर मुड़ा है, लेकिन इससे एक और चिंता पैदा होती है. पोषण की जानकारी आसान बनाने की कोशिश में क्या भारत में उसे जरूरत से ज्यादा सरल बनाया जा सकता है?
उद्योग से जुड़े एक खाद्य विशेषज्ञ पैकेट के पीछे की जरूरी पोषण जानकारी सामने लाने के सिद्धांत का समर्थन करते हैं. लेकिन वे इसे ट्रैफिक लाइट जैसे फैसले में बदलने की स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मांग से सहमत नहीं. वे कहते हैं, “इसे सभी के लिए समान नहीं माना जा सकता. खिलाड़ी की पोषण जरूरत अलग होती है और डायबिटीज के मरीज की अलग.”
इसलिए खतरे का चिह्न लगाने से पहले नियामकों को इस बुनियादी सवाल का वैज्ञानिक रूप से मजबूत जवाब देना होगा कि कितनी मात्रा को “अधिक” माना जाए. वे कहते हैं, “जब तक यह तय नहीं होगा कि वसा, नमक और चीनी की कितनी मात्रा अधिक है, तब तक लाल या हरे संकेतों वाली व्यवस्था को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता.”
वे जरूरत से ज्यादा सरलीकरण के बिना पारदर्शिता चाहते हैं. “इसमें 30 फीसद चीनी है. इसमें 10 फीसद नमक है. फिर उपभोक्ता को फैसला लेने दें.”
देश में कुछ उत्पादों के लिए पहले से यह तरीका अपनाया जाता है. मिश्रित खाद्य तेलों पर उनमें शामिल तेलों की जानकारी देना जरूरी है. कॉफी-चिकोरी उत्पादों पर दोनों का अनुपात बताना होता है. यही सिद्धांत उन पोषक तत्वों पर लागू किया जा सकता है जिन पर उपभोक्ताओं को ज्यादा नजर रखनी चाहिए.
हालांकि, कुछ लोग उद्योग के विरोध से सहमत नहीं. उनका कहना है कि कंपनियां विदेशी बाजारों में उपभोक्ताओं को जानकारी देने के कड़े नियमों का पालन करती हैं, इसलिए भारत के लिए कम मानक की मांग उचित नहीं है. बकौल सिंह, “विडंबना यह है कि वे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में ऐसा कर रही हैं. तो यहां क्यों नहीं कर सकतीं? क्या हम कमतर लोग हैं? हम भी उतना ही दाम दे रहे हैं.”
सही संतुलन
जानकारों का मानना है कि एफएसएसएआइ लोगों को ज्यादा चीनी या दूसरी नुक्सानदेह चीजों वाले खाद्य पदार्थ खरीदने से न तो रोक सकता है, न उसे ऐसा करना चाहिए. लोगों को इतना पता होना चाहिए कि वे सोच-समझकर चुनाव कर सकें. यही फर्क अहम है.
देश में भरोसेमंद एफओपीएल व्यवस्था चाहिए, लेकिन सरलता के लिए जानकारी को तोड़ा-मरोड़ा नहीं जाना चाहिए. सीमाएं मजबूत वैज्ञानिक आधार पर तय हों और उनमें भारतीय आहार दिशानिर्देशों तथा खानपान की आदतों का ध्यान रखा जाए.
नियामकों को तय करना होगा कि चेतावनी कुल या अतिरिक्त चीनी और वसा में से किसके आधार पर दी जाए. उन्हें सर्विंग साइज, खाद्य श्रेणियों के बीच अंतर, उचित छूट और पैकेजिंग बदलने के लिए मिलने वाले समय पर भी फैसला करना होगा.
एक और बड़ा मुद्दा बाकी है. बढ़ते शोध अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (यूपीएफ) की ज्यादा खपत को मोटापे, डायबिटीज, दिल की बीमारी और दूसरी गैर-संचारी बीमारियों से जोड़ते हैं. फिर भी देश में अब तक यूपीएफ की परिभाषा तय नहीं है.
आर्थिक सर्वेक्षण ने भी सुझाव दिया है कि एफएसएसएआइ स्पष्ट परिभाषा, मानकों और ज्यादा सख्त लेबलिंग नियमों के साथ यूपीएफ के कायदे पर विचार करे. एफओपीएल का मतलब यह नहीं कि सरकार लोगों को बताए कि वे क्या खाएं और क्या नहीं. इसका मकसद ज्यादा बुनियादी हैः लोगों को यह जानने के लिए जरूरी जानकारी देना कि वे क्या खा रहे हैं.

