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ग्लेशियरों से उपजी बाढ़ : भारत पर खतरा क्यों

नेपाल में आई तबाही ने स्पष्ट कर दिया कि हिमालय की तलहटी वाले भारत के नाजुक प्रदेश भी ऐसी त्रासदियों की दहलीज पर खड़े. उस जोखिम से निबटने के क्या हैं उपाय

नेपाल के रसुवा जिले के एक रिहाइशी इलाके में 26 अगस्त को आए सैलाब ने किस रफ्तार से तबाही मचाई
अपडेटेड 13 सितंबर , 2026

न बारिश हुई, न किसी ज्ञात ग्लेशियल झील के फटने की घटना और न ही भूकंप आया. 26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के काफी ऊपर पहाड़ का एक हिस्सा टूट गया. सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि लांगटांग हिमाल के पास करीब 17,000 फुट की ऊंचाई पर आधार चट्टान और उसके ऊपर जमी ग्लेशियर की बर्फ अलग होकर करीब 4,000 फुट नीचे घाटी में जा गिरी.

टूटन का निशान लगभग 1.4 किलोमीटर लंबा था, यानी एक कतार में रखे करीब 10 क्रिकेट स्टेडियम जितना. यह विकराल हिस्सा नीचे घाटी से टकराया तो जमीन इतनी तेज हिली कि 5.2 तीव्रता का भूकंप जैसा कंपन हुई. वैज्ञानिकों ने बाद में साफ किया कि यह भूकंप नहीं था. पहाड़ टूटने से पैदा हुई कंपन थी.

फिर काला दानव आया. चट्टानें, टूटी बर्फ, पानी और कीचड़ मिलकर तेज रफ्तार मलबे में बदल गए. यह नेपाल-तिब्बत सीमा पर ल्हेंदे खोला नदी से होता हुआ रसुवा सीमा चौकी के पास भोटे कोशी-त्रिशूली नदी मार्ग में घुस गया.

चीनी भूवैज्ञानिकों ने मलबे की रफ्तार 180 किलोमीटर प्रति घंटा यानी 50 मीटर प्रति सेकंड आंकी. उसने संकरी घाटियों को चीरते हुए सीमा चौकियां, पुल, सड़कें, पनबिजली संयंत्र और बस्तियां निगल लीं. नदी की धारा 100 किलोमीटर से ज्यादा नीचे तक बदल दी गई.

काठमांडो से 50 किलोमीटर उत्तर में गल्छी के पास नदी का जलस्तर कथित तौर पर आधे घंटे में नौ मीटर बढ़ गया. बचे हुए लोग इसे सामान्य बाढ़ के रूप में याद नहीं करते. उनकी याद में बहती धरती की एक रौंदती हुई दीवार है.

एक हफ्ते बाद नेपाल के आपदा प्राधिकरण ने 1,200 से ज्यादा मौतों और 5,000 से ज्यादा लोगों के अब भी लापता होने की बात कही. उनमें तीर्थयात्री, ट्रेकर और पनबिजली परियोजनाओं के कर्मचारी शामिल हैं. लापता लोगों में 200 से ज्यादा भारतीय भी हैं, जिनमें ज्यादातर तिब्बत में कैलाश पर्वत की तीर्थयात्रा पर गए थे.

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ डेटन, ओहायो में पृथ्वी, पर्यावरण और स्थिरता के प्रोफेसर भू-वैज्ञानिक डॉ. उमेश हरिताश्य ने ग्लेशियर के जल-विज्ञान और ऊंचे पहाड़ों के खतरों पर व्यापक शोध किया है. वे घटना की वजह को सटीक ढंग से समझाते हैं, “यह आम हिमस्खलन नहीं था, जिसमें बर्फ जमीन पर गिरती है. यहां बेडरॉक यानी आधार चट्टान ही टूट पड़ी और उसके ऊपर संयोग से बर्फ जमी थी.”

चट्टान और बर्फ की सही मात्रा तथा इतना पानी आने के स्रोत का अब भी आकलन हो रहा है. पर घटनाक्रम काफी हद तक साफ है.पहाड़ का एक हिस्सा गिरा, मलबे का विनाशकारी सैलाब घाटी में दौड़ा और उससे बनी अस्थायी अवरोधक झीलों ने आगे और बाढ़ का खतरा पैदा किया.

यह फर्क भारत के लिए बेहद अहम है. ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (ग्लॉफ) सुनकर ऐसी झील की तस्वीर उभरती है, जिसका पानी ढीली चट्टानों और तलछट के प्राकृतिक बांध के पीछे बढ़ता रहता है और फिर बांध टूट जाता है.

नेपाल की घटना ने खतरों का कहीं व्यापक और ज्यादा अनिश्चित रूप सामने रखा. लटकते ग्लेशियर टूट सकते हैं, पिघलाव से कमजोर चट्टानी ढलानें ढह सकती हैं, हिमस्खलन झील में गिरकर पानी को किनारों से बाहर फेंक सकता है और मलबा नदी रोककर कुछ घंटों में झील बना सकता है.

रुकावट टूटने पर दूसरी बाढ़ आ सकती है. आपदा शुरू होने से पहले जानलेवा झील किसी सरकारी नक्शे पर कहीं भी नजर नहीं आ सकती. राजनैतिक सीमा भी कोई सुरक्षा नहीं देती. हरिताश्य चेताते हैं, “वहां जो हुआ, वह भारत में भी हो सकता है. पहाड़ों की स्थिरता के लिहाज से सीमाओं का कोई अस्तित्व नहीं होता.”

भीषण खतरा

आइआइटी रुड़की से डॉक्टरेट कर चुके हरिताश्य बदकिस्मती से बिल्कुल सच कह रहे हैं. भारत सरकार ने बचाव दलों के साथ जरूरी दवाएं और खाद्य सामग्री भेजकर नेपाल की मदद की.

लेकिन इस त्रासदी की वजह और उसका पैमाना भारत के विशाल हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर खतरे का संकेत है. करीब 2,500 किलोमीटर लंबी हिमालयी पट्टी लद्दाख और जम्मू-कश्मीर से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम होते हुए अरुणाचल प्रदेश तक फैली है.

इसमें 11 राज्य और दो केंद्रशासित प्रदेश आते हैं, जिनकी कुल आबादी करीब पांच करोड़ है. लेकिन हिमालयी बाढ़ से प्रभावित हो सकने वाले गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी क्षेत्रों में नीचे की ओर 70 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं. यह देश की करीब आधी आबादी है.

खतरा भारत की सीमाओं से बहुत आगे तक फैला है क्योंकि सिंधु, सतलज, ब्रह्मपुत्र और गंगा की कई सहायक नदियों के उद्गम तिब्बत, नेपाल या भूटान में हैं. दूसरे देश में पहाड़ या ग्लेशियर टूटने की घटना भारत के निचले इलाकों में आपदा ला सकती है.

इसके पैमाने को कम आंकना आसान है. हिंदुकुश हिमालय (एचकेएच) में 63,000 से ज्यादा ज्यादा ग्लेशियर हैं. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मुताबिक, इनमें 16,627 भारत की राजनैतिक सीमाओं के भीतर हैं.

 

वहीं, कुल 34,919 ग्लेशियर भारत के लिए अहम सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्रों को पानी देते हैं. केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के एटलस में भारत के भीतर 0.25 हेक्टेयर से बड़ी करीब 7,570 ग्लेशियल झीलें दर्ज हैं. पूरे हिमालयी क्षेत्र में इनकी संख्या 28,000 से ज्यादा है.

ये नक्शे पर स्थिर नीले बिंदु नहीं हैं. इसरो ने 2024 में लंबे समय की सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर हिमालयी नदी क्षेत्रों की 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 झीलों का आकलन किया.

उनमें 676 झीलें 1984 के बाद काफी फैल गई थीं. इनमें 130 भारत में हैं—65 सिंधु, सात गंगा और 58 ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र में. उनमें से 601 झीलों का क्षेत्रफल दोगुने से ज्यादा हो गया था. मसलन, हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाट झील 1989 से 2022 के बीच 178 फीसद फैलकर 36.5 हेक्टेयर से 101.3 हेक्टेयर हो गई.

बड़ी झीलों में ज्यादा पानी होता है, लेकिन खतरा केवल आकार से तय नहीं होता. खड़ी और आबाद घाटी के ऊपर स्थित छोटी झील किसी बड़ी और स्थिर झील से ज्यादा जानलेवा हो सकती है.

उसके चट्टानी गाद की मजबूती, उसमें हिमस्खलन की आशंका, घाटी की ढलान और बनावट तथा निचले इलाकों की आबादी और बुनियादी ढांचा—ये सभी बातें मायने रखती हैं. इसीलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि ‘ज्यादा जोखिम वाली झीलों’ की साधारण राष्ट्रीय गिनती सुरक्षा का झूठा भरोसा दे सकती है.

भारत को सिर्फ झीलों की सूची पर नजर रखने के बजाए पूरे जलग्रहण क्षेत्र का आकलन करना होगा. उसमें झीलें, ग्लेशियर, चट्टानी ढलान, हमेशा जमी रहने वाली जमीन, नदियों की रुकावटें और निचले इलाकों पर खतरा शामिल है.

बढ़ता तापमान इस पूरी व्यवस्था के हर हिस्से में खतरा बढ़ा रहा है. इक्कीसवीं सदी में पूरे हिमालय का तापमान हर दशक करीब 0.15 डिग्री सेंटीग्रेड से 0.60 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ा है. सबसे ज्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बढ़ोतरी और तेज है.

शोध आधारित परामर्श और क्षमता निर्माण संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण के मुताबिक, भारत की ओर हिमालय में बर्फ की सतह का औसत तापमान 2000-09 के -11.27 ‌डिग्री सेंटीग्रेड से बढ़कर 2020-23 में -7.13 डिग्री सेंटीग्रेड हो गया.

भारत-गंगा के मैदान में जीवाश्म ईंधन और जैव ईंधन जलाने से निकलने वाला ब्लैक कार्बन बर्फ को काला करता है. इससे बर्फ खासकर मध्य और पूर्वी हिमालय में ज्यादा गर्मी सोखती और तेजी से पिघलती है.

अंतरिक्ष से पीछे हटती बर्फ दिखाई देती है, लेकिन ज्यादा खतरनाक बदलाव पहाड़ के भीतर होता है. ग्लेशियर सिकुड़ने पर आसपास की ढलानों को मिलने वाला उसका सहारा हट जाता है. वैज्ञानिक इसे ‘डी-बट्रेसिंग’ कहते हैं.

इसी के साथ आधार चट्टान की दरारों में सीमेंट की तरह जमी पर्माफ्रॉस्ट पिघलने लगती है. पिघला पानी इन दरारों में घुसता है और बर्फ तथा पानी धीरे-धीरे दरारों को चौड़ा करता जाता है. यह चट्टान और बर्फ के बीच की सतह को फिसलन भरा भी बना सकता है और चट्टान के खिसकने या टूटकर गिरने की राह तैयार कर सकता है.

हरिताश्य बताते हैं, “जहां चट्टानों की दरारों में जमी बर्फ या पर्माफ्रॉस्ट मौजूद होती है, वहां आधार चट्टान आपस में जुड़ी रहती है. तापमान बढ़ने पर यह जोड़ पिघलने लगता है. फिर चट्टानों को बांधने वाला सीमेंट या गोंद नहीं रहता. यहीं से खिसकाव शुरू होता है.”

खतरे वाले क्षेत्र

जलवायु परिवर्तन से सिर्फ ग्लेशियर नहीं पिघल रहा, बल्कि हिमालयी पहाड़ों की संरचनात्मक स्थिरता भी बदल रही है. इसरो के अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के पूर्व वैज्ञानिक और अब भारतीय विज्ञान संस्थान से जुड़े अनुभवी ग्लेशियर वैज्ञानिक अनिल कुलकर्णी चेताते हैं, “इसरो ने सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए हिमालयी ग्लेशियल झीलों की हलचल और खतरे सहित विस्तृत जानकारी सरकार को दी है.

निचले इलाकों के जोखिम का भी विस्तार से आकलन हुआ है. इसे भूमि उपयोग की योजना का आधार बनाया जाना चाहिए. लेकिन क्या पनबिजली और शहरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की योजना बनाते समय इन रिपोर्टों को पढ़ा जाता है?”

हिमालय के पहाड़ पीने और खेती के साथ ऊर्जा उत्पादन के लिए भी पानी देते हैं. हिमालयी राज्यों में अब 25,300 मेगावाट की कुल क्षमता वाली 86 छोटी-बड़ी पनबिजली परियोजनाएं हैं. 30 अन्य परियोजनाएं प्रस्तावित हैं.

इस तरह भारत ने अपना कुछ सबसे महंगा बुनियादी ढांचा ठीक उसी जगह खड़ा किया है, जहां ग्लेशियल या मलबे की बाढ़ आएगी—घाटियों की तलहटी में. पनबिजली परियोजनाओं के लिए नदियों के किनारे बांध, सुरंगें, बिजलीघर, सब-स्टेशन, कामगार बस्तियां और संपर्क सड़कें चाहिए.

राजमार्ग और तीर्थ सुविधाएं भी निर्माण योग्य जमीन की इसी संकरी पट्टी से सटी हैं. किसी एक ढांचे के टूटने पर कंक्रीट, मशीनें और खुदाई का मलबा भी सैलाब में शामिल हो सकता है. नदी रुकने या जलाशय को नुक्सान पहुंचने से निचले इलाकों में बाढ़ की एक और लहर आ सकती है.

खतरा साफ और सामने है. सिक्किम भारत के लिए सबसे स्पष्ट चेतावनी है. अक्तूबर 2023 में चट्टानों का हिमस्खलन दक्षिण ल्होनक झील में गिरा. इससे उठे सैलाब ने उसके मोरेन बांध को तोड़ दिया.

करीब पांच करोड़ घन मीटर पानी तीस्ता नदी तंत्र में बहा, जो दिल्ली की एक महीने की पानी की जरूरत के बराबर था. बाढ़ ने चुंगथांग में 1,200 मेगावाट के तीस्ता-3 बांध को तबाह कर दिया. पुल, सड़कें, सैन्य ठिकाने और घर बह गए. दर्जनों लोग मारे गए और 88,000 से ज्यादा प्रभावित हुए.

इससे पता चला कि बांध और बस्तियां नदी के एक ही संकरे रास्ते में हों तो प्राकृतिक खतरा किस तरह एक के बाद दूसरी बुनियादी ढांचा आपदा पैदा कर सकता है. तीस्ता के ऊपरी इलाके में फैलती दूसरी झीलों के कारण सिक्किम और नीचे स्थित उत्तरी पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में हैं.

पश्चिमी हिमालय में उत्तराखंड अस्थिर ऊंचे पहाड़ों और घनी मानवीय मौजूदगी के सबसे खतरनाक मेल वाला राज्य हो सकता है. गंगा और यमुना के उद्गम क्षेत्रों में तीर्थनगरों, होटलों, सड़कों, पुलों, सुरंगों और पनबिजली परियोजनाओं की भरमार है.

अलकनंदा-धौलीगंगा, भागीरथी, मंदाकिनी और काली-शारदा नदी तंत्र खास तौर पर संवेदनशील हैं. साल 2013 में बेहद भारी बारिश और चोराबाड़ी ताल से निकले पानी ने केदारनाथ आपदा को और भीषण बना दिया था.

वर्ष 2021 में रोंटी चोटी से चट्टानों और बर्फ का सैलाब ऋषिगंगा-धौलीगंगा घाटी में करीब 2.7 करोड़ घन मीटर मलबा लेकर आया. इससे एक पनबिजली परियोजना तबाह हुई, दूसरी को नुक्सान पहुंचा और करीब 200 लोग मारे गए या लापता हो गए. वहां फटने के कगार पर कोई बड़ी ग्लेशियल झील नहीं थी. उसके बाद खतरे की चेतावनी और गंभीर हुई है.

आइआइटी भुवनेश्वर के आशिम सत्तार और आइआइएससी बेंगलूरू के दिवेचा जलवायु परिवर्तन केंद्र के नंदू कृष्णन ने अप्रैल 2026 के अध्ययन में अकेले उत्तराखंड के अलकनंदा नदी क्षेत्र में 219 लटकते ग्लेशियरों की पहचान की. उन्होंने बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में संभावित रूप से बेहद विशाल हिमस्खलनों का अनुमान भी तैयार किया.

यहां ज्यादा जोखिम वाली झीलों की अपेक्षाकृत कम सरकारी संख्या लटकती बर्फ, अस्थिर चट्टानों और घाटियों की तलहटी में भारी निर्माण से पैदा बड़े खतरे को छिपाती है. पास के हिमाचल प्रदेश में मुख्य खतरा ऊपरी सतलुज और उसकी सहायक बासपा, स्पीति और पार्वती नदियों के क्षेत्रों में है.

इन खड़ी घाटियों में ग्लेशियरों और अस्थिर ढलानों के ठीक नीचे पनबिजली केंद्र, जलाशय, राजमार्ग और बस्तियां हैं. राज्य के सर्वे ग्लेशियल झीलों और ऊंचाई वाले जलाशयों की संख्या तेजी से बढ़ने के संकेत देते हैं.

लाहौल-स्पीति की घेपांग घाट झील दिखाती है कि कोई एक झील कितनी तेजी से फैल सकती है और कितना बड़ा खतरा बन सकती है. सतलुज तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है, इसलिए ऊपरी क्षेत्र की जानकारी बेहद जरूरी है.

सरहद के अनदेखे खतरे

लद्दाख और जम्मू-कश्मीर में घनी आबादी वाली घाटियां कम हैं, लेकिन इससे वे सुरक्षित नहीं हो जाते. बस्तियां, सड़कें, सैन्य ठिकाने और पर्यटन ढांचा सिंधु, जांस्कर, श्योक, नुब्रा और चिनाब नदी तंत्रों के किनारे केंद्रित हैं. ये नदियां चीन और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर आती-जाती हैं.

यहां निगरानी मुश्किल, संचार सीमित और निकासी के विकल्प कम हैं. पिघलती पर्माफ्रॉस्ट चट्टान और बर्फ का हिमस्खलन ला सकती है या नदी पर अस्थायी बांध बना सकती है. यह बांध टूटने पर ऐसी बस्ती में सैलाब ला सकता है, जिसके ऊपर कोई चिह्नित ग्लेशियल झील न हो.

भारत की दूसरी छोर की सीमा पर अरुणाचल प्रदेश देश के प्रमुख खतरे वाले क्षेत्रों में सबसे कम समझा गया है, लेकिन यहां असर बहुत बड़ा हो सकता है. दिबांग घाटी और तवांग के मागो चू नदी क्षेत्र में तेजी से फैलती झीलों की पहचान हुई है. अगले 10 वर्षों में 19,165 मेगावाट बिजली पैदा करने वाली 33 बड़ी पनबिजली परियोजनाओं की योजना निचले इलाकों का खतरा बढ़ाती है.

राज्य सियांग-ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के विशाल तिब्बती जलग्रहण क्षेत्रों की घटनाओं के प्रति भी संवेदनशील है, जिनकी भारत को वास्तविक समय में बहुत कम जानकारी मिलती है.

खतरा हिमालयी राज्यों तक ही सीमित नहीं. उत्तरी पश्चिम बंगाल तीस्ता नदी पर सिक्किम के नीचे है. असम और पूरी ब्रह्मपुत्र घाटी तिब्बत के ग्लेशियल क्षेत्र के निचले हिस्से में हैं. बिहार को कोसी और गंडक जैसी हिमालयी नदियों से बार-बार खतरा होता है. यहां ग्लेशियल खतरे मॉनसूनी बारिश, भूस्खलन और तटबंध टूटने के साथ मिल सकते हैं.

इस तरह ऊंचे पहाड़ों की कोई घटना मैदानी इलाकों तक पहुंच सकती है, अपने साथ तलछट ला सकती है, बैराज और पुलों को नुकसान पहुंचा सकती है और स्रोत से बहुत दूर लोगों को विस्थापित कर सकती है.

नेपाल की आपदा ने बिजली उत्पादन और पारेषण की कई इकाइयां ठप कर दीं. फिर भी पर्यावरण प्रभाव आकलन और बांधों के डिजाइन आम तौर पर नदियों के पिछले व्यवहार—पुरानी बारिश, दर्ज बाढ़ और परिचित झील परिदृश्यों—पर आधारित रहे हैं, जबकि पहाड़ों का भविष्य इन पुराने रिकॉर्ड से आगे निकल रहा है.

हरिताश्य कहते हैं, “हम इन घाटियों की पुरानी जानकारी के आधार पर बुनियादी ढांचा बना रहे हैं, जबकि इसे घाटियों के भविष्य को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए.” उनके मुताबिक, हर हिमालयी घाटी में निर्माण रोकना जरूरी नहीं, लेकिन हर घाटी बड़े बांध, राजमार्ग या शहर के लिए उपयुक्त भी नहीं है.

कसौटी यह होनी चाहिए कि अनुमानित तापमान वृद्धि, ग्लेशियरों के पीछे हटने, पर्माफ्रॉस्ट के खत्म होने और अतिवृष्टि के बीच परियोजना अपने पूरे जीवनकाल में सुरक्षित रहेगी या नहीं और उसके विफल होने से नीचे की हर बस्ती पर क्या असर पड़ेगा.

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आइसीमोड) के वरिष्ठ सलाहकार और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व सदस्य प्रोफेसर महेंद्र पी. लामा का कहना है कि हिमालयी सीमाओं को सिर्फ सुरक्षा रेखा नहीं, बल्कि साझा पारिस्थितिक क्षेत्र माना जाना चाहिए. वे कहते हैं, “लोग, तीर्थयात्री, पर्यटक, व्यापारी, नदियां और प्राकृतिक खतरे इन सीमावर्ती क्षेत्रों से गुजरते हैं.”

उसके बावजूद भारत और नेपाल के बीच भी जल संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान सीमित है और चीन के साथ तो कहीं ज्यादा पाबंद है. सिंधु, सतलज और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्रों के लिए यह केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा भी है.

भारत को नेपाल, भूटान और चीन के साथ नदियों के ऊपरी हिस्सों के जलस्तर, बारिश, भूकंपीय संकेतों, सैटेलाइट से मिली जानकारी और अवरोधक झीलों की चेतावनियों के स्वतः और वास्तविक समय में आदान-प्रदान की जरूरत है.

इसके लिए साझा नियम होने चाहिए, जो राजनैतिक रिश्ते बिगड़ने पर भी लागू रहें. आंकड़े धीमी कूटनीतिक मंजूरी का इंतजार करने के बजाए सीधे नदी क्षेत्र के नियंत्रण कक्षों और जिला अधिकारियों तक पहुंचने चाहिए. पड़ोसी देशों को साझा खतरा मानचित्र, एक-दूसरे के अनुरूप चेतावनी मानक और नियमित सीमा-पार अभ्यास भी चाहिए. बाढ़ संप्रभुता नहीं, गुरुत्वाकर्षण मानती है.

बिना तैयारी चेतावनी प्रणाली

भारत ने खतरे को नजरअंदाज नहीं किया. सिक्किम में आई आपदा के बाद केंद्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए 150 करोड़ रुपए के राष्ट्रीय जीएलओएफ जोखिम नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की. उसका मकसद खतरे का आकलन करना, निगरानी रखना, शुरुआती चेतावनी प्रणाली लगाना, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और स्थानीय समुदायों को तैयार करना है.

अब उन सभी प्रस्तावित बांधों के लिए जीएलओएफ अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है जिनके जलग्रहण क्षेत्रों में संवेदनशील झीलें मौजूद हैं. साथ ही, मौजूदा और बन रहे प्रोजेक्ट के डिजाइन की भी समीक्षा की जा रही है. लेकिन सैटेलाइट से खतरा देख लेने और किसी परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के बीच अभी भी बहुत बड़ा अंतर है. इस योजना के तहत 195 अति-संवेदनशील झीलों पर शुरुआती चेतावनी प्रणाली लगाने का लक्ष्य रखा गया था.

इस रिपोर्ट के लिए जिन अधिकारियों से बातचीत की गई, उनका कहना है कि झीलों पर इन प्रणालियों को लगाने का काम तय समय से पीछे चल रहा है. इसकी वजह देरी से फंड मिलना, उपकरणों का परीक्षण जारी होना और बेहद दुर्गम इलाकों में सिर्फ कुछ ही महीने मौसम अनुकूल होना है.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के विभाग प्रमुख कृष्ण वत्स का कहना है कि प्रणालियां अपने उन्नत परीक्षण चरण में हैं और हिमाचल प्रदेश में जल्द ही कुछ उपकरण लगा दिए जाएंगे. उन्होंने एक पुरानी घटना का जिक्र करके कहा कि एक सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया था और उसकी जांच करना भी मुश्किल हो गया था, इसलिए “सिर्फ उपकरण लगा देना ही काफी नहीं है; उनका संपर्क में रहना भी बेहद जरूरी है.”

विशेषज्ञों का मानना है कि एक भरोसेमंद चेतावनी नेटवर्क सिर्फ किसी झील का पानी नापने वाला मीटर भर नहीं होता. झील के मुहाने पर लगे सेंसरों को पानी का स्तर, नदी का बहाव, बारिश, जमीन की कंपन और गाद की मात्रा नापनी चाहिए.

भूकंपीय उपकरण ऐसे होने चाहिए जो भूस्खलन या हिमस्खलन शुरू होते ही उसे डिटेक्ट कर ले. यह जानकारी सैटेलाइट, रेडियो और टेलीकॉम लिंक के जरिए बिना किसी रुकावट नियंत्रण कक्ष, जलविद्युत संयोजकों, जिला अधिकारियों और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों तक पहुंचनी चाहिए.

एक निश्चित सीमा पार होते ही साइरन, लाउडस्पीकर, मोबाइल अलर्ट अपने आप शुरू हो जाने चाहिए. साथ ही, सड़कें बंद करने, पावर प्रोजेक्ट बंद करने और लोगों को बाहर निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो जानी चाहिए. सभी को स्पष्ट पता होना चाहिए कि फैसला कौन लेगा और लोगों को सुरक्षित पहुंचने के लिए कहां जाना है.

यह सब इसलिए बेहद जरूरी है क्योंकि चेतावनी मिलने का समय कुछ ही मिनटों का हो सकता है. बाढ़ के रास्ते में आने वाला फोन टावर, वॉटर गेज या पुल ही सबसे पहले तबाह हो सकते हैं. हरिताश्य बताते हैं कि नेपाल के सिस्टम ने अलर्ट जारी करके जानें तो बचाईं, लेकिन उसे इतने बड़े पैमाने पर आए मलबे और कीचड़ के बहाव को झेलने के लिए डिजाइन नहीं किया गया था.

उन्होंने कहा, “हमें चेतावनी प्रणालियों को नदियों के काफी ऊपर स्थापित करने की जरूरत है, ताकि निचले इलाके के लोगों को निकल पाने का पूरा समय मिल सके—और इसके लिए एक स्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्था पहले से तय होनी चाहिए, न कि आपदा के वक्त रणनीति बनाई जाए.”

सिर्फ शुरुआती चेतावनी ही एकमात्र बचाव नहीं हो सकती. जिन झीलों तक पहुंचना संभव है, वहां इंजीनियर साइफन, पंप या नियंत्रित निकास चैनलों के माध्यम से पानी का स्तर कम कर सकते हैं. नेपाल ने त्सो रोल्पा और इम्जा झीलों पर यही तरीका अपनाया था.

भारत में ऐसे उपाय बेहद कठिन और खर्चीले हैं, इसलिए इन्हें कुछ प्रमुख झीलों में ही उपयोग किया जा सकता है. इनका इस्तेमाल केवल उन्हीं झीलों पर किया जाना चाहिए जहां निचले इलाकों की आबादी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को बचाना बेहद जरूरी हो, जबकि बाकी कैचमेंट क्षेत्रों की निगरानी अन्य तरीकों से की जा सकती है.

कोई भी सायरन न तो किसी बांध की रक्षा कर सकता है और न लापरवाही से किए गए निर्माण की भरपाई कर सकता है. पर्यावरण परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समूह (आइपीसीसी) के लेखक और फ्लेम यूनिवर्सिटी में पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर अंजल प्रकाश चेतावनी देते हैं, “कोई भी सायरन कुछ ही सेकंडों में ढहते पहाड़ से तेज नहीं भाग सकता.”

बचाव का पहला तरीका यही है कि नए रिहाइशी इलाकों, होटलों, ईंधन डिपो, मजदूरों की बस्तियों और महत्वपूर्ण सुविधाओं को बाढ़ और मलबा संभावित रास्तों से दूर रखा जाए. नदियों के किनारे निर्माण कार्य पर रोक लगे, पहाड़ों को डाइनामाइट से उड़ाने और मलबे को नदियों में फेंकने पर रोक लगाई जाए. लोगों को दूसरी जगह बसाया भी जाए.

भारत फौरन क्या करे

नेपाल की आपदा ने भारत के सामने सवाल बदल दिए हैं. अब सिर्फ यह पहचानना काफी नहीं है कि ग्लेशियर के मलबे से बनी कौन-सी झील फट सकती है. योजनाकारों को अब यह सोचना होगा कि पहाड़ का कौन-सा हिस्सा पूरा गिर सकता है, कहां टकरा सकता है, मलबा कहां नदी का रास्ता रोक सकता है, बाढ़ की लहरें कितनी तेजी से आगे बढ़ सकती हैं और उनके रास्ते में क्या-क्या आता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को सबसे पहले झीलों की पुरानी लिस्ट को हटाकर पूरे हिमालयी क्षेत्र का एक मौजूदा जोखिम मानचित्र तैयार करना चाहिए, जिसे लगातार अपडेट भी करते रहना होगा.

इसमें झीलों का बढ़ता आकार, गहराई, ग्लेशियर की हलचल, लटकते हिमखंडों की स्थिति, ढलान खिसकना, जमी बर्फीली जमीन, भूस्खलन का इतिहास और निचले इलाकों का जोखिम, सब शामिल होना चाहिए. रडार और सैटेलाइट बदलावों की पहचान कर सकते हैं, जबकि ड्रोन और जमीनी अभियानों के जरिए खतरनाक जगहों की सटीक मैपिंग की जा सकती है.

इसके साथ ही, सबसे ज्यादा संवेदनशील नदी घाटियों में पूरी तरह से सक्षम चेतावनी प्रणालियां हों, जो पहाड़ों की चोटियों से लेकर मैदानों तक काम करें. बिजली कटने, टावर टूटने या सड़कें बह जाने जैसी विषम परिस्थितियों के लिए हर सिस्टम का स्ट्रेस टेस्ट होना चाहिए.

स्थानीय लोगों, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, पुलिस, बांध ऑपरेटरों और जिला अधिकारियों की भूमिकाएं तय होनी चाहिए; आपदा के समय भागने के रास्ते चिन्हित हों और दिन के साथ-साथ रात में भी नियमित मॉक ड्रिल कराया जाए.

इसके साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारों को हिमालय क्षेत्र में बनने वाले हर बांध, हाइवे, सुरंग, होटल कॉम्प्लेक्स और टाउनशिप के लिए जलवायु-अनुकूल बहु-आपदा आकलन अनिवार्य बना देना चाहिए.

मौजूदा परियोजनाओं का पुनर्मूल्यांकन सबसे भयानक जीएलओएफ और बर्फीली चट्टान के खिसकने के खतरों के आधार पर किया जाना चाहिए. 

एक और बेहद जरूरी कदम यह है कि भूमि-उपयोग जोनिंग को सख्ती से लागू करना चाहिए. खतरे के नक्शों से यह तय होना चाहिए कि कहां निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है, कहां कम आबादी वाली गतिविधियों की अनुमति है, और कहां इमारतों को बाढ़-रोधी डिजाइन के साथ बनाने की जरूरत है.

नदियों में उफान के समय उन्हें काफी जगह चाहिए होती है. लोगों को स्थानांतरित करने और पुरानी इमारतें मजबूत करने का खर्च कठिन फैसला हो सकता है लेकिन पूरी घाटी के तबाह होने के बाद दोबारा बसाने की लागत बहुत ज्यादा होगी. 

आखिर में, पड़ोसी देशों के साथ रियल-टाइम अलर्ट साझा करने, संयुक्त वैज्ञानिक टीमों और घाटी-स्तरीय आपातकालीन नियमों के लिए समझौता होना चाहिए. नेपाल का वह काला सैलाब 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आई एक चेतावनी था.

अब यह भारत और हमारे पड़ोसियों के हाथ में है कि अगली बार ऐसा खतरा आए, तो क्या नीचे रहने वाले हजारों लोग, बांध, हाइवे और पूरा का पूरा शहर अपना बचाव करने के लिए तैयार हैं या नहीं.

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(प्रज्ञान थापा घि‌मिरे  की जमीनी रपट)

अब इस मोड़ से उबरने की चुनौती

नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ के एक हफ्ते बाद 1,292 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और करीब 5,000 लोग लापता बताए जा रहे हैं. घटना के बाद से ये आंकड़े लगातार बढ़े हैं. साल 2015 के भूकंप के बाद यह नेपाल की सबसे विनाशकारी ‘प्राकृतिक’ आपदा है.

नेपाल में बाढ़ के 70 किलोमीटर लंबे रास्ते के ज्यादातर बुरी तरह प्रभावित इलाके अब भी पानी में डूबे हैं. बाढ़ में बहे लोगों के शव पड़ोसी भारत में 250 किलोमीटर दूर तक मिले हैं. तबाह हुए गांवों, कस्बों, पुलों, सड़कों और दूसरे जरूरी ढांचों के पुनर्निर्माण की लागत चार अरब डॉलर से ज्यादा आंकी गई है. यह नेपाल की जीडीपी का दसवां हिस्सा है.

नेपाल के उत्तरी जिले रसुवा और नुवाकोट सदियों से नेपाल तथा तिब्बत को जोड़ने वाले अहम व्यापारिक और यात्रा केंद्र रहे हैं. ये हिंदुओं और बौद्धों के तीर्थस्थल भी हैं. बाढ़ के समय इलाके में मौजूद कुछ लोग 27 अगस्त को जनै पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के लिए वहां गए थे. इस क्षेत्र में नेपाल के सबसे ज्यादा पनबिजली संयंत्र भी हैं. सभी 12 संयंत्र पूरी तरह या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे 431 मेगावाट बिजली उत्पादन का नुक्सान हुआ.

बाढ़ की खबर मिलते ही नेपाल सरकार ने बचाव अभियान में सेना और पुलिस को उतार दिया. एक हफ्ते में 21,000 से ज्यादा जवान और 15 हेलिकॉप्टर लगाए गए. एक सितंबर तक प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में करीब आठ अरब नेपाली रुपए जमा हो चुके थे. दूसरे मुल्कों ने राहत कार्यों के लिए 2.5 करोड़ डॉलर से ज्यादा देने का वादा किया. इसके अलावा बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण और सामान के रूप में भी मदद मिली.

नेपाल-तिब्बत सीमा पर बाढ़ प्रभावित एक बस्ती में 26 अगस्त को सैन्य हे‌लिकॉप्टर के जरिए एक लड़के को बचाया गया

सैकड़ों सामाजिक कार्यकर्ता भी राहत सामग्री जुटा रहे हैं. शुरुआत में खबर आई कि सरकार ने विदेशी खोज और बचाव दलों की मदद ठुकरा दी है जबकि पहले 538 विदेशी नागरिकों के लापता होने की सूचना थी. इसकी वजह आत्मनिर्भरता और 2015 के भूकंप के बाद विदेशी बचावकर्मियों के साथ तालमेल के खराब अनुभव को बताया गया. प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने दो सितंबर को संसद में इसे खारिज किया. उन्होंने कहा कि आपदा की शुरुआत से ही विदेशी बचाव दलों का स्वागत किया गया है.

नेपाल के नेशनल डिजास्टर रिस्क मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीआरआरएमए) के मुताबिक, करीब 12,000 लोगों को बचाया गया है. मगर तबाह इलाके में पहुंचने की मुश्किल और आगे बाढ़ के खतरे से बचाव कार्य बाधित हुए हैं.

नई बनी अवरोधक झीलों और मानसून की भारी बारिश ने यह जोखिम और बढ़ा दिया है. स्थानीय निकायों के साथ सही तालमेल और उन्हें संसाधन देने में सरकार की कथित नाकामी की व्यापक आलोचना हुई है. आपदा स्थलों पर नेताओं और मशहूर हस्तियों की दिखावटी और गैरजरूरी मौजूदगी पर भी सवाल उठे हैं.

गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने मौके पर बचावकर्मी की भूमिका निभाने का फैसला लिया. इससे सवाल उठा कि क्या उन्हें अपने पद के मुताबिक राहत अभियान के प्रशासनिक और नीतिगत पहलुओं पर ध्यान नहीं देना चाहिए था. इस तबाही ने उन दूरदर्शी विशेषज्ञों की चेतावनियों पर ध्यान खींचा है, जो दशकों से नेपाल को जलवायु परिवर्तन के खतरनाक असर के लिहाज से सबसे संवेदनशील देशों में रखते आए हैं.

नेपाल के डिपार्टमेंट ऑफ वॉटर रिसोर्सेंज ऐंड इरिगेशन ने जुलाई 2026 की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया कि 2011 से 2025 के बीच बढ़ते तापमान और मौसम के लगातार अनिश्चित होते मिजाज से और गंभीर हुई “जल-जनित आपदाओं” के कारण 4,271 लोगों की जान गई. नेपाल के पहाड़ों में बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण जमी हुई जमीन धीरे-धीरे पिघल रही है.

इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट बाढ़ (ग्लॉफ) यानी हिमनद झील फटने से आने वाली बाढ़ की घटनाएं 1990 के बाद बढ़ी हैं. जून 2025 में भोटे कोशी नदी के किनारे आई बाढ़ ऐसा ही एक संकेत थी. उसमें रसुवा में नौ लोगों की मौत हुई और 20 लापता हो गए. बाद में यह घटना उसी रास्ते और उससे आगे आई कहीं बड़ी आपदा की चेतावनी साबित हुई.

विडंबना कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी 0.1 फीसद से भी कम है. इस त्रासदी ने नेपाल को एक वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है. वह ऐसे संकट का अनचाहा शिकार है, जिसे पैदा करने में उसकी भूमिका बहुत मामूली रही है.

प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने भी दो सितंबर को संसद में इसका उल्लेख किया. उन्होंने इस बाढ़ को “जलवायु परिवर्तन के कारण [नेपाल के] हिमालयी क्षेत्र पर बढ़ते खतरों का गंभीर संकेत” बताया. बालेंद्र शाह ने कहा, “इसके असर को कम करना और इससे निबटना वैश्विक समुदाय की साझा जिम्मेदारी है.”

इस संबोधन से पहले प्रधानमंत्री से संयुक्त राष्ट्र महासभा में नेपाल का प्रतिनिधित्व करने और राहत तथा मुआवजे की अपील करने की मांग उठी थी. साथ ही जलवायु परिवर्तन पर दुनिया भर में बेहतर नीतियां और ठोस कार्रवाई करने की मांग भी की गई. पर्यावरण के साथ दुनिया के रिश्ते में तत्काल, बड़े पैमाने पर और आमूल बदलाव नहीं आया तो भविष्य निराशाजनक दिखता है.

(थापा एक लेखक और रिसर्चर हैं. वे काठमांडू में रहते हैं)
 

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