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क्या वे बदलाव ला सकते हैं?

कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने एजेंडे को विस्तार दिया और पहुंच बढ़ा रही लेकिन एक बड़ी सियासी ताकत के रूप में उभर पाने से पूर्व वह कई अहम चुनौतियों से दो-चार

cover story 
अभिजीत दीपके (सामने), सौरभ दास (काली टीशर्ट में) और आशुतोष रांका

सीजेपी अब ‘सीजन 1’ की कामयाबी के बाद कहीं बड़ा प्रयास कर रही है. दिल्ली के जंतर मंतर पर राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ उसका आंदोलन 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ था.

अब इंस्टाग्राम पर जन्मे आंदोलन को सीजेपी गांवों और कस्बों तक ले जा रही है. साथ ही, वह परीक्षाओं में निष्पक्षता की लड़ाई को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सरकार की जवाबदेही तक विस्तार दे रही है.

सीजेपी अब समझ रही है कि डिजिटल आंदोलन जब जमीनी सत्ता से टकराता है तो क्या होता है. राजस्थान के अलवर जिले के थानागाजी में छात्रों ने स्कूल की बदहाली के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया तो सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका और संगठन के सह-प्रमुख दीपक बालियान वहां पहुंचे.

स्कूल के 180 छात्रों के लिए वहां सिर्फ तीन शिक्षक और तीन कमरे हैं. कक्षाओं में पानी टपकता है, न इस्तेमाल लायक शौचालय है, न ही पीने के पानी की ठीक व्यवस्था. प्रदर्शन कर रहे कुछ बच्चे छह-सात साल के थे. उनका नारा बेहद सीधा था: “हमें टीचर दो या फिर टीसी दे दो (ताकि हम दूसरे स्कूल जा सकें).”

आखिर कुछ तो है जो बदल गया है. बालियान याद करते हैं कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन शुरू होने पर पहले सिर्फ 200-300 लोग आए थे. कई लोग डर रहे थे कि ताकतवर सरकार से कैसे टकराव लेंगे. वे कहते हैं, “अब युवाओं का डर पूरी तरह खत्म हो गया है. अब हम अफसरों से नहीं डरते. अब वे हमसे डरते हैं.”

माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य अशोक धवले भी इस मानसिक बदलाव को सीजेपी की पहली सफलता मानते हैं. उनके शब्दों में, “डर को ध्वस्त करना सीजेपी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी.” धवले के मुताबिक, इससे आंदोलन का समर्थन करने वाले विपक्षी दलों और संगठनों का भी हौसला बढ़ा.

बहरहाल, अब ज्यादा कठिन बदलाव और बड़ा सवाल सामने है: क्या सीजेपी अपने आंदोलन को देशभर की बड़ी राजनीतिक ताकत बना सकती है?

महाराष्ट्र के ‌हिंगोली में 18 अगस्त को एक सरकारी स्कूल में बच्चों से बातचीत करते दीपके

दबाव समूह या राजनैतिक दल?
दरअसल, दीपके के शब्दों में, सीजेपी अपने शुरुआती रूप में राजनैतिक आंदोलन के बजाए ‘दबाव समूह’ बने रहना चाहती है. वे इंडिया टुडे से कहते हैं, “लोगों का सभी संस्थाओं से भरोसा उठ गया है. जनप्रतिनिधि चुनाव जीतते ही पाला बदल लेते हैं. भारत को ऐसा सामाजिक आंदोलन चाहिए जिसमें लोग राजनैतिक जुड़ाव से ऊपर उठें.”

हालांकि दीपके भविष्य में सीजेपी के राजनैतिक दल बनने की संभावना खारिज नहीं करते. वे कहते हैं, “अगर लोग चाहेंगे तो हमें इस पर विचार करना होगा. मगर अभी ऐसी कोई योजना नहीं है.”

सीजेपी जिन लोगों को जोड़ना चाहती है, उनकी विशाल संख्या को देखते हुए चुनावी राजनीति का लोभ संवरण कर पाना मुश्किल हो सकता है. देश के वोटरों में 18-29 वर्ष के युवाओं की हिस्सेदारी करीब 30 फीसद है, यह देश में कुल मतदाताओं का करीब एक-तिहाई है.

तमिलनाडु ने दिखा दिया कि यह संख्या वोटों में बदले तो क्या हो सकता है : विजय की तमिलगा वे‌ित्र कलगम (टीवीके) को करीब 60 फीसद युवा वोटरों का समर्थन मिला. इससे नई पार्टी ने 234 में से 108 सीटें जीतीं और दशकों से चले आ रहे द्रमुक-अन्नाद्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कलगम-अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम) के दबदबे को तोड़ दिया. मगर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में जेन ज़ी की मौजूदगी बेहद कम है. लोकसभा के 543 सांसदों में 30 साल से कम उम्र के सिर्फ छह सांसद हैं. देश के 4,131 विधायकों में ऐसे सदस्यों की संख्या केवल 20 है.

दीपके का सतर्क रहना समझदारी भरा कदम है. आजादी के बाद भारत में कई आंदोलनों ने विभिन्न सरकारों को हिलाया है लेकिन बाद में वे ठंडे पड़ गए. वैसे, कुछ आंदोलनों ने राजनीतिक तस्वीर हमेशा के लिए बदल दी (देखें बॉक्सः नवजवानों का इंकलाब).

इनमें बिहार का 1974 का ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन था. गांधीवादी जयप्रकाश नारायण की नैतिक अगुआई वाले इस छात्र आंदोलन ने 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की करारी हार का रास्ता बनाया.

वहीं, 1990 के दशक में आरक्षण विरोधी मंडल आंदोलन ने जाति और प्रतिनिधित्व की राजनीति को बदल दिया. उससे बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार तथा उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव सरीखे जातियों के मजबूत नेताओं के उभार की जमीन तैयार हुई.

साल 2011 में इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आइएसी) आंदोलन ने लोकपाल की मांग उठाई. यह प्रधानमंत्री समेत सरकारी पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाली राष्ट्रीय कानूनी संस्था थी.

गांधीवादी कार्यकर्ता अण्णा हजारे भूख हड़ताल पर बैठे और मनमोहन सिंह सरकार ने उनकी मांग मान ली. इसी आंदोलन से अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) निकली. उसने 2025 की हार से पहले 12 साल तक दिल्ली पर राज किया और 2022 में पंजाब की सत्ता भी फतह कर ली.

सीजेपी अभी शायद इतनी दूर की नहीं सोच रही है. मगर नीट की नाकामी ने उसे ऐसा मुद्दा दिया जो खास भी था और व्यापक भी. निम्न और मध्य आय वाले परिवारों के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं आर्थिक सुरक्षा और तरक्की के गिने-चुने रास्तों में हैं.

वर्षों की पढ़ाई, कोचिंग फीस और बचत इस उम्मीद में लगती है कि कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद बच्चों को निष्पक्ष मौका मिलेगा. धांधली वाले नीट ने यही भरोसा फिर तोड़ा और दबा गुस्सा इस गर्मी में जंतर मंतर पर फूट पड़ा.

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश कहते हैं, “सीजेपी जाति, समुदाय या धर्म की नहीं, सिर्फ परीक्षाओं, निष्पक्षता और बराबरी की बात कर रही थी. इसलिए लोगों ने उससे जुड़ाव महसूस किया.” रमेश 2023-24 में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के सूत्रधारों में थे.

उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री समेत राजनैतिक चेहरों पर व्यंग्य करना सीजेपी की ताकत है. वे कहते हैं, “किसी नेता के लिए व्यंग्य का पात्र बनने से ज्यादा नुक्सानदेह कुछ नहीं. इससे उसका कुछ आभामंडल टूट जाता है.” हालांकि वे सीजेपी को जल्द राजनैतिक दल बनने से बचने की सलाह देते हैं.

उनका कहना है, “सीजेपी को समर्थन इसलिए भी मिलता है क्योंकि वह गैर-राजनैतिक है और कांग्रेस, भाजपा या आप का हिस्सा नहीं दिखती. पार्टी बनने पर उसका असर बहुत घट जाएगा.” कांग्रेस नेता रमेश की दलील में दम है. मगर सीजेपी राजनैतिक ताकत नहीं बनी तो वह महज एक बड़े एनजीओ में सिमट सकती है.

सीजेपी के एजेंडे का विस्तार
अपना राजनैतिक असर बढ़ाने और सत्ता की तलाश में लगे अवसरवादी संगठन सरीखी छवि से बचने के बीच सीजेपी को संतुलन बनाना होगा. दीपके के मुताबिक, जंतर मंतर आंदोलन ने जेन ज़ी को परेशान करने वाले मुद्दों को उजागर कर दिया.

वे कहते हैं, “शिक्षा की गुणवत्ता और उसका खर्च बड़ा मुद्दा है. लेकिन बेरोजगारी भी उतनी ही हावी थी. भीड़ में सिर्फ छात्र नहीं, बल्कि 25-35 साल के लोग भी थे. कई प्रदर्शनकारियों के पास डिग्रियां थीं, लेकिन नौकरी नहीं.” सीजेपी को शायद बहुत बड़े दायरे वाले मुद्दे मिल गए हैंः युवाओं की बढ़ती आकांक्षाओं और घटते अवसरों की टकराहट.

दिल्ली के सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर विजिटिंग फेलो और राजनीति विज्ञानी अश्विनी कुमार एक और पीढ़ीगत बदलाव देखते हैं. पहले आकांक्षाओं की जानी-पहचानी भाषा थी—डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार या प्रशासनिक अधिकारी. ये पेशे स्थिरता, रुतबा और तरक्की का भरोसा देते थे.

उनके मुताबिक, मिलेनियल्स और जेन ज़ी ने यह सोच बदल दी है. वे कहते हैं, “नौकरी, गिग, अतिरिक्त काम और करिअर के बीच की सीमा धुंधली हो गई है. युवा अपनी शर्तों पर जिंदगी बनाना चाहते हैं, लेकिन उनके लिए अवसर नहीं हैं.” विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका दायरा पुराने आंदोलनों को ताकत देने वाले युवा असंतोष से कहीं बड़ा हो सकता है.

भारत में राष्ट्रवादी और धार्मिक आंदोलनों का अध्ययन कर चुके स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जाने-माने राजनैतिक मानवशास्त्री प्रोफेसर थॉमसन ब्लॉम हैनसन कहते हैं, “युवाओं में भारी आकांक्षाएं जमा हो रही हैं और उस व्यवस्था को लेकर अधीरता बढ़ रही है, जो न झुकती दिखती है, न उन्हें कुछ देती है. इस समय यह भारत का सबसे विस्फोटक मुद्दा हो सकता है कि आगे बहुत कम अवसर पाने वाले इन युवाओं का क्या होगा?”

सीजेपी के सामने चुनौती इस बिखरे असंतोष को ऐसी मांगों में बदलने की है, जो अलग-अलग वर्गों को जोड़ने जितनी व्यापक और अभियान चलाने जितनी स्पष्ट हों. पांच अगस्त को छत्रपति संभाजीनगर में दीपके के घर हुए पहले ‘कॉकरोच कॉन्क्लेव’ में साफ था कि सीजेपी अपना एजेंडा बढ़ा रही है.

निष्पक्ष प्रवेश परीक्षाओं से लेकर बेहतर सरकारी स्कूलों और सस्ती शिक्षा तक, बेरोजगारी से लेकर भर्ती में गड़बड़ियों और गिग वर्करों की सामाजिक सुरक्षा तक. उसका ‘क्या बोलती पब्लिक?’ अभियान नीचे से और शिकायतें तलाशने की कोशिश है.

हालांकि जनसंपर्क के जरिए सिर्फ शिकायतें जुटाने से मांगों की लंबी और बेतरतीब सूची बनने का खतरा है. 1970 के दशक से भारतीय सामाजिक आंदोलनों का अध्ययन कर रहे राजनैतिक समाजशास्त्री घनश्याम शाह कहते हैं कि ‘स्कूल ठीक करो’ उपयोगी अभियान है, लेकिन “कार्यक्रमों को नीतियों से जोड़ना होगा.”

शाह के लिए बड़ा सवाल यह नहीं कि सीजेपी टूटा शौचालय ठीक करा सकती है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह बता सकती है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य क्या होना चाहिए.

मुंबई यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर और अर्थशास्त्री नीरज हातेकर भी इससे सहमत हैं. वे चेताते हैं, “शिक्षा बजट बढ़ाने, शिक्षकों के खाली पद भरने या पाठ्यक्रम बदलने के लिए शीर्ष स्तर पर फैसले जरूरी हैं. सीजेपी ने राजनैतिक ताकत हासिल नहीं की तो उसका काम सिर्फ मरम्मत तक सीमित रहेगा.”

यहीं सीजेपी के सामने पहला बुनियादी चुनाव आता है. क्या वह एक-एक मुद्दे पर व्यवस्था सुधारना चाहती है या इतनी ताकत हासिल करना चाहती है कि व्यवस्था ही बदल सके? दोनों के लिए जबरदस्त संगठन क्षमता चाहिए.

कॉकरोच सेना खड़ी करना
अगर एजेंडा सीजेपी का अवसर है, तो एक मजबूत राष्ट्रीय राजनैतिक संगठन बनाना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी. दिल्ली के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज में प्रोफेसर और चुनाव विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं, “सफल आंदोलन अपने आप सफल पार्टी नहीं बन जाता.”

उनके मुताबिक, आंदोलन को चुनावी ताकत में बदलने के मामले में इतिहास अलग-अलग सबक देता है. छह साल चले असम छात्र आंदोलन (1979-1985) से असम गण परिषद (एजीपी) निकली, जिसने 1985 का विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता हासिल की.

इसके उलट, उत्तर प्रदेश से अलग पहाड़ी राज्य बनाने के लंबे संघर्ष की प्रमुख ताकत उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी), वर्ष 2000 में उत्तराखंड बनने के बाद उस जीत का फायदा नहीं उठा सका और मामूली चुनावी ताकत बनकर रह गया.

संजय कुमार एक और बड़ी बाधा बताते हैं. “सीजेपी का मुकाबला सत्ता में बैठी मजबूत भाजपा से होगा. इसलिए तुरंत खुद को राष्ट्रीय विकल्प मानने के बजाए किसी एक राज्य या कुछ सीटों से शुरुआत कर अपनी क्षमता साबित करना बेहतर होगा.”

आखिर भाजपा-आरएसएस का तंत्र कई पीढ़ियों में तैयार हुआ है. उसके पास कार्यकर्ता, बूथ समितियां और जमीनी नेटवर्क हैं, जो चुनौती देने वालों का मुकाबला कर सकते हैं, उन्हें रोक सकते हैं या अपने साथ मिला सकते हैं. हालांकि स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के हैनसन को इसमें एक संभावित कमजोरी दिखती है.

वे कहते हैं, “भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ताओं, भौतिक नेटवर्क और अनुशासित लामबंदी के सहारे बीसवीं सदी की राजनीतिक मशीन खड़ी की है. लेकिन क्या सोशल मीडिया के दौर में भी यह उतनी ही निर्णायक रहेगी, जब सीजेपी रफ्तार, डिजिटल पहुंच और सीधे आपसी जुड़ाव की ताकत दिखा चुकी है?”

दीपके के एक सहयोगी के शब्दों में, सोशल मीडिया सीजेपी का ‘ब्रह्मास्त्र’ है. ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान इसकी एक झलक देता है कि यह हथियार कैसे काम करता है. स्थानीय इंस्टाग्राम यूजर और कंटेंट क्रिएटर गांवों के स्कूलों की पड़ताल करते हैं.

फिर सीजेपी का केंद्रीय हैंडल उनकी रील शेयर करता है और किसी बेहद स्थानीय शिकायत को देशभर की चर्चा में बदलने की कोशिश करता है. दिल्ली की शिव नाडर यूनिवर्सिटी में मानविकी के प्रोफेसर अजय दांडेकर को इसमें कुछ बिल्कुल नया दिखाई देता है. वे कहते हैं कि सीजेपी का जमीनी आंदोलन सोशल मीडिया पर होने वाले ऐसे इंटरैक्शन से निकलता है, जो “अपने आप में लगभग एक स्वतंत्र गतिविधि और बाहरी खिंचाव/दबाव से मुक्त है.”

इसके नतीजे हमेशा व्यवस्थित नहीं रहे. कई बार जल्दबाजी में बातें रखी गईं और गलतियां भी हुईं. फिर भी दांडेकर मानते हैं कि लोगों को अपनी बात खुलकर कहने की अचानक मिली यह जगह “हमारे लोकतंत्र के लिए बेहद अच्छा संकेत” है. लेकिन सोशल मीडिया फॉलोअर, समर्पित जमीनी कार्यकर्ता नहीं होते.  सीजेपी यह बात जानती है. इसलिए वह नीति, कानूनी मामलों, वित्त, टेक्नोलॉजी, मीडिया और प्रशासन से जुड़े राष्ट्रीय ढांचे तैयार कर रही है. बालियान को जमीनी संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी दी गई है.

संभावित वॉलंटियरों से उनके सवाल बेहद सीधे और व्यावहारिक होते हैं: “आप इसके लिए कितना समय दे सकते हैं? आप खुद को कितनी दूर तक जाते देखते हैं? आप कितनी भागदौड़ कर सकते हैं?”

यह ऐसा साधारण और चमक-दमक से दूर काम है, जिसके सहारे कोई आंदोलन सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म आगे बढ़ जाने के बाद भी जिंदा रहता है. मगर इस मोर्चे पर सीजेपी को अभी लंबा रास्ता तय करना है.

वरिष्ठ समाजवादी और आम आदमी पार्टी की महाराष्ट्र इकाई के पूर्व प्रमुख रंगा राचुरे कहते हैं कि सीजेपी से जुड़े लोग भले ही “सिस्टम के खिलाफ गुस्से में उबल रहे हों”, लेकिन उनमें विचारधारा को लेकर साफ समझ नहीं है. उनके पास ऐसा जमीनी संगठन भी नहीं है, जो आंदोलन से जुड़े लोगों को लंबे समय तक अपने साथ बनाए रख सके.

इसका एक उलटा खतरा भी है—जरूरत से ज्यादा संगठन. दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर तनवीर एजाज ‘नौकरशाहीकरण’ को लेकर आगाह करते हैं.

यह वह प्रक्रिया है जिसमें अचानक खड़ा हुआ कोई आंदोलन इतना ज्यादा ढांचागत और नियमों में बंध जाता है कि अपनी शुरुआती ऊर्जा ही खो बैठता है. लिहाजा सीजेपी के सामने तुरंत यह साबित करने की चुनौती नहीं है कि वह संगठन के खेल में भाजपा को हरा सकती है या नहीं.

असली परीक्षा यह है कि क्या वह इक्कीसवीं सदी के आंदोलन का कोई नया ढांचा तैयार कर सकती है—जो डिजिटल दुनिया की सहजता को बचाए रखने जितना हल्का हो, जमीनी अभियानों को लंबे समय तक चलाने जितना गहरा हो और पारंपरिक राजनीति में समा जाए बिना राजनैतिक दबाव बनाने जितना एकजुट और स्पष्ट हो.

सीजेपी का चेहरा कौन?
भारत में बदलाव लाने वाले लगभग हर आंदोलन को आखिरकार एक चेहरा मिलता आया है. जेपी ने बिहार छात्र आंदोलन को नैतिक ताकत दी, वी.पी. सिंह मंडल का राजनैतिक चेहरा बने और अण्णा हजारे इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के प्रतीक रहे, जिसकी कुछ ऊर्जा को बाद में केजरीवाल चुनावी राजनीति में ले गए.

सीजेपी के पास 30 वर्षीय दीपके हैं—इस आंदोलन का असामान्य चेहरा, लेकिन पूरी तरह संयोगवश भी उभरा हुआ नहीं. महाराष्ट्र के मध्यमवर्गीय बौद्ध दलित परिवार में जन्मे दीपके ने मराठी मीडियम स्कूल में पढ़ाई की, पुणे से पत्रकारिता में ग्रेजुएशन किया और बोस्टन यूनिवर्सिटी में पब्लिक रिलेशंस की पढ़ाई की.

राजनीति भी उनके लिए बिल्कुल नई नहीं है. 2020 से 2023 के बीच उन्होंने आप की सोशल मीडिया टीम में वॉलंटियर के तौर पर काम किया, जहां डिजिटल संदेशों की उनकी समझ दिखने लगी थी.

उनके साथ काम कर चुके आप के पूर्व सोशल मीडिया रणनीतिकार अंकित लाल कहते हैं, “अभिजीत लीक से हटकर थे. वे हमेशा विचारों से भरे रहते थे. उनमें कुछ अलग था.” फिर भी सीजेपी ने जानबूझकर दीपके को व्यक्तिपूजा का केंद्र बनाने से परहेज किया है.

चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं कि इससे सीजेपी नेतृत्वहीन नहीं हो जाती. उनका कहना है, “उनके पास पहले से नेता हैं... फैसले लेने का एक ढांचा है.” कोशिश नेता-केंद्रित हुए बिना नेतृत्व देने की है.

दीपके के उभार का एक और दिलचस्प पहलू है. बी.आर. आंबेडकर से प्रभावित दीपके महाराष्ट्र के उस बौद्ध दलित समुदाय से आते हैं, जहां शिक्षा और सरकारी नौकरी लंबे समय से सामाजिक तरक्की के मजबूत साधन रहे हैं. फिर भी उन्होंने खुद को दलित नेता के तौर पर पेश नहीं किया.

उन्होंने जाति के बजाए पीढ़ी के आधार पर एक व्यापक पहचान बनाने की कोशिश की और सभी सामाजिक समूहों के छात्रों तथा नौकरी चाहने वाले युवाओं को एकसाथ जोड़ा. यही सीजेपी को एक अलग प्रयोग बनाता है. उसका जनाधार जाति, धर्म, भाषा या भूगोल के खड़े बंटवारे पर नहीं बल्कि उम्र और साझा आकांक्षाओं के व्यापक जुड़ाव पर टिका हुआ है.

हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर बंटे हुए हैं कि सीजेपी का विकेंद्रीकृत मॉडल उसकी ताकत है या कमजोरी. चुनाव विश्लेषक और सी-वोटर के सह-संस्थापक यशवंत देशमुख इतिहास की ओर इशारा करते हैं. दरअसल, कामयाब जन आंदोलन आम तौर पर किसी पहचाने जाने वाले चेहरे—जेपी, वी.पी. सिंह, हजारे या केजरीवाल—के आसपास एकजुट हुए हैं.

देशमुख को नहीं लगता कि दीपके का कद अभी इतना बड़ा है. वे सफल डिजिटल आंदोलन खड़ा करने और जन आंदोलन को टिकाए रखने वाली नैतिक साख तथा करिश्मे के बीच साफ फर्क करते हैं.

उनका कहना है, “दीपके जेपी या अन्ना के आसपास भी नहीं हैं. वे अरविंद केजरीवाल के एक फीसद भी नहीं हैं.” देशमुख के मुताबिक, सोनम वांगचुक को आंदोलन में शामिल करना दिखाता है कि सीजेपी ने नेतृत्व की इस कमी को खुद भी महसूस किया है.

वांगचुक ने आंदोलन को भले ही नैतिक साख और सार्वजनिक पहचान दी, लेकिन वे भी इसका स्थायी केंद्र बनने लायक समर्थन नहीं जुटा सके. देशमुख का मानना है, “सीजेपी की सबसे बड़ी कमी यह है कि उसके पास लोगों को एकजुट करने के लिए अण्णा हजारे सरीखा कोई चेहरा नहीं है.”

घनश्याम शाह शायद इसका सबसे उपयोगी जवाब देते हैं. वे कहते हैं, “कोई बड़ा विचार इसे जोड़ सकता है. उसके पीछे एक व्यक्ति या लोगों का समूह हो सकता है.” उनकी बड़ी आपत्ति यह है कि सीजेपी के पास अभी वह व्यापक नजरिया नहीं है.

जेपी के ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान के उलट, वे कहते हैं, “आज की तारीख में वह नजरिया नहीं है...मुझे वह दिखाई नहीं देता.” यानी नेतृत्व का सवाल फिर एजेंडे पर लौट आता है. अपना जेपी खोजने से पहले सीजेपी को शायद अपना बड़ा विचार खोजना होगा.

पीएम मोदी 8 अगस्त को आइआइटी दिल्ली के दीक्षांत समारोह में
देहरादून में 17 जुलाई को कांग्रेस के 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी

क्या यह जेन ज़ी का पल है?
असल में, सीजेपी को सबसे मजबूत हवा शायद उस बदलाव से मिल रही, जिसे उसने पैदा नहीं किया है. वह बदलाव है भारतीय राजनीति में बढ़ती पीढ़ीगत दरार. कांग्रेस के विचारक और राज्यसभा सांसद प्रवीण चक्रवर्ती के मुताबिक, मंडल या इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के आंदोलन किसी खास मुद्दे के इर्द-गिर्द खड़े हुए थे, लेकिन अब उभरता बंटवारा उम्र के आधार पर हो सकता है.

चक्रवर्ती कहते हैं, “भारतीय राजनीति में पहली बार उम्र की दरार इतनी साफ नजर आ रही है. युवा वोटर केवल नौकरियों या फिर परीक्षाओं को लेकर नाराज नहीं. उनकी बेचैनी उस पूरे राजनैतिक तंत्र से है, जिसे वे पुराने दौर का मानते हैं.”

देश की राजनीति में पीढ़ियों की यह दूरी शायद और तेजी से बढ़ रही है. आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर कहते हैं कि जिस पीढ़ीगत बदलाव में पहले 20-25 साल का लंबा वक्त लगता था, वह तकनीक और तेजी से बदलते नजरिए के कारण अब चार-पांच साल में ही हो सकता है.

केतकर का मानना है, “अचानक आए तकनीकी बदलाव ने सामाजिक-सांस्कृतिक दरार पैदा कर दी है और पीढ़ियों के बीच संवाद की दूरी बढ़ाई है. समाज और परिवारों के रूप में हमें इस दूरी को पाटना होगा. वरना सामाजिक बिखराव बढ़ेगा और आंकड़ों से परिभाषित जेन ज़ी की चिंताओं का टिकाऊ समाधान नहीं मिल सकेगा.”

दिलचस्प बात यह है कि सीजेपी के वैचारिक विरोधी भी मानते हैंः स्थापित राजनीति ने इस नए वर्ग की बात नहीं सुनी तो खतरा उत्पन्न हो सकता है. केतकर का कहना है, “जेन ज़ी एकतरफा संवाद के बजाय बातचीत चाहती है. वह चाहती है कि उसकी बात भी सुनी जाए. उसकी अपनी चिंताएं हैं.”

तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलै ने पार्टी छोड़कर एक जमीनी संगठन बनाया है. उनका कहना है कि भाजपा का लगातार अपने दायरे में सिमटता तंत्र सीजेपी के पक्ष में उठ रही जमीनी लहर को नहीं भांप सका. अन्नामलै का मानना है कि भाजपा को अब दिखावटी नहीं बल्कि पीढ़ीगत स्तर पर वास्तविक बदलाव करना होगा. लेकिन, पुरानी राजनीति से नाराजगी अपने आप सीजेपी के समर्थन में तब्दील नहीं हो जाएगी.

यह किसी एकजुट ‘जेन ज़ी वोट’ का संकेत भी नहीं है. भारत में क्षेत्रीय, जातीय और दलीय ढांचे अब भी काफी मजबूत हैं. कोई कामयाब आंदोलन आसानी से नाकाम राजनीतिक दल बन सकता है.

सीजेपी खाली राजनैतिक मैदान में भी काम नहीं कर रही. भाजपा युवाओं तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है. उसकी तरह कांग्रेस भी युवाओं तक अपनी पहुंच बढ़ा रही है (देखें ग्राफिक). स्थापित दल खुद को बदल सकते हैं, नेतृत्व में नए चेहरे ला सकते हैं, जेन ज़ी के मुद्दों को अपना सकते हैं और उसकी डिजिटल भाषा सीख सकते हैं.

सीजेपी अभी जिस राजनीतिक माहौल में उतरी है, उसका विरोधाभास यही है. बदलाव के लिए जमीन असाधारण रूप से तैयार हो सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह सीजेपी के लिए तैयार हो. नई पीढ़ी शायद किसी नए विकल्प की तलाश में है. मगर सीजेपी उसका जरिया बन पाएगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर होगा कि वह युवा होने और नएपन के थोड़े समय के फायदे को भरोसे, प्रदर्शन और टिकाऊ ताकत में बदल पाती है या नहीं.

उसके आंदोलन के सीजन 1 ने दिखाया कि सीजेपी बड़ी हलचल पैदा कर सकती है. अब सीजन 2 बताएगा कि वह बदलाव ला सकती है या नहीं.

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