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डार्क मोड

अंडे पर खींचतान

सोलह राज्यों ने मिड-डे मील में अंडा परोसने से इनकार किया. ऐसे में दुनिया की इस तरह की सबसे बड़ी योजना बच्चों के पोषण को मानकों के अनुरूप न रखने को लेकर आलोचनाओं के घेरे में है

cover story: midday meals
आवरण कथा : मिड-डे मील (फोटो : बंदीप सिंह)
अपडेटेड 17 अगस्त , 2026

स्कूली बच्चों की दोपहर की थाली में अंडा देश के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने की दरारों को जितनी स्पष्टता से पेश करता है, वैसा शायद ही कोई व्यंजन कर सके. इसी वजह से पश्चिम बंगाल का ताजा मिड-डे मील विवाद मेन्यू में बदलाव से कहीं ज्यादा राजनैतिक बवंडर बन गया.

राज्य में नौ मई को पहली बार भाजपा की सरकार बनने के फौरन बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की कि कोलकाता नगर निगम (केएमसी) क्षेत्र के करीब 1,800 सरकारी और सरकार से सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए पका हुआ मिड-डे मील अन्नामृत फाउंडेशन तैयार करेगा.

यह इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (इस्कॉन) का एक एनजीओ है. यह संगठन सख्त शाकाहारी परंपरा का पालन करता है. इसका मतलब यह था कि इन स्कूलों के मिड-डे मील की थाली में जल्द ही अंडों की जगह सोया, पनीर, राजमा और दालें परोसी जाने लगेंगी.

किसी और राज्य में इस तरह का कदम उठाया गया होता तो शायद लोगों के ध्यान में भी नहीं आता. लेकिन बंगाल में मछली, मांस और अंडे ज्यादातर लोगों के रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा हैं. ऐसे में विपक्षी दलों ने नई भाजपा सरकार पर पिछले दरवाजे से शाकाहार थोपने का आरोप लगाया.

अभिभावकों ने साफ कहा कि सरकारी स्कूलों में बच्चे क्या खाएंगे, यह किसी धार्मिक संगठन की भोजन संहिता से क्यों तय हो? शिक्षकों ने सावधान किया कि अंडे थाली की एक और चीज भर नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के कुछ बच्चों के लिए स्कूल आने की एक वजह भी हैं.

भारी विरोध ने सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया. 29 जुलाई को शुभेंदु अधिकारी ने ऐलान किया कि पहली अगस्त से इस्कॉन पायलट प्रोजेक्ट के तहत शाकाहारी भोजन देगा लेकिन स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) अलग से अंडे उपलब्ध कराएंगे.

उन 185 केएमसी संचालित स्कूलों में भी अंडे फिर शुरू किए जाएंगे, जहां तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) शासन के समय से इस्कॉन पहले ही शाकाहारी भोजन दे रहा था. अधिकारी ने ओडिशा मॉडल का हवाला देते हुए कहा, ‘‘इनके साथ-साथ राज्य सरकार एसएचजी के जरिए छात्रों को प्रोटीन के लिए अंडे देगी.’’

इस तरह से बंगाल के ‌मिड-डे मील में अंडा वापस आ गया है. लेकिन इस विवाद ने देश के मौजूदा तानेबाने की जैसे सीवन उधेड़ दी कि: आखिर क्यों कुछ राज्यों के स्कूलों में छात्रों को अंडे मिलें और दूसरों को नहीं?

बच्चों को किफायती प्रोटीन उपलब्ध कराने का मामला क्या राज्य की राजनीति, स्थानीय खानपान की आदतों, धार्मिक भावना, लागत खर्च, लॉजिस्टिक्स या केंद्रीकृत शाकाहारी भोजन सप्लायरों की पसंद पर निर्भर होना चाहिए? देश में अब भी बच्चों का कुपोषण एक बड़ी समस्या है, ऐसे में क्या सियासत को बच्चों की सेहत के मामलों पर हावी होने दिया जाना चाहिए?

राष्ट्रीय दरार
अपरान्ह भोजन या मिड-डे मील कार्यक्रम करीब 10.4 लाख स्कूलों में लगभग 11.2 करोड़ बच्चों को मुहैया कराया जाता है, जिसे अब प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण या संक्षेप में पीएम पोषण कहा जाता है. इस तरह से यह दुनिया का सबसे बड़ा स्कूली बच्चों का भोजन कार्यक्रम बन गया है.

यह सीधे-सादे वादे पर खड़ा किया गया था कि गरम पका हुआ भोजन बच्चों को स्कूल में खींचेगा, हाजिरी सुधरेगी और यह उन्हें पर्याप्त पोषण मुहैया कराने का बुनियादी आधार बनेगा. लेकिन यह आधार बराबर नहीं. केंद्र कैलोरी और प्रोटीन के मानक तय करता है, मुफ्त में अनाज देता है और रसोई खर्च राज्यों के साथ साझा करता है. लेकिन मेन्यू राज्य सरकारें तय करती हैं.

पोषण का एक अजीब भूगोल है. एक राज्य में बच्चे को हफ्ते में छह दिन अंडे मिल सकते हैं. दूसरे में कभी नहीं. तीसरे में अंडे कागज पर हो सकते हैं लेकिन वे स्थानीय फंड, माता-पिता की सहमति, सप्लायरों या स्कूल मैनेजमेंट कमेटी की दान जुटाने की इच्छा पर निर्भर करते हैं.

राज्यों से मिले इनपुट के आधार पर मौजूदा गिनती साफ तस्वीर पेश करती है: 28 राज्यों में से सिर्फ 16 और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में से चार नियमित पीएम पोषण या राज्य-पोषित पूरक स्कूल भोजन मेन्यू में अंडे शामिल करते हैं. सोलह ऐसा नहीं करते.

अंडे परोसने वाले राज्य मुख्य रूप से दक्षिण, पूर्व और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में केंद्रित हैं: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, असम, त्रिपुरा और कुछ अन्य राज्य अपने-अपने ढंग से कम-ज्यादा अंडे परोसते हैं. गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, गोवा और दिल्ली समेत कई राज्य अंडा-मुक्त या बड़े पैमाने पर शाकाहारी सूची में हैं.

यही अंडों की बड़ी खाई है. इसे सिर्फ दलगत राजनीति से परिभाषित नहीं किया जा सकता. हालांकि राजनीति उससे दूर भी कहां रहती है. भाजपा-शासित कर्नाटक ने धार्मिक समूहों के विरोध के बावजूद बसवराज बोम्मई के कार्यकाल में 2021-22 में अंडे परोसने शुरू किए. एनडीए-शासित आंध्र प्रदेश अब भी हफ्ते में पांच दिन अंडे परोसता है.

भाजपा-शासित उत्तराखंड हफ्ते में एक बार अंडे या फल परोसता है, और हफ्ते में दो बार स्किम्ड मिल्क. फिर भी उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भाजपा-शासित या भाजपा-प्रभावित राजनैतिक व्यवस्था ने शाकाहारी भोजन को तरजीह दी है या अंडों के लिए राज्य फंडिंग वापस ले ली है.

कांग्रेस या विपक्ष-शासित राज्य भी इस मामले में एक जैसे नहीं. यह खाई विचारधारा, खानपान की आदतों, जातिगत श्रेणियों, सप्लायर मॉडल, राज्य की वित्तीय स्थिति और प्रशासनिक सुविधा वगैरह के आधार पर बनती है.

विडंबना यह है कि स्कूल भोजन में अंडे की शुरुआत खुद एक राजनैतिक कदम थी. हालांकि उसकी जड़ें कल्याणकारी लोकलुभावन राजनीति में थीं. देश में स्कूली भोजन के प्रयोग 1925 में मद्रास में शुरू हुए. 1960 के दशक में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. कामराज ने मिड-डे मील को शिक्षा के व्यापक प्रसार का औजार बनाया. बाद में एम.जी. रामचंद्रन ने उसे अपनी बड़ी राजनैतिक ताकत बनाया.

तमिलनाडु ने स्कूलों में अंडे मुहैया करने की भी शुरुआत की. एम. करुणानिधि के समय राज्य ने 1989 में हफ्ते में एक उबला अंडा देना शुरू किया गया. जे. जयललिता ने बाद में ‌इस कार्यक्रम का विस्तार किया, और तमिलनाडु आज उन राज्यों में है जहां अंडे स्कूल मेन्यू का नियमित हिस्सा हैं.

सुप्रीम कोर्ट के 2001 के ऐतिहासिक आदेश ने उसे राष्ट्रीय कार्यक्रम में बदल दिया. यह पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की ओर से जीवन के अधिकार के तहत दायर जनहित याचिका पर आया फैसला था. अदालत ने राज्यों को पका हुआ मिड-डे मील देने का निर्देश दिया.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 ने बाद में 6-14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त पौष्टिक भोजन का वैधानिक अधिकार दिया. उसी योजना को 2021 में पीएम पोषण नाम दे दिया गया. लेकिन कानून में पौष्टिक आहार देने की बात है, उसका स्रोत तय नहीं है. वह चाहे अंडा हो, दूध हो या कोई खास खाद्य पदार्थ हो.

प्राइमरी स्कूल के भोजन में 450 किलो कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन होना चाहिए. उच्च प्राथमिक स्कूल के भोजन में 700 किलो कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन होना चाहिए. थाली की चीजें भी तयह हैं: प्राथमिक स्कूल के बच्चों के लिए 100 ग्राम अनाज, 20 ग्राम दाल, 50 ग्राम सब्जी और पांच ग्राम तेल; बड़े बच्चों के लिए 150 ग्राम अनाज, 30 ग्राम दाल, 75 ग्राम सब्जी और 7.5 ग्राम तेल.

केंद्र की भूमिका सीमित लेकिन अहम है. वह ज्यादातर राज्यों में रसोई की लागत का 60 फीसद और पूर्वोत्तर तथा निर्धारित हिमालयी राज्यों में 90 फीसद खर्च उठाता है; अनाज मुफ्त दिया जाता है. वित्त वर्ष 2027 के बजट में पीएम पोषण के लिए 12,750 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं.

प्रति बच्चे प्रति स्कूल दिवस सामग्री लागत बाल वाटिका से कक्षा 5 तक के लिए 6.78 रुपए और कक्षा 6-8 के लिए 10.17 रुपए है. कई राज्य उससे ऊपर खर्च करके अंडे, दूध, फल, चिक्की या अन्य पूरक चीजें देते हैं. विवेकानुसार तय होने वालेे इसी मोड़ पर अंडा अक्सर कमजोर पड़ जाता है.

थाली की राजनीति
अमूमन अंडे राज्य के खर्च से अतिरिक्त तौर पर जोड़े जाते हैं, इसलिए लागत खर्च बढ़ने या सप्लायरों की शिकायत आने पर सबसे पहले उन्हीं की कटौती होती है. महाराष्ट्र में साफ ‌दिखा ‌कि सरकार कैसे पीछे हट गई. दो दशक के अंतराल के बाद 2023 में राज्य ने हफ्ते में एक बार उबले अंडे या अंडा पुलाव देने का फैसला किया, और जो बच्चे अंडे नहीं खाते, उनके लिए केले या स्थानीय फल का विकल्प रखा. मकसद चावल-आधारित स्कूल भोजन में प्रोटीन जोड़ना था.

एक जिला परिषद के शिक्षा अधिकारी बताते हैं कि बच्चे अंडे “चाव से” खाते थे. लेकिन इस कदम का धार्मिक और सांप्रदायिक समूहों ने विरोध किया, जिनमें जैन समुदाय के कुछ लोग भी शामिल थे. जनवरी 2024 में राज्य ने फंडिंग वापस ले ली और स्कूल मैनेजमेंट कमेटियों से कहा कि अगर वे अंडे देना जारी रखना चाहती हैं तो जनता से धन जुटाएं. 12 शाकाहारी व्यंजनों की सूची—वेज पुलाव, सोयाबीन पुलाव, दाल-चावल वगैरह—विकल्प बन गई.

इस कदम ने महाराष्ट्र में तीखी बहस छेड़ दी. कोंकण के मछुआरों का प्रतिनिधित्व करने वाली मच्छीमार कृति समिति के अमजद बोरकर ने तटीय इलाके में बच्चों को अंडे नहीं दिए जाने को विडंबना बताया, जबकि वहां की बहुसंख्यक आबादी मांसाहारी है.

अर्थशास्त्री नीरज हातेकर ने अंडों को प्रोटीन कुपोषण का आसान समाधान बताया और कहा कि किसी भी विकल्प से पहले “पायलट रन और रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल” होने चाहिए.

दलित किचन्स ऑफ मराठवाड़ा के लेखक शाहू पटोले ने इस विवाद को पूरी तरह जाति की राजनीति से जोड़ा. उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों में मुख्य रूप से गरीब बच्चे पढ़ते हैं, जिनमें कई दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों से आते हैं. उनके लिए अंडे सामान्य भोजन हैं. उन्होंने पूछा, “ये स्कूल आम तौर पर गरीबों के बच्चों के लिए हैं. तो फिर उन्हें अंडे देने में समस्या क्या है?”

अंडों का विरोध करने वाले लोग अपनी आपत्ति को शायद ही कभी विचारधारा से प्रेरित बताते हैं. एकनाथ शिंदे की शिवसेना से जुड़े धर्मवीर आध्यात्मिक सेना के अक्षय महाराज भोसले ने दलील दी कि जिन परिवारों में मांसाहार नहीं होता, उनके बच्चे स्कूल में अंडे खा सकते हैं.

उन्होंने इसके बजाय मूंगफली, ड्राइ फ्रूट्स, सेब, फल और दूध का सुझाव दिया, और पोल्ट्री में स्टेरॉयड तथा एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर चिंता जताई. उनका कहना था कि “लागत जो हो, छात्रों को अंडे से भी ज्यादा पौष्टिक भोजन दीजिए.”

श्री जैन संघ संगठन के कमलेश शाह ने स्वच्छता, संक्रमण, परिवहन और भंडारण में स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर की कमी, और अंडे के छिलकों पर रासायनिक अवशेषों की बात उठाई. उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र अपनी बड़ी शाकाहारी आबादी के लिए चिक्की बांट सकता है.

ये गंभीर आपत्तियां हैं. कुछ बच्चों को अंडों से एलर्जी हो सकती है. गर्मी में उनके टूटने और खराब होने का अंदेशा रहता है. पर ऐसी दलीलें अक्सर ज्यादा बुनियादी एजेंडा दिखाती हैं: राज्य को साझा स्कूल भोजन में ऐसी चीज नहीं परोसनी चाहिए, जिसे मांसाहारी माना जाता है.

शाकाहारी संस्कृति
राजस्थान सरकार खुलकर कहती है कि राज्य में मिड-डे मील में कभी अंडे नहीं दिए गए, चाहे सत्ता में भाजपा रही हो या कांग्रेस. वजहें जितनी सांस्कृतिक हैं, उतनी ही प्रशासनिक भी. शाकाहारियों के बहुमत वाले पांच राज्यों में राजस्थान की आबादी में उनका प्रतिशत सबसे ज्यादा है. बाकी राज्य पंजाब, हरियाणा और गुजरात हैं.

राज्य में जैन, वैष्णव, बिश्नोई और हिंदू समुदायों के बड़े हिस्से पीढ़ियों से शाकाहारी भोजन करते आए हैं. कई घरों में अंडे स्वीकार्य भोजन नहीं. कुछ माता-पिता न सिर्फ अपने बच्चों के अंडे खाने को लेकर असहज हैं, बल्कि उन बर्तनों में परोसे गए भोजन को लेकर भी, जिनका पहले अंडों के लिए इस्तेमाल हुआ हो.

एक निजी स्कूल शिक्षक ने इंडिया टुडे को बताया कि पक्के शाकाहारी परिवारों के कुछ बच्चों को अंडे देखने में भी “घिनौने” लगते हैं, हालांकि कुछ बच्चे जिज्ञासा में उन्हें चख सकते हैं और माता-पिता को नहीं बताते. राजस्थान लॉजिस्टिक्स का हवाला भी देता है: गर्मियों में भंडारण, ढुलाई, टूट-फूट, गंध, छीलना और स्टाफ पर बोझ. इसलिए लगातार सरकारों ने सामाजिक टकराव का जोखिम उठाने के बजाए दूध, दाल, सोया, चना और फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों को तरजीह दी है.

गुजरात ने 1984 में स्कूल भोजन शुरू किया और 1995 में उसे राष्ट्रीय योजना के साथ मिला दिया लेकिन उसने भी कभी अंडा नहीं परोसा. उसके मेन्यू में गेहूं, चावल, दालें, सब्जियां और सुखाड़ी शामिल हैं, जो गेहूं, गुड़ और घी से बनी मिठाई है. बंगाल बहस के केंद्र में आई इस्कॉन से जुड़ी संस्था अक्षय पात्र राज्य में केंद्रीकृत रसोइयां चलाती है.

गुजरात कागज पर कहता है कि वह जरूरी कैलोरी और प्रोटीन मानकों से ज्यादा दे रहा है. 2024 में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने मुख्यमंत्री पौष्टिक अल्पाहार योजना जोड़ी, जो नाश्ते का कार्यक्रम है. इसमें फाड़ा लापसी, मुठिया, अंकुरित दालें और चना जैसी चीजों के जरिए औसतन 200 कैलोरी और छह ग्राम प्रोटीन दिया जाता है, और यह करीब 32,000 स्कूलों में 40 लाख से ज्यादा बच्चों तक पहुंचता है.

फिर एक दूसरा गुजरात भी है. मई 2026 में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-6) के छठे दौर में राज्य में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनापन 35.3 फीसद दिखता है, जो राष्ट्रीय औसत 29.3 फीसद से काफी ज्यादा है (देखें, पौिष्टक आहार की खाई). 6-23 महीने के बच्चों में न्यूनतम पर्याप्त आहार पाने वालों की हिस्सेदारी सिर्फ 7.8 फीसद है, जबकि राष्ट्रीय आंकड़ा 15.3 फीसद है.

2020 में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने स्कूल भोजन में विटािमन और प्रोटीन की कमी पाई और पोषण गुणवत्ता की कमजोर निगरानी पर सवाल उठाया. इसमें दो राय नहीं कि बच्चे की वृद्धि मां को मिलने वाले पोषण, गरीबी, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवा और पहले 1,000 दिनों में दूध पिलाने से तय होती है. लेकिन एक ऐसे राज्य के लिए, जहां पोषण के मोर्चे पर‌ स्थिति पहले से ही लचर हो, उसकी भरपाई न करने का जोखिम कैसे उठा सकता है.

बीच का रास्ता
इसके उलट, आंध्र प्रदेश में अंडे मुहैया कराने को अहम माना जाता है. इस राज्य में हफ्ते में पांच दिन अंडे परोसे जाते हैं, जिसका 2020 में जगन मोहन रेड्डी के जगनन्ना गोरुमुड्डा कार्यक्रम के तहत बड़ा विस्तार किया गया था. मौजूदा तेलुगु देशम पार्टी की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार ने उस योजना का नाम बदलकर डोक्का सीतम्मा मध्याना बडी भोजनम कर दिया है, लेकिन प्रोटीन से भरपूर आहार बरकरार रख गया है.

आंध्र प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में एमडीएम तथा स्कूल स्वच्छता के निदेशक श्रीनिवास राव कहते हैं, “खासकर बच्चों के आहार में अंडे प्रोटीन और ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं लेकिन घरों में अक्सर उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है. जो परिवार हफ्ते में एक-दो बार चिकन खाते हैं, वे भी रोजमर्रा के आहार में अंडों की अहमियत नहीं समझते. इसलिए एमडीएम में अंडों को शामिल करना छात्र की बढ़वार के लिए बेहद जरूरी है.”

तेलंगाना हफ्ते में तीन बार अंडे परोसता है, साथ में रागी जावा जैसे मोटे अनाज अतिरिक्त देता है. वहां समस्या धर्म नहीं, बल्कि कीमत और सप्लाइ है. जब बाजार कीमतें राज्य की तय दरों से ऊपर चली जाती हैं या सप्लायरों के बिल लंबित रहते हैं, तो अंडों की डिलीवरी बाधित हो जाती है. आंध्र और तेलंगाना, दोनों में सरकारें फिलहाल प्रति अंडा करीब छह रुपए खर्च करती हैं.

कर्नाटक ने दिखाया है कि विरोध से कैसे पार पाया जा सकता है. 2021-22 में बोम्मई सरकार ने कल्याण कर्नाटक जिलों में सप्लीमेंटरी न्यूट्रिशन फूड के रूप में हफ्ते में दो बार अंडे परोसने शुरू किए. और जो बच्चे अंडे नहीं खाते, उनके लिए केले या मूंगफली की चिक्की का विकल्प रखा. धार्मिक समूहों ने इस पर ऐतराज किया. लेकिन सरकार की ओर से कराए गए एक अध्ययन में पाया गया कि यडगीर में अंडे या केले पाने वाले बच्चों का वजन गडग के बच्चों की तुलना में बढ़ा. गडग में यह योजना उपलब्ध नहीं थी.

भाजपा सरकार ने जुलाई 2022 में इस योजना को पूरे राज्य में फैला दिया. 2024 में सिद्धरामैया सरकार ने अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जिसने सभी 31 जिलों में एलकेजी से कक्षा 10 तक के छात्रों को अंडे परोसने के लिए तीन वर्षों में 1,500 करोड़ रुपए देने का वादा किया. यह हफ्ते में दो दिन से बढ़ाकर स्कूल वाले सभी छह दिनों में परोसा जाने लगा. आज कर्नाटक में पीएम पोषण के तहत 52,425 स्कूलों के करीब 47 लाख छात्र कवर होते हैं.

झारखंड एक ऐसा राज्य है आदिवासी, दलित और बड़े पैमाने पर ग्रामीण समुदाय के लोग अंडे का सेवन करते हैं. यह प्रदेश अंडे को लेकर एक ऐसी नीति अपनाता है जिसमें फूड आइटम एक प्रैक्टिकल सप्लीमेंट हैं. रांची के लालपुर में बालिका शिक्षा भवन की 13 वर्षीया पायल कुमारी को सोमवार और शुक्रवार का इंतजार रहता है, क्योंकि उन दिनों अंडे मिलते हैं.

पायल कहती है, “मेरे पिता गरीब हैं. घर पर हम सिर्फ रविवार को अंडा करी बना सकते हैं. लेकिन स्कूल में मुझे हफ्ते में दो बार अंडे मिलते हैं. उनका स्वाद सचमुच अच्छा होता है.” 

बिहार इस मायने में ज्यादा सतर्क है: हर शुक्रवार को एक उबला अंडा दिया जाता है. और जो बच्चे अंडे नहीं खाते, उनके लिए 100 ग्राम मौसमी फल मुहैया किया जाता है. राज्य में अंडों को लेकर कोई बड़ा राजनैतिक टकराव नहीं दिखा लेकिन पोषण विशेषज्ञों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारी कुपोषण वाले राज्य के लिए हफ्ते में एक अंडा बहुत कम है. बाल अधिकार कार्यकर्ता के.डी. मिश्र अंडों को “बच्चों के लिए उपलब्ध प्रोटीन के सबसे किफायती और संपूर्ण स्रोतों में से एक” बताते हैं.

भाजपा-शासित राज्यों में उत्तराखंड एक और अपवाद है. यहां चारधाम सर्किट की वजह से धर्म खासी अहमियत रखता है, लेकिन यह राज्य अपने संसाधनों से हफ्ते में एक बार अंडे या फल और हफ्ते में दो बार स्किम्ड दूध मुहैया कराता है. दरअसल यह चुनाव शाकाहार बनाम पोषण का नहीं, बल्कि इस बात की स्वीकारोक्ति है कि पहाड़ों में खानपान की आदतें मैदानी इलाकों से एकदम अलग हैं. 

सबकी चिंता का हल
असल मुद्दा तब उठता है, जब केंद्रीकृत शाकाहारी सप्लायर बहस के केंद्र में आ जाते हैं. इस्कॉन और उससे जुड़ी चैरिटेबल संस्थाएं मांस, मछली या अंडे नहीं पकातीं, क्योंकि उनका भोजन पहले गौड़ीय वैष्णव परंपरा में प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है. इस्कॉन भक्तों की स्थापित अक्षय पात्र संस्था लैक्टो-वेजिटेरियन दर्शन को बनाए रखती है.

उसका कहना है कि उसका भोजन अनाज, दाल, सोया, पनीर और स्थानीय शाकाहारी व्यंजनों के जरिए सरकार के पीएम पोषण मानकों को पूरा करता है.

वह हर राज्य के लिए मेन्यू तैयार करती है: कर्नाटक में चावल, सांभर और बिसी बेले भात; ओडिशा में दलमा; गुजरात में सुखाड़ी; उत्तरी राज्यों में दाल, चावल, खिचड़ी और सब्जी. उसका तर्क है कि बच्चों को अंडे मिलेंगे या नहीं, यह सरकारों के चुने हुए कॉन्ट्रैक्ट पर निर्भर करता है, सेवा प्रदाता पर नहीं.

पोल्ट्री उद्योग भी इस बहस को अपने कारोबारी हितों से बड़ा मानता है. जैसे-जैसे देश में ज्यादा से ज्यादा लोग पोषक तत्वों, खासकर प्रोटीन की कमी को लेकर जागरूक हो रहे हैं, अंडों की खपत लगातार बढ़ रही है. प्रति व्यक्ति औसत सालाना अंडा खपत कोविड महामारी से पहले 84 अंडों से बढ़कर आज 104 हो गई है.

मिड-डे मील इस ईकोसिस्टम का अहम हिस्सा है. देश भर में स्कूली भोजन के जरिए हर दिन करीब तीन करोड़ अंडे परोसे जाते हैं, जो देश में कुल अंडा उत्पादन का लगभग 8 फीसद है. पोल्ट्री इंडिया/आइपीईएमए के अध्यक्ष उदय सिंह बायस कहते हैं, “मिड-डे मील के तहत अंडे परोसने की नीति का 50 फीसद भी पूरी तरह लागू नहीं हो रहा.” वे उन कई राज्यों की ओर इशारा करते हैं जो या तो अंडे बिल्कुल नहीं परोसते या हफ्ते में सिर्फ एक-दो बार ही परोसते हैं.

दोपहर का भोजन करते रांची के लालपुर में बालिका शिक्षा भवन हाइस्कूल के बच्चे

हालांकि पोल्ट्री उद्योग के लिए राज्यस्तरीय प्रतिबंधों या उसके हटाए जाने का असर सीमित और अस्थायी ही होता है. बायस कहते हैं कि इस क्षेत्र की सालाना बड़ी चुनौतियां पक्षियों की मौत, बीमारी के प्रकोप और चारे की बढ़ती लागत है.

उनके शब्दों में, “मिड-डे मील में अंडों पर रोक उद्योग के लिए बड़ा मुद्दा नहीं है. लेकिन पोषण के नजरिए से मां के दूध के बाद अंडे भोजन के सबसे शुद्ध रूपों में हैं और उसे बढ़ावा मिलना चाहिए.” अंडों का विरोध करने वाले लोग अक्सर पोल्ट्री में एंटीबायोटिक के कथित इस्तेमाल की दलील देते हैं, और बायस को अफसोस है कि इसी का इस्तेमाल अंडों को स्कूल भोजन से बाहर रखने के लिए किया जा रहा है.

वे स्पष्ट करते हैं कि उद्योग केवल सरकार से मंजूर एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करता है और तय स्वीकार्य सीमा का पालन करता है. उनके मुताबिक, ज्यादातर पोल्ट्री किसान छोटे उत्पादक हैं, जिनके पास एंटीबायोटिक का अत्यधिक इस्तेमाल करने की वित्तीय क्षमता ही नहीं होती. ये दवाएं महंगी होती हैं और जरूरत पड़ने पर ही इस्तेमाल की जाती हैं.

वे एगोज से जुड़े हाल के विवाद की ओर भी इशारा करते हैं, जहां अंडों में प्रतिबंधित एंटीबायोटिक अवशेषों को लेकर आरोप लगाए गए थे. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) ने बाद में साफ किया कि देश में उपलब्ध अंडे मानव उपभोग के लिए सुरक्षित हैं और अंडों को कैंसर जोखिम से जोड़ने वाले दावे भ्रामक हैं और वैज्ञानिक रूप से समर्थित नहीं हैं.

उद्योग के हक में इसका निष्कर्ष साफ और सरल है: अगर चिंता गुणवत्ता पर नियंत्रण को लेकर है तो बेहतर नियमन कीजिए; गरीब बच्चों की थाली से सबसे किफायती प्रोटीन खाद्य पदार्थों में से एक को हटाइए मत.
 

अंडे के फायदे
अब भी यह दलील कारगर है कि अंडे से अच्छा पोषण मिलता है. एक अंडा 6-7 ग्राम हाइ बायोलॉजिकल वैल्यू वाला प्रोटीन देता है, जिसमें सभी नौ जरूरी अमीनो एसिड होते हैं, साथ में विटामिन बी12, विटामिन डी, कोलीन, सेलेनियम और फैट भी. पोषण विशेषज्ञ उसे सबसे अच्छी गुणवत्ता वाले प्रोटीन स्रोतों में गिनते हैं.

फरीदाबाद में फोर्टिस हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन के निदेशक डॉ. बी.एन. सिंह कहते हैं कि जो बच्चे अंडे नहीं खाते, वे दूध, दही, पनीर, दाल, चना, राजमा, सोयाबीन, नट्स, बीज और अनाज-दाल के मेल से प्रोटीन पा सकते हैं, बशर्ते आहार विविधतापूर्ण हो, मात्रा पर्याप्त हो और भोजन ठीक से प्लान ‌किया गया हो. यही शर्त असल मुद्दे की जड़ है. सावधानी से तैयार घरेलू आहार एक चीज है, लेकिन सरकारी स्कूल का भोजन बिल्कुल दूसरी ही बात.

यशोदा मेडिसिटी में इंटरनल मेडिसिन के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. सौरभ गुप्ता बताते हैं कि अंडों की जगह कुछ और लेना सिर्फ प्रोटीन का सवाल नहीं है; विटामिन बी12, विटामिन डी और कोलीन की भी भरपाई करनी होगी. वे कहते हैं, “मुख्य बात यह नहीं कि हर भोजन में सभी जरूरी अमीनो एसिड हों. मायने यह रखता है कि दिन भर में अलग-अलग प्रोटीन स्रोतों को मिलाकर लिया जाए.”

पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ डॉ. श्रीकांतिया श्रीधर इसे और साफ शब्दों में कहते हैं: “क्या बच्चे के आहार में अंडा अनिवार्य है? नहीं, ऐसा नहीं है. लेकिन अंडों की जगह जो भी दिया जाएगा, उसके सामने लॉजिस्टिक्स की कहीं ज्यादा जटिल चुनौती होगी. उस भोजन की निगरानी, निरंतरता, मात्रा और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सिस्टम को बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी.”

ऐसा नहीं है कि शाकाहारी भोजन से पर्याप्त पोषण नहीं मिल सकता. बिल्कुल मिल सकता है. बात दरअसल यह है कि उबला अंडा मापा जा सकता है, दिखता है और उसकी जगह धोखा देना मुश्किल है. दाल पतली हो सकती है. सोया नाम भर का हो सकता है. पनीर खरीद की गड़बड़ियों में गायब हो सकता है. फल विकल्प तो दे सकता है, प्रोटीन नहीं. इसलिए सबूत देने की जिम्मेदारी उस राज्य पर होनी चाहिए, जो अंडा हटाता है.

अंडों के खिलाफ दलील में अधिकारों का एक वैध पक्ष भी है. किसी बच्चे को परिवार की आस्था के खिलाफ कुछ खाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. गोवा में करीब 90 फीसद आबादी मांस या मछली खाती है. वहां सरकार ने 2022 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हफ्ते में तीन बार अंडे परोसने शुरू किए, लेकिन जल्द ही उसे बंद कर दिया गया.

कई राज्यों में बहस खानपान की पसंद से आगे बढ़कर पहचान तक पहुंच गई है. उत्तर प्रदेश ने स्कूली भोजन में कभी अंडे शुरू नहीं किए. उसकी आधिकारिक स्थिति अंडा-विरोधी नहीं है, लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार के तहत खाद्य विकल्पों ने सांस्कृतिक अर्थ हासिल कर लिया है.

राज्य की एक जिला, एक व्यंजन की पहल शाकाहारी जिला व्यंजनों को बढ़ावा देती है, जबकि लखनऊ के गलौटी और काकोरी कबाब, रामपुरी खानपान और मुरादाबादी बिरयानी जैसी दुनिया भर में मशहूर मांसाहारी परंपराओं को बाहर छोड़ देती है. आलोचक इसे शाकाहारी सार्वजनिक संस्कृति की व्यापक प्रस्तुति का हिस्सा मानते हैं.

समाजशास्त्री अमिता बाविस्कर का तर्क है कि हिंदुओं में सिर्फ कुछ ऊंची जातियां और कुछ मध्यवर्ती किसान जातियां ही परंपरागत रूप से शुद्ध शाकाहार का पालन करती रही हैं, जबकि ज्यादातर हिंदू मांसाहारी हैं. उनका कहना है कि शाकाहार पर हिंदुत्व राष्ट्रवादी जोर भोजन और संस्कृति को लेकर ब्राह्मणवादी नजरिया दिखाता है. फिर भी देश की बाल पोषण चुनौती निस्संदेह गंभीर बनी हुई है.

एनएफएचएस-6 के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनापन 29.3 फीसद है, जबकि गुजरात में यह 35.3 फीसद, राजस्थान में 31.8 फीसद, मध्य प्रदेश में करीब 31.4 फीसद और महाराष्ट्र में 29.5 फीसद है.

दूसरी तरफ तमिलनाडु और केरल में बौनेपन की दरें कम, करीब 20-21 फीसद हैं. ये लंबे समय से स्कूली भोजन में नवाचार करने वाले राज्य रहे हैं. ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि अंडे ही जवाब हैं, लेकिन वे यह जरूर बताते हैं कि स्कूल पोषण को पहचान की राजनीति की भेंट क्यों नहीं चढ़ाना चाहिए.

बंगाल सरकार का रास्ता बदलना दिखाता है कि पोषण की प्राथमिकताएं विचारधारा पर भारी पड़ सकती हैं. यही राष्ट्रीय सिद्धांत होना चाहिए. देश को अनिवार्य शाकाहार की जरूरत नहीं, बल्कि बच्चों को पौष्टिक आहार मुहैया कराने को लेकर अनिवार्य गंभीरता की जरूरत है.

राज्य का कर्तव्य आस्था, जाति या सुविधा का मेन्यू थोपना नहीं है, बल्कि यह पक्का करना है कि सबसे गरीब बच्चे को सबसे कम लागत पर सबसे अच्छा संभव पोषण मिले, परिवार की पसंद का सम्मान रहे लेकिन सार्वजनिक नीति दबंगई वाले खानपान वीटो के आगे समर्पण न करे. पीएम पोषण को पोषण कार्यक्रम ही बने रहना चाहिए, थाली की राजनीति का एक और रणक्षेत्र नहीं.

—साथ में ब्यूरो रिपोर्ट

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