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जेन ज़ी का आक्रोश

परीक्षाओं के पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ था एक विरोध प्रदर्शन. धीरे-धीरे बढ़ते हुए वह किस तरह से बन गया उसके लिए मोदी सरकार से जवाब मांगने वाला युवाओं का पूरा एक आंदोलन.

cover story angry youth
दिल्ली में 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश करती पुलिस

दिल्ली के जंतर-मंतर पर तीन हफ्तों तक प्रदर्शनकारियों को नजरअंदाज किया जा सकता था, उनका मजाक उड़ाया जा सकता था या उन्हें एक और सोशल मीडिया तमाशा कहकर खारिज किया जा सकता था. यह सिलसिला 20 जुलाई को खत्म हुआ, जब मॉनसून सत्र के पहले दिन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संसद मार्च के आह्वान पर हजारों-हजार लोग उमड़ पड़े.

बैरिकेड गिर गए, मध्य दिल्ली में आंसू गैस फैल गई और एक अजीब-से नाम वाले आंदोलन ने खुद को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया. फौरी वजह थी नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट फॉर अंडरग्रेजुएट (नीट-यूजी) 2026 के प्रश्नपत्र का लीक होना.

प्रदर्शनकारियों ने इस चूक की जवाबदेही के रूप में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा और उन छात्रों के लिए न्याय, जिन्हें उस व्यवस्था ने धोखा दिया जो उनकी सेवा के लिए बनी थी. जल्द ही नीट एक गंभीर विफलता का सबसे नुमायां संकेत बन गया: लीक होती परीक्षाएं, रद्द होती भर्ती परीक्षाएं, खाली पड़े पद और तैयारी के वे साल, जिन्हें धोखाधड़ी, देरी या प्रशासनिक नाकामी के चलते खोना पड़ा.

प्रदर्शनकारियों की यह विशाल संख्या जेन ज़ी की थी, यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा, और कमोवेश शांत. उनके हथियार थे पोस्टर, मीम्स और नारे. जब उनसे पूछा गया कि वे क्यों आए हैं, तो बहुत कम लोगों ने कहा कि वजह नीट पेपर लीक है. 26 साल की समरीन ने कहा, “कुछ भी तो ठीक से काम नहीं कर रहा.

जिस हवा में आप सांस लेते हैं, वह जहरीली है. परीक्षाएं होतीं नहीं. होती हैं तो नतीजे आने में सालों लग जाते हैं. नौकरियां हैं नहीं. कोई सुनता नहीं. और जब आप बोलते हैं, तो वे पुलिस छोड़ देते हैं. क्या हम मुजरिम हैं?”

थोड़ी देर और रुकिए तो गुस्सा शिकायतों की कई परतें खोलने लगता है: कि निष्पक्ष मौके नहीं हैं, कि डिग्री अब नौकरी की गारंटी नहीं देती, कि संस्थाएं जल्दी जवाब नहीं देतीं, गलतियां सुधारने में और देरी, और जिम्मेदार लोगों को सजा देने में सबसे ज्यादा देरी.

सेंट्र्ल दिल्ली में 20 जुलाई को दो स्टुडेंट्स पर लाठियां भांजता एक पुलिसकर्मी

इतना आक्रोश क्यों?

 

उनका गुस्सा उस परीक्षा व्यवस्था से भड़का, जो लाखों लोगों के धैर्य की परीक्षा लेती है. नीट-यूजी भारत में अंडरग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा का एकमात्र प्रवेश द्वार है. तीन मई को 22.1 लाख से ज्यादा उम्मीदवार करीब 1.37 लाख एमबीबीएस सीटों के लिए परीक्षा में बैठे.

परीक्षा से पहले ही राजस्थान के सीकर और महाराष्ट्र के लातूर समेत कोचिंग हबों में टेलीग्राम और व्हाट्सऐप पर एक “गेस पेपर” आ चुका था. बताया गया कि करीब 120 सवाल असली परीक्षा से मेल खाते थे.

ऐसे में नीट कराने वाली संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने 12 मई को परीक्षा रद्द कर दी—इस परीक्षा को पूरी तरह रद्द करने का फैसला पहली बार लिया गया—और 21 जून को दोबारा परीक्षा कराई. परीक्षा रद्द करने और रीटेस्ट के बीच 46 दिनों में 11 से 13 अभ्यर्थियों ने अपनी जान दे दी. जंतर मंतर के प्रदर्शनकारियों का दावा है कि यह आंकड़ा 21 से ज्यादा था. अब तक कोई आधिकारिक गिनती नहीं है, न ही कोई मुआवजा.

नीट कोई अपवाद नहीं. एक दशक लंबे डेटाबेस में 89 संदिग्ध लीक और 48 रीटेस्ट दर्ज हैं, जिनसे कम से कम 6.5 करोड़ उम्मीदवार प्रभावित हुए. एक और रिकॉर्ड में पांच वर्षों में 15 राज्यों में 41 लीक दर्ज किए गए.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक दशक में 152 लीक का हवाला देते हैं, जिनसे 7.5 करोड़ छात्रों का जीवन प्रभावित हुआ. जवाबदेही तो और भी दुर्लभ रही: दो दशकों में 45 बड़े लीक मामलों में—जिनमें हर परक्षीा में कम से कम 1 लाख अभ्यर्थी शामिल थे—से सिर्फ दो में सजा हुई.

सरकार का कहना है कि उसने संकट को नजरअंदाज नहीं किया. पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) ऐक्ट, 2024 संगठित नकल को रोकने के लिए पहला केंद्रीय कानून है. यह यूपीएससी (यूनियन पब्लिक सर्विस कमिशन), स्टेट सर्विस कमिशन, एनटीए, रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड और बैंकिंग भर्ती संस्थाओं की परीक्षाओं को कवर करता है, और सभी अपराधों को संज्ञेय तथा गैर-जमानती बनाता है.

दोषियों को 3-5 साल की कैद और 10 लाख रुपए तक जुर्माना हो सकता है. नीट पेपरलीक के मामले में सरकार का कहना है कि उसने शामिल लोगों को तुरंत गिरफ्तार किया, जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) को सौंपी, रीटेस्ट कराया और नतीजे प्रकाशित किए, वह भी एडमिशन कैलेंडर को बर्बाद किए बिना.

हालांकि नाकामी जितनी कानूनी है, उतनी ही संस्थागत भी. प्रवेश परीक्षाओं को मानकीकृत करने के लिए 2017 में बनाई गई एनटीए यूपीएससी जैसी वैधानिक संस्था नहीं है. यह 1860 के एक अधिनियम के तहत पंजीकृत सोसाइटी है, कानूनी रूप से हल्की संस्था, जिसके पास स्थायी कैडर नहीं है.

यह प्रतिनियुक्त अधिकारियों पर निर्भर करती है और छपाई, भंडारण तथा परिवहन को निजी वेंडरों को आउटसोर्स करती है. इसका पेन-ऐंड-पेपर मॉडल इन जोखिमों को कई गुना बढ़ा देता है. अक्तूबर 2024 में सौंपी गई के. राधाकृष्णन समिति की 101 सिफारिशों में सुरक्षित केंद्रों पर एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्रों की छपाई, साइकोमेट्रिक नॉर्मलाइजेशन और कम से कम 1,000 स्थायी टेस्टिंग सेंटरों का प्रस्ताव था.

डिजिटल खामियों और नौकरशाही के निठल्लेपन ने इन्हें अपनाने में देरी की. इस साल की फजीहत के बाद ही एनटीए ने 2027 से नीट को कंप्यूटर-बेस्ड टेस्टिंग (सीबीटी) में बदलने का फैसला किया.

लेकिन केवल कंप्यूटराइजेशन शिक्षा व्यवस्था की खामियों को ठीक नहीं कर सकता. उच्च शिक्षा संस्थानों में नामांकन अब करीब 4.5 करोड़ है, जो 2014-15 की तुलना में 31.5 फीसद ज्यादा है. ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो 23.7 से बढ़कर 30 हो गया है.

महिलाओं का ग्रॉस एनरोलमेंट पुरुषों से आगे निकल गया है, पीएचडी नामांकन लगभग तीन गुना हो गया है, और कॉलेजों की संख्या 38,498 से बढ़कर 46,624 हो गई है. लेकिन इस वृद्धि का बड़ा हिस्सा निजी संस्थानों से आया है, जबकि फैकल्टी भर्ती पीछे रह गई है.

एआइसीटीई (ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन) के प्रति शिक्षक 15-20 छात्रों के मानक के मुकाबले निजी कॉलेजों में औसतन 28 छात्र और सरकारी कॉलेजों में 47 छात्र हैं. हर 100 अतिरिक्त छात्रों पर एक से भी कम शिक्षक जोड़ा जाता है. 39 फीसद से कम विश्वविद्यालयों के पास नेशनल असेसमेंट ऐंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (नैक) की मान्यता है.

नतीजा यह है कि ऊपर एक छोटा, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी वर्ग है, बीच में असमान गुणवत्ता वाले सरकारी विश्वविद्यालय हैं, और नीचे हजारों संसाधन-विहीन संस्थान, जो ऐसी डिग्रियां दे रहे हैं जिनकी श्रम बाजार में कीमत लगातार डगमगा रही है.

ग्रेजुएट स्किल इंडेक्स 2025 के मुताबिक, केवल 42.6 फीसद स्नातक रोजगारयोग्य माने जाते हैं; इंजीनियरिंग स्नातकों में सिर्फ करीब 45 फीसद अपने मूल क्षेत्र की नौकरियों के लिए उपयुक्त हैं. औपचारिक व्यावसायिक ट्रेनिंग भारत के कार्यबल के सिर्फ 3-8 फीसद तक पहुंचती है; जर्मनी में यह 75 फीसद और दक्षिण कोरिया में 96 फीसद है.

भारत में 15-29 आयु वर्ग के 37.1 करोड़ लोग हैं, जो अमेरिका की पूरी आबादी से भी ज्यादा हैं. वे देश के इतिहास की सबसे शिक्षित पीढ़ी हैं, फिर भी उनमें से कई अब इस बात पर संदेह करने लगे हैं कि क्या शिक्षा अब भी उन्हें जीवन में ऊपर उठने में मदद कर सकती है.

पढ़ाई कर रहे युवाओं की हिस्सेदारी 2017 में 38 फीसद से घटकर 2024 के आखिर तक 34 फीसद रह गई. पढ़ाई छोड़ने वालों में घरेलू आय में मदद करने की जरूरत बताने वालों का अनुपात तेजी से बढ़ा, 58 फीसद से 72 फीसद तक.

रिसर्च फर्म जस्टजॉब्स नेटवर्क की संस्थापक सबीना दीवान कहती हैं, “नौकरियां वह नजरिया हैं, जिससे युवा दुनिया को देखते हैं, क्योंकि यह उनके भविष्य से जुड़ा है. उस मायने में यह पूरा विरोध वास्तव में नौकरियों और आजीविका, और युवाओं की गहरी असुरक्षा के बारे में है.”

श्रमबल भागीदारी एक गंभीर समस्या है क्योंकि 15 से 29 वर्ष के सिर्फ 46 फीसद युवा या तो काम कर रहे हैं या काम की तलाश में हैं. पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे 2025 युवाओं में बेरोजगारी 9.9 फीसद बताता है, जो कुल बेरोजगारी दर 3.1 फीसद से तीन गुना है. करीब हर चार में से एक युवा भारतीय न पढ़ रहा है, न रोजगार में है, न ट्रेनिंग में.

सरकार ईपीएफओ (एम्प्लॉईज प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन) और एनपीएस (नेशनल पेंशन सिस्टम) पेरोल में बढ़ोतरी, मुद्रा लोन, पीएलआइ (प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव) योजनाओं से पैदा हुई 14.5 लाख नौकरियों और 30 करोड़ से ज्यादा ई-श्रम रजिस्ट्रेशन का हवाला देती है, और सीएमआइई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) और आइएलओ (इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन) की पद्धतियों पर सवाल उठाती है.

दिल्ली में चल रहे प्रदर्शन के साथी एकजुटता जताते हुए देश के विभिन्न शहरों में छात्र और विपक्षी दलों के कार्यकर्ता

नौकरियों का संकट

मगर हकीकत यह है कि 15-25 वर्ष आयु वर्ग के स्नातकों में बेरोजगारी करीब 40 फीसद है, जो किसी भी शैक्षणिक श्रेणी में सबसे ज्यादा है. अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2004 से 2023 के बीच स्नातकों की संख्या औसतन हर साल करीब 50 लाख बढ़ी, लेकिन स्नातक रोजगार हर साल सिर्फ 28 लाख और वेतनभोगी स्नातक रोजगार 17 लाख बढ़ा.

करीब 90 फीसद कामगार अब भी अनौपचारिक क्षेत्र में हैं. इस रिपोर्ट के सह-लेखक और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के अमित बसोले कहते हैं, “पहले से कहीं ज्यादा भारतीय शिक्षित हैं, फिर भी उन्हें नौकरियां नहीं मिल रहीं, जबकि नियोक्ता कहते हैं कि उन्हें कुशल कर्मचारी नहीं मिलते.” छोटे शहरों के शिक्षित युवाओं के लिए वेतनभोगी काम की कमी सरकारी नौकरियों को असामान्य रूप से आकर्षक बना देती है.

सरकार पर प्रस्तावों की कमी का आरोप नहीं लगाया जा सकता. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने बहु-विषयक विश्वविद्यालयों, मल्टीपल एंट्री और एग्जिट विकल्पों के साथ चार साल की अंडरग्रेजुएट डिग्री, क्रेडिट पोर्टेबिलिटी, हायर एजुकेशन कमिशन ऑफ इंडिया (एचईसीआइ) के जरिए एकल नियामक, अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन, विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस, डिजिटल विश्वविद्यालय और जीडीपी के छह फीसद के बराबर शिक्षा खर्च का वादा किया था.

कागज पर यह दशकों में शिक्षा का सबसे व्यापक पुनर्गठन है. पर व्यवहार में यह अमल की जानी-पहचानी बीमारी से घिरा है. करीब 56 फीसद विश्वविद्यालयों ने चार साल का कार्यक्रम शुरू किया, 49 फीसद ने मल्टीपल एंट्री और एग्जिट, 41 फीसद ने इंटर्नशिप सेल और सिर्फ सात फीसद ने अप्रेंटिसशिप सेल. एचईसीआइ का प्रस्ताव आया लेकिन उस पर कानून कभी नहीं बना.

किसी सरकार की प्राथमिकताओं का सबसे साफ पैमाना यह है कि वह अपना पैसा कैसे खर्च करती है. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का आवंटन 2018-19 में 85,010 करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 के संशोधित अनुमान में 1.22 लाख करोड़ रुपए और 2026-27 के बजट अनुमान में 1.39 लाख करोड़ रुपए हो गया है.

वैसे, केंद्रीय बजट में हिस्सेदारी के रूप में यह 2013-14 के 4.6 फीसद से घटकर करीब 2.5 फीसद रह गया है. शिक्षा पर केंद्र और राज्यों का संयुक्त खर्च जीडीपी का 4.1 फीसद अनुमानित है, जो एनईपी के छह फीसद लक्ष्य से कम है. प्राथमिकताएं भी बदली हैं.

2013-14 में शिक्षा और स्वास्थ्य को मिलाकर केंद्रीय बजट का 6.5 फीसद मिला था, जबकि सड़कों और राजमार्गों को 1.8 फीसद. बारह साल बाद शिक्षा और स्वास्थ्य को 4.5 फीसद, जबकि सड़कों और राजमार्गों को 5.8 फीसद मिल रहा है.

कॉकरोच पार्टी का उभार

नाकामियों के इसी गर्दोगुबार ने गुस्से को ईंधन दिया. सीजेपी ने उसे नाम, पहचान और रास्ता दिया. विडंबना यह है कि पार्टी का जन्म मोदी सरकार के सीधे विरोध में नहीं, बल्कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) की एक टिप्पणी के जवाब में हुआ.

15 मई को कानून की फर्जी डिग्रियों से जुड़ी अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सीजेआइ सूर्यकांत ने ऐसे लोगों को “समाज के परजीवी” कहा और पत्रकारिता, सोशल मीडिया और आरटीआइ एक्टिविज्म की ओर भटकते बेरोजगार युवाओं की तुलना उन कॉकरोचों से की, जो “सब पर हमला करने लगते हैं”. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर 30 वर्षीय राजनैतिक संचार रणनीतिकार अभिजीत दीपके ने पूछा: अगर सारे कॉकरोच एकजुट हो जाएं तो? अगले दिन उन्होंने सीजेपी शुरू कर दी.

इसके 78 घंटों के भीतर सीजेपी के इंस्टाग्राम अकाउंट ने 30 लाख फॉलोअर पार कर लिए. पांच दिनों के भीतर यह एक करोड़ तक पहुंच गया और 22 मई तक दो करोड़ को छू गया. #मैंभीकॉकरोच राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेंड करने लगा.

अमेरिका से लौटने के बाद दीपके ने छह जून को जंतर मंतर पर सीजेपी का पहला प्रदर्शन किया. आंदोलन जल्द ही महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, केरल, कर्नाटक और गोवा तक फैल गया.

अपने अनशन के दौरान सोनम वांगचुक और सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके

प्रदर्शन स्थल पर सोनम वांगचुक का आना निर्णायक मोड़ बन गया. लद्दाखी इंजीनियर, जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक वांगचुक ने 28 जून को जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. उनकी मांग थी कि प्रधान इस्तीफा दें और परीक्षा व्यवस्था में पूरी तरह बदलाव हो.

उनके उपवास ने परीक्षा लीक के खिलाफ शुरू हुए विरोध को नई भावनात्मक ताकत दी. 18 जुलाई को तड़के हुई कार्रवाई में मेडिकल सलाह और हाइकोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए पुलिस वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल ले गई, जिसे उनकी पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो ने अवैध हिरासत कहा. बाद में आंगमो की याचिका पर अदालत के आदेश के बाद उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल ले जाया गया.

पुलिस ने बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 163 लागू की और संसद मार्च की अनुमति देने से इनकार कर दिया. बारिश, कई चरणों वाली बैरिकेडिंग, 3,000 पुलिसकर्मियों और स्थानीय इंटरनेट बंदी के बावजूद हजारों-हजार लोग जुटे. वे ऐसे ब्लूटूथ मेश-मैसेजिंग ऐप्स के जरिए तालमेल कर रहे थे, जो सेल्युलर नेटवर्क के बिना काम करते हैं.

सीजेपी ने दावा किया कि पुलिस लाठीचार्ज में 150 से ज्यादा प्रदर्शनकारी घायल हुए. प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित तौर पर पेलेट गन भी इस्तेमाल की गईं. पुलिस ने कहा कि 118 कर्मी—जिनमें ज्यादातर पथराव में घायल हुए—और करीब 60 प्रदर्शनकारी घायल हुए. 

अशांति दिल्ली से बाहर भी फैल गई. मुंबई पुलिस ने दक्षिण मुंबई को किले में बदल दिया और शिवाजी पार्क में प्रदर्शन करने वाले 900 लोगों के खिलाफ सात एफआइआर दर्ज कीं. बेंगलूरू, गोवा और दूसरी जगहों पर सैकड़ों लोग जुलूस में शामिल हुए.

सीजेपी जोर देकर कहती है कि उनकी मांग सिर्फ एक मंत्री को हटाने की नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही की है. सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरभ दास कहते हैं, “प्रधान का इस्तीफा जवाबदेही की दिशा में पहला कदम होगा.” 

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा को प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत का रास्ता खोलने की जिम्मेदारी दी गई. 20 जुलाई की शाम नड्डा ने दास और आशुतोष रांका के साथ बैठक की. उन्होंने एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें प्रधान के इस्तीफे, वांगचुक को अस्पताल में कैद रखने जैसी स्थिति खत्म करने और नीट लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को 1-1 करोड़ रुपए मुआवजा देने की मांग की गई. नड्डा ने कहा कि मांगों पर उचित स्तर पर विचार किया जाएगा और प्रदर्शनकारियों से धरना खत्म करने की अपील की. वे देर रात आरएमएल अस्पताल में घायलों से मिले.

21 जुलाई की रात नड्डा और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह अस्पताल में वांगचुक से मिले और उनसे उपवास खत्म करने की अपील की. वांगचुक के मुताबिक, उन्होंने भरोसा दिया कि सरकार शोकसंतप्त परिवारों के लिए पर्याप्त मुआवजे पर विचार करेगी और जवाबदेही पर संसद में सार्थक चर्चा करवाएगी, जिसमें शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी शामिल होगी.

अगले दिन वांगचुक ने दोनों मंत्रियों को खुले पत्र में जवाब दिया. इसमें उन्होंने अपना उपवास खत्म करने के लिए एक साफ शर्त रखी: यह स्पष्ट भरोसा कि आंदोलन में शामिल होने के कारण किसी भी प्रदर्शनकारी पर दंडात्मक या बदले की कानूनी कार्रवाई नहीं होगी. सरकार ने प्रक्रिया की पेशकश की थी—चर्चा, विचार और यह भरोसा कि मांगों की जांच की जाएगी.

पत्र ने गतिरोध की शर्तें बदल दीं, लेकिन इससे आंदोलन पर कोई असर नहीं पड़ा. फिर 24 जुलाई को वांगचुक ने 26 दिन की भूख हड़ताल खत्म कर दी, जब केंद्र ने उन्हें लिखित आश्वासन दिया कि वह नीट-यूजी पेपर लीक, परीक्षा जवाबदेही और व्यापक सुधारों पर संसद में चर्चा करेगा.

राजनैतिक प्रभाव

यह मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की अग्निपरीक्षा बना पहला बड़ा जनांदोलन है. अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि क्या सीजेपी भाजपा को उतना ही नुक्सान पहुंचाएगी जितना सरकार के उत्साही समर्थक समझते हैं या फिर जितनी उसके आलोचक उम्मीद करते हैं.

सड़कों पर जुटी भीड़ अपने आप वोटों में तब्दील नहीं होती, और फिर पार्टी के पास एक बेजोड़ संगठनात्मक ढांचा है और अपने मतदाताओं के बीच मोदी की व्यक्तिगत अपील बरकरार है. पिछले कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार को सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) विरोधी और किसान आंदोलनों का सामना करना पड़ा था लेकिन उन्हें एक सीमित क्षेत्रीय या वर्गीय आधार वाले आंदोलन माना गया.

सीजेपी एक ज्यादा जटिल चुनौती बन सकती है क्योंकि इसे इतनी आसानी से खारिज या वर्गीकृत नहीं किया जा सकता. एक आंदोलन सिख और जाट किसानों से जुड़ा था तो दूसरे का प्रतिनिधित्व मुस्लिम प्रदर्शनकारी और उनके सहयोगी कर रहे थे.

लेकिन सीजेपी की भीड़ में प्रमुख यूनिवर्सिटी और प्रांतीय कॉलेजों के छात्र, अंग्रेजी-भाषी पेशेवर और निम्न-मध्य वर्ग के अभ्यर्थी, युवा महिलाएं, अभिभावक और उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और उससे भी बढ़कर पहली बार प्रदर्शन करने मैदान में उतरे लोग भी शामिल हैं.

सरकार के लिए यहां उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के लिए कोई जाति, क्षेत्र या धर्म नहीं है; यहां केवल उसका अपना सबसे भरोसेमंद मतदाता वर्ग है, जो चाहता है कि उसकी बात सुनी जाए.

यह आक्रोश जितने बड़े पैमाने पर उभरा या इसका जो स्वरूप नजर आ रहा है, वह दक्षिण एशिया में अन्य जगह के युवा-नेताओं के आंदोलनों की याद दिलाता है- 2022 में श्रीलंका, 2024 में बांग्लादेश और पिछले साल नेपाल. इनकी समानताएं आसानी से देखी जा सकती हैं: एक विशाल युवा आबादी, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, किसी नेता के बिना एकजुट होती भीड़, सोशल मीडिया की केंद्रीय भूमिका, और अचानक आंदोलन का इतनी तेजी पकड़ना कि राजनैतिक व्यवस्था कुछ समझ ही न पाए.

घरेलू स्तर पर इसकी सबसे करीबी तुलना अण्णा हजारे के 2011-12 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से की जा सकती है. दोनों ने गैर-राजनैतिक चरित्र अपनाया, राजधानी में सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा जमाया और एक खास शिकायत को उस समय की सरकार के खिलाफ मजबूत हथियार में तब्दील कर दिया.

इसी इतिहास की वजह से सीजेपी मुख्य विपक्षी दल को भी लगभग उतना ही असहज करती है जितना भाजपा को. कांग्रेस इस बात को कैसे भूल सकती है कि कैसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को कमजोर किया और अंततः आम आदमी पार्टी को जन्म दे दिया, जिसने दिल्ली में उसकी अधिकांश राजनैतिक जमीन छीन ली.

एक सफल, स्वतंत्र युवा मंच कांग्रेस को भी उतना नुक्सान पहुंचा सकता है जितना भाजपा को, यही वजह है कि पार्टी आंदोलन को लेकर असमंजस में है. अपनी बची-खुची जमीन भी खिसकने की आशंका के बीच वह हड़बड़ाहट में इसके जरिए खुद को मजबूत करने की कोशिश में जुटी है, क्योंकि उसके अपने छिटपुट प्रयासों को इतनी गति नहीं मिली है.

यह मानकर कि सीजेपी के साथ हाथ मिलाना ही बेहतर है, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और मल्लिकार्जुन खड़गे ने समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव के साथ 21 जुलाई को 7, लोक कल्याण मार्ग के बाहर अचानक बिना अनुमति धरना दिया.

विपक्ष के किसी भी नेता ने इससे पहले प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन नहीं किया था; वहां आखिरी बार ऐसा धरना 1999 में आइसी-814 के बंधकों के परिवारों ने दिया था. इसके बाद जो हुआ उसने कांग्रेस को वही तस्वीरें दीं जो वह चाहती थी.

राहुल सड़क पर लेटे दिखाई दिए, जब पुलिस उन्हें उठाने की कोशिश कर रही थी और फिर उन्हें दूर ले जाया गया, तब उनकी नाक से खून बहता दिख रहा था. वहां से ले जाते समय उन्होंने कहा, “भारत में लोकतंत्र यही है.” उस पल ने वह काम कर दिखाया जो जंतर मंतर पर दो महीने से जारी विरोध प्रदर्शन नहीं कर पाया था: उसने प्रशासनिक विफलता से हटाकर आंदोलन को सीधे मोदी पर केंद्रित कर दिया.

सरकार को क्या करना चाहिए

यह आंदोलन मोदी के शासनकाल के 12वें वर्ष में उपजा है, जिसका संचालन ऐसे मतदाता कर रहे हैं, जिन्होंने किसी अन्य सरकार के कामकाज को देखा-परखा नहीं है. 2026 में पहली बार वोट डालने वाला युवा छह साल का था जब मोदी ने पदभार संभाला था; इस पीढ़ी के एक बड़े हिस्से के पास यूपीए की कोई राजनैतिक याद नहीं है.

ऐसे में भाजपा पुरानी सरकार की अव्यवस्था का हवाला देकर संस्थागत विफलता को आसानी से खारिज नहीं कर सकती. जंतर मंतर पर जेन ज़ी के आंदोलन के बीच, मोदी ने एक्स पर घोषणा की कि उनकी सरकार ने पेपर लीक में शामिल लोगों को जल्द से जल्द और सख्त सजा सुनिश्चित करने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने का निर्णय किया है. उन्होंने आगे कहा, “हमारे युवाओं के भविष्य को बिगाड़ने की कोशिश करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.”

बहरहाल, घटना के बाद सजा में तेजी लाना अब नाकाफी है. मौजूदा समय में एक ऐसी प्रणाली की दरकार है जो पेपर लीक को संरचनात्मक रूप से लगभग असंभव बना दे, न कि घटना के बाद सजा देने वाला कोई अपराध. इसकी शुरुआत एनटीए से होनी चाहिए.

मॉनसून सत्र के पहले दिन मीडिया को संबोधित करते प्रधानमंत्री मोदी; शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और नेता विपक्ष राहुल गांधी

सरकार को राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को धूल चाटने के लिए छोड़ने के बजाए उन्हें लागू करने की एक समयबद्ध रूपरेखा बतानी चाहिए. सुरक्षित कंप्यूटर आधारित परीक्षण, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र, बायोमेट्रिक जांच, हर केंद्र पर सीसीटीवी निगरानी और स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट नियम होने चाहिए, कोई अपवाद नहीं.

परीक्षा प्रणाली में सुधार तात्कालिक नाराजगी दूर करने का साधन तो हो सकता है, लेकिन इससे अंतर्निहित कमियां दूर नहीं होतीं. क्षमता दूसरी प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि लाखों छात्रों को सस्ती शिक्षा की खातिर बेहद सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, और निजी चिकित्सा संस्थानों में पढ़ाना अधिकांश परिवारों के बस की बात ही नहीं.

केंद्र और राज्यों को सरकारी कॉलेजों, खासकर चिकित्सा संस्थानों का विस्तार करना चाहिए और बाजार को पढ़ाई के नाम पर लूटने की छूट देने के बजाए पारदर्शी, सीमित शुल्क विनियमन लागू करना चाहिए. सार्वजनिक शिक्षा खर्च जीडीपी के छह फीसद के बराबर रखने के संबंध में लंबे समय से किए जा रहे वादों को पूरा किया जाना चाहिए.

यही नहीं, राज्य के उन विश्वविद्यालयों का समुचित और एक फॉर्मूले पर आधारित वित्तपोषण किया जाना चाहिए जहां भारत के अधिकांश छात्र वास्तव में पढ़ते हैं, न कि केवल उन चु‌निंदा केंद्रीय संस्थानों के लिए जहां संख्या बेहद कम है.

आखिर में, सबसे बुनियादी बात यह है कि शिक्षा परिणामपरक होनी चाहिए, यानी यह सीखने, जीवन में आगे बढ़ने और नौकरियां देने वाली हो, न कि केवल कागज की एक डिग्री देने वाली.

पाठ्यक्रम को आधुनिक बनाने की जरूरत है, जिसमें शुरू से ही उद्योग की भागीदारी हो, और मान्यता देने के लिए इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, करिअर परामर्श और कंपनियों से जुड़ाव को बुनियादी शर्त बनाया जाना चाहिए. इसके अलावा, विश्वविद्यालयों में शिकायत निवारण प्रणाली, लोकपाल, काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो वास्तव में काम करे.

सरकार को शिक्षा और रोजगार के उन आंकड़ों को भी जारी करना चाहिए जिन्हें दबाकर बैठी है, हर आत्महत्या को एक अलग त्रासद घटना के रूप में देखने के बजाए परीक्षा से जुड़े तनाव का सही तरीके से पता लगाया जाना चाहिए, और छात्रों के नतीजों, संकाय क्षमता, रोजगार क्षमता और परिसर की सुरक्षा पर सालाना रिपोर्ट छापनी चाहिए.

उन नियामक सुधारों को भी लागू करना चाहिए जिनका वादा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत किया गया था. संस्थानों को स्वायत्तता के साथ उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. भाषा की चोंचलबाजी को हटा दें, तो रूपरेखा काफी सरल है: कोई लीक नहीं, किफायती सीटें, बेहतर संसाधनसंपन्न शिक्षक, ऐसी डिग्री या डिप्लोमा जिनका कोई मतलब हो, और फिर नौकरी के उचित अवसर भी मिलने चाहिए.

ऐसे संकेत हैं कि सरकार तेजी से कदम उठाने की राजनैतिक जरूरत को अच्छी तरह समझती है, भले ही जमीनी बदलावों में कुछ समय लगे. मोदी संसद के इस सत्र में वादों का एक और पिटारा खोलने के बजाए विस्तृत, और तय समयसीमा के भीतर अमल में लाए जाने वाले कदमों की घोषणा कर सकते हैं.

लीक पर डैशबोर्ड और सुधारों की रूपरेखा बनाना जरूरी है पर इसमें तथा छात्रों की बात सही मायने में सुनने में काफी अंतर है, और इस पीढ़ी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह दोनों के बीच का अंतर बहुत अच्छी तरह समझती है.

जनता का भरोसा बहाल करना किसी एक नीतिगत घोषणा पर कम और इस पर अधिक निर्भर करेगा कि सत्र में जिन सुधारों का वादा किया गया है, उन पर जंतर मंतर से भीड़ छंट जाने के बाद भी ध्यान दिया जाता है या नहीं, और उन्हें पूरा किया जाता है या नहीं.

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