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डार्क मोड

नई पीढ़ी का मन खट्टा क्यों

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के विफल होते संस्थानों से मोहभंग ने जेन ज़ी को सड़कों पर उतरने को बाध्य कर दिया.

inside the mind of gen z
बदलाव की बयार : नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर  22 जुलाई को प्रदर्शनकारी

जेन ज़ी के मन की बात

तख्तियों और नारों से परे जाकर देखें तो साफ नजर आएगा कि जंतर मंतर का आंदोलन दरअसल एक पीढ़ी की खुद को अभिव्यक्त करने की कोशिश है. जेन ज़ी की सोच-समझ पर अध्ययन करने वाले मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों और समाजशास्त्रियों से बात करें तो आपको एक अधिक सटीक तस्वीर मिलती है.

एमिटी यूनिवर्सिटी नोएडा में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर अन्ना नाथ गांगुली कहती हैं कि जेन ज़ी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि “सिर्फ मूकदर्शक बने रहने के बजाए वे सक्रिय भागीदारी चाहते हैं. वे मुद्दा-आधारित आंदोलनों के माध्यम से न्याय, एकजुटता और विकास के विचारों को फिर से परिभाषित करना चाहते हैं.

वे किसी कमरे में अलग-थलग बैठे रहने को तैयार नहीं. वे वहां रहना चाहते हैं जहां फैसले होते हैं और भविष्य को गढ़ने में खुद की भागीदारी चाहते हैं.”

भारतीय जेन ज़ी के प्रतिनिधि वैसा कुछ नहीं चाहते, जैसा उनके माता-पिता चाहते थे. दिल्ली की मनोवैज्ञानिक उपासना चड्ढा कहती हैं, “इनमें से कई सिर्फ ‘सुरक्षित जीवन’ का सपना नहीं देखते. सुरक्षा उनकी न्यूनतम जरूरत है, आखिरी मंजिल नहीं.”

पुरानी पीढ़ी जहां सेवानिवृत्ति तक यात्रा, शौक और खुद को खुलकर अभिव्यक्ति करने से कतराती थी, आज के युवा भारतीय इन्हें एक सफल जीवन का हिस्सा मानते हैं. भारत के आर्थिक विकास ने उनमें आकांक्षाएं तो भर दी हैं लेकिन मौके उम्मीद से कहीं अधिक सीमित हैं.

वे जिन लोगों से तुलना करते हैं, इसके बाद यह खाई और ज्यादा गहरी नजर आती है. चड्ढा कहती हैं, “सफलता को अब सिर्फ अपने सहपाठियों या पड़ोसियों से नहीं मापा जाता, बल्कि दुनियाभर के इन्फ्लुएंसर्स, स्टार्टअप संस्थापकों, क्रिएटर्स और मित्रों के साथ अपनी तुलना की जाती है.”

यही बदलाव कहीं न कहीं उन्हें हमेशा खुद को कमतर पाने और उनकी महत्वाकांक्षाओं को चरम पर पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है. मनोचिकित्सक श्रीकांत श्रीनिवासन अपने मरीजों को अक्सर इसके बीच ही जूझते पाते हैं. उनके मुताबिक, “कई भारतीय जेन ज़ी युवा मानते हैं कि ‘कुछ भी पाना संभव है’ और अपनी 20-25 वर्ष की उम्र में सब कुछ हासिल न होने को अपने पिछड़ जाने के तौर पर देखते हैं.”

यही कारण है कि किसी भी एक विचारधारा के बजाए निष्पक्षता इस विरोध-प्रदर्शन के केंद्र में है. 100 फीसद कट-ऑफ वाली दुनिया में पली-बढ़ी इस पीढ़ी ने गला-काट प्रतिस्पर्धा के साथ एक असहज समझौता कर लिया है; लेकिन वह यह धांधली स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं कि परीक्षा का पर्चा लीक हो जाए, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता न हो या इसमें कोई मनमाना फैसला लागू हो. उपासना चड्ढा कहती हैं, “मैं अनिश्चितता भरी स्थिति के कारण कई छात्रों का परीक्षा और प्रतिस्पर्धा से मोहभंग होते देखती हूं.”

सत्तर के दशक के छात्र आंदोलनों या 2010 के दशक की शुरुआत के भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों के विपरीत, यह वर्ग शायद ही किसी बड़ी क्रांति के पक्ष में नजर आता है. इसकी मांग ज्यादा सीमित और व्यक्तिगत है: यदि मैंने पढ़ाई की, नियमों का पालन किया और मुझसे अपेक्षित सब कुछ किया, तो प्रणाली ने अपना वादा क्यों नहीं निभाया?

चड्ढा कहती हैं, “एक रद्द परीक्षा या विलंबित भर्ती केवल प्रशासनिक नाकामी नहीं; यह जीवन का एक और साल टल जाने जैसा है.” मौकों को लगातर सीमित होते देख रही पीढ़ी में वक्त की बर्बादी पर गुस्सा भड़कना स्वाभाविक है.

प्रदर्शन स्थल से अलग भी यह बात साफ दिखाई देती है कि नई पीढ़ी अपने जीवन पर किसी तरह के नियंत्रण के खिलाफ है. हाल ही के डेलॉइट इंडिया जेन ज़ी ऐंड मिलेनियल सर्वे में पाया गया कि इस पीढ़ी के 99 फीसद लोग नौकरी में संतुष्टि को अहम मानते हैं, और लगभग आधे उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने ऐसी नौकरी छोड़ दी जो उनके निजी मूल्यों से टकराती थी.

टिंडर ईयर इन स्वाइप 2025 में पाया गया कि यह पीढ़ी रिश्तों में वफादारी, भावनात्मक ईमानदारी और स्पष्टता को बहुत ज्यादा अहमियत देती है. गांगुली का कहना है कि वे अब इस बात का इंतजार नहीं करते कि नेता, माता-पिता या संस्थान उनकी आवाज उठाएं.

उन्होंने अपने खुद के प्लेटफॉर्म बनाए हैं और चाहते हैं कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भी भागीदारी हो. वे कहती हैं कि युवाओं का यह आक्रोश मूल्यों और वास्तविकता के बीच बढ़ती दूरी से उपजा है, मसलन सीमित होती नौकरियां, बढ़ता भाई-भतीजावाद और घटती जवाबदेही.

मानसिक आघात पीड़ितों की काउंसलिंग करने वाली साइकोलॉजिस्ट प्रणीत कौर कहती हैं, “यह पीढ़ी सत्ता से नहीं डरती. प्रामाणिकता और पारदर्शिता उनकी प्राथमिकता है. वे नतीजों से नहीं डरते; बस इतना जानते हैं कि आगे बढ़ने का यही एकमात्र रास्ता है.”

उनकी बेसब्री सरकार तक सीमित नहीं. जेन ज़ी बॉलीवुड, खिलाड़ियों और इन्फ्लुएंसर्स के बारे में भी यही रुख अपनाती है और जानना चाहती है कि उनके रोल मॉडल चुप क्यों रहे. जिस पीढ़ी ने यह तय कर लिया कि बोलना कोई विकल्प नहीं बल्कि एक हक है, उनके लिए यह चुप्पी अखरने वाली है.

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