
जुलाई 1985: राजीव-लोगोंवाल समझौते की बदौलत टकराव से बाहर निकलने का रास्ता मिलता दिखा. लेकिन महीने भर बाद अकाली नेता हरचंदसिंह लोगोंवाल की हत्या हो गई, और प्रमुख वादे पूरे न हो सके
अप्रैल 1986: अकाल तख्त में सरबत खालसा के जमावड़े में खालिस्तान को लक्ष्य घोषित किया गया. जल्द ही खालिस्तान कमांडो फोर्स, बब्बर खालसा, खालिस्तान लिबरेशन फोर्स और भिंडरांवाले टाइगर फोर्स उभरे
जुलाई, नवंबर 1986: उग्रवादी हिंसा तेज हुई, और उसने सांप्रदायिक रंग अख्तियार कर लिया. जुलाई और नवंबर में उग्रवादियों ने मुक्तसर और होशियारपुर के नजदीक बसों को रोकर हिंदू सवारियों को अलग किया और गोली मार दी, एक सिख समेत 38 जानें गईं
11 मई 1987: बरनाला सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगाया गया. रात होने के बाद गांव-देहातों में उग्रवादियों का बोलबाला रहता. नागरिक प्रशासन, न्यायपालिका और मीडिया ठप हो गए. वरिष्ठ पुलिस अफसर डी.एस. मंगत के सर्जन बेटे की पटियाला में हत्या
6 जुलाई 1987 : उग्रवादियों ने हिंदू तीर्थयात्रियों को ऋषिकेश ले जा रही बस पर हमला करके 38 लोग मार दिए
मई 1988: 200 से ज्यादा हथियारबंद उग्रवादियों ने स्वर्ण मंदिर परिसर पर फिर कब्जा कर लिया. ब्लूस्टार के विपरीत, ऑपरेशन ब्लैक थंडर II में उग्रवादियों पर सीधे हमले से बचा गया. पंजाब के डीजीपी के.पी.एस. गिल की अगुआई में सुरक्षा बलों ने परिसर को घेर लिया, रसद रोक दी और स्नाइपरों का इस्तेमाल करके उग्रवादियों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया
1988-1993: दहशतगर्दों ने ऐसा माहौल बना दिया जिसमें मजिस्ट्रेट आंतकवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई करने से डरने लगे. बब्बर खालसा ने गुरदासपुर, होशियारपुर और पटियाला की अदालतों में बम विस्फोट किए, जिनमें 13 लोग मारे गए. अगले पांच साल में 12 न्यायिक अधिकारियों की हत्याएं हुईं. न्यायमूर्ति हंसराज कौशिक की मोगा में भरी अदालत में गोली मारकर हत्या कर दी गई

23 जुलाई 1990: उग्रवादियों ने भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड के मुख्य इंजीनियर एम.एस. सेखरी और सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर अवतार सिंह औलख की हत्या कर दी. मकसद था सतलज-यमुना लिंक नहर का निर्माण रोकना
1991-92: हिंसा चरम पर पहुंच गई, 5,265 आम लोग, सुरक्षाकर्मी और उग्रवादी मारे गए. केसीएफ के बंदूकधारियों ने 15 जून को लुधियाना के नजदीक किला रायपुर और बड्डोवाल में दो सवारी रेलगाड़ियों पर हमला करके 110 लोगों को मार डाला
पुलिसवालों को इस्तीफे देने पर मजबूर करने के लिए उग्रवादी उनके परिजनों पर भी हमले करने लगे. 1991 में पुलिसवालों के 134 रिश्तेदारों की हत्याएं की गईं, उसके अगले साल और 200 से ज्यादा लोगों की हत्याएं हुईं
उग्रवादियों ने 1991 के विधानसभा चुनावों के बहिष्कार की घोषणा की, उम्मीदवारों और प्रचार कर रहे कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया. 24 अकाली उम्मीदवारों समेत 700 से ज्यादा लोग मारे गए, चुनाव रद्द करने पड़े
1992-94: के.पी.एस. गिल 1991 में पंजाब के डीजीपी बनकर लौटे, और फरवरी 1992 के चुनाव शांति से करवाना पक्का किया. बेअंत सिंह की अगुआई में कांग्रेस सत्ता में आई. गिल ने पुलिस के मनोबल को नए सिरे से मजबूत किया, उग्रवादियों का बढ़-चढ़कर मुकाबला करने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत किया, और ग्रामीण इलाकों को उग्रवादियों के कब्जे से छुड़ाने के लिए ऑपरेशन नाइट डॉिमनेंस शुरू किया
सेना की टुकड़ियां गांवों को घेर लेतीं और पुलिस के जत्थे स्थानीय खुफिया सूत्रों और हथियार डाल चुके उग्रवादियों के जरिए छिपने के ठिकानों और कमांडरों का पता लगाते. गुरजंट सिंह बुधसिंहवाला और सुखदेव सिंह बब्बर सहित बड़े नेताओं का सफाया, कई उग्रवादी संगठनों का खात्मा हो गया. 1993 आते-आते हत्याओं में काफी कमी आई. 1994 आते-आते केवल दो आम लोग आतंकी हमलों में मारे गए, सुरक्षा बलों का कोई जवान नहीं मारा गया
1995: मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने पुलिस के हाथों अवैध हिरासत, प्रताड़ना, फर्जी मुठभेड़ों और लोगों के बलात गायब होने के मामलों का पर्दाफाश किया.
31 अगस्त को बेअंत सिंह खालिस्तानी आत्मघाती हमलावर के हाथों मारे गए. छह दिन बाद खालड़ा को अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से उठा लिया गया, फिर यंत्रणाएं देकर पुलिस हिरासत में मार दिया गया. उनका शव सतलज में फेंक दिया गया. उनकी हत्या के लिए आठ पुलिस अधिकारियों को ताउम्र कैद की सजा मिली.

