
- प्रो. रवि भटनागर
एक ऐसा समाज बनाने के लिए आखिर क्या करना होगा जहां हर व्यक्ति को यह भरोसा हो कि उसकी पसंद और व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान किया जाएगा?
इसी सवाल ने इंडिया टुडे और रेकिट कंसेंट कल्चर सर्वे के लिए प्रेरित किया. इसके तहत इस साल 5 मई से 20 मई के बीच भारत के सभी राज्यों में 11 भाषाओं में 6,379 महिलाओं से बात की गई. इसका मकसद कानूनी जागरूकता भर आंकना नहीं, बल्कि यह पता लगाना था कि महिलाएं अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में सहमति की अहमियत को कितना और कैसे समझती हैं. सर्वे के नतीजों से इस बारे में समझ बढ़ती है कि भारत सम्मान, गरिमा और आपसी समझ की संस्कृति को किस तरह से सशक्त बनाना जारी रखे.
सर्वे बताता है कि हालांकि सहमति को लेकर जागरूकता बढ़ तो रही है मगर रोजमर्रा की हमारी बातचीत में सहमति के असली मायने क्या हैं, इस पर और ज्यादा स्पष्टता की जरूरत है. करीब हर 10 में से छह महिलाओं को लगता है कि किसी विवाद से बचने के लिए दबाव में आकर किसी बात को मान लेने को भी सहमति कहा जाएगा, जबकि एक-तिहाई महिलाओं की साफ राय है कि दबाव में मानी गई बात सच्ची सहमति नहीं होती. आधी से कम महिलाओं को लगा कि शुरू में 'हां' कहने के बाद अपना मन बदलना ठीक है, और 10 में से चार से ज्यादा महिलाओं ने कहा कि उन्हें अक्सर किसी बात के लिए मना करने पर वजह बताने या उसे सही साबित करने की जरूरत महसूस होती है.
सर्वे से कई बड़ी जानकारियां सामने आईं. उनमें से एक यह थी: महिलाओं के अपनी व्यक्तिगत सीमाएं जाहिर करने में परिवार और कार्यस्थल के माहौल का गहरा असर पड़ता है. असहज महसूस करने के बावजूद चुप रहने वाली 10 में से चार से ज्यादा महिलाओं ने इसकी वजह ऐसे माहौल से मिली परवरिश को बताया, जहां उन्हें चुपचाप सब झेलना सिखाया गया है. इससे साफ पता चलता है कि घर, स्कूल, कार्यस्थल और सामुदायिक स्थल खुली बातचीत को बढ़ावा देने और ऐसे स्थान बनाने में कितनी अहम भूमिका निभा सकते हैं जहां व्यक्तिगत पसंद का सम्मान किया जाता हो.
नतीजे बताते हैं कि सहमति की संस्कृति को मजबूत करना कानूनी जागरूकता भर से जुड़ा मसला नहीं. यह रोजमर्रा की जिंदगी में सम्मान, समानुभूति, आपसी समझ वाला व्यवहार विकसित करने के लिहाज से भी बेहद जरूरी है.
पिछले कुछेक सालों में रेकिट ने ड्यूरेक्स द बर्ड्स ऐंड बीज़ टॉक जैसी पहलकदमियों के माध्यम से इसमें रोल निभाने की कोशिश की है, जो जीवन के हुनर से जुड़ा एक कार्यक्रम है और 10 राज्यों में 40 लाख से ज्यादा युवाओं तक पहुंच चुका है. यह कार्यक्रम कम उम्र में ही समझदारी भरी बातचीत को बढ़ावा देने और ऐसा सुरक्षित स्थान तैयार करने पर केंद्रित है जहां युवा पूरे आत्मविश्वास के साथ सम्मान, सीमाओं और स्वस्थ रिश्तों पर चर्चा कर सकें.
इसी सोच ने हमें क्लासरूम से आगे बढ़कर सांस्कृतिक मंचों तक पहुंचने की प्रेरणा दी. भारत के सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजनों में शुमार नगालैंड के हॉर्नबिल फेस्टिवल में हमने एशिया का पहला कंसेंट कैफे शुरू किया, जो सहमति, जागरूकता, सुरक्षा और समानता पर केंद्रित अनूठा अनुभव रहा. शिलांग चेरी ब्लॉसम फेस्टिवल में हजारों युवाओं ने कला, स्वास्थ्य शिक्षा और रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से इन चर्चाओं में भाग लिया, जिसने यह साबित किया कि ऐसी बातें सार्थक होने के साथ-साथ सुलभ भी हो सकती हैं.
सर्वे व्यापक स्तर पर बदलाव के लिए तैयार होने के उत्साहजनक संकेत भी देता है. पूर्वोत्तर और केंद्रशासित प्रदेशों में आधी से थोड़ा कम महिलाओं ने कहा कि वे सीधे तौर पर 'ना' कहने में सहज महसूस करती हैं, और सिर्फ एक-तिहाई ने साफ तौर पर माना कि दबाव में आकर सहमत होने को सहमति नहीं कह सकते. इसके साथ लगभग तीन-चौथाई लोगों ने सहमति के बारे में शिक्षित करने को अनिवार्य बनाने का समर्थन किया. यह शिक्षा और संवाद के माध्यम से समझ को गहरा करने की जरूरत और इच्छा दोनों को दर्शाता है.
ये सारी बातें दर्शाती हैं कि भारत पहले से चल रही प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए सही स्थिति में है. जागरूकता अभियानों ने एक महत्वपूर्ण आधार तैयार कर दिया है. अब जरूरत एक ऐसा साझा ढांचा स्थापित करने की है जो घरों, स्कूलों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर इन सिद्धांतों को निरंतर मजबूती प्रदान करे.

इसीलिए देश को एक सहमति चार्टर अपनाने पर विचार करना चाहिए. एक ऐसा चार्टर सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांतों को मजबूती देगा: हर व्यक्ति को अपने शरीर, पर्सनल स्पेस, समय और सीमाओं के बारे में निर्णय लेने का अधिकार है.
सिद्धांत एकदम सीधा-सा है. सहमति का अधिकार हमेशा स्वतंत्र रूप से मिलना चाहिए. दबाव, डर, अपराधबोध या भावनात्मक जाल में फंसाकर 'हां' कराने को सच्ची सहमति नहीं माना जा सकता.
मौन को कभी भी सहमति नहीं समझा जाना चाहिए. हर व्यक्ति को अपने निर्णय के लिए माफी मांगने, उस पर स्पष्टीकरण देने या फिर उसे सही साबित करना जरूरी समझे बिना 'ना' कहने का अधिकार है. सीधे शब्दों में कहें तो 'ना' अपने आप में एक पूरा वाक्य है.
सहमति निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रिया है. एक बार सहमत होने का मतलब यह नहीं कि हमेशा के लिए सहमति दे दी गई है. हर व्यक्ति को किसी भी मोड़ पर अपना मन बदलने का अधिकार है, और उस विकल्प का सम्मान किया जाना चाहिए. यह बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि किसी के इनकार को हमेशा दबाव, उपहास या गुस्से के बजाए समझदारी से स्वीकारा जाना चाहिए. किसी दूसरे व्यक्ति की सीमाओं का सम्मान करना आपसी सम्मान की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियों में से एक है.
सहमति का विचार करीबी या शारीरिक रिश्तों से कहीं आगे तक जाता है. यह रोजमर्रा की स्थितियों पर भी समान रूप से लागू होता है, मसलन किसी को गले लगाने से पहले पूछना, तस्वीरें साझा करने से पहले अनुमति मांगना, बच्चों की व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना. किसी से निजी चीजें उधार लेना, किसी दूसरे के व्यक्तिगत स्थान में प्रवेश करना या निजी जानकारी तक पहुंच बनाना भी इसके दायरे में आता है. इस तरह कई मायनों में सहमति का अर्थ है दैनिक जीवन के हर पहलू में दूसरे व्यक्ति की पसंद-नापसंद का सम्मान करना.
सर्वे में यह भी पाया गया कि अधिकांश महिलाएं जिम्मेदारी को साझा मानती हैं. आधी से ज्यादा का मानना था कि किसी बातचीत में शामिल हर व्यक्ति सहमति पक्की करने और सम्मानजनक सीमाएं बनाए रखने के लिए समान रूप से जिम्मेदार होता है. यह साझा जिम्मेदारी किसी भी राष्ट्रीय ढांचे का आधार होनी चाहिए.
इसमें परिवारों को विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. रिश्तों को सम्मान देने की आदत जैसे कई मूल्य जीवन के शुरुआत में ही सीखे जा सकते हैं. बच्चों को अनुमति मांगने, किसी दूसरे की 'ना' का सम्मान करने और आत्मविश्वास के साथ अपनी पसंद जाहिर करने को प्रोत्साहित करने पर यह व्यवहार जीवनभर के लिए आदत बन जाता है.
राष्ट्रीय सहमति चार्टर को लंबा या जटिल बनाना जरूरी नहीं. इसे कुछ सरल सिद्धांतों में समेटा जा सकता है. सहमति सोच-समझकर और स्वेच्छा से दी जाने वाली होनी चाहिए और इसमें निरंतरता होनी चाहिए. हर 'ना' सम्मान की हकदार है. सम्मानजनक रिश्तों की शुरुआत पूछने से होती है, सिर्फ मान लेने से नहीं.
भारत ने बार-बार दिखाया है कि जब सरकारें, शिक्षक, व्यवसाय, समुदाय और नागरिक मिलकर काम करते हैं, तो स्थायी सामाजिक बदलावों में कोई बाधा नहीं रहती. निरंतर और सामूहिक प्रयासों के बूते स्वच्छता, साफ-सफाई और सड़क सुरक्षा के प्रति जनजागरूकता धीरे-धीरे रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बन चुकी है.
सहमति के लिए ऐसे ही एक अवसर की दरकार है. इस सर्वे में नजर आई ऐसी चर्चाओं में शामिल होने की बढ़ती इच्छा भविष्य के लिए मजबूत आधार मुहैया करती है. कंसेंट चार्टर का उद्देश्य नए दायित्व बनाना नहीं बल्कि इसका उद्देश्य सम्मान, पसंद और गरिमा की एक साझा समझ को मजबूत करना है जो इन मूल्यों को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने में मदद करेगा.
इस दिशा में भारत कदम पहले ही बढ़ा चुका है. अब इसे गति देकर एक ऐसी संस्कृति विकसित करने का समय आ गया है जिसमें पूछना, सुनना और सीमाओं का सम्मान करना एक स्वभाव बन जाए. सहमति चार्टर उस साझा राष्ट्रीय यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है.
लेखक रेकिट में दक्षिण एशिया, एमईएनएआरपी और अफ्रीका के कम्युनिकेशंस और कॉर्पोरेट अफेयर्स डायरेक्टर हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, इन्हें कंपनी या उसके सहयोगियों का विचार नहीं माना जा सकता
दबाव में, डर से, अपराधबोध में या जज्बात के जाल में फंसाकर 'हां' कहलवाने को जेनुइन किस्म की सहमति नहीं माना जा सकता.

