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डार्क मोड

हर कदम पर डोलता खतरा

सार्वजनिक जगहों, कार्यस्थलों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा का दायरा लांघने में कसर नहीं छोड़ी जाती. ऊपर से उत्पीड़न, सत्ता की ताकत का डर, निजता हनन और जबरन थोपी चुप्पी का अटूट सिलसिला.

consent survey: Unsafe Worlds: Public, Professional and Digital Violations
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 24 जुलाई , 2026

जब भी कोई महिला घर से बाहर कदम रखती है, चाहे बस, दफ्तर, या फिर परदे पर, वह जोखिम वाले दायरे में होती है. इस हिस्से में हम एक-दूसरे से जुड़े उल्लंघनों के तीन मोर्चों की बात करेंगे—सार्वजनिक स्थान, कार्यस्थल और डिजिटल प्लेटफॉर्म. उनमें साझा सूत्र है ताकत. ताकत भीड़ की, बॉस की, या  अनजान सेंडर की. उस पर थोपी गई चुप्पी भी.

सड़कों पर महिला सुरक्षा का उल्लंघन सबसे आम है. सर्वे में करीब आधी स्त्रियों ने माना कि बसों, ट्रेनों और बाजारों में गलत तरीके से छुआ गया या कुछ असहज करने के इरादे से बेहद करीब आए.

जवाब बताता है कि महिलाओं की पसंद किस कदर डर के साए में सांस लेती है. आखिरी बार उत्पीड़न का शिकार बनीं तब क्या किया, इस पर सिर्फ 13 फीसद ने माना कि उत्पीड़क का सीधे सामना किया, और सिर्फ पांच फीसद ने पुलिस में शिकायत की. ज्यादातर महिलाएं चुप रह गईं या मान लिया कि उनकी प्रतिक्रिया से स्थिति और बिगड़ सकती है.

महज 37 फीसद महिलाएं यह उम्मीद करती हैं कि आसपास खड़े लोग मदद के लिए आगे आएंगे. सबसे गंभीर आंकड़ा अंदेशे का है—70 फीसद महिलाएं उत्पीड़न से बचने के लिए अपना व्यवहार, पहनावा, रास्ता या समय बदल लेती हैं. यानी जीवन को उसी हिसाब से ढाल लेती हैं.

दूसरा मोर्चा कार्यस्थल है, जहां पद दबाव का कारण बन जाता है. 36 फीसद महिलाओं ने किसी वरिष्ठ (जैसे बॉस, शिक्षक या मेंटॉर) की ओर से ताकझांक या दबाव का सामना करने की बात कही. ठीक इतनी ही संख्या में महिलाओं ने माना कि ऊंचे पद के किसी ने उनके इनकार को नजरअंदाज किया और आगे बढ़ गया.

सिर्फ 44 फीसद महिलाएं ही असुरक्षित महसूस होने वाले काम को मना कर पाती हैं, 36 फीसद मना तो कर पाती हैं लेकिन उन्हें नौकरी गंवाने का डर रहता है, और 12 फीसद बिल्कुल मना नहीं कर पातीं. संस्थागत सुरक्षा बेहद कमजोर है. सिर्फ 32 फीसद का कहना है कि उनके कार्यस्थल में सहमति और उत्पीड़न पर सार्थक प्रशिक्षण या नीतियां लागू होती हैं, जबकि 36 फीसद की नजर में मौजूदा नीतियां तो औपचारिकता भर हैं.

डिजिटल दुनिया सबसे नया मोर्चा है. 28 फीसद महिलाओं को ऑनलाइन तस्वीरें या संदेश भेजे गए, 24 फीसद ने ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना किया है, और एक-तिहाई महिलाओं को यौन कमेंट या चुटकुले झेलने पड़े हैं. इसमें भी महिलाएं चुप रहना ही बेहतर समझती हैं, ताकि मामला तूल न पकड़े. 42 फीसद महिलाएं ऐसे संदेश भेजने वालों को ब्लॉक या अनफ्रेंड कर देती हैं; सिर्फ 13 फीसद आवाज उठाती हैं.

तीनों में ही पैटर्न एक जैसा है. उल्लंघन आम है, शिकायतें शायद ही होती हैं, और महिलाएं उसकी कीमत नजरअंदाज करके, चुप्पी और खुद पर पाबंदियां लगाकर चुकाती हैं. ऐसी असुरक्षित दुनिया स्त्रियों की सीमाएं सीमित कर देती है.

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