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डार्क मोड

अभी चाहिए और अधिकार

महिलाओं में जागरूकता बढ़ी है लेकिन सार्वजनिक जगहों, कार्यस्थलों और डिजिटल स्पेस में गैर-सहमति वाले यौन व्यवहार को खत्म करने के लिए हमें सुरक्षा का बोझ महिलाओं के शरीर से हटाकर पितृसत्ता की संस्थाओं पर डालना होगा.

GUEST COLUMN | Unsafe Worlds: Public, Professional and Digital Violations
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 24 जुलाई , 2026

अभी तक मुझे वह वाकया याद है. 20 साल पहले मैं एक प्रदर्शन में गई थी, जहां मेरे हाथ में तख्ती थी, जिस पर लिखा था, 'नो शब्द का कौन-सा हिस्सा आपको समझ नहीं आता?’ एक युवा महिला के रूप में वह पंक्ति मेरे लिए बेहद ताकतवर थी. दशकों बाद भी वह नारा उतना ही सच है.

सहमति पर इंडिया टुडे का सर्वे इस मुद्दे को केंद्र में लाता है, भले ही आज हम महिलाओं को अलग-अलग भूमिकाओं में देख रहे हों. निष्कर्ष दिखाते हैं कि सहमति को समझने के मामले में महिलाएं महसूस करती हैं कि उनकी आवाज नहीं सुनी जाती और उनके अनुभवों को महत्व नहीं दिया जाता.

सच्ची सहमति सिर्फ बंद दरवाजों के पीछे कानूनी 'हां’ या 'ना’ का मामला नहीं. यह महिला के इस अधिकार से जुड़ी है कि वह जगह घेरे, उसका वहां होना स्वीकार हो और वह बिना डर जिंदगी में आगे बढ़ सके.

हमने लंबे समय तक महिलाओं की सुरक्षा को संरक्षण के मामले के रूप में देखा है, यानी उनके ही भले के लिए उन्हें बंद कर देना. हर बार जब कोई भयावह मामला सामने आता है, तो महिलाएं और परिवार आजादियों पर ज्यादा नियंत्रण लगाने लगते हैं. आखिरकार इससे सुरक्षा का बोझ महिलाओं के शरीर पर ही बना रहता है. हमें यह बोझ पुरुषों और उन सभी संस्थाओं पर डालना होगा, जो पितृसत्ता को जिंदा और सक्रिय रखती हैं.

यह सर्वे सार्वजनिक जगहों, कार्यस्थलों और डिजिटल स्पेस में महिलाओं के गैर-सहमति वाले यौन व्यवहार के अनुभवों पर चिंताजनक आंकड़े सामने लाता है. करीब 50 फीसदी उत्तरदाताओं ने सार्वजनिक जगहों पर अनचाहे स्पर्श, छेड़छाड़ और उत्पीड़न का अनुभव किया. करीब 70 फीसदी ने कहा कि उत्पीड़न से बचने के लिए वे अपने कपड़े, रास्ते या समय बदलती हैं.

यह इस बात का प्रमाण है कि हिंसा का डर भी महिलाओं की आवाजाही और आजादी को सीमित करने में वास्तविक हिंसा जितना ही अहम है. आज डिजिटल स्पेस भी सार्वजनिक जगह है, जहां असमानताएं और हिंसा दोहराई और पहले से ज्यादा बढ़ाई जाती है. सर्वे में उत्तरदाताओं ने इनकार के बाद भी अनचाहे संदेश मिलने, बिना अनुमति तस्वीरें साझा किए जाने, अनचाही अश्लील सामग्री भेजे जाने और पीछा किए जाने की बात कही.

यह राहत की बात है कि महिलाओं में अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ी है, जैसा कि उल्लंघनों पर उनकी प्रतिक्रिया से दिखता है. जब उनसे पूछा गया कि सार्वजनिक जगहों पर किसी भी गैर-सहमति वाले यौन व्यवहार की स्थिति में वे क्या करेंगी, तो 37 फीसदी ने कहा कि वे सीधे जवाब देंगी, आठ फीसदी अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिक्रिया देंगी, आठ फीसदी दोस्तों या परिवार से मदद लेंगी और 16 फीसदी ने कहा कि वे पुलिस या हेल्पलाइन में शिकायत करेंगी. यह भरोसा देने वाली बात है क्योंकि महिलाएं अब उतनी चुप नहीं रह रहीं, जितनी शायद पहले रहती थीं.

डिजिटल स्पेस में यह रुझान साफ दिखता है. जिन महिलाओं ने ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना किया था, उनमें 42 फीसदी ने कहा कि उन्होंने उस व्यक्ति को ब्लॉक किया और 27 फीसदी ने कहा कि मामला गंभीर होने पर उन्होंने प्लेटफॉर्म पर शिकायत की. नतीजे यह भी बताते हैं कि शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण महिलाओं की सहमति या उसकी कमी को समझने और उसे आवाज देने की क्षमता में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं.

बदकिस्मती से सार्वजनिक जगहों पर मौजूद लोगों की प्रतिक्रिया उतनी उत्साहजनक नहीं. 57 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह का अनचाहा यौन व्यवहार देखने वाले लोगों के मदद या हस्तक्षेप करने की संभावना कम होती है.

सार्वजनिक जगहों, जिनमें सार्वजनिक परिवहन भी शामिल है, पर बड़ी भीड़ के कारण दुर्व्यवहार करने वालों की पहचान करना या उन्हें पकड़ना बहुत मुश्किल होता है. इससे उल्लंघनों की शिकायत करना भी कठिन हो जाता है. इसलिए राहगीरों और आम लोगों का समर्थन यौन उत्पीड़न को रोकने का अहम सामाजिक तरीका बन जाता है.

कार्यस्थल पर सहमति और यौन व्यवहार को लेकर सर्वे के नतीजे चिंताजनक हकीकत दिखाते हैं. केवल 44 फीसदी महिलाओं को लगा कि वे किसी असहज अनुरोध को मना कर सकती हैं, जबकि बहुमत को डर था कि मना करने पर नौकरी पर असर पड़ सकता है. पूरे 36 फीसदी ने कहा कि असहजता या इनकार जताने के बावजूद उनके बॉस या मैनेजर ने देर रात मीटिंग, निजी संदेश या 'खास ध्यान’ देना जारी रखा.

यहां भी जवाब उत्साहजनक हैं. सिर्फ तीन फीसदी ने कहा कि वे इस बारे में कुछ नहीं करेंगी. 15 फीसदी ने कहा कि वे एचआर में शिकायत करेंगी, जबकि बाकी ने कहा कि वे या तो सीधे इसका सामना करेंगी या ज्यादा छोटे-छोटे तरीकों से इसे संभालेंगी. साफ है कि महिलाओं में अपने अधिकारों की समझ बढ़ी है, लेकिन संस्थानों और उनमें मौजूद व्यक्तियों को ज्यादा जवाबदेह होना होगा.

18-25 आयु वर्ग की युवा महिलाओं ने सहमति की अवधारणा की अच्छी समझ दिखाई, लेकिन यह ज्यादा स्वायत्तता की भावना में नहीं बदली. हम पाते हैं कि युवा महिलाएं घर के भीतर और बाहर, यौन उल्लंघनों के प्रति सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं.

उन्हें सहमति के बारे में सिखाना काफी नहीं, अगर उसके साथ अपनी आवाज पर भरोसा देने वाली ताकत न दी जाए. ज्यादातर महिलाओं को यौन उत्पीड़न के अपने पहले या शुरुआती अनुभव शर्म और जवाब न दे पाने के क्षणों के रूप में याद रहते हैं, भले ही वे जानती थीं कि यह उल्लंघन था.

इसीलिए विजिबिलिटी मायने रखती है. अजमेर में युवा महिलाओं की ओर से हाल ही चलाए गए 'मैं भी बाहर जाऊंगी’ अभियान से मुझे उम्मीद मिली. इसमें उन्होंने ऑटो रिक्शा में रात की रैली निकाली. रात में सार्वजनिक जगहों पर उनकी मौजूदगी ने अपने-आप में एक नई कहानी बनाई. रात पर दावा करना ही यह कहने जैसा है कि शहर उनका भी है.

मैं दो दशक से ज्यादा समय से सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा और आजादी के सवाल से जुड़ी रही हूं, और मुझे उम्मीद दिखती है. शारीरिक और डिजिटल, दोनों जगहों पर यौन उत्पीडऩ एक हकीकत है, लेकिन महिलाएं पीछे नहीं हट रहीं. वे अपनी जगह मांग रही हैं, जोखिम लेने और अपने फैसले खुद करने के अपने अधिकार पर जोर दे रही हैं. बदकिस्मती से हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक कथाएं और संस्थाएं इस बदलाव के साथ कदम नहीं मिला पाई हैं.
महिलाओं को बेटियों, बहनों, पत्नियों और माताओं के रूप में पहचानने वाली थकी हुई भाषा को छोड़ना होगा. हमें समस्या को उलटकर देखना होगा, जैसा एक और नारा बताता है: 'यह पूछना बंद करो कि उसने क्या पहना था. यह पूछना शुरू करो कि उसे हक की जरूरत क्यों महसूस हुई’.

लेखिका सेफटिपइन की को-फाउंडर और सीईओ हैं, जो शहरों को महिलाओं के लिए ज्यादा सुरक्षित और समावेशी बनाने के लिए क्राउड-सोर्स्ड डेटा का इस्तेमाल करता है

युवा महिलाएं यौन उल्लंघनों के प्रति सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं. उन्हें सहमति के बारे में सिखाना भर काफी नहीं. उन्हें अपनी आवाज पर भरोसा देने वाली ताकत देना जरूरी है.

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