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डार्क मोड

जानने और करने के बीच का फासला

जागरूकता ने सार्वजनिक विमर्श का नक्शा बदला. लेकिन सार्थक बदलाव के लिए सहमति की समानता और गरिमा में गहरी रची-बसी संस्कृति बनाने की दरकार.

GUEST COLUMN: Consent, Choice and the Limits of Love
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 24 जुलाई , 2026

- परोमिता वोहरा

मेहमान का पन्ना: सहमति, विकल्प और  प्यार की सीमाएं

हम आज जिसे सहमति का विमर्श कह रहे हैं, वह सबसे पहले 1970 के दशक में अमेरिका में शुरू हुआ. लिंग-आधारित हिंसा के विश्लेषणों से यह सचाई खुली कि पितृसत्तात्मकता के जरिए महिलाओं पर किस तरह भौतिक, भावनात्मक, सांस्कृतिक और दैहिक नियंत्रण रखा जाता था.

इसकी बदौलत दैहिक स्वायत्तता की नई समझ मिली. 'नो मीन्स नो (नहीं मतलब नहीं)’ मुहावरा इसी संदर्भ में आया. महिला की इच्छा के सिद्धांत पर ध्यान बढ़ने के साथ ही सहमति भी इनकार या 'नो मीन्स नो’ से विकसित होकर व्यक्त इच्छा और सकारात्मक सहमति या 'यस मीन्स यस (हां मतलब हां)’ तक आ गई.

भारत में यह विमर्श एक अहम मोड़ पर शुरू हुआ. दिल्ली में 2012 के खौफनाक सामूहिक बलात्कार के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने कई तरह के जनसमूहों को सड़कों पर ला खड़ा किया. उनमें से कइयों को राजनैतिक जुड़ाव का कोई अनुभव न था. उस घटना ने यौन हिंसा के सवाल को पहले पन्ने पर ला दिया. जनविरोध का यह शायद पहला आंदोलन रहा जो उसी समय सोशल मीडिया के उभार के साथ सड़कों से इंटरनेट तक आ गया.

अविश्वसनीय रूप से बड़ी आबादी तक तेजी से संदेश पहुंचाने की सोशल मीडिया की ताकत और उतनी ही तेजी से रचनात्मकता और अभियान विकसित करने के उसके औजार नया जोश और स्फूर्ति लेकर आए. यह बातचीत शुरू करने और संपर्क कायम करने की जगह बन गया. लिंग और यौनिकता पर केंद्रित कई सारी पहल और अकाउंट तेजी से बढ़े और फैले.

जब #मीटू आया, वे अपने मुद्दों को जिंदा रखने के लिए इन्हीं डिजिटल संसाधनों का फायदा उठा पाए. सहमति का विमर्श इन्हीं बरसों में तेजी से फला-फूला. इस डिजिटल कामयाबी और साथ ही इसकी सीमाओं की कहानी इंडिया टुडे के सहमति सर्वे के इस दमदार निष्कर्ष पर रोशनी डालती है कि सहमति के बारे में महिलाओं की जागरूकता और इसके बारे में उनके वास्तविक अनुभव के बीच काफी बड़ा फासला है.

सहमति का विमर्श और उसके साथ 'नो मीन्स नो’ और 'यस मीन्स यस’ की शब्दावली में दिया जा रहा साफ संदेश सोशल मीडिया पर वायरल होने की परिस्थितियों से बखूबी मेल खाता था. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए संदेश को सोशल मीडिया के प्रारूपों के अनुरूप होना चाहिए: गिनती के शब्द, छोटे वीडियो और सहज-सरल, अच्छा हो कि एक ही बात उठाने वाला संदेश, जो बार-बार दोहराया जाए, जैसा कि विज्ञापनों में होता है.

सोशल मीडिया के आंकड़े असर की तस्दीक करते हैं और इन्हीं की बदौलत यह राजनीति की उपजाऊ जमीन की तरह लगता है. जब कोर्टरूम ड्रामा फिल्म पिंक (2016) में अमिताभ बच्चन ने गरजते हुए 'नो मीन्स नो’ कहा, तब इस नारीवादी संदेश के मुख्यधारा में पैठ बनाने का जश्न मनाया गया.

सहमति के विमर्श को ब्रांड से लेकर एनजीओ और इन्फ्लुएंसर तक कई सारे खिलाड़ी 'बड़े पैमाने पर बढ़ा’ सकते हैं, क्योंकि इसके न्यूनतम साझा रूप से कोई असहमत नहीं होगा. एक लिहाज से यह सहमति की निरी कानूनी और अनुबंधात्मक समझ है. यह तब तो उपयोगी है जब हम मर्यादा भंग होने के बारे में सोचते हैं, लेकिन तब उतनी मददगार नहीं है जब हम आजादी की कल्पना करने की कोशिश करते हैं.

सहमति की बहस को अगर उसकी बुनियादी बातों तक सीमित कर दिया जाए, तो कई खिलाड़ी—ब्रांड से लेकर एनजीओ और इन्फ्लुएंसर तक—इसे 'बड़े पैमाने पर’ फैला सकते हैं, क्योंकि इसके न्यूनतम साझा रूप से कोई असहमत नहीं होगा. सोशल मीडिया के आंकड़े असर को मान्यता देते हैं और उसे राजनैतिक रूप से उपजाऊ जगह जैसा महसूस कराते हैं.

सर्वे में उसी की गूंज सुनाई देती है जो मैंने पिछले 11 वर्षों में सेक्स, प्रेम और इच्छा से जुड़े प्रोजेक्ट एंजेट्स ऑफ इश्क के जरिए यौन रिश्तों की थीमों पर काम करते हुए देखा. लोग दोटूक भरोसे के साथ विषयों की बढ़ती फेहरिस्त—सहमति, समलैंगिक रुझान, बहुत-से यौन संबंध, अपारंपरिक यौन क्रिया—के बारे में बात करते हैं, जिनमें से ज्यादातर के बारे में उन्होंने ऑनलाइन जाना-सीखा होता है.

मगर वे अक्सर इस उलझन, अज्ञानता, वर्जना, दुख और डर को छिपा रहे होते हैं कि वे न तो अपने होने के पारंपरिक तरीकों और न ही आधुनिकता के समकालीन नियम-कायदों पर खरे उतरते हैं.

राजनीति की चर्चा करने से आगे बढ़कर उसे जीने के लिए सहमति के बारे में ज्यादा तरह-तरह की बातचीत की जरूरत है, जिसके पैमाने की कल्पना चौड़ाई में नहीं गहराई में की गई हो. हर चीज की तरह सहमति भी एक पूरी शृंखला में मौजूद होती है.

उसका तानाबाना कई सारी इच्छाओं के साथ बुना होता है: हम क्या खाते हैं, कहां काम करते हैं, कैसे कपड़े पहनते हैं, किससे प्रेम करते हैं, अपने को कैसे व्यक्त करते हैं. इन इच्छाओं की जड़ें जाति के, क्षेत्र और धर्म के, यौन उन्मुखता के, और हमारी मनमौजी काव्यात्मक अस्मिता के कई सारे संदर्भों में होती हैं. एक शब्द में इन चीजों को हम व्यक्तिपन कह सकते हैं. 

इस व्यक्तिपन की खुरदुरी स्वीकृति और एक दूसरे को ध्यान से सुनने और मतभेद का सम्मान करने की क्षमता को आपसी सहमति और अंतरंग एकजुटता की वृहत्तर संस्कृति कहा जा सकता है. यही व्यक्तिपन समानता की आधारशिला भी है, और समानता का मतलब संसाधनों तक पहुंच है.

इस सर्वे का यह निष्कर्ष कि आर्थिक शक्ति का असर सहमति के बारे में महिलाओं के सकारात्मक अनुभवों पर पड़ता है, इसी सच का बखान करता है. सहमति के बारे में टुकड़े-टुकड़े और अलग-थलग बातचीत करना संभव नहीं है.

वे तभी जीवंत हो सकती हैं जब उनमें लिंग, जाति और यौनिकता के बारे में ज्यादा बड़ी राजनैतिक बातचीत की भावना का संचार हो. ऐसी राजनैतिक बातचीत जो लोगों के बीच, समुदायों के बीच, और सरकारों और नागरिकों के बीच आपसी सहमति की संस्कृति की कल्पना करती हों.

व्यक्तिपन के इस विचार का भावनात्मक नकार हमने अभी हाल ही में त्विषा शर्मा के मामले में देखा. दहेज और साथी की हत्या के हालिया मामलों में हमने देखा कि खुद अपना पैसा और सांस्कृतिक पूंजी कमाने वाली महिलाओं को हिंसक प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ सकता है.

ऐसे में सर्वे सहमति के बारे में ज्यादा बातचीत की तरफ ही इशारा नहीं करता, बल्कि सहमति के बारे में ज्यादा तरह की बातचीत और राजनैतिक रूप से ज्यादा समेकित समझ की तरफ भी इशारा करता है. आज जब हम एक नया युवा आंदोलन, कॉकरोच जनता पार्टी, होता देख रहे हैं, इंटरनेट से सड़कों की तरफ उलटी यात्रा करने का समय शायद आ गया है.न

परोमिता वोहरा लेखिका, फिल्म निर्माता और सेक्स, प्यार और इच्छा के बारे में मल्टीमीडिया प्रोजेक्ट 'एजेंट्स ऑफ इश्क’ की फाउंडर हैं

सहमति के विमर्श को ब्रांड से लेकर एनजीओ और इन्फ्लुएंसर तक कई सारे खिलाड़ी 'बड़े पैमाने पर बढ़ा’ सकते हैं, क्योंकि इसके न्यूनतम साझा रूप से कोई असहमत नहीं होगा.

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