
राजस्थान में सीकर के 22 वर्षीय प्रदीप मेघवाल पिछले तीन साल से नीट-यूजी (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट-अंडरग्रेजुएट) की तैयारी कर रहे थे. उन्हें भरोसा था कि इस बार उनका दाखिला किसी टॉप मेडिकल कॉलेज में हो जाएगा. लेकिन 3 मई को हुई परीक्षा पेपर लीक के बाद रद्द कर दी गई, तो लीक होने के तीन दिन बाद 15 मई को उसने अपने घर में आत्महत्या कर ली.
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 21 वर्षीय ऋतिक मिश्र ने भी यही रास्ता चुना. रद्द हुई परीक्षा ने उनके तीसरे प्रयास पर भी पानी फेर दिया था. 20 वर्षीया अंशिका पांडेय, जो पिछली बार सिर्फ चार अंकों से सीट पाने से चूक गई थीं, अपना तीसरा प्रयास हाथ से निकल जाने का सदमा न झेल सकीं और दिल्ली के आजादपुर में उन्होंने भी जान दे दी. गोवा में 17 साल के एक छात्र ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए हॉकी के प्रति अपने जुनून को पीछे कर दिया था. वह भी दबाव झेल नहीं पाया. उसने भी मौत चुन ली.
चार युवा जिंदगियां उस तार-तार हुई परीक्षा व्यवस्था की मानवीय कीमत बन गईं, जिसे देश की प्रमुख परीक्षा संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) चलाती है, जिसे दो बार अपनी व्यवस्था सुधारने की चेतावनी दी गई, लेकिन हालात नहीं बदले.
नीट-यूजी 2026 एक दिन की पेन-ऐंड-पेपर परीक्षा थी, जिसमें 565 शहरों के 5,400 से ज्यादा केंद्रों पर करीब 22.8 लाख छात्रोंं ने हिस्सा लिया. इस परीक्षा के जरिए देश के 823 मेडिकल कॉलेजों की 1,29,805 एमबीबीएस सीटों और 330 डेंटल कॉलेजों की 27,695 बीडीएस सीटों पर दाखिला होना था.
परीक्षा के कुछ ही दिनों बाद करीब 410 सवालों वाला एक हस्तलिखित 'गेस पेपर’ सामने आया. बताया गया कि यह पेपर परीक्षा से पहले ही व्हाट्सऐप और टेलीग्राम पर उपलब्ध था. कुछ छात्रों को यह 42 घंटे पहले मिला था, जबकि कुछ के पास यह करीब एक महीने पहले पहुंच चुका था. सीकर के एक व्हिसलब्लोअर ने जब इसका मिलान आधिकारिक प्रश्नपत्र से किया तो दोनों में चौंकाने वाली समानता मिली. कथित तौर पर 720 में से लगभग 600 अंकों के सवाल एक जैसे थे.
एनटीए की अपनी आंतरिक जांच में पाया गया कि लीक हुई सामग्री केमिस्ट्री के पेपर से पूरी तरह मेल खाती थी, जबकि बायोलॉजी के बड़े हिस्से भी मिलते-जुलते थे. 'गेस पेपर’ के करीब 120 सवाल असली परीक्षा में आए थे. 12 मई को एनटीए ने पहली बार पूरे देश में परीक्षा रद्द कर दी. अब दोबारा परीक्षा 21 जून को कराई जाएगी.
इस मामले की शुरुआती जांच राजस्थान विशेष अभियान दस्ते (एसओजी) ने की थी लेकिन बाद में इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) को सौंप दिया गया. सीबीआइ ने पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रीवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) ऐक्ट, 2024 के तहत एफआइआर दर्ज की, साथ ही धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार की धाराएं भी लगाई गईं.
शुरुआती निष्कर्ष बताते हैं कि यह मामला पहले हुए पेपर लीक से कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है. यह सिर्फ बाहर बैठे अपराधियों का नेटवर्क नहीं था, जो चकमा दे रहा था. अंदरूनी मिलीभगत के साफ संकेत दिखाई दे रहे थे.
ऊपर से लीक
इस बार नीट पेपर पहले की तरह प्रिंटिंग प्रेस, कूरियर वैन या परीक्षा केंद्र के बाहर लीक नहीं हुआ. सवाल वहीं से बाहर आए जहां उन्हें बनाया और अनुवाद किया जा रहा था—यानी उस चरण में, जब वे अभी ढुलाई सिस्टम में पहुंचे ही नहीं थे. नीट-यूजी परीक्षा अंग्रेजी और 12 क्षेत्रीय भाषाओं यानी कुल 13 भाषाओं में आयोजित होती है.
अंग्रेजी में मास्टर पेपर तैयार होने के बाद उसका हर भाषा में अनुवाद किया जाता है. फिर उसकी शुद्धता जांचने के लिए वापस अंग्रेजी में अनुवाद कराया जाता है. यानी प्रश्नपत्र सील होने से पहले कई लोगों के हाथों से गुजरता है. जोखिम कम करने के लिए एनटीए कई बार एक ही विशेषज्ञ से प्रश्न बनवाने और अनुवाद कराने दोनों का काम कराती है. 2026 में यही 'शॉर्टकट’ कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित हो गया.
इन विशेषज्ञों में पुणे के केमिस्ट्री लेक्चरर पी.वी. कुलकर्णी और बायोलॉजी विशेषज्ञ मनीषा गुरुनाथ मंधारे शामिल थे. दोनों एक-दूसरे को वर्षों से जानते थे और दोनों ही प्रश्न तैयार करने के साथ-साथ मराठी अनुवादक भी थे. अनुवादक के तौर पर कुलकर्णी के पास केमिस्ट्री के 45 सवाल थे, जबकि मंधारे के पास बायोलॉजी के 90 सवाल. दोनों मिलकर बायोलॉजी और केमिस्ट्री के कुल 135 सवालों को जानते थे.
सीबीआइ के मुताबिक, अप्रैल के आखिर में कुलकर्णी ने इसी पहुंच का इस्तेमाल किया. उसने पुणे स्थित अपने घर पर खास कोचिंग क्लास चलाईं, जहां वह असली सवाल, उनके विकल्प और सही जवाब डिक्टेट करता था. बाद में इन कक्षाओं में बनाए गए हस्तलिखित नोट तीन मई के असली प्रश्नपत्र से मेल खाते पाए गए.
जांच एजेंसियों को शक है कि कुलकर्णी और मंधारे ने 75 से ज्यादा छात्रों को प्रश्नपत्र 2.5 से 3 लाख रुपए में बेचे. उसके बाद यह सामग्री पहले हाथ से लिखे नोट के रूप में फैली, फिर पीडीएफ बनी और व्हाट्सऐप और टेलीग्राम के जरिए राजस्थान और महाराष्ट्र के कोचिंग हब तक पहुंची. जांच आगे बढ़ी, विषयवार नए नाम सामने आने लगे. फिजिक्स के सवालों के मामले में पुणे की एनटीए विशेषज्ञ मनीषा संजय हवलदार की पहचान हुई.
इन विशेषज्ञों के नीचे दलालों और लाभार्थियों का पूरा नेटवर्क काम कर रहा था. दलाल छात्र जुटाते थे और हर छात्र से लीक पेपर के बदले 10 से 15 लाख रुपए तक वसूले जाते थे. 60 से ज्यादा संभावित लाभार्थी अब जांच के घेरे में हैं, जिनमें कई राजस्थान के सीकर के कोचिंग नेटवर्क से जुड़े बताए जा रहे हैं.
28 मई तक सीबीआइ ने दिल्ली, जयपुर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे, लातूर और अहिल्यानगर से 13 लोगों को गिरफ्तार किया. एनटीए ने भी करीब 24-27 प्रश्नपत्र तैयार करने वालों और अनुवादकों को 'संदेह के दायरे’ में रखा है. पूरी पेपर-सेटिंग कमेटी से पूछताछ हुई है और दोबारा परीक्षा से पहले विशेषज्ञों के पैनल बदल दिए गए हैं.
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने माना कि ''कमान चेन में कहीं न कहीं सेंध लगी थी.’’ नीट-यूजी परीक्षा से सिर्फ एक महीने पहले पद संभालने वाले एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह इसकी वजह उस भरोसे को मानते हैं, जो धीरे-धीरे सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया.
वे कहते हैं, ''कई अनुवादक छह-सात साल से जुड़े हुए थे. संस्था को उन पर भरोसा हो गया था. लेकिन ऐसी परीक्षाओं में आपको शून्य भरोसा तरीका अपनाना पड़ता है.’’ एनटीए के दूसरे सूत्रों का कहना है कि अनुवाद का काम हाथ से किया गया था और आरोपियों ने शायद कई कॉपियां बनाकर प्रश्नपत्र बाहर पहुंचाए. हालांकि सीबीआइ अब तक यह साफ नहीं कर पाई है कि पेपर बाहर कैसे निकाला गया.
इस बीच छात्र संगठनों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा. आरएसएस से जुड़ी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद समेत कई छात्र संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए, जबकि विपक्षी दलों ने सरकार पर हमला किया. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने नीट को ''नीलामी’’ करार दिया और आरोप लगाया कि सवाल व्हाट्सऐप पर बेचे गए. उन्होंने कहा कि शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते और व्यवस्था सुरक्षित नहीं होती, तब तक कांग्रेस शांत नहीं बैठेगी.
सबक सीखने से इनकार
एनटीए ने 2019 में नीट-यूजी की जिम्मेदारी संभाली, उसके बाद से ही गड़बड़ियों-घोटालों की कई वारदातें सामने आ चुकी हैं. 2021 में एजेंसी ने अनुचित तरीकों के इस्तेमाल के आरोप में 15 उम्मीदवारों के परिणाम रद्द किए थे. 2022 में सीबीआइ ने 'सॉल्वर’ गैंग का भंडाफोड़ किया था, जिसमें दूसरे लोग उम्मीदवार बनकर परीक्षा देने पहुंचते थे.
2025 में भी सीबीआइ ने एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया, जिस पर नीट-यूजी 2023 में किसी उम्मीदवार की जगह परीक्षा देने का आरोप था. 2024 का नीट-यूजी घोटाला तीन अलग-अलग मोर्चों पर सामने आया था. झारखंड के हजारीबाग में सीबीआइ जांच में पता चला कि एक व्यक्ति ने परीक्षा केंद्र बने स्कूल के प्रिंसिपल और वाइस-प्रिंसिपल की मदद से प्रश्नपत्र हासिल किया था.
बाद में दलालों ने 144 अभ्यर्थियों से 30 से 50 लाख रुपए तक वसूले. गुजरात के गोधरा में 27 उम्मीदवारों से कथित तौर पर ओएमआर शीट खाली छोड़ने को कहा गया था, ताकि बाद में अंदरूनी लोग उन्हें भर सकें. इसके लिए हर उम्मीदवार से 10 लाख रुपए लिए गए थे. परीक्षा परिणाम आने के बाद देशभर में भारी नाराजगी फैल गई थी, जब 67 उम्मीदवारों ने पूरे 720 अंक हासिल किए.
इनमें से कई छात्र एक ही केंद्र से थे. यह विवाद उस वक्त और बढ़ा जब एनटीए ने 1,563 छात्रों को 'ग्रेस मार्क्स’ दिए. बाद में ग्रेस मार्क्स वापस ले लिए गए, लेकिन तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश डी.वाइ. चंद्रचूड़ की अगुआई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने परीक्षा रद्द करने से इनकार कर दिया.
अदालत ने कहा कि पेपर लीक सीमित स्तर पर हुआ था और पूरे देश में ''व्यवस्थागत’’ गड़बड़ी का कोई सबूत नहीं. इसके बजाए सीमित स्तर पर दोबारा परीक्षा कराने का आदेश दिया गया. साथ ही फिजिक्स के एक विवादित सवाल में सुधार के बाद पूरे अंक पाने वालों की संक्चया 67 से घटकर 17 रह गई.
लेकिन समस्या जस की तस बनी रही. 25 मई को दो याचिकाओं की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनटीए ने 2024 के संकट से कोई सबक नहीं सीखा. उस पेपर लीक के बाद दो समितियां बनीं. एक, शिक्षा मंत्रालय ने जून 2024 में पूर्व इसरो अध्यक्ष के. राधाकृष्णन की अगुआई में सात सदस्यीय उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति बनाई.
उसका मकसद पूरी परीक्षा व्यवस्था और एनटीए के कामकाज में व्यापक बदलाव था. दूसरी, शिक्षा पर संसदीय प्रवर समिति की अध्यक्षता दिग्विजय सिंह कर रहे थे. दिसंबर 2025 में संसद में पेश हुई उसकी रिपोर्ट 371 में कहा गया था कि 2024 में एनटीए की परीक्षा व्यवस्था ''भरोसा पैदा नहीं कर पाई.’’
अब फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने एनटीए को ''बदलने या पूरी तरह पुनर्गठित करने’’ की मांग उठाई है. संवैधानिक संस्था यूपीएससी (लोक सेवा आयोग) और वैधानिक संस्था स्टाफ सेलेक्शन कमीशन के उलट एनटीए फिलहाल सिर्फ सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1860 के तहत पंजीकृत एक सोसाइटी है.
युनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट ने मांग की है कि एनटीए को खत्म करके संसद के कानून के तहत नई वैधानिक संस्था बनाई जाए, जो संसद के प्रति जवाबदेह हो और जिसकी जांच सीएजी ऑडिट और संसदीय समितियां कर सकें. डॉक्टर संगठनों का कहना है कि 2026 का पेपर लीक ''बार-बार दोहराई जा रही, सिस्टम में जड़ जमा चुकी भयावह नाकामियों’’ का हिस्सा है.
उनका तर्क है कि सिर्फ ''दिखावटी प्रशासनिक बदलाव’’ या राधाकृष्णन समिति जैसी कमेटियां समस्या का हल नहीं निकाल सकतीं, जब तक बड़ा कानूनी बदलाव न हो. उन्होंने प्रश्नपत्रों की डिजिटल लॉकिंग और पूरी परीक्षा को कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) मोड में ले जाने की भी मांग की है, ताकि पेपर की सुरक्षा से जुड़े खतरे खत्म किए जा सकें. केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रधान पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि अगले साल से नीट सीबीटी मोड में आयोजित होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, शिक्षा मंत्रालय, एनटीए और सीबीआइ को नोटिस जारी किया है. अदालत ने एनटीए को तीन दिन के भीतर हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा कि सुधार संबंधी सिफारिशों को लागू करने के लिए उसने क्या कदम उठाए. राधाकृष्णन को भी अलग हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि उनकी समिति की सिफारिशें सच में लागू हुईं या नहीं.
नीट का गड़बड़झाला
अकेली नीट में ही एनटीए के संचालन में गड़बड़ियां नहीं उजागर हुई हैं. लेकिन यह जरूर ऐसी परीक्षा बन चुकी है जिसकी साख बार-बार सवालों के घेरे में आई है. दूसरी बड़ी परीक्षाएं—जैसे आइआइटी में दाखिले के लिए जॉइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन, विश्वविद्यालयों के लिए कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट और केंद्रीय लोकसेवा आयोग की प्रशासनिक सेवा परीक्षा—इतनी बार बड़े पैमाने पर पेपर लीक का शिकार नहीं हुईं.
बेशक, इन परीक्षाओं में उम्मीदवारों की संख्या काफी कम होती है. जेईई मेन में 15 लाख से कम उपस्थिति दर्ज हुई थी, सीयूईटी में लगभग 10.7 लाख और यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में करीब 58,000 अभ्यर्थी शामिल हुए थे. लेकिन सिर्फ संख्या ज्यादा होना इस नाकामी की वजह नहीं हो सकता.
चीन की राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा गाओकाओ में 2025 में 1.33 करोड़ छात्र बैठे थे, जो नीट परीक्षार्थियों से लगभग छह गुना ज्यादा है. इसके बावजूद वहां परीक्षा लगभग सैन्य स्तर की सुरक्षा व्यवस्था के बीच होती है. एआइ आधारित निगरानी, सिग्नल जैमर और नकल पर तुरंत और कड़ी सजा जैसी व्यवस्थाएं वहां आम हैं.
नीट की सबसे बड़ी कमजोरी उसके ढांचे में ही छिपी है (देखें, नीट बनाम...). यह एक बार की परीक्षा है. एक ही परीक्षा, एक ही प्रश्नपत्र और उसी से सब कुछ तय हो जाता है. इसके उलट जेईई में कई स्तर होते हैं—जेईई मेन, जेईई एडवांस्ड और क्लास 12 के अंकों की पात्रता शर्त. यानी कोई सिस्टम से छेड़छाड़ करना चाहे, तो उसे कई स्तरों पर सेंध लगानी होगी.
इसके अलावा यह कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) मोड में कई सत्रों और अलग-अलग प्रश्नपत्रों के साथ आयोजित होती है. यूपीएससी की परीक्षा में भी प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू जैसे कई फिल्टर मौजूद हैं. नीट में यही कमी उसका सबसे बड़ा जोखिम बन जाती है.
पूरे देश में सभी छात्र एक ही समय पर एक ही पेन-पेपर परीक्षा देते हैं, इसलिए किसी एक कड़ी में सेंध लग जाए, तो पूरी परीक्षा संदिग्ध हो जाती है. लाखों सीलबंद प्रश्नपत्रों को छापना, सुरक्षित रखना और 5,400 से ज्यादा केंद्रों तक पहुंचाना—और वह भी करीब दो हफ्ते तक घूमते रहना—हर चरण को संभावित लीक पॉइंट बना देता है.
इसीलिए ज्यादातर विशेषज्ञ नीट को सीबीटी मोड में ले जाने की वकालत कर रहे हैं. पूर्व केंद्रीय शिक्षा सचिव आर. सुब्रह्मण्यम कहते हैं कि उन्होंने 2018 में यह सुझाव दिया था, ''लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने विरोध किया.’’ नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) के भीतर भी विरोध रहा है. उनका तर्क है कि सीबीटी से ग्रामीण और गरीब छात्रों को नुक्सान हो सकता है. लेकिन राधाकृष्णन समिति के सदस्य और एचआर टेक कंपनी पीपलस्ट्रांग के सह-संस्थापक पंकज बंसल कहते हैं, ''ग्रामीण और गरीब छात्र आइआइटी-जेईई भी दे रहे हैं.’’
सीबीटी में सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत है. जैसा कि राधाकृष्णन ने दूरदर्शन से बातचीत में बताया, प्रश्नपत्र छापने की जरूरत नहीं, इसलिए सवाल सिर्फ एक-दो घंटे पहले चुने जा सकते हैं और फिर सुरक्षित नेटवर्क के जरिए केंद्रों तक भेजे जा सकते हैं.
इतने कम समय में छेड़छाड़ करना बेहद मुश्किल होगा—बशर्ते परीक्षा केंद्र भरोसेमंद और तकनीकी तौर पर सक्षम हों. इसी वजह से समिति ने अपने खुद के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया. राधाकृष्णन ने कहा, '' केंद्र या राज्य सरकारों के संस्थानों में ही 2025 और 2026 में नीट के ज्यादातर परीक्षा केंद्र थे. 2027 के सीबीटी चक्र में भी यही प्रक्रिया जारी रहेगी.’’
राधाकृष्णन समिति के सदस्य रहे आइआइटी दिल्ली में प्रोफेसर आदित्य मिट्टा मानते हैं कि केंद्र किराए पर लेने के बजाए सरकारी स्कूलों में रखना चाहिए. वे कहते हैं, ''हर जिले में एक केंद्रीय विद्यालय है और हर केंद्रीय विद्यालय में 100 कंप्यूटर टर्मिनल लगाए जा सकते हैं. इन टर्मिनलों का इस्तेमाल बड़ी प्रवेश परीक्षाओं के दौरान किया जा सकता है और बाकी साल बच्चों की पढ़ाई के लिए.’’
लेकिन सीबीटी भी कोई जादुई सुरक्षा कवच नहीं है. यह 2021 में जेईई-मेन परीक्षा को हैक होने से नहीं रोक पाया था. इसके अलावा 20 से 25 लाख छात्रों के लिए एक ही सीबीटी सत्र आयोजित करना लगभग असंभव है. पूर्व केंद्रीय शिक्षा सचिव सुब्रह्मण्यम कहते हैं, ''हमारे पास 20 लाख छात्रों के लिए इतनी क्षमता नहीं है.’’
ऐसी स्थिति में परीक्षा कई सत्रों में करानी पड़ती है. इसका मतलब यह भी है कि अलग-अलग छात्र अलग-अलग प्रश्नपत्र हल करेंगे, जिनकी कठिनाइयां होंगी. फिर निष्पक्षता बनाए रखने के लिए अंकों को सांख्यिकीय तरीके से बराबरी पर लाना पड़ता है. एनएमसी को इसी प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है, जबकि जेईई-मेन में यह व्यवस्था पहले से लागू है.
पर्सेंटाइल की पहेली
आलोचक नीट की प्रवेश प्रक्रिया के तर्क पर भी सवाल उठा रहे हैं. इस परीक्षा में पास करने के कोई तय अंक नहीं होते. छात्र प्रतिशत अंक हासिल करके नहीं, बल्कि ‘पर्सेंटाइल’ पार करके योग्य घोषित होता है. यानी यह इस बात का पैमाना है कि आपने कितने उम्मीदवारों को पीछे छोड़ा, न कि आपने कितने अंक हासिल किए.
पूर्व एनटीए प्रमुख और वर्तमान उच्च शिक्षा सचिव विनीत जोशी कहते हैं, ''इसी में पूरी गड़बड़ी शुरू होती है.’’ वे कहते हैं, ''मान लीजिए योग्यता सीमा 50 फीसद हो. परीक्षा 720 अंकों की है, तो 50 फीसद 360 अंक होगा. 360 अंक लाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी. लेकिन जब यह 50 पर्सेंटाइल हो जाता है, तो आधे छात्र हमेशा योग्य घोषित हो जाएंगे, चाहे उनके अंक कुछ भी हों.

अगर 24 लाख छात्र परीक्षा दें, तो 50 पर्सेंटाइल का मतलब 12 लाख छात्र.’’ उनके मुताबिक इससे योग्य छात्रों का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है और फिर ''उस पूल के साथ खेलना आसान हो जाता है’’, खासकर निजी मेडिकल कॉलेजों के लिए, जिन्हें सिर्फ अपनी सीटें भरने के लिए पर्याप्त पात्र छात्र चाहिए होते हैं. इसके पीछे भारी आर्थिक दांव है. भारत में डॉक्टर बनना अब भी सबसे ज्यादा कमाई और सामाजिक प्रतिष्ठा वाले पेशों में गिना जाता है.
यही वजह है कि सिस्टम से छेड़छाड़ करने का लालच बेहद बड़ा बन जाता है. डॉक्टर बनने के बाद करोड़ों रुपए कमाने की उम्मीद हो तो लीक हुई परीक्षा के जरिए दाखिला पाने के लिए कुछ लाख रुपए खर्च करना छोटी कीमत लग सकती है. अब प्रवेश व्यवस्था के ढांचे ने इस प्रलोभन को और बढ़ा दिया है.
पर्सेंटाइल सिस्टम में निजी मेडिकल कॉलेज की सीट के लिए छात्र को लगभग 140-150 अंक ही चाहिए होते हैं—बाकी काम फीस कर देती है. सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई के खर्च में करीब एक करोड़ रुपए तक का अंतर हो सकता है. ऐसे में किसी के लिए 25-30 लाख रुपए खर्च कर नतीजे में हेरफेर करना और फिर भी भारी रकम बचा लेना एक आयान सौदा हो सकता है.
इसकी झलक आंकड़ों में भी दिखती है. एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह कहते हैं, ''किसी भी परीक्षा में अमूमन 75-80 फीसद उपस्थिति रहती है. लेकिन नीट में यह 99 फीसद तक पहुंच जाती है.’’ उनके मुताबिक यही दबाव परीक्षा रद्द करने को लगभग असंभव बनाता रहा, जिसने पेपर लीक गिरोहों का हौसला बढ़ाया. अब पहली बार पूरी परीक्षा रद्द करने का फैसला इसी सोच को बदलने की कोशिश है.
सलाह अनसुनी
परीक्षा रद्द होने के बाद यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि एनटीए ने आखिर के. राधाकृष्णन समिति की 101 सिफारिशों को कितनी गंभीरता से लागू किया. एनटीए और सरकार ने समिति की आसान और प्रशासनिक सिफारिशों पर ही अमल किया.
जैसे जिला स्तर पर नियंत्रण व्यवस्था, आधार आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन, सरकारी परीक्षा केंद्र और एआइ आधारित सीसीटीवी निगरानी. लेकिन दो सबसे अहम सुझावों को टाल दिया गया—परीक्षा को कई सत्रों में आयोजित करना और उसे कंप्यूटर आधारित प्रारूप में ले जाना.
राधाकृष्णन, जो इन सिफारिशों की निगरानी समिति के प्रमुख भी हैं, कहते हैं कि शुरुआती लगभग 60 सिफारिशें 2025 और 2026 के परीक्षा चक्र के लिए थीं और उनमें करीब 80 फीसद लागू की जा चुकी हैं. समिति के सदस्य पंकज बंसल कहते हैं, ''2025 में सब कुछ बहुत सुचारु रूप से हुआ था.’’ लेकिन प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया लगभग अछूती रह गई.
2026 का पेपर लीक ठीक उसी स्तर से शुरू हुआ. इन गिरफ्तारियों ने पिछले साल की परीक्षा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं क्योंकि पकड़े गए लोगों पर 2025 में भी सक्रिय रहने का शक है. राजस्थान के जमवा रामगढ़ के बिवाल परिवार के चार बच्चों ने नीट 2025 पास किया था और उन्हें छोटे शहर की सफलता की मिसाल बताया गया था, अब सीबीआइ को शक है कि विकास बिवाल ने 2025 का प्रश्नपत्र खरीदा था. उसे गिरफ्तार किया जा चुका है.
राधाकृष्णन कहते हैं कि समिति गोपनीय प्रक्रियाओं में शामिल ''लोगों और पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और गुणवत्ता’’ तय करने के दिशा-निर्देश तय कर चुकी थी. एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह कहते हैं, ''दीर्घकालिक समाधान यह है कि जो विशेषज्ञ सवाल बना रहे हों, उन्हें यह पता नहीं होना चाहिए कि वे किस परीक्षा का पेपर तैयार कर रहे हैं.’’
उनके मुताबिक प्रश्न बैंक तैयार करना चाहिए, जो क्लास 12 स्तर के अनुरूप हों. फिर एआइ आधारित रैंडम सिस्टम इन सवालों में से प्रश्नपत्र तैयार करे. इससे ''किसी विशेषज्ञ को यह पता होने की गुंजाइश बहुत कम हो जाएगी कि उसका सवाल असली प्रश्नपत्र में आएगा.’’
लेकिन एनटीए के पास अब भी उन 33 सिफारिशों को लागू करने की कोई तय समयसीमा नहीं है, जिन्हें राधाकृष्णन समिति ने 'फेज 2: लांग-टर्म पर्सपेक्टिव्ज’ के तहत रखा था. समिति के एक सदस्य का कहना है कि उन्हें लागू करने में एक साल से ज्यादा नहीं लगना चाहिए, खासकर सरकार जब अगले साल से नीट के सीबीटी मोड को मंजूरी दे चुकी है.
परीक्षकों के मोर्चे पर
सबसे गहरी समस्या एनटीए और उसके ढांचे में ही है. पूर्व केंद्रीय शिक्षा सचिव सुबह्मïण्यम कहते हैं, ''कैबिनेट की मंजूरी के समय एनटीए को प्रीमियम टेस्टिंग एजेंसी के तौर पर सोचा गया था, जो आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करे और ऑनलाइन परीक्षाएं आयोजित करे.
इसे बेहद चुस्त और छोटे ढांचे वाली संस्था होना था, जिसमें अत्यंत दक्ष लोग हों. लेकिन इस तरह की कलम-कागज वाली परीक्षा कराने के लिए करीब 10,000 लोगों की जरूरत पड़ती है.’’ वे कहते हैं कि एनटीए के पास इतनी क्षमता नहीं है, इसलिए उसे बाहरी लोगों और एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता है.
एनटीए की 2018 से 2023 तक कमान संभाल चुके जोशी कहते हैं, ''परीक्षा कराना एक तकनीकी काम है, जो अनुभव से सीखा जाता है.’’ वे कहते हैं कि नकल और धोखाधड़ी के तरीके हर साल बदलते रहते हैं और ''सिस्टम से खेल करने वाले लोग भी बेहद अनुभवी होते हैं.’’
उनके हिसाब से समाधान यह है कि परीक्षा संचालन की जिम्मेदारी वास्तविक परीक्षा विशेषज्ञों को दी जाए. वे कहते हैं, ''हमें कभी भी एनटीए की तुलना सीबीएसई और यूपीएससी से नहीं करनी चाहिए.’’ सीबीएसई की स्थापना 1929 में हुई थी और यूपीएससी की 1926 में. ''एनटीए सिर्फ आठ साल पुरानी है. सीखने और परिपक्व होने में समय लगता है.’’
विशेषज्ञों को जुटाना और सम्मान करना होता है. समिति के एक सदस्य कहते हैं, ''आप चाहते हैं कि गंभीर लोग प्रश्नपत्र तैयार करें और गोपनीयता बरतें, तो उन्हें उचित भुगतान भी करना होगा.’’ बंसल अमेरिका की एजुकेशन टेस्टिंग सर्विस का उदाहरण देते हैं, जो जीआरई और टीओईएफएल जैसी परीक्षाएं संचालित करती है और जिसके पास करीब 600 शोधकर्ता हैं. वे कहते हैं, ''एनटीए के पास पर्याप्त साइकोमेट्रिक विशेषज्ञ या गहरे स्तर के पेपर-सेटिंग एक्सपर्ट नहीं हैं.’’
हालांकि अब सरकार ने संसद को बताया कि राधाकृष्णन समिति की सिफारिश के अनुसार एनटीए में 16 नए पद बनाए गए हैं. अब तक सिर्फ सात पद भरे गए हैं, जिनमें चार नियुक्तियां पिछले महीने हुईं—यानी नीट रद्द होने के बाद. इसके साथ प्रतिनियुक्ति पर काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या 29 हो गई है. पिछले मार्च में सरकार ने राज्यसभा को बताया था कि एनटीए में 43 कर्मचारी कॉन्ट्रैक्ट पर थे.
अब सबकी नजर 21 जून की परीक्षा पर टिकी है, उन 23 लाख छात्रों के लिए जो दोबारा परीक्षा देंगे. यही तय करेगा कि कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल नीट को बचा पाएंगे या नहीं. पिछले महीने चार परिवारों ने अपने बच्चों को सिर्फ पेपर लीक की वजह से नहीं खोया. वे उस व्यवस्था की भेंट चढ़े, जिसे दो बार चेतावनी दी गई, लेकिन जिसने एक बार भी गंभीरता से सबक नहीं लिया.

