इससे बेहतर दिन नहीं हो सकता था शुभेंदु अधिकारी के लिए बंगाल की राजनीति को नए दौर में ले जाने की अगुआई करने को—9 मई 2026, महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती. नए मुख्यमंत्री और उनकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस मौके का पूरा इस्तेमाल किया.
शपथ ग्रहण समारोह के मंच पर टैगोर की तस्वीर लगाई गई, रवींद्र संगीत बजाया गया और शुभेंदु ने टैगोर के पैतृक घर जोरासांको ठाकुरबाड़ी जाकर 'कविगुरु' को पुष्पांजलि अर्पित की.
वहां उन्होंने टैगोर की प्रसिद्ध कविता चित्तो जेथा भय शून्यो (जहां मन भय से मुक्त हो) का पाठ भी किया. 'भय' शब्द पर जोर देते हुए उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की बात दोहराई कि अब बंगाल में 'भय' की जगह 'भरोसे' ने ले ली है.
यह मौका इतना बड़ा है कि शुभेंदु भी भावुक हो गए और खुलकर बोलते दिखे. 57 वर्षीय शुभेंदु बंगाल के नौवें और राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने हैं. उन्होंने पूर्वी भारत में भाजपा को उसकी सबसे बड़ी और निर्णायक राजनैतिक जीत दिलाई है, वह भी 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटों के विशाल बहुमत के साथ. चुनाव प्रचार के दौर की तीखी और विभाजनकारी बयानबाजी अब शांत और समावेशी भाषा में बदल चुकी है. वे कहते हैं, ''अब मैं मुख्यमंत्री हूं, मैं सबका हूं. यह 'मैं' नहीं, 'हम, हम और हम' की सरकार है. यह सरकार 'जनता की, जनता के लिए, जनता के द्वारा' है, किसी पार्टी के लिए नहीं.''
मगर उन्हें मिले इतने बड़े जनादेश का भार संभालने के लिए सिर्फ शब्द काफी नहीं होंगे. वे नंदीग्राम आंदोलन और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के उभार के प्रमुख चेहरों में रहे हैं लेकिन बंगाल में विकास लंबे समय से राजनीति का बंधक बना रहा. पहले 34 साल के वाम शासन में और फिर 15 साल तक ममता बनर्जी की कल्याणकारी राजनीति में वह दोयम दर्जा पाता रहा है.
नतीजा यह हुआ कि राज्य में उद्योग लगभग खत्म हो गए और युवाओं के सामने रोजगार के अवसर कम होते गए. ममता की तरह भाजपा को भी यह समझना होगा कि सिर्फ खैरात वाली योजनाएं और कल्याणकारी राजनीति लंबे समय तक जनता को संतुष्ट नहीं रख सकती. भाजपा भले इस रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती हो मगर उसे कल्याणकारी योजनाओं और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाना होगा. अपराध पर नियंत्रण भी बड़ी चुनौती होगा.
भाजपा ने आर.जी. कर मामले को तृणमूल कांग्रेस शासन में महिलाओं की सुरक्षा की विफलता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया और यहां तक कि पीड़िता की मां रत्ना देवनाथ को पानीहाटी से चुनाव मैदान में उतारकर राजनैतिक फायदा भी लिया. लेकिन सिर्फ तृणमूल कांग्रेस का शासन खत्म होने से कानून व्यवस्था अपने आप ठीक नहीं हो जाएगी. कभी खुद तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा रहे शुभेंदु शायद पार्टी की 'कट मनी' संस्कृति को सबसे बेहतर तरीके से जानते हैं और शायद इसी वजह से वे तृणमूल कांग्रेस को उसी के खेल में मात देने की स्थिति में भी हैं.
बांग्लादेश से घुसपैठ रोकने के लिए राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करना मुख्यमंत्री के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है. यह भाजपा के चुनावी अभियान का बड़ा मुद्दा था. बंगाल के इस मजबूत नेता ने चुनाव जीतने की अपनी क्षमता साबित कर दी है. अब उन्हें यह दिखाना होगा कि जिस 'बदलाव' के नाम पर जनता ने उन्हें चुना, उसे जमीन पर कैसे उतारते हैं.
राजनैतिक पेचीदगियां
नवान्न के नए 'शेरिफ' ने आते ही काम शुरू कर दिया है. ममता बनर्जी के दौर की 'वन-वूमन शो' राजनीति से अलग, जहां पार्टी संगठन और राज्य प्रशासन के बीच फर्क करना मुश्किल था, नए मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी ने साफ कर दिया है कि सरकार और संगठन आपसी तालमेल से काम करेंगे, लेकिन दोनों स्वतंत्र रूप से संचालित होंगे. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि प्रशासन 'भाजपा की सरकार' नहीं होगा क्योंकि ''यह पश्चिम बंगाल की सरकार है.''
हालांकि, केंद्र सरकार बड़े भाई की भूमिका निभा सकती है और उसका असर राज्य प्रशासन पर स्पष्ट दिख सकता है. मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु का पहला बड़ा फैसला भारतीय न्याय संहिता और आयुष्मान भारत योजना को लागू करना था, जिनका ममता सरकार विरोध करती रही थी.
लेकिन अधिकारी की चुनौतियां सिर्फ विपक्ष से नहीं, पार्टी के भीतर से भी आ सकती हैं. राज्य भाजपा में कई प्रभावशाली नेता हैं, जिनमें दिलीप घोष भी शामिल हैं, जिनके साथ शुभेंदु के रिश्ते कभी बहुत सहज नहीं रहे. पार्टी नेतृत्व के कुछ लोग पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और सांसद दिलीप घोष से पिछले कुछ बरसों से नाराज थे लेकिन अब उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के समर्थन से राजनैतिक वापसी की है. उन्हें नई बंगाल कैबिनेट में पंचायत और ग्रामीण विकास जैसे अहम विभाग के साथ पशुपालन और कृषि विपणन मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है.
मुख्यमंत्री के साथ चार अन्य नेताओं ने भी शपथ ली, जिनमें विपक्ष के नेता रहने के दौरान शुभेंदु की करीबी सहयोगी अग्निमित्रा पॉल और अशोक कीर्तनिया शामिल हैं. इसके अलावा पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री निशीथ प्रमाणिक और पहली बार विधायक बने खुदीराम टुडु ने भी मंत्री पद की शपथ ली. हालांकि, पूरी कैबिनेट का गठन अभी बाकी है और शुभेंदु को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते समय वफादारी, गुटीय संतुलन और संगठन की अपेक्षाओं के बीच संतुलन साधना होगा.
इस बीच, उनके काम करने का व्यक्तिगत तरीका भी नौकरशाही और सियासी हलकों में चर्चा का विषय बनने लगा है. शुभेंदु जब ममता बनर्जी की कैबिनेट में मंत्री थे, तब उनके साथ काम करने वाले एक सेवानिवृत्त नौकरशाह उनकी मौजूदगी को ''प्रभावशाली'' और कभी-कभी ''डर पैदा करने वाली'' बताते हैं. मगर वे यह भी याद करते हैं कि शुभेंदु ध्यान से सुनते थे और दूसरों की बात सुनने के लिए तैयार रहते थे. वे कहते हैं, ''मुझे कई मौके याद हैं जब मेरी उनसे असहमति हुई. लेकिन वे हमारी दलील और तर्क ध्यान से सुनते थे. अगर आप अपनी बात ठीक से रख दें तो शुभेंदु बाबू पीछे हट जाते थे.''
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री बनने के शुरुआती दो दिनों में अधिकारी काफी सहज और सुलभ नजर आए. एक पुलिस अफसर ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा, ''ऐसा लगता है कि वे यह साबित करने के मिशन पर हैं कि वे अपनी पूर्ववर्ती की तरह नहीं हैं.'' इसका संकेत नवान्न (सचिवालय भवन) में हुई पहली कैबिनेट बैठक में ही मिल गया, जहां शुभेंदु ने प्रशासनिक और राजनैतिक स्तर पर बड़े बदलाव का संदेश दिया.
उन्होंने कई ऐसे फैसले किए जिनका मकसद मजबूत शासन की छवि पेश करना था. इनमें आइएएस और आइपीएस अफसरों के अंतरराज्यीय प्रशिक्षण की बहाली, सरकारी नौकरियों में आयु सीमा में पांच साल की छूट, लंबे समय से रुकी जनगणना प्रक्रिया फिर शुरू करना और बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा करने के लिए सीमा सुरक्षा बल को जमीन हस्तांतरित करना शामिल था.
सरकार ने इसके साथ ही नागरिक और प्रशासनिक अनुशासन को भी सख्ती से लागू करने पर जोर दिया. विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) का मुद्दा चुनाव खत्म होने के बाद भी चर्चा में बना रहा क्योंकि शुभेंदु ने घोषणा की कि जिन लोगों का नाम मतदाता सूची में नहीं होगा, वे राज्य सरकार की सुविधाओं के पात्र नहीं होंगे.
हालांकि उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि जिन लोगों ने नागरिकता (संशोधन कानून) के तहत आवेदन कर रखा है या ट्रिब्यूनल में अपील कर रखी है, उन पर यह नहीं लागू होगा. सरकार ने यह भी कहा कि सभी लोगों को अपने धर्म का शांतिपूर्ण तरीके से पालन करने की पूरी आजादी है, लेकिन सड़कों को जाम करना या लाउडस्पीकर से लोगों को असुविधा पहुंचाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
त्योहारों के दौरान भी इसकी अनुमति सिर्फ कानूनी मंजूरी के बाद ही होगी. स्कूलों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया गया. सरकार से यह उम्मीद भी की जा रही है कि वह अपने बड़े चुनावी वादों पर जल्द काम शुरू करेगी. इनमें महिलाओं को मासिक भत्ता, उनकी सुरक्षा, आर.जी. कर रेप और हत्या जैसे मामलों की जांच दोबारा शुरू करना और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करना शामिल है. लेकिन इन सभी इरादों के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट क्या है? राज्य की खराब वित्तीय स्थिति.
आर्थिक गतिरोध
पश्चिम बंगाल भारत की छठी सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था है और वित्त वर्ष 27 के लिए उसका अनुमानित सकल राज्य घरेलू उत्पाद 21.8 लाख करोड़ रुपए है. मगर उसकी प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1.71 लाख रुपए है जो राष्ट्रीय औसत 2.12 लाख रुपए से 20 फीसद कम है. समस्या को और गंभीर बनाता है राज्य पर 7.71 लाख करोड़ रुपए का भारी कर्ज, जो देश के राज्यों में पांचवां सबसे ज्यादा कर्ज वाला राज्य है. विदेशी निवेश आकर्षित करने में भी बंगाल की स्थिति कमजोर है. भारत में आने वाले कुल विदेशी निवेश में राज्य की हिस्सेदारी सिर्फ 0.6 फीसद है.
सरकार को राज्य से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन की समस्या से भी निबटना होगा. अनौपचारिक अनुमान बताते हैं कि रोजगार की तलाश में 50 लाख से ज्यादा मजदूर बंगाल छोड़ चुके हैं. यह सरकार के सामने सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह की चुनौती है, खासकर जब भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान रोजगार सृजन और औद्योगिक क्षेत्र के पुनरुद्धार का वादा किया था.
इसके साथ ही सरकार को कल्याणकारी योजनाएं भी जारी रखनी होंगी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस सरकार से ज्यादा भुगतान के साथ. ममता बनर्जी की लक्ष्मी भंडार योजना का लाभ दो करोड़ से ज्यादा महिलाओं ने लिया. इस योजना के लिए सालाना 26,700 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान था. इस योजना के तहत सामान्य वर्ग की महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए और आरक्षित वर्ग की महिलाओं को 1,700 रुपए दिए जाते थे. भाजपा ने इस राशि को बढ़ाकर 3,000 रुपए प्रति माह करने का वादा किया है, जिसके लिए अनुमानित तौर पर हर साल करीब 72,000 करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी. यह भाजपा के चुनावी वादों का सिर्फ एक हिस्सा है.
लक्ष्मी टी समूह के प्रबंध निदेशक और कालीन निर्माता ओबिटी के चेयरमैन रुद्र चटर्जी कहते हैं, ''पश्चिम बंगाल अब तक कल्याणकारी योजनाओं और सेवा क्षेत्र आधारित विकास पर निर्भर रहा है. लेकिन अगला दौर सिर्फ खपत, सब्सिडी और निर्माण कार्यों के सहारे नहीं चल सकता. अगर बंगाल 2030 तक 500 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना चाहता है, तो उसे खुद को निर्यात-उन्मुख मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में फिर से खड़ा करना होगा, जहां टेक्सटाइल, फूड प्रोसेसिंग, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक शहरीकरण के जरिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हों.''
उद्योग जगत के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि जब तक बंगाल में बड़े निवेश नहीं आते, राज्य की अर्थव्यवस्था संघर्ष करती रहेगी. सरकारी नौकरियों पर निर्भरता कम करनी होगी और निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे. लेकिन इसके लिए निवेश के अनुकूल माहौल जरूरी है. केवेंटर ग्रुप के मयंक जालान कहते हैं, ''अब तक सबसे बड़ी समस्या प्रशासन की अनिर्णय की स्थिति रही. निवेशकों को समझ नहीं आता था कि क्या करें. कुलपी पोर्ट परियोजना को लेकर हम दशकों से जूझ रहे हैं.'' रासबिहारी से भाजपा के नवनिर्वाचित विधायक स्वपन दासगुप्त का मानना है कि ''शुरुआत करने के लिए'' कम से कम एक बड़े निवेश प्रोजेक्ट को लाना होगा.
चुस्त-दुरुस्त शासन व्यवस्था
पहली बार विधायक बने दासगुप्त नई सरकार के सामने दो और बड़ी चुनौतियां बताते हैं. वे कहते हैं, ''हमें गुंडाराज और कट मनी की समस्या खत्म करनी होगी. कानून व्यवस्था को भी तुरंत पटरी पर लाना जरूरी है.'' सरकार ने राज्य में सभी अवैध टोल गेट, ड्रॉप गेट, बैरिकेड और वसूली केंद्रों को तुरंत बंद करने का आदेश दिया है. पिछली सरकार पर आरोप लगता रहा कि उसने ऐसी उगाही की व्यवस्थाओं को नजरअंदाज किया.
ममता बनर्जी सरकार पर यह भी बड़ा आरोप था कि पुलिस का एक हिस्सा निष्पक्ष कानून व्यवस्था बल की बजाए पार्टी कॉडर की तरह काम करता था. अधिकारी ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ अपनी पहली बैठक में साफ कहा कि वे चाहते हैं कि पुलिस स्वतंत्र रूप से काम करे. बताते हैं अफसरों को निर्देश दिया गया है कि चुनाव बाद हिंसा की घटनाओं पर कार्रवाई करते समय राजनैतिक संरक्षण की परवाह न करें.
यह तब है जब भाजपा की जीत के दो दिन बाद ही अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई. शुभेंदु और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य दोनों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि हिंसा और डराने-धमकाने की राजनीति किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी, चाहे उसमें भाजपा कार्यकर्ता ही क्यों न शामिल हों. कानून व्यवस्था में लोगों का भरोसा बहाल करना और पुलिस की राजनैतिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना नई सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.
सीमा और घुसपैठ की चुनौती
जहां नई भाजपा सरकार बांग्लादेश की सीमा को पूरी तरह सुरक्षित करने की कोशिश कर रही है, वहीं उसे कथित अवैध घुसपैठ जैसे राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दे से भी जूझना पड़ रहा है. भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के वादों को दोहराते हुए बार-बार कहा था कि बंगाल में भाजपा सरकार बनने पर अवैध घुसपैठियों की 'पहचान, उनके नाम हटाने और निर्वासन' का काम किया जाएगा, खासकर बांग्लादेश से आए लोगों का. लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा.
देश के दूसरे हिस्सों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां अवैध प्रवासियों की पहचान की प्रक्रिया के दौरान कई भारतीय मुस्लिम नागरिकों को भी कथित तौर पर जबरन बांग्लादेश भेज दिया गया. असम सरकार पर भी इसी तरह के आरोप लगते रहे हैं, जहां मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्ग लगातार उत्पीड़न का दावा करते रहे हैं. एक वरिष्ठ प्रशासनिक सूत्र के मुताबिक, सरकार न तो अवैध घुसपैठ बर्दाश्त करेगी और न ही भारतीय मुसलमानों को परेशान करेगी.
सूत्र का कहना है, ''हम अवैध घुसपैठियों की पहचान करने का तरीका निकालेंगे. यह आसानी से किया जा सकता है. उसके बाद उन्हें बांग्लादेश भेज दिया जाएगा.'' लेकिन अगर राज्य के भारतीय मुसलमान महसूस करते हैं कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा या बेवजह परेशान किया जा रहा, तो इससे बंगाल के उस उदारवादी मतदाता वर्ग का एक हिस्सा दूर हो सकता है, जिसने शांति और स्थिरता की उम्मीद में तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था.
पहले ही शुभेंदु की कोलकाता के टॉपसिया और तिलजला इलाकों में बुलडोजर कार्रवाई, जिसकी तुलना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'बुलडोजर राजनीति' से की जा रही है, और 1950 के पशु वध कानून को लागू करने के निर्देश, जिसमें बिना वैध प्रमाणन खुले में पशु वध पर रोक है, ने असहजता पैदा कर दी है.
फिलहाल शुभेंदु अपनी सरकार को प्रशासनिक रूप से सख्त, लेकिन राजनैतिक रूप से संयमित दिखाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं. मगर बंगाल जैसे जटिल और पुरानी समस्याओं से घिरे राज्य को चलाना चुनाव लड़ने से बिल्कुल अलग है. ''सबका मुख्यमंत्री'' बनने की बात कहना आसान है, मगर वास्तव में वैसा बन पाना कहीं ज्यादा मुश्किल.

