दरअसल, हिमंत बिस्व शर्मा 12 मई, 2026 को दिसपुर ऐसे जनादेश के साथ वापस लौटे जिसमें न तो विरोधियों की गुंजाइश बची और न ही बहानों की. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने असम की 126 विधानसभा सीटों में से 82 सीटें जीतकर पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया.
इसके साथ ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की कुल सीटें 102 हो गई हैं जिनमें असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) को 10-10 सीटों पर जीत मिली.
शर्मा अब असम के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बन गए हैं जिन्होंने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की है. इस तरह से एनडीए 3.0 की शुरुआत वे राज्य के अब तक के सबसे निर्विवाद भाजपा नेता के तौर पर कर रहे हैं.
यही उनके लिए अवसर भी है और एक तरह का जाल भी. शर्मा के सामने भाजपा के भीतर कोई गंभीर सियासी चुनौती नहीं है. वहीं, बाहर देखें तो कांग्रेस केवल 19 सीटों पर सिमट गई जो असम में उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है.
कांग्रेस के इस पतन ने शर्मा को एक और सियासी हथियार दिया है. उसके 19 विधायकों में से 18 मुसलमान हैं. इस तथ्य के जरिए भाजपा के पास कांग्रेस को न केवल कमजोर बल्कि अल्पसंख्यक सियासत तक सीमित पार्टी के रूप में पेश करने का मौका है.
मगर, यहीं से भाजपा के तीसरे कार्यकाल की असली चुनौती भी शुरू होती है. भारी बहुमत और कमजोर विपक्ष वाली सरकार तेज फैसले ले सकती है. इसके साथ ही वही सरकार अधिक केंद्रीकृत, बेपरवाह और असहिष्णु भी हो सकती है.
मसला प्रवासी आबादी का
शर्मा ने इस बात का कहीं से कोई इशारा नहीं किया है कि वे अपने सियासी नजरिए और बयानबाजी को नरम करना चाहते हैं. उनके दूसरे कार्यकाल की पहली बैठक से ही साफ हो गया कि उनका इरादा भाजपा के मूल एजेंडे को ही आगे बढ़ाने का है.
उसमें सरकार ने दूसरी बातों के अलावा विधानसभा के पहले सत्र में समान नागरिक संहिता विधेयक लाने का फैसला लिया है. शपथ लेने के कुछ घंटों के बाद ही उन्होंने पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ एक तस्वीर पोस्ट की और लिखा, ''बुरे दिन...(आप जानते हैं किनके लिए).’’ यह पोस्ट गूढ़ थी मगर असम और बंगाल के सियासी माहौल में इसे अवैध प्रवासियों के लिए चेतावनी के रूप में देखा गया.
बांग्लादेश से होने वाला अवैध प्रवासन असम में अब भी एक वास्तविक और अनसुलझा मसला है. शर्मा ने बार-बार कहा है कि वे भारतीय मुसलमानों के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि अवैध प्रवासियों के खिलाफ हैं. वैसे, अपने दूसरे कार्यकाल में उन्हें दिखाना होगा कि यह फर्क उन्होंने महज सियासी सुविधा के लिए नहीं गढ़ा है.
कॉटन यूनिवर्सिटी, गुवाहाटी के राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रमुख और एसोसिएट प्रोफेसर दिलीप गोगोई कहते हैं, ''सियासी रूप से एनडीए के सामने, मजबूत केंद्रीय नेतृत्व और असम की गहरी क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच एक कठिन संतुलन साधने की चुनौती है. खासकर अस्मिता, प्रवासन और स्वायत्तता के सवालों पर. सामाजिक स्तर पर देखें तो जातीय और सांप्रदायिक अंदेशों-आशंकाओं को बिना ध्रुवीकरण बढ़ाए संभालना बेहद अहम होगा.’’
यहीं जमीन को फिर से हासिल करने का शर्मा का एजेंडा सियासी रूप से अहम हो जाता है. उनकी सरकार का कहना है कि पिछले कार्यकाल में उसने 1,50,000 बीघा अतिक्रमित भूमि खाली करवाई. अब अगले चरण में उसने 5,00,000 बीघा भूमि फिर से वापस पाने का वादा किया है. यह पूरी पहल एनडीए के व्यापक 'जाति, माटी, भेटी’ (पहचान, भूमि, घर) नारे और मूलनिवासी हितों की रक्षा के वादे के दायरे में रखी गई है.
प्रशासनिक नजरिए से राज्य सरकार कुछ इस तरह के तर्क दे सकती है कि इस अभियान के जरिए वह सरकारी, वन, चरागाह और संस्थागत भूमि को सुरक्षित रखने, बुनियादी ढांचे के निर्माण और दूसरे बेहतर कार्यों के लिए मुक्त कर रही है. भाजपा 'अवैध कब्जे’ को बांग्लादेशी प्रवासियों से जुड़ी जनसांख्यिकीय समस्या के तौर पर पेश करती है. ऐसे में सियासी नजरिए से देखें तो इस अभियान को उसके खिलाफ ठोस कदम बताया जाता है.
आर्थिक सचाइयों से सामना
शर्मा के पहले कार्यकाल को राजनैतिक मजबूती, प्रशासनिक गति, कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार और बुनियादी ढांचे के तेज विकास के दौर के रूप में देखा जा सकता है. वहीं, दूसरे कार्यकाल का मूल्यांकन रोजगार, आय, समग्र औद्योगिक विकास, मानव पूंजी और समावेशी विकास सरीखे मोर्चों पर कठिन और ठोस नतीजों के आधार पर होगा.
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2021 से 2025 के बीच असम ने 45 फीसद की दर से राज्यों में सबसे तेज आर्थिक वृद्धि दर्ज की है. यह 29 फीसद के राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है. प्रदेश सरकार का कहना है कि जीएसडीपी वर्तमान मूल्यों पर 16.93 फीसद की वृद्धि दर के साथ वित्त वर्ष 2027 में 8.7 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है. साथ ही, प्रति व्यक्ति आय वित्त वर्ष 2021 के 86,947 रुपए से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 1.8 लाख रुपए हो गई है.
मगर, यह बात एक दूसरी हकीकत पर पर्दा डालती है. असम कुल जीडीपी के मामले में अब भी देश के शीर्ष 15 राज्यों में शामिल नहीं है. प्रति व्यक्ति आय में यह सबसे पिछड़े 10 राज्यों में है. समष्टिगत वित्तीय स्थिति पर नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश की नॉमिनल जीडीपी में असम की हिस्सेदारी 1991 में 2.6 फीसद से घटकर वित्त वर्ष 2022 में 1.8 फीसद रह गई. मैक्युफैक्चरिंग क्षेत्र का राज्य मूल्य संवर्धन में योगदान 12.5 फीसद है जो 14.8 फीसद के राष्ट्रीय औसत से कम है.
वित्तीय ढांचा संरचनात्मक अर्थव्यवस्था की तुलना में ज्यादा मजबूत नजर आता है. पूंजीगत व्यय एक दशक में आठ गुना बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 26,409 करोड़ रुपए हो गया. जीएसडीपी के अनुपात में इसका कर्ज 25.52 फीसद है.
28 राज्यों की तुलना में यह अपेक्षाकृत कम है और इस मामले में असम 21वें स्थान पर है. असम का कर राजस्व चार साल में 75 फीसद बढ़कर 30,052 करोड़ रुपए हो गया है. मगर इसकी निर्भरता की समस्या खत्म नहीं हुई है. केंद्र से मिलने वाली रकम असम के जीएसडीपी का 14.2 फीसद है और यही राज्य के कुल राजस्व का 72 फीसद हिस्सा पूरा करती है.
आर्थिक मोर्चे की सबसे बड़ी चुनौती रोजगार है. शर्मा के पहले कार्यकाल में एक लाख से ज्यादा सरकारी नौकरियां दी गईं. उन्हें अब निजी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के मौके बनाने होंगे. बड़े उद्योग रोजगार पैदा कर सकते हैं.
मसलन, मोरीगांव जिले में टाटा सेमीकंडक्टर सुविधा से 15,000 प्रत्यक्ष और 11,000-13,000 परोक्ष नौकरियां तैयार होने की उम्मीद है. मगर राज्य के आर्थिक मोर्चे को देखते हुए सरकार को तात्कालिक प्राथमिकता के रूप में स्व-रोजगार को बढ़ावा देने के उपाय करने चाहिए.
प्रोफेसर गोगोई कहते हैं, ''असल परीक्षा शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार सृजित करने और निर्माण-आधारित विकास से इतर आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था तैयार करने की है.’’ शर्मा को इस जरूरत का पूरी तरह से एहसास है.
शपथ लेने से पहले सोशल मीडिया पर उन्होंने एमएसएमई, उद्यमिता और स्व-रोजगार पर केंद्रित रोजगार एजेंडा पेश किया था. उसमें 10 लाख युवाओं के लिए पांच लाख रुपए तक की उद्यमिता सहायता और स्टार्टअप, स्थानीय आर्थिक विकास, रोजगार तथा औद्योगिक विस्तार पर ज्यादा जोर देने का वादा किया गया था.
एक अदद मॉडल की तलाश
असम में पिछले पांच साल उसके एक आधार के तैयार होने के चरण के रूप में थे जिसे शर्मा हिमंत बिस्व शर्मा मॉडल कहते है. अब तक बुनियादी ढांचे का विकास, कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार और कुशल शासन के रूप में इसके तीन हिस्से नजर आते हैं.
शासन के संदर्भ में भूमि सुधार, सेवाओं की तीव्र पहुंच, पारदर्शी भर्तियां और ज्यादा मजबूत कानून-व्यवस्था शामिल हैं. शर्मा का दूसरा कार्यकाल इसी एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन बड़ा लक्ष्य रोजगार पैदा करने वाला विकास होना चाहिए. यह आर्थिक एजेंडा राष्ट्रीय स्तर पर भी अहमियत रखता है. दरअसल, शर्मा की अगुआई वाले असम में 14 लोकसभा सीटें हैं, फिर भी वह ज्यादातर आर्थिक संकेतकों पर राष्ट्रीय औसत से पीछे दिखता है.
ऐसे में शर्मा को अपनी आक्रामक सियासी शैली से आगे जाना होगा. वे अपने तीखे बयानों के साथ अपनी प्रशासनिक सक्रियता के लिए भी मशहूर हैं. मगर सिर्फ तीखी बयानबाजी से राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत दावा नहीं बनता.
गुजरात से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदय भी सिर्फ हिंदुत्व पर आधारित नहीं था. उन्होंने वैचारिक मजबूती के साथ विकास की भी कहानी जोड़ी. शर्मा को भी ऐसा असम मॉडल तैयार करना होगा जो विकासपरक होने के साथ-साथ इतना समावेशी हो ताकि अपने ही सांप्रदायिक समीकरणों के बोझ से ढह न जाए.
समावेशी भावना पहले से ही शर्मा के शासन में मौजूद है. उनकी कल्याणकारी योजनाओं में हिंदू-मुस्लिम का कोई भेद नहीं है. मगर उनके दूसरे कार्यकाल की चुनौती यह है कि वह समावेशी भावना उनके राजनैतिक व्यवहार और भाषा में भी नजर आनी चाहिए.
बड़े पैमाने पर प्रगति के लिए हिमंत बिस्व शर्मा को निजी क्षेत्र के रोजगार, कौशलयुक्त काम, सेवाओं, मैन्युफैक्चरिंग और स्व-रोजगार के अवसर विकसित करने होंगे
शर्मा ने कहा है कि वे भारतीय मुसलमानों के खिलाफ नहीं, अवैध प्रवासियों के खिलाफ हैं. उन्हें दिखाना होगा कि यह फर्क महज सियासी सुविधा के लिए उन्होंने नहीं गढ़ा.
पांच प्रमुख चुनौतियां
- यह सुनिश्चित करना कि भारी बहुमत वाली सरकार कहीं अत्यधिक केंद्रीकृत, बेपरवाह और असहिष्णु न हो जाए.
- वैध भारतीय मुसलमानों को अलग-थलग किए बिना या उनको निशाना बनाए बगैर अवैध प्रवासन के खिलाफ कार्रवाई को अंजाम देना.
- उच्च आर्थिक वृद्धि को ऊंची आय, औद्योगिक विस्तार और मजबूत राजस्व में भी तब्दील करना.
- निजी क्षेत्र, एमएसएमई और कौशल-आधारित रोजगार के बड़े पैमाने पर अवसर उत्पन्न करना.
- समावेशी भावना, मानव पूंजी और सतत विकास पर आधारित विकास मॉडल

