नरेंद्र मोदी के साथ नजदीक से काम करने वाले जानते हैं कि प्रधानमंत्री जो भी कहते या करते हैं, वह बेतरतीब नहीं होता. मोदी का हर काम बड़ी तस्वीर से जुड़ा होता है जो कभी-कभी उनके साथियों और विरोधियों को भी पता नहीं चल पाता. देश पर मोदी की हुकूमत के बीते नौ साल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने अप्रतिम नेता की प्रबंधन शैली को बड़े पैमाने पर आत्मसात कर लिया है.
उस अनूठी खूबी को सत्ता की अथक (कई लोग इसे निर्मम कहते हैं) पिपासा से जोड़कर भाजपा ने मोदी और उनके सिपहसालार अमित शाह की अगुआई में खुद को बेहद ताकतवर राजनैतिक ताकत में तब्दील कर लिया है. कहा जा सकता है कि अब वह दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी है, जो कॉर्पोरेट कंपनियों सरीखी दक्षता से काम करती है, अपनी उपलब्धियों से संतोष नहीं करती, और झटकों तथा नाकामियों से हमेशा सीख लेती है.
अब जब 2024 के आम चुनाव में एक साल से भी कम वक्त रह गया है, भाजपा ने अपने दम पर बहुमत के साथ केंद्र में लगातार तीसरा असाधारण कार्यकाल हासिल करने के लिए अपना भव्य गेमप्लान जाहिर कर दिया है, जो 2014 और 2019 में हासिल उसके संपूर्ण दबदबे का ही एक और दोहराव है. इस मिशन को तत्काल अंजाम देना उस वक्त और जरूरी हो गया जब 15 विपक्षी दल भाजपा को हराने की गरज से अपनी-अपनी ताकत को सामूहिक शक्ति में बदलने के तरीकों पर विचार करने 23 जून को बिहार की राजधानी पटना में इकट्ठा हुए.
अपना मकसद हासिल करने के लिए भाजपा ने चौंकाने और झटका देने वाली रणनीति का सहारा लिया है. 27 जून को मध्य प्रदेश में, जहां चुनाव होने वाले हैं, बूथ कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक में मोदी ने विपक्ष पर सोचा-समझा निशाना साधा. उन्होंने कहा कि उनकी विरोधी पार्टियां जिस भी राज्य में सत्ता में होती हैं ''भ्रष्टाचार की गारंटी’’ देती हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) पर अलग से हमला करते हुए उन्होंने इसे ''लगातार टिक्-टिक् करने वाला घोटाले का मीटर’’ करार दिया.
उन्होंने आगे जोड़ा, ''एनसीपी पर करीब 70,000 करोड़ रुपए के घोटाले के आरोप हैं, जिनमें महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक घोटाला, महाराष्ट्र सिंचाई घोटाला और अवैध खनन घोटाला शामिल हैं. यह फेहरिस्त बहुत लंबी है.’’ अगले दिन एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने आरोपों को सिरे से झटक दिया और उनके भाषण को यह कहकर खारिज कर दिया कि प्रधानमंत्री विपक्ष की बढ़ती एकता पर अपनी कुंठा जाहिर कर रहे हैं.
मगर पांच दिन बाद 2 जुलाई को उलटे पवार ही अपने जख्म सहलाते देखे गए जब उनके भतीजे अजित पवार ने एनसीपी को तोड़कर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल होने का फैसला किया. कई पर्यवेक्षकों ने प्रधानमंत्री के बयान को इस तरह देखा: वे अजित पवार और उनके समर्थक जत्थे यानी सीधे घोटालों में शामिल नेताओं को साफ-साफ चेतावनी दे रहे थे कि हिचकिचाहट खत्म करके भाजपा के साथ आ जाएं और काम करें या फिर नतीजे भुगतें.
2024 का गेमप्लान
भाजपा के निशाने की जद में महाराष्ट्र अकेला राज्य नहीं था. अजित पवार और एनसीपी के नौ विधायकों को कैबिनेट मंत्रियों के रूप में शपथ दिलवाने के एक दिन बाद, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ जमीन-के-बदले-नौकरी घोटाले में कथित लिप्तता के लिए आरोपपत्र दाखिल कर दिया. यह घोटाला 2000 के दशक के मध्य में तब हुआ था जब लालू संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार में रेल मंत्री थे.
भाजपा तभी से उस टीस से परेशान से थी, जो अगस्त 2022 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) ने उनकी गठबंधन सरकार को उलटकर पहुंचाई थी. नीतीश ने पाला बदलकर राजद के साथ बिहार में नई गठबंधन सरकार बनाई, जिसमें तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया. भाजपा तभी से नए गठजोड़ को अस्थिर करने की साजिश रचती रही है. ताजा कदम नीतीश को शर्मसार करने और उन पर दबाव डालने के मकसद से उठाया गया, ताकि उनके लिए बयानबाजी की गुंजाइश कम हो जाए. वोट देने वाली जनता के लिए संदेश यह था कि अगर नीतीश भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता का दावा करते हैं तो कम से कम इतना तो उन्हें करना ही होगा कि अपने इस दावे पर खरा उतरकर दिखाएं.
महाराष्ट्र और बिहार अकेले राज्य नहीं हैं जो पिछले साल लगातार भाजपा के निशाने पर रहे. इसे उचित ही ऑपरेशन तोड़-फोड़ कहा जा सकता है, जिसमें भाजपा ने उन विपक्षी दलों को बदनाम और कलंकित करने के लिए कई अभियान छेड़ दिए जो 2024 में अपने दम पर लोकसभा में बहुमत जितनी सीटें जीतने के उसके मिशन के लिए खतरा पैदा कर रहे थे. 2014 में उसने 282 सीटें जीती थीं और 2019 में उन्हें बढ़ाकर 303 पर ले गई, जबकि साधारण बहुमत के लिए 272 सीटें चाहिए.
विकासशील समाज अध्ययन केंद्र (सीएसडीएस) में लोकनीति के सह-निर्देशक और चुनाव विश्लेषक संजय कुमार मानते हैं कि भाजपा को 200 से 225 सीटें तो आराम से मिल जाएंगी. इसके पीछे उनकी दलील है कि 2019 में भाजपा ने 225 सीटें 1,00,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती थीं, जिसमें से 105 सीटों पर जीत का अंतर 3,00,000 वोटों से ज्यादा था.
संजय बताते हैं, ''200 सीटों पर भाजपा ने 50 फीसद से ज्यादा वोट हासिल किए थे, जिससे विपक्षी गठजोड़ के लिए ये सीटें उनसे छीन पाना मुश्किल होगा. मगर अपने दम पर बहुमत से कम सीटें जीतना प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए भारी झटका होगा क्योंकि वे गठबंधन के भागीदार दलों पर निर्भर रहना नहीं चाहेंगे. इसलिए बड़ी लड़ाई इस बात को लेकर है कि अपने दम पर साधारण बहुमत पक्का करने के लिए उसे 80 से 100 के बीच वे अतिरिक्त सीटें मिल पाती हैं या नहीं.’’
ऐसा करने के लिए पार्टी विपक्ष की हुकूमत वाले 13 राज्यों पर ध्यान दे रही है, जिनमें बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना शामिल हैं. इन 13 राज्यों में लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 298 या 55 फीसद सीटें हैं. 2019 में भाजपा ने इनमें से 119 सीटें जीतीं थीं, जिनकी बदौलत पार्टी की कुल सीटें 303 पर पहुंच गईं. कुल मिलाकर भाजपा की अगुआई वाले 20 पार्टियों के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 353 सीटें जीतीं और निर्णायक बहुमत हासिल किया. लेकिन बाद के सालों में एनडीए के कई साझेदार दलों के बाहर चले जाने के साथ यह संख्या लगातार घटती रही, जब तक कि पिछले साल शिवसेना और हाल ही में एनसीपी की टूट से उसकी सीटों की संख्या में इजाफा नहीं हुआ.
महा प्रहार
महाराष्ट्र उन राज्यों में सबसे ऊपर था जो भाजपा की अपने दम पर बहुमत हासिल करने की ख्वाहिश में पलीता लगा सकता था. उत्तर प्रदेश की 80 सीटों के बाद लोकसभा की दूसरी सबसे ज्यादा 48 सीटें इसी राज्य में हैं. 2019 में भाजपा ने अविभाजित शिवसेना के साथ चुनाव लड़ा और दोनों ने मिलकर 48 में से 41 सीटें जीतीं. इनमें भाजपा की 23 और शिवसेना की 18 सीटें थीं. एनडीए के गठजोड़ को कुल 51.3 फीसद वोट मिले, जिसमें भाजपा का योगदान 27.8 फीसद और सेना का 23.5 फीसद था. कांग्रेस और एनसीपी से मिलकर बने यूपीए ने कुल 32 फीसद (कांग्रेस 16.4 फीसद, एनसीपी 15.6 फीसद) वोट हासिल करके महज पांच सीटें जीतीं.
अलग-अलग वोट हिस्सेदारी और गठबंधन के जोड़ महाराष्ट्र में जीत की कुंजी हैं, खासकर विधानसभा चुनाव में, जिनमें 1985 के बाद किसी भी पार्टी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला. 2019 के विधानसभा चुनाव में, जो उस साल लोकसभा चुनाव के बाद हुए थे, एनडीए ने 288 में से 161 सीटें जीतीं, जो बहुमत के निशान 145 से खासी ज्यादा थीं. इनमें से भाजपा ने 105 और साफ तौर पर जूनियर पार्टनर सेना ने 56 सीटें जीतीं.
फौरन बाद दोनों पार्टियों में इस बात को लेकर ठन गई कि मुख्यमंत्री किसका होगा. सेना ने दावा किया कि चुनाव से पहले यह पद उसके प्रतिनिधि को देने का अलिखित समझौता हुआ था. भाजपा उस वक्त ठगी-सी रह गई जब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाकर, जिन्होंने मिलकर कुल 98 सीटें जीती थीं, महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) बनाया और मुख्यमंत्री बनकर उभरे.
भाजपा को अच्छी तरह पता था कि अगर अघाड़ी को 2024 के लोकसभा चुनाव तक एकजुट ताकत के तौर पर कायम रहने दिया गया तो उसकी कुल 55 फीसद वोट हिस्सेदारी को परास्त कर पाना लगभग नामुमकिन होगा. राजनीति हालांकि इतना सटीक विज्ञान नहीं है कि जिसमें दो और दो मिलकर चार ही होते हों. भाजपा के सिर पर 2019 में जीती गई 41 में से कई सीटें गंवाने का खतरा मंडरा रहा था. लिहाजा पिछले साल जून में भाजपा ने पहले शिवसेना में टूट की पटकथा रची और शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे के सिर पर मुख्यमंत्री का सेहरा बांधकर एक नई गठबंधन सरकार बनाई.
फिर इस जुलाई में भाजपा ने अपनी स्थिति को दोगुना पक्का करने का फैसला किया. उसने एनसीपी में फूट डालकर अजित पवार और पार्टी के बहुमत विधायकों को साथ आने के लिए राजी कर लिया. मगर अलग रंग-ढंग की पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा को दलबदल करवाने के लिए तीखी आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा. महाराष्ट्र में किए गए एबीपी जनमत सर्वेक्षण में 58 फीसद उत्तरदाताओं की राय थी कि इससे भाजपा को नुक्सान पहुंचेगा, जबकि 38 फीसद को लगता था कि इससे उसे फायदा होगा.
हालांकि भाजपा के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा इस बात से इनकार करते हैं कि पार्टी ने दलबदल करवाए. वे कहते हैं, ''भाजपा में ठेठ जनसंघ के दिनों से ही हमारी विचारधारा रत्ती भर भी कमजोर नहीं हुई है. हम पहले भी राष्ट्र और राष्ट्रवाद की बात करते थे और अब भी करते हैं. यही अनुच्छेद 370, राम मंदिर या तीन तलाक के मामले में भी है. हम अपने विश्वासों पर अडिग हैं और उन्हीं के अनुसार काम करते हैं. हम अकेली पार्टी हैं जो लगातार एक-सी रही है, अकेली पार्टी जिसने अपनी विचारधारा को कमजोर नहीं होने दिया. जहां तक दूसरी पार्टियों की बात है, हमने उन्हें कैसे तोड़ा? उन्होंने खुद अपनी इच्छा से ऐसा किया. इसलिए कि वे हमारे साथ जुड़ गए हैं, हम अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं करेंगे.’’ (देखें इंटरव्यू: 'विपक्षी एकता छलावा है’).
लोहे के चने
महाराष्ट्र की तरह दूसरे अहम राज्यों में भी भाजपा विपक्ष को बेअसर करने के अपने मनसूबों पर आगे बढ़ रही है. लोकसभा की 40 सीटों वाला बिहार उतार-चढ़ाव से गुजरता एक और राज्य है. नीतीश का जद (यू) और तेजस्वी की अगुआई में फिर उठ खड़ा हुआ राजद का गठबंधन मजबूत चुनौती पेश कर रहा है. 2015 के विधानसभा चुनाव में, जब दोनों पार्टियों ने कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन (एमजीबी) बनाया था, इस गठबंधन ने 178 सीटों और 41.8 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया था.
भाजपा ने 24.4 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ महज 53 सीटें जीतीं. अलबत्ता 2019 का लोकसभा चुनाव जद (यू) ने एनडीए के छत्र तले भाजपा और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के साथ मिलकर लड़ा. एनडीए ने 53 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ 40 में से 39 सीटें जीत लीं. इनमें भाजपा को 17, जद (यू) को 16 और लोजपा को छह सीटें मिलीं. महागठबंधन की वापसी से पलड़ा निर्णायक रूप से विपक्ष के पक्ष में झुक गया है, जिसकी वोट हिस्सेदारी भाजपा से 10 फीसद ज्यादा रहने की संभावना है. इसका मतलब है कि अगर महागठबंधन तमाम मुश्किलों के बीच भी अपना दम साधे रखता है, तो भाजपा 2019 में जीती गई सीटों में से खासी बड़ी संख्या में सीटें गंवा सकती है.
भाजपा बखूबी जानती है कि बिहार में नीतीश और तेजस्वी दोनों के अपने-अपने मजबूत सामाजिक आधार हैं. राजद की मजबूत एम-वाइ (मुस्लिम-यादव) धुरी कायम है, तो जद (यू) के पास कुछ पिछड़ी जातियों, अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) और महादलितों का ऐसा ही बड़ा धड़ा है जो नीतीश के पीछे गोलबंद है. इसलिए भाजपा बिहार में महागठबंधन को अस्थिर करने के लिए तिहरी रणनीति अपना रही है. सीबीआइ के जरिए लालू और तेजस्वी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को जिंदा करके वह न केवल राजद को बदनाम करने बल्कि जद (यू) के विधायकों को उसके खिलाफ भड़काने की भी उम्मीद कर रही है.
भाजपा यह कहकर परेशानी पैदा करना चाहती है कि नीतीश के वादे के मुताबिक अगर तेजस्वी मुख्यमंत्री के रूप में उभरते हैं तो राज्य में जद (यू) की ताकत काफी कम हो जाएगी. 2020 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ आखिर पूरी कटुता से लड़ी थीं. मगर लालू और तेजस्वी के खिलाफ सीबीआइ के आरोपपत्र दाखिल करने के बाद नीतीश ने इस बात का खास ख्याल रखा कि वे तेजस्वी और उनके भाई तेज प्रताप सिंह के साथ बिहार विधानसभा पहुंचें. इससे यह संदेश गया कि राजद के साथ जद (यू) का गठबंधन साबुत और मजबूत है.
विपक्षी नेताओं को शक है कि भाजपा अब जद (यू) में फूट डालने की कोशिश कर रही है. मगर गठबंधन को कुल 243 में से 160 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल है (साधारण बहुमत के लिए 122 सीटें चाहिए). ऐसे में 45 विधायकों वाले जद (यू) को तोड़कर भी सरकार नहीं गिराई जा सकती. इस बीच, भाजपा इन पार्टियों के जनाधार में सेंध लगाने में जुटी है. उसके इसी अभियान के तहत जीतनराम मांझी का हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (एचएएम) और नवगठित राष्ट्रीय लोक जनता दल (आरएलजेडी) के नेता उपेंद्र कुशवाहा जद (यू) के साथ रिश्ते तोड़कर बाहर आ चुके हैं.
मार्च में सम्राट चौधरी को राज्य भाजपा का अध्यक्ष बनाकर पार्टी नीतीश के मूल वोटर आधार और बिहार के कुल मतदाताओं में 5 फीसद हिस्सेदारी रखने वाले कोइरी-कुशवाहा मतदाताओं के एक हिस्से को तोड़ने की उम्मीद कर रही है. भाजपा हवा का रुख अपने पक्ष में मोड़ने के लिए मोदी के करिश्मे पर भी भरोसा कर रही है. वह केंद्र की सरकार चलाने के लिए विपक्षी पार्टियों के भारी-भरकम और मुश्किल जमावड़े के बजाए पूर्ण बहुमत वाली पार्टी के पक्ष में वोट मांग रही है.
असल में नीतीश के साथ विपक्षी एकता के सूत्रधार के रूप में उभरे महाराष्ट्र के शरद पवार पर हमला करके भाजपा ने विश्वसनीय और व्यावहारिक गठबंधन का ताना-बाना बुनने की उनकी योजना में अच्छी-खासी सेंध लगा दी है. चुनाव विश्लेषक संजय कुमार का मानना है कि विपक्षी एकता की शुरुआत बहुत धीमी हुई है. वे कहते हैं, ''उन्हें इसे मैराथन मानने के बजाए 100 मीटर की दौड़ की तरह लेना चाहिए.’’
पश्चिम बंगाल में जहां कद्दावर ममता बनर्जी ने भाजपा को बार-बार धूल चटाई है, वह उनके भतीजे और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के दूसरे नंबर के नेता अभिषेक बनर्जी को निशाना बना रही है. 8 जून को यानी जिस दिन भारत के निर्वाचन आयोग ने बंगाल के पंचायत चुनावों की तारीखों का ऐलान किया, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अभिषेक को शिक्षक भर्ती घोटाले (जिसकी जांच सीबीआइ भी कर रही है) में उनकी कथित भूमिका के बारे में पूछताछ के लिए दिल्ली तलब कर लिया.
ईडी ने कोयला चोरी से जुड़े एक अन्य मामले में उनकी पत्नी रुजिरा से भी पूछताछ की है. लेकिन ममता मुश्किल आसामी हैं और हाल के नगर निकायों के चुनावों में तृणमूल की भारी जीत से संकेत मिलता है कि उनका जनाधार मजबूती से कायम है जबकि भाजपा का आधार काफी कमजोर हुआ है. पार्टी के लिए 2019 का अपना प्रदर्शन दोहराना वाकई मुश्किल हो सकता है. तब उसने राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 18 जीती थीं.
दक्षिणी रुझान
दूसरे बड़े विपक्ष शासित राज्यों में भाजपा तमिलनाडु पर निशाना साध रही है, जहां लोकसभा की 39 सीटें हैं. भगवा पार्टी 2019 के चुनावों में वहां खाता खोलने में नाकाम रही. मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की अगुआई में द्रविड़ मुनेत्र कडगम (द्रमुक) धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठजोड़ के बैनर तले 39 में 38 सीटें जीत गई थी, जिसमें कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां शामिल हैं. द्रमुक ने 24 सीटें जीती थीं. भाजपा की रणनीति यहां द्रमुक को बदनाम करने की है.
साथ ही अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडगम (अन्नाद्रमुक) और उससे टूटे ओ. पनीरसेल्वम की अगुआई वाले धड़े तथा दूसरे टी.टी.वी. दिनकरण धड़े के साथ गठजोड़ करने की है. पिछले महीने ईडी ने द्रमुक के बिजली मंत्री वी. सेंथिल बालाजी के खिलाफ पैसा लेकर नौकरी देने संबंधी घोटाले की जांच शुरू की. मामला तब का है जब वे 2014 में अन्नाद्रमुक सरकार में परिवहन मंत्री हुआ करते थे. बालाजी के समर्थन में उतरे स्टालिन ने कहा कि भाजपा नेताओं के खिलाफ भी मामले हैं और ''नैतिकता का ऊंचा पैमाना एकतरफा नहीं होता.’’
तेलंगाना में 17 लोकसभा सीटें हैं, वहां भाजपा की कोशिश है कि 2019 में जीती गई चार से अधिक सीटें आएं. ईडी दिल्ली शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) की बेटी कल्वाकुंतला कविता को निशाना बना रही है. मोदी ने आरोप लगाया है कि भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के प्रमुख और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा रखने वाले केसीआर राज्य में कई घोटालों में शामिल हैं.
पड़ोसी आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ युवजन श्रमिक रायतु कांग्रेस पार्टी (वाइएसआरसीपी) ने 2019 में सभी 25 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. वहां भाजपा की रणनीति मुख्यमंत्री वाइ.एस. जगन मोहन रेड्डी को साथ रखने की है, ताकि लोकसभा में शक्ति प्रदर्शन की नौबत आई तो उनकी पार्टी भाजपा के साथ खड़ी रहे. भाजपा कभी भी जगन पर शिकंजा कस सकती है क्योंकि सीबीआइ और ईडी उनके खिलाफ कई आरोपों की जांच कर रही हैं.
भाजपा ने संभावनाएं बढ़ाने के लिए हाल में इन दोनों राज्यों में अपने पार्टी अध्यक्ष भी बदले हैं. तेलंगाना में भाजपा ने बंडी संजय के स्थान पर केंद्रीय पर्यटन मंत्री जी. किशन रेड्डी को अध्यक्ष बनाया है, जहां इस साल के अंत में चुनाव होने हैं. पार्टी को उम्मीद है कि इससे पार्टी में दूसरे दलों से आए नेताओं (दलबदलुओं) और मूल कार्यकर्ताओं के बीच तनाव को सुलझाया जा सकेगा और ठोस चुनावी अभियान चलाया जा सकेगा.
रणनीति यह है कि नए जोश से उभरती कांग्रेस को मात देने के लिए मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया जाए. आंध्र में भाजपा ने तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के संस्थापक एन.टी. रामराव की तीसरी बेटी तथा पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडु की साली दग्गुबाती पुरंदेश्वरी के हाथ पार्टी की कमान देकर बाजी खेली है. रणनीति यह है कि प्रभावशाली कम्मा समुदाय के वोटो में बंटवारा किया जा सके और टीडीपी तथा नायडू के काडर और फंड में अच्छी-खासी सेंध लगाई जाए, ताकि यह संदेश जाए कि भाजपा ही जगन की वाइएसआरसीपी के व्यावहारिक विकल्प के रूप में उभरेगी.
भाजपा दो अन्य मोर्चों पार्टी के ढांचे और एनडीए को फिर से मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है. कर्नाटक में उसे डर है कि वह खासकर हाल के विधानसभा चुनाव में पुनर्जीवित कांग्रेस के हाथों करारी हार के बाद 2019 में 28 लोकसभा सीटों में से 25 जीतने का प्रदर्शन न दोहरा पाए. इसलिए, भाजपा एच.डी. देवेगौड़ा की जनता दल (सेक्युलर) पर डोरे डाल रही है कि पार्टी अपने गढ़ पुराने मैसूरू इलाके में सीटें जीतने के लिए गठबंधन कर ले. पंजाब में पार्टी शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन फिर से जिंदा करने पर चर्चा कर रही है. भाजपा फिलहाल अधिक सीटों की मांग कर रही है. यानी लोकसभा चुनाव के लिए कुल 13 में से सात (पहले की तीन की बजाए) और विधानसभा चुनाव के लिए 117 में से 55 (पहले की 23 की बजाए).
गढ़ की किलेबंदी
उत्तर प्रदेश 80 लोकसभा सीटों के साथ यूं तो सुरक्षित गढ़ माना जाता है, लेकिन वहां भी भाजपा ने अपनी ताकत और बढ़ाने की रणनीति तैयार की है. उसके गठबंधन ने 2019 में 64 सीटें जीती थीं. उन्हें बरकरार रखने के अपने प्रयासों को तेज करने के अलावा बाकी 16 सीटें भी जीतने की अलग योजना तैयार कर रही है. पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के जाट नेता जयंत चौधरी को पाले में लाने की कोशिश कर रही है, जिन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ साझेदारी की थी.
भाजपा गैर-यादव ओबीसी समुदायों के बीच पर्याप्त वोट आधार बनाए रखने पर जोर लगा रही है, जो राज्य की आबादी का 30 फीसद हैं. माना जा रहा है कि पार्टी का रुख बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की नेता मायावती के प्रति नरम है और उम्मीद है कि वे विपक्षी गठबंधन में शामिल नहीं होंगी. इस बीच, भाजपा अपने दम पर दलित वोटों को लुभाने की हरसंभव कोशिश कर रही है, जिसमें छोटे दलों को पाले में लाना भी शामिल है. भाजपा राज्य की एक दर्जन लोकसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाले पसमांदा या पिछड़े वर्गों के मुस्लिम वोटों के एक वर्ग पर भी डोरे डालने की कोशिश में है.
भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में विपक्ष में एकजुटता का अभाव, बिहार में जद (यू) नेताओं में बेचैनी, तमिलनाडु में द्रमुक तथा तेलंगाना में बीआरएस में बढ़ती कलह और एनसीपी तथा शिवसेना में टूट वगैरह बड़े विपक्षी गठबंधन की राह में रुकावट बनेंगे. बेशक, कागज पर विपक्षी गठबंधन दुर्जेय दिखता है और कुछ राज्यों में भाजपा के गणित को गड़बड़ा सकता है. लेकिन भगवा पार्टी के नेता विपक्षी नेताओं के बीच की केमिस्ट्री पर संदेह जाहिर करते हैं.
आप के साथ ऐसी खटास है कि पार्टी गठबंधन में फिट न हो पाए. नड्डा कहते हैं, ''विपक्ष सिर्फ परिवारवाद के मुद्दे पर एकजुट हो रहा है. सभी केवल अपने वंशवादी उत्तराधिकारियों को बचा रहे है, चाहे कांग्रेस, शरद पवार, लालू, स्टालिन हों या ममता. वे आंतरिक विरोधाभासों के कारण नाकाम हो जाएंगे.’’
सांगठनिक चुस्ती
इस रणनीति को विस्तार देते हुए भाजपा ने सांगठनिक फेरबदल की शुरुआत कर दी है. 4 जुलाई को भाजपा ने चार राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों को बदलने की घोषणा की. इस बीच, भाजपा अपनी राष्ट्रीय और राज्य इकाइयों का पुनर्गठन कर रही है. तेलंगाना की कमान केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी को दी गई है, जहां इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं. आंध्र प्रदेश में पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव पुरंदेश्वरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है.
आंध्र प्रदेश में अगले साल मार्च-अप्रैल में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा के चुनाव भी होने हैं. रेड्डी और पुरंदेश्वरी को दिल्ली से अपने राज्यों में भेजने का सीधा संकेत है कि भाजपा उन प्रदेशों में विपक्ष को बेअसर करना चाहती है. झारखंड में 14 लोकसभा सीटें हैं और पूर्व मुख्यमंत्री मरांडी को इसलिए कमान दी गई है, ताकि वे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चुनौती देकर मुकाबला संथाली बनाम संथाली बना सकें.
भाजपा ने ईडी के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में सोरेन को घेरने की कोशिश की थी, लेकिन अब तक मुख्यमंत्री अपनी जमीन पर पकड़ बनाए हुए हैं और उनका कद भी बढ़ा है. वे अब विपक्ष की एका मुहिम के एक अहम नेता हैं. पंजाब में कांग्रेस के पूर्व नेता जाखड़ से पार्टी को उम्मीद है कि उनके जरिए राज्य के गांवों और छोटे शहरों में समर्थन हासिल करने में मदद मिलेगी. पूर्व कांग्रेसी जाखड़ अपनी पुरानी पार्टी से कुछ लोगों को भाजपा में ला सकते हैं. उनको प्रदेश भाजपा की कमान देकर पार्टी ने यह संकेत भी दे दिया है कि दूसरी पार्टी से भगवा खेमे में आने वाले नेताओं को सम्माजनक सांगठनिक पद भी दिया जा सकता है.
इसके अलावा, भाजपा ने उन राज्यों के चुनाव प्रभारियों की भी घोषणा की है जहां इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं. भूपेंद्र यादव को मध्य प्रदेश, प्रह्लाद जोशी को राजस्थान, ओमप्रकाश माथुर को छत्तीसगढ़ और प्रकाश जावडेकर को तेलंगाना का चुनाव प्रभारी बनाया गया है. यादव जिस राज्य में गए हैं वहां दूसरी पार्टियों के प्रमुख लोगों को भाजपा में लाने में सफल हुए हैं. मध्य प्रदेश में भी वे ऐसा ही कुछ कर सकते हैं.
आम चुनाव से पहले भाजपा के लिए सबसे बड़ी परीक्षा इस साल के अंत में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव हैं. हालांकि 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने तीनों राज्यों में बहुमत हासिल किया, लेकिन अगले साल हुए आम चुनाव में भाजपा ने इन राज्यों की 65 में से 61 लोकसभा सीटें जीत लीं. भाजपा नेताओं के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द छत्तीसगढ़ है. भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर तो है, लेकिन भाजपा के पास राज्य में चुनौती देने के लिए नेता नहीं हैं.
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज चौहान कुल मिलाकर करीब 18 वर्षों से सत्ता में हैं और उनसे मतदाताओं में ऊब पैदा हो रही है. लेकिन वे राज्य के सबसे चर्चित नेता और पार्टी का सबसे मजबूत ओबीसी चेहरा हैं. यही वजह है कि पार्टी अब तक उन्हें बदलने के बारे में सोच नहीं पाई है. मध्य प्रदेश में दूसरा मुद्दा यह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में शामिल हुए कांग्रेस विधायकों का पार्टी में मिलन सहज नहीं रहा है.
कहा जा रहा है कि सिंधिया को अपने गढ़ ग्वालियर-चंबल इलाके में चुनौती का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनके साथ आए कई नेता पुरानी पार्टी में लौट गए हैं. भूपेंद्र यादव मध्य प्रदेश में अपना कौशल दिखा सकते हैं. राजस्थान में कांग्रेस बैकफुट पर तो है, लेकिन भाजपा अभी भी नेतृत्व का मुद्दा सुलझा नहीं पाई है. वहां पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ताकतवर बनी हुई हैं. भाजपा कांग्रेस पार्टी को तोड़ने के अपने प्रयासों में भी नाकाम रही है. सचिन पायलट ने अभी तक दलबदल या खुद की पार्टी बनाने का फैसला नहीं किया.
छह चालें
बहरहाल, भाजपा चुनाव जीतने के लिए छह प्रमुख रणनीतियों पर जोर दे रही है. विपक्ष को राज्यों और केंद्र दोनों जगह कमजोर और भ्रष्ट के रूप में पेश करना पहली रणनीति है, जिसका मकसद उनका नैतिक मनोबल तोड़ना है. दूसरा, भाजपा का मुद्दा विकास है, जिसके तहत वह अपने विशाल संगठन की मदद से पिछले नौ वर्षों में मोदी सरकार की उपलब्धियों को लेकर 1.2 करोड़ परिवारों तक पहुंची है. इसके लिए 44 केंद्रीय मंत्रियों और पार्टी के शीर्ष नेताओं को भी काम पर लगाया गया है.
उसने सामाजिक योजनाओं के 45 करोड़ लाभार्थियों का डेटाबेस भी तैयार किया है और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के जरिए उनसे व्यक्तिगत संपर्क कर रही है. तीसरे, वह समर्थन बढ़ाने के लिए अति-राष्ट्रवाद के भरोसेमंद मुद्दे के आसरे है जैसा कि उसने 2019 में किया था. संजय कुमार मानते हैं कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के अलावा ''भाजपा का तुरुप का पत्ता’’ संसद में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का विधेयक पेश करना है. इससे बहुसंख्यकों का समर्थन मिलने की संभावना है क्योंकि इससे अल्पसंख्यकों में दरार पैदा होगी. विपक्ष इस मामले में बैकफुट पर आ सकता है.
यह सब उसके हिंदुत्व के चौथे प्रमुख मुद्दे से मेल खाता है. भाजपा जनवरी 2024 में अयोध्या में राम मंदिर के पहले चरण के उद्घाटन के साथ खुद को आस्था के रखवाले के रूप में पेश करेगी. पांचवां और शायद सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा खुद प्रधानमंत्री मोदी और उनकी भारी लोकप्रियता, जिसमें देश के वोटरों ने विश्वास जताया है. भाजपा की कोशिश होगी कि 2024 का चुनाव मोदी बनाम अन्य हो यानी राष्ट्रपति चुनाव के मोड में हो.
पार्टी अध्यक्ष नड्डा का मानना है कि दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार के प्रदर्शन ने देश को निकट भविष्य में एक विकसित देश बनने की रफ्तार तेज कर दी है. छठा मुद्दा मतदाताओं से यह वादा है कि करिश्माई मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार आजादी के 100 साल पूरे होने पर ''विकसित भारत’’ की दिशा में बढ़ रही है. अब तक के अपने सभी दांव-पेचों के दम पर भाजपा 2024 का आम चुनाव जीतने की स्थिति में दिख रही है.
—साथ में हिमांशु शेखर और ब्यूरो रिपोर्ट

