
साल 2022 के आखिर में देश का सबसे अमीर और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अमीर शख्स बनने पर गौतम अदाणी ने इन रैंकिंग को बेमतलब कहकर झटक दिया था. बंदरगाहों से बिजली तक अरबों डॉलर के विशालकाय समूह अदाणी ग्रुप के चेयरमैन ने इंडिया टुडे से कहा था, ''मुझे चुनौतियों से निपटने में रोमांच मिलता है—वे जितनी ज्यादा बड़ी होती हैं, मैं उतना ही ज्यादा खुश होता हूं.’’ अब अपने करियर की सबसे बड़ी चुनौती उनके सामने मुंह बाए खड़ी है और नतीजे अब तक तो पूरी तरह प्रतिकूल रहे हैं, उनके लिए और अहमदाबाद स्थित उस समूह के लिए भी, जिसे उन्होंने अकेले अपने दम पर खड़ा किया है.
अदाणी एंटरप्राइजेज अभी एफपीओ (फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर) की तैयारी कर ही रही थी कि 24 जनवरी को न्यूयॉर्क स्थित शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च अपनी सनसनीखेज रिपोर्ट लेकर आई, जिसमें शेयर बाजार में हेर-फेर और हिसाब-किताब में धोखाधड़ी सहित कई आरोप लगाए गए थे. समूह के शेयर धड़ाम से नीचे आ गिरे और देखते ही देखते एक हफ्ते के भीतर समूह की नौ कंपनियों में निवेशकों की 120 अरब डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपए) की संपदा स्वाहा हो गई.
शेयर बाजारों में सूचीबद्ध इन नौ कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 7 फरवरी को महज 9.8 लाख करोड़ रुपए रह गया, जो दो माह पहले उनके मूल्य से करीब आधा था. फोर्ब्स की सबसे अमीर लोगों की सूची में अदाणी 7 फरवरी को लुढ़ककर 17वीं पायदान पर पहुंच गए और भारत के सबसे अमीर शख्स का दर्जा गंवा बैठे.
अदाणी भले ही अपने शेयरों को फिलहाल और ज्यादा ढहने से बचाने में कामयाब रहे हों, लेकिन उससे पहले ही तेज गिरावट के चलते उनके समूह का भविष्य अपशगुन की छाया से घिर गया. साथ ही, वे एक जबरदस्त राजनैतिक विवाद के केंद्र में आ गए, जिसने 2024 के आम चुनाव से पहले मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया.
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की अगुआई में विपक्ष ने प्रधानमंत्री पर इस कारोबारी की तरफदारी करने का आरोप लगाया और संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से मामले की जांच करवाने की मांग की (देखें साथ की रिपोर्ट, कुछ धूल उड़ी, कुछ धुआं उठा). समूह में सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) और सरकार की मिल्कियत वाली सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआइसी) का जोखिम भी सवालों के घेरे में आ गया और विपक्ष ने सार्वजनिक धन की लूट का आरोप लगाया.
उधर, अपनी तरफ से प्रधानमंत्री ने संसद में अपनी भाषण कला की पूरी ताकत का इस्तेमाल किया और उस पर तीखा प्रहार किया जिसे उन्होंने भ्रष्टाचार और नाकारेपन का ''ईकोसिस्टम’’ कहा, जिसने 2004-2014 (कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए की हुकूमत के साल) को गंवाया हुआ दशक बना दिया. इसकी तुलना उन्होंने अपने कार्यकाल में की गई विकास की पहलों से की.
उन्होंने न तो अदाणी का कोई जिक्र किया और न ही जांच का कोई वादा. यानी यह साफ है कि अदाणी का झमेला जल्द खत्म होने वाला नहीं है. इसने अदाणी और उनके समूह को नुक्सान पहुंचाने के अलावा देश की वित्तीय स्थिरता और प्रधानमंत्री तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को होने वाले संभावित राजनैतिक नुक्सान को लेकर चिंताएं पैदा कर दी हैं.
अदाणी को कितना नुक्सान हुआ?
हिंडनबर्ग रिसर्च ने अपनी भारी-भरकम रिपोर्ट में अदाणी ग्रुप पर ''दशकों से शेयरों में खुल्लम-खुल्ला हेर-फेर और हिसाब-किताब में धोखाधड़ी’’ का आरोप लगाया. अमेरिकी फर्म, जिसका बड़े कॉर्पोरेट घरानों को ''शॉर्टिंग’’ करने का इतिहास रहा है, ने समूह से 88 सवाल पूछे थे.
आरोपों में यह भी शामिल था कि समूह ने अपने कृत्रिम रूप से बढ़ी हुई कीमत के शेयर कर्ज के लिए गिरवी रखे, जिसने इसे डांवाडोल वित्तीय स्थिति में डाल दिया, और आरोप लगाया कि वह फर्जी टर्नओवर पैदा करने और अपनी सात सूचीबद्ध कंपनियों से पैसा निकालने के लिए विदेशों में मुखौटा कंपनियों का इस्तेमाल कर रही थी, जिनमें से कई का काम गौतम के बड़े भाई विनोद अदाणी संभालते थे. समूह को ऐसे आरोपों का कोई अंदेशा नहीं था और जब तक वह संभलता, शेयर बाजारों में उसके शेयरों के दाम धड़धड़ाकर नीचे आ गिरे.


अदाणी समूह को 413 पन्नों का विस्तृत स्पष्टीकरण लेकर आने में दो दिन लगे, जिसमें कहा गया कि अदाणी पोर्टफोलियो की कंपनियां हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में उठाए गए 88 में से 65 सवालों के जवाबों का समय-समय पर पहले ही खुलासा कर चुकी हैं. बाकी 23 में से 18 सवाल सार्वजनिक शेयरधारकों और तीसरे पक्षों से जुड़े हैं, और उसने दावा किया कि पांच आरोप बेबुनियाद हैं.
उसने आरोपों को यह कहकर खारिज कर दिया कि वे ''झूठा नैरेटिव गढ़ने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में पहले से मौजूद मामलों की चुनिंदा और चालाक प्रस्तुति’’ हैं. अदाणी ग्रुप ने जोर देकर कहा कि उसने लागू होने वाले तमाम कानूनों और नियम-कायदों का पूरी तरह पालन किया है और वह ''तमाम उपयुक्त प्राधिकारियों के समक्ष अपने शेयरधारकों की हिफाजत के उपायों’’ की तलाश कर सकती है. उसने आरोपों को राष्ट्र पर हमला भी करार दिया. अदाणी की सफाई के जवाब में हिंडनबर्ग अपने आरोपों पर कायम रहा और उसने यहां तक ऐलान किया कि ''धोखाधड़ी को राष्ट्रवाद की आड़ में छिपाया नहीं जा सकता.’’
इस बीच, बताया जाता है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) और बाजार नियामक सेबी (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) मामले की छानबीन कर रहे हैं. अलबत्ता, निवेशकों को समूह की वित्तीय हालत के बारे में आश्वस्त करने में जितनी देरी होगी, उतनी ही वे बाजार में दहशतजदा बिकवाली के प्रति लाचार होंगे. यहां तक कि बीएसई और एनएसई ने अदाणी समूह की तीन कंपनियों—अदाणी एंटरप्राइजेज, अदाणी पोर्ट्स ऐंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन, और अंबुजा सीमेंट्स—को अपने अल्पकालिक एडिशनल सर्विलांस मेजर फ्रेमवर्क पर डाल दिया है.
रेटिंग एजेंसी एसऐंडपी ने अदाणी पोटर्स और अदाणी इलेक्ट्रिसिटी को लाल झंडी दिखाई. क्रेडिट सुइस की उधारी देने वाली शाखा ने अदाणी की कंपनियों की तरफ से जारी बॉन्ड को शून्य उधार मूल्य दिया, वहीं बताया जाता है कि सिटीग्रुप की संपदा निवेश शाखा नेमार्जिन लोन देने के बदले जमानत के तौर पर अदाणी ग्रुप की प्रतिभूतियों को स्वीकार करना बंद कर दिया है.
फ्रांसीसी कंपनी टोटल ने अदाणी के साथ अपना हाइड्रोजन उद्यम आरोपों से मुक्त होने तक रोक दिया. अदाणी को कुछ राहत फिच रेटिंग्स के बयान से मिली, जिसने फिच से जुड़ी अदाणी की संस्थाओं और उनकी प्रतिभूतियों की रेटिंग पर तत्काल कोई असर पड़ने की संभावना को खारिज कर दिया.
हालांकि नुक्सान से इनकार नहीं किया जा सकता. हिंडनबर्ग की रिपोर्ट अदाणी ग्रुप के एफपीओ से ठीक पहले आई, जिसके जरिए वे समूह के विस्तार और कर्ज का कुछ हिस्सा चुकाने के लिए बाजारों से 20,000 करोड़ रुपए उगाहना चाहते थे. मगर हिंडनबर्ग के आरोपों के चलते अदाणी एंटरप्राइजेज के शेयर जल्दी ही एफपीओ के आधार मूल्य से काफी नीचे लुढ़क गए थे, जबकि एफपीओ प्रति शेयर 3,112-3,276 रुपए के प्राइस बैंड में था.
एफपीओ खासकर अमीर लोगों की मदद के बूते हालांकि पूरा सब्सक्राइब हो गया, पर अदाणी ग्रुप ने इसे ''अपने सब्सक्राइबरों के हित में’’ 1 फरवरी को वापस ले लिया और कहा कि इसे आगे ले जाना ''नैतिक रूप से सही नहीं होगा.’’ हकीकत यही है कि उसके शेयरों की कीमत पहले ही गिरकर 15,00 रुपए प्रति शेयर पर आ गई और आगे और भी गिरावट के संकेत दे रही थी.
क्या भारत की वित्तीय स्थिरता दांव पर है?
मोदी सरकार के लिए तात्कालिक चिंता यही रही है कि अदाणी के शेयरों में गिरावट कहीं दूरगामी नतीजों के साथ देश की वृहद आर्थिक स्थिरता पर असरकारक और शेयर बाजारों में मंदी ला देने वाली तो साबित नहीं होगी. आखिरकार, अदाणी देश में निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बिजली उत्पादक हैं, बंदरगाहों और हवाई अड्डों के संचालन, उपभोक्ता गैस व्यवसाय और इलेक्ट्रिक ट्रांसमिशन क्षेत्र में भी उनकी कंपनियों की भागीदारी है.
इसके अलावा इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास और अक्षय ऊर्जा में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है. सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन क्षेत्रों में उनकी कंपनियों की बड़ी योजनाएं हैं, और बिजली से लेकर खाद्य तेल, खनन से लेकर डेटा केंद्रों तक दायरा बहुत बड़ा है. अदाणी का साम्राज्य ढहा तो अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ना लाजिमी है. हालांकि, वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी को पूरा भरोसा है कि अर्थव्यवस्था की वित्तीय स्थिरता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ने वाला.
वे कहते हैं, ''अदाणी की कंपनियों में निवेश करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों ने ऐसा कुछ दांव पर नहीं लगा रखा है कि शुरुआती झटकों से ही हिल जाएं. अदाणी कोई ऐसे कारोबारी भी नहीं हैं जो रातोरात छूमंतर हो जाएंगे, बल्कि ऐसी कंपनियों के मालिक हैं जिसके पास ठोस मूल्यवान संपत्तियां हैं, खासकर इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में. उन्होंने बतौर कोलैटरल (ऋण गारंटी) इन्हीं के आधार पर कर्ज लिया है. बेशक, टैक्स हेवन में ऑफशोर कंपनियों के जरिए निवेश के अलावा समूह के शेयरों की कीमतें बढ़ाने के लिए स्टॉक हेरफेर जैसे आरोपों पर गौर होना चाहिए.’’
अन्य विशेषज्ञ भी इसी तरह की राय रखते है. हिंडनबर्ग रिपोर्ट का बम फटने के दो दिन बाद, ग्लोबल ब्रोकरेज सीएलएसए ने अपनी 26 जनवरी की रिपोर्ट में कहा कि मार्च 2022 को समाप्त वित्तीय वर्ष में अदाणी समूह का सकल ऋण 2.2 लाख करोड़ रुपए था. इसमें कहा गया है कि बैंक ऋण (सावधि ऋण, कार्यशील पूंजी और अन्य सुविधाएं) समूह के कुल ऋण का सिर्फ 38 फीसद है, जबकि 37 फीसद बॉन्ड/वाणिज्यिक पत्र (सीपी) के जरिए जुटाया गया है.
अन्य 11 फीसद कर्ज वित्तीय संस्थानों से लिया गया है, और 12-13 फीसद अंतर-समूह ऋण है. रिपोर्ट में बताया गया है कि ''इसमें से निजी बैंकों का जोखिम ऋण समूह के कुल कर्ज के 10 फीसद से कम है और अधिकांश बैंकों ने संकेत दिए हैं कि उनके पास बड़े पैमाने पर मजबूत नकदी प्रवाह वाली वित्तपोषित संपत्तियां जैसे बंदरगाह/हवाई अड्डे आदि हैं. पीएसयू बैंकों के लिए भारी जोखिम (समूह के ऋण का 30 फीसद) तो है, लेकिन यह कर्ज पिछले तीन साल में बढ़ा नहीं है.’’

गौरतलब है, गौतम अदाणी ने पिछले दिसंबर में इंडिया टुडे से बातचीत में बताया था कि समूह भारतीय बैंकों से लिया गया अपना कर्ज घटा रहा है, नौ साल पहले 86 फीसद की तुलना में इसे घटाकर 32 फीसद कर दिया गया है. उन्होंने कहा था कि समूह का तकरीबन आधा कर्ज अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड के जरिए है और वे समय पर ही सब्सक्राइब होते. इससे कई मायने में उनके शेयरों की कीमतों में गिरावट से निवेशकों में घबराहट कम हुई है.
सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों, खासकर एलआइसी और एसबीआइ ने तत्काल यह स्पष्ट कर दिया कि अदाणी समूह के मामले में उनका जोखिम कुल उधार के 1 प्रतिशत से कम है और कोलैटरल आधार पर दिया गया है. एलआइसी ने 30 जनवरी को एक बयान जारी कर कहा कि अदाणी समूह में इक्विटी और ऋण के तहत उसकी हिस्सेदारी 35,917 करोड़ रुपए है, साथ ही साफ किया कि अदाणी की सभी ऋण प्रतिभूतियों की क्रेडिट रेटिंग में भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के निवेश नियमों का पूरी तरह पालन किया गया है.
वहीं, एसबीआइ ने बताया कि उसने 27,000 करोड़ रुपए का कर्ज दे रखा है. एसबीआइ के चेयरमैन दिनेश कुमार खारा ने बताया, ''हम जैसे बैंकों ने जो उधार दे रखा है, वह हमारी लोन बुक का बहुत ही छोटा हिस्सा है. यह सब जमीनी, नकदी प्रवाह वाली संपत्तियों के आधार पर दिया गया है और पूर्व में ऋण चुकाने में कोई चूक भी नहीं देखी गई है.’’
भारतीय म्युचुअल फंड उद्योग से जुड़े सूत्रों ने बताया कि उनका अदाणी के शेयरों में कोई निवेश नहीं है, यही वजह है कि अदाणी के शेयर धड़ाम होने से बड़ी संख्या में खुदरा निवेशकों पर कोई असर नहीं पड़ा. एक बड़े म्यूचुअल फंड के सीईओ कहते हैं, ''इसकी वजह यह है कि स्थानीय निवेशकों को अदाणी समूह पर भरोसा नहीं है. अधिकांश एसेट मैनेजमेंट कंपनियों का मानना है कि अदाणी के शेयरों को बढ़ा-चढ़ाकर आंका गया है.’’
इस बीच, आरबीआइ की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया कि उसके मौजूदा आकलन के मुताबिक, बैंकिंग क्षेत्र अप्रभावित और स्थिर बना हुआ है और उसने इस क्षेत्र पर लगातार नजर बना रखी है. अदाणी समूह का उल्लेख किए बिना बयान में कहा गया, ''पूंजी पर्याप्तता, संपत्ति की गुणवत्ता, नकदी प्रावधान, सुरक्षा और लाभप्रदता जैसे सभी मानक अच्छी स्थिति में हैं.’’
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा, ''हमारे मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल और हमारी अर्थव्यवस्था की छवि पर कोई असर नहीं पड़ा है. पिछले दो दिनों में हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में 8 अरब डॉलर की वृद्धि यही दर्शाती है कि भारत की क्षमताओं को लेकर अवधारणा में कोई बदलाव नहीं आया है.’’ उन्होंने यह भी कहा कि सेबी जैसे नियामक इस मामले में काम करेंगे, लेकिन इस बारे कोई विस्तृत ब्योरा नहीं दिया.
सेबी की तरफ से तत्काल कदम उठाना जरूरी क्यों
ज्यादातर विशेषज्ञों की राय है कि सेबी को आरोपों की जांच तेज करनी चाहिए और जल्द से जल्द अपने निष्कर्षों को सामने लाना चाहिए. सेबी के पूर्व चेयरमैन एम. दामोदरन कहते हैं कि जब स्टॉक की कीमतें आसमान छू रही थीं तभी सतर्क हो जाना चाहिए था. यह नियामक अक्सर शिकायतों के बाद कार्रवाई करता है और इसका काम धीमी गति से चलता है, स्वतंत्र निदेशकों को अपनी भूमिका अच्छी तरह निभानी चाहिए और सतर्कता बरतनी चाहिए. हिंडनबर्ग रिपोर्ट में कई ऐसे अहम बिंदु उठाए गए हैं जिन पर आरबीआइ, सेबी और अन्य नियामक एजेंसियों को ध्यान देना चाहिए.
हिंडनबर्ग का एक प्रमुख आरोप है कि अदाणी की कंपनियों ने जरूरत से ज्यादा ऋण ले लिया, जिससे समूह की आर्थिक स्थिति में अनिश्चितता आ गई. समूह के करीबी सूत्रों ने इस पर कुल कर्ज 2.4 लाख करोड़ रुपए बताया है. अगर 30,000 करोड़ रुपए का नकद भंडार घटा दें तो यह आंकड़ा करीब 2.1 लाख करोड़ रुपए होता है.
समूह का दावा है कि उसके पास 3.7 लाख करोड़ रुपए की सकल अचल संपत्ति है और सालाना इससे 60,000 करोड़ रुपए के करीब नकद एबिटडा (ब्याज, कर, मूल्यह्रास और परिशोधन से पहले की कमाई) हासिल होता है. इसका मतलब है कि शुद्ध ऋण और एबिटडा के बीच अनुपात (कंपनी की माली हालत का पैमाना) 3.2 गुना है, जो उद्योग का मानक बताया जाता है. इन्फ्रास्ट्रक्चर व्यवसाय आम तौर पर 70 फीसद ऋण और 30 फीसद इक्विटी पर चलता है, लेकिन स्रोत का कहना है कि अदाणी के पास 55 फीसद ऋण और 45 प्रतिशत इन्न्विटी है, जो इसे कम असुरक्षित बनाता है.
दूसरा आरोप है कि पिछले पांच साल में अदाणी के शेयरों के बाजार पूंजीकरण में अभूतपूर्व वृद्धि दिखी है और इसकी वजह है स्टॉक मूल्यों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जाना. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनेस में फाइनेंस के प्रोफेसर अश्वत्थ दामोदरन जैसे विशेषज्ञों ने यह पता लगाने की कोशिश की कि कुछ ही साल में अदाणी समूह की किस्मत इतनी कैसे पलट गई. 2023 की शुरुआत में एम-कैप के संदर्भ में अदाणी की चार कंपनियां—अदाणी एंटरप्राइजेज, अदाणी टोटल गैस, अदाणी ग्रीन एनर्जी और अदाणी ट्रांसमिशन—शीर्ष 20 में शामिल थीं.
वे अदाणी के अधिक पारिवारिक नियंत्रण की ओर भी ध्यान आकृष्ट करते हैं. सेबी का आदेश है कि प्रवर्तकों की अधिकतम शेयरधारिता 75 फीसद से अधिक नहीं होनी चाहिए, शेष सार्वजनिक शेयरधारिता बनी रहनी चाहिए. हालांकि, नवंबर, 2022 तक समूह संरचना को देखें तो प्रमोटरों के पास अदाणी एंटरप्राइजेज में 72.6 प्रतिशत, अदाणी पावर में 75 प्रतिशत और अदाणी ट्रांसमिशन में 73.9 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, यानी इन सभी में सेबी की तरफ से तय अधिकतम सीमा के करीब थी.
बाजार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह न केवल कारोबार पर परिवार के अत्यधिक नियंत्रण को दर्शाता है, बल्कि नियामकों और निवेशकों के जरा भी चूकने पर शेयरों की कीमतें बढ़ा दिए जाने की गुंजाइश पैदा करता है. 9 फरवरी को, मॉर्गन स्टेनली कैपिटल इंटरनेशनल ने कहा कि अदाणी समूह की प्रतिभूतियों में कुछ निवेशकों के पास अब फ्री क्रलोट (जिन शेयरों का सार्वजनिक कारोबार किया जा सके) का दर्जा नहीं रहना चाहिए, और यह अदाणी समूह के शेयरों पर और दबाव बढ़ाते हुए स्थिति की समीक्षा कर रहा है.
हिंडनबर्ग के सबसे गंभीर आरोप शेल कंपनियों, स्टॉक हेरफेर और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े है. (देखें: 'मुखौटा कंपनियों’ का तहलका) रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि अदाणी के पास मॉरिशस से चल रही शेल कंपनियों का एक समूह है, जिनका उपयोग शेयर खरीदने के लिए किया जाता है और इस तरह समूह में प्रमोटरों का अधिक नियंत्रण बना रहता है. अश्वत्थ दामोदरन कहते हैं, ''ऐसी गुंजाइश कम ही है कि हिंडनबर्ग ने शेल कंपनियों के संजाल का आरोप हवा में ही लगा दिया होगा.
मॉरिशस में 6,300 कंपनियां हैं. यह ऐसी जगह है जहां अदाणी समेत कई भारतीय कारोबार करते हैं. भारत सरकार ऐसी कंपनियों पर नकेल कसने की कोशिश कर रही है.’’ अदाणी समूह इससे इनकार करता है कि उसने मॉरिशस कनेक्शन का दुरुपयोग किया है. समूह का दावा है कि उसका हर लेनदेन साफ-सुथरा है और मौजूदा कानूनों के अनुरूप ही है.
रिपोर्ट का दूसरा सबसे गंभीर खुलासा अदाणी एंटरप्राइजेज के मूल्य और कमाई यानी पी/ई अनुपात से संबंधित है, जो 2016-21 में सिर्फ 15 गुना से बढ़कर पिछले दो वर्षों में 214 गुना हो गया है. पी/ई अनुपात मौजूदा शेयर मूल्य और प्रति शेयर कमाई के आधार पर कंपनी की मौजूदा हैसियत को आंकने का तरीका है.
इससे यह अंदाजा लगता है कि कोई भी प्रमोटर अपनी कंपनी के शेयर अधिक कीमत पर क्यों चाहेगा. बेहतर मूल्यांकन से कंपनियों के लिए फंड जुटाना आसान हो जाता है. शेयरों में इस तरह उच्च मूल्यांकन अस्थिर बाजारों की पहचान है और पिछले एक दशक में टेक कंपनियों के मामले में ऐसा देखा गया है, दामोदरन बुनियादी ढांचा क्षेत्र में ऐसा होने को लेकर हैरानी जताते हैं.
इसके पीछे उनका तर्क है कि आम तौर पर बुनियादी ढांचा क्षेत्र की कंपनियों को मुनाफा लंबी अवधि में होता है, और उन्हें निवेश पर लाभ कुछ अन्य व्यवसायों की तुलना में अपेक्षाकृत कम मिलता है. दामोदरन यह भी पता लगाते हैं कि मार्च, 2021 से सितंबर, 2022 के बीच अदाणी की कंपनियों ने वास्तव में कितनी बड़ी छलांग लगाई. भारी निवेश के बावजूद अदाणी एंटरप्राइजेज का अपनी पूंजी पर रिटर्न 2002-2015 में 14.69 फीसद के उच्च स्तर से घटकर 2021-22 में 3.18 फीसद हो गया.
दामोदरन का मानना है कि अदाणी एंटरप्राइजेज के स्टॉक में 40 फीसद से अधिक 'डाउनसाइड’ (यानी शेयर मूल्य 40 फीसद कम होना) है, और कीमत 945 रुपए प्रति शेयर होनी चाहिए. यह एफपीओ प्राइस बैंड से काफी नीचे है. समूह पी/ई अनुपात में हेरफेर के किसी भी आरोप को निराधार करार देता है. उसका यह भी कहना है कि दामोदरन जैसे विशेषज्ञ समूह की मजबूत वृद्धि पर ध्यान नहीं दे रहे, जो शेयरों की उच्च कीमतों का मुख्य कारण रहा है.
दामोदरन कहते हैं, ''अदाणी के शेयरों के दाम गिरने के लिए जो तत्व जिम्मेदार हैं उनमें नियंत्रण को बेचैन महत्वाकांक्षी परिवार समूह, बुनियादी वित्तीय बातों से ज्यादा ट्रेडिंग को तवज्जो देने वाला वित्त बाजार और सरकार और नियामकों के अपने-अपने पैमाने वाला पूंजी बाजार (ऋण और इक्विटी) शामिल हैं. कई भारतीय कंपनियां इसी आधार पर चलती हैं और यही सबसे कमजोर कड़ी है.’’
क्या असर थोड़े ही समय के लिए होगा?
गौतम अदाणी पहले भी कई मुश्किलें झेल चुके हैं. किसी योद्धा की तरह वे हर संकट को एक अवसर के तौर पर देखते हैं. कारोबार में सबसे बुरे दौर से गुजर रहे अदाणी ने शेयरों के दाम सुधारने के लिए आनन-फानन चार चरण की रणनीति तैयार की और समूह को फिर उच्च वृद्धि की राह पर ला दिया. 6 फरवरी को निवेशक समुदाय का भरोसा बहाल करने के लिए अदाणी समूह की कंपनियों के प्रमोटरों ने अदाणी पोर्ट्स ऐंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन, अदाणी ग्रीन एनर्जी और अदाणी ट्रांसमिशन के कुछ गिरवी रखे शेयर समय से पहले छुड़ाने के लिए 1.114 अरब डॉलर (लगभग 9,217 करोड़ रुपए) का भुगतान किया.
समूह ने कहा कि यह कदम ''बाजार में जारी भारी उतार-चढ़ाव और अदाणी की सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में प्रोमोटर लीवरेज घटाने की प्रोमोटरों की प्रतिबद्धता के मद्देनजर उठाया गया.’’ इस कदम के नतीजे भी तुरंत सामने आ गए. 7 फरवरी को, अदाणी समूह की अधिकांश कंपनियों के शेयरों में तेज उछाल दिखा, अदाणी एंटरप्राइजेज बीएसई में 14.63 प्रतिशत बढ़त के साथ 1,802.50 रुपए पर बंद हुआ. अगले दिन, स्टॉक इससे भी ऊपर चढ़कर 2,158.65 रुपए पर बंद हुआ.
अदाणी समूह के करीबी सूत्रों का कहना है कि गिरवी रखे शेयरों को छुड़ाना घबराहट में बिकवाली रोकने और यह बताने के लिए था कि समूह के पास नकदी की कोई कमी नहीं है. संकट से उबरने की दिशा में समूह की रणनीति का यह पहला चरण था. शेयर बाजार विशेषज्ञ अरुण केजरीवाल कहते हैं कि गिरवी शेयर वापस लेना इसका मजबूत संकेत है कि प्रमोटरों को पैसों की सख्त जरूरत नहीं है. वे कहते हैं, ''बड़े भूकंप के बाद भी छोटे-छोटे झटके आते रहते हैं. आपको ये झटके बंद होने का इंतजार करना होगा. अदाणी की कंपनियों के साथ भी यही होगा. बाजार अपना रास्ता खोज लेगा और स्थिर हो जाएगा.’’
अगले दो महीने अदाणी के लिए बेहद अहम होंगे. उन्हें वित्त पोषण के मोर्चे पर सबसे बड़ी चुनौती झेलनी होगी. विशेषज्ञों को लगता है कि उनके लिए समूह के मौजूदा ऋणों को पुनर्निर्धारित करना, साथ ही बैंकों और पूंजी बाजार से नया वित्त जुटाना मुश्किल हो सकता है. इस सब में दोनों पक्षों के लिए साख और भरोसा बहुत मायने रखता है, और इसी पर संदेह के बादल छा गए हैं. इन्फ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ विनायक चटर्जी कहते हैं, ''अदाणी के पास मजबूत नकदी भंडार है. पेशेवर प्रबंधकों की अच्छी टोली है, अच्छे नकदी प्रवाह के साथ चल रही ठोस परियोजनाएं हैं. एक साल तक भले कारोबार मंदा रहे लेकिन फिर कंपनी उछाल मारेगी.’’
समूह अपनी रणनीति के दूसरे चरण में बैंकों के साथ मिलकर काम करेगा. समूह के साथ प्रमुखता से जुड़े बैंकों ने शेयरधारक ऋणों के संदर्भ में तरलता बढ़ानी पहले ही शुरू कर दी है. इससे अदाणी पोर्टफोलियो के शेयर मूल्यों को लेकर अस्थिरता का खतरा घट गया है. समूह छह माह से लेकर 10 साल तक की दीर्घकालिक रणनीति के तहत अपनी पूंजीगत व्यय योजना और क्रेडिट प्रोफाइल भी लाएगा. इस बीच, उसने 10 रेटिंग एजेंसियों—तीन विदेशी और दो भारतीय—से संपर्क साधना भी शुरू कर दिया है, और उन्होंने कंपनी की क्रेडिट प्रोफाइल पर संतोष जताया है.
तीसरे चरण में, समूह कुछ और कदम उठाने की योजना बना रहा है, जिन्हें बॉन्डधारकों को ध्यान में रखकर ही बाजार में जाहिर किया जाएगा, क्योंकि निवेशक अब और ज्यादा कड़ाई से परखेंगे. कंपनी के अधिकारी पहले से ही बॉन्डधारकों से सीधे बात कर रहे हैं. अगले 12 महीनों में पूंजीगत खर्च धीमा रहेगा. समूह की कंपनियों के तिमाही नतीजों के आधार पर निवेशकों का भरोसा बहाल करने पर ध्यान होगा. चौथे चरण में, समूह अपने व्यवसायों को जोखिम मुक्त करने की योजना बना रहा है.
अदाणी कहते हैं कि वे जन्मजात आशावादी हैं और समूह यह तूफान झेल लेने के प्रति आश्वस्त लगता है. बेशक, यह कई फैक्टर पर निर्भर है, जिसमें भारतीय नियामकों की तरफ से उन्हें सभी आरोपों में क्लीनचिट देना भी शामिल है. बहरहाल, इस पूरे प्रकरण से भारत की वित्तीय साख पर चोट जरूर पहुंची है.
अगर सेबी प्रहरी की भूमिका में जरा भी कमजोर दिखा तो मोदी सरकार के लिए राजनैतिक नतीजे गंभीर हो सकते हैं, क्योंकि विपक्ष आरोप लगाएगा कि वह कारोबारियों का पक्ष लेती है. सरकार को यह दर्शाना होगा कि देश में वित्तीय लेनदेन वैध और पारदर्शी तरीके से होते हैं और नियामकों को भी सतर्कता कड़ी करनी होगा ताकि भारत के दावों में सही मायने में दम नजर आए.
'मुखौटा कंपनियों’ का तहलका
हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि गौतम अदाणी के बड़े भाई विनोद अदाणी ने अपने करीबी सहयोगियों के साथ मिलकर विदेशों में स्थित मुखौटा कंपनियों का पूरा एक जाल बना रखा है, जिनमें 38 की पहचान की गई है. इसने अदाणी समूह से इन कंपनियों और संबंधित पक्षों के साथ लेनदेन पर कई सवाल किए हैं. हिंडनबर्ग के कुछ प्रमुख आरोप और उस पर अदाणी के जवाब:
आरोप: विनोद अदाणी की कंपनियों से जुड़ी 13 वेबसाइटें यह दिखाने की कोशिश में लगी थीं कि वे चालू अवस्था में हैं. इसमें से कई वेबसाइट एक ही दिन शुरू हुईं और उन्होंने 'विदेश में खपत’ और 'कमर्शियल मौजूदगी’ जैसी फिजूल की सेवाओं के संबंध में एक-सी जानकारी सूचीबद्ध की.
जवाब: विनोद अदाणी के पास अदाणी समूह की किसी भी सूचीबद्ध कंपनी या दूसरी इकाइयों में कोई प्रबंधकीय पद नहीं है और रोजमर्रा के मामलों में उनकी कोई भूमिका नहीं. अदाणी पोर्टफोलियो की कंपनियों की तरफ से किसी भी संबंधित पक्ष के साथ किसी भी तरह के लेनदेन के बारे में पूरा ब्योरा सामने रखा गया है, इसमें भारतीय कानूनों को ध्यान में रखकर सभी नियम-कायदों का पालन किया गया है.
आरोप: अदाणी का कॉर्पोरेट ढांचा आपस में जुड़ा हुआ और काफी जटिल है. समूह की सात प्रमुख लिस्टेड कंपनियां और इनकी 578 सहायक कंपनियां हैं. बीएसई का ब्योरा बताता है कि अकेले वित्त वर्ष 22 में ही समूह संबंधित पक्षों के साथ अलग-अलग 6,025 लेनदेन में शामिल रहा.
जवाब: भारत के साथ-साथ
कई जगहों पर इन्फ्रास्ट्रक्चर बिजनेस के लिए कंपनियों को आम तौर पर एक खास प्रोजेक्ट फाइनेंस स्ट्रक्चर के दायरे में काम करना पड़ता है, जिसमें हर प्रोजेक्ट के लिए एक अलग कंपनी होती है और विशिष्ट प्रोजेक्ट एसेट्स के आधार पर फाइनेंस जुटाया जाता है. यह संरचना बैंकों और वित्तीय संस्थानों को भी पसंद आती है क्योंकि यह दिवालिया होने के खतरे को घटाती है.
आरोप: हाल ही सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी से पता चलता है कि सेबी अदाणी के विदेशी फंड स्टॉक स्वामित्व की जांच कर रहा है.
जवाब: 14 जून, 2021 को बीएसई और एनएसई को लिखे पत्र में अदाणी ने स्पष्ट कर दिया था कि मीडिया रिपोर्ट 'पूरी तरह गलत‘ है और यह बात 'निवेशक समुदाय को जानबूझकर गुमराह करने के लिए फैलाई गई’ है, जिसके मुताबिक कथित तौर पर नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी ने अदाणी समूह की शेयरधारक तीन विदेशी फंडिंग कंपनियों—अल्बुला इन्वेस्टमेंट फंड, क्रेस्टा फंड और एपीएमएस इनवेस्टमेंट फंड—के खातों को फ्रीज कर दिया है. अदाणी ग्रुप ने बताया कि उन्हें रजिस्ट्रार और ट्रांसफर एजेंट की तरफ से लिखित तौर पर दी गई पुष्ट जानकारी में साफ तौर पर बताया गया है कि कंपनी के शेयर जिन डीमैट खातों से जुड़े हैं, उन्हें फ्रीज नहीं किया गया है.
आरोप: मॉरिशस स्थित एपीएमएस इन्वेस्टमेंट फंड, क्रेस्टा फंड, एलटीएस इनवेस्टमेंट फंड, इलारा इंडिया ऑपर्चुनिटीज फंड और ओपल इन्वेस्टमेंट्स वगैरह जैसी कंपनियां सामूहिक रूप से और एक विशेष ढंग से अदाणी की सूचीबद्ध कंपनियों में शेयर भागीदारी रखती हैं, जो कुल मिलाकर लगभग 8 अरब डॉलर (66,139 करोड़ रुपए) है. यह स्पष्ट नहीं है कि अदाणी की कंपनियों में उनके निवेश किए धन का मूल स्रोत क्या है.
जवाब: यह सवाल जिन इकाइयों से जुड़ा है, वे सभी अदाणी पोर्टफोलियो में सूचीबद्ध कंपनियों की सार्वजनिक शेयरधारक हैं. किसी सूचीबद्ध कंपनी का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होता कि सार्वजनिक ट्रेडिंग में शामिल शेयरों को कौन खरीद/बेच रहा या उस पर किसका स्वामित्व है या इसके जरिए कोई कितना कारोबार कर रहा है. न तो उसे यह पता होता है कि सार्वजनिक शेयरधारकों के धन का स्रोत क्या है और न ही भारतीय कानूनों के तहत उसके लिए अपने सार्वजनिक शेयरधारकों के लिए ऐसी कोई जानकारी रखना आवश्यक ही है.
आरोप: 2019 में अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (एजीईएल) की तरफ से दो शेयर बिक्री प्रस्ताव (ओएफएस) लाए गए जो यह पक्का करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे कि इसके सार्वजनिक शेयरधारक 25 प्रतिशत लिस्टिंग सीमा की अनिवार्यता से ऊपर हों. इन ओएफएस के जरिए कुछ हिस्सा ऑफशोर कंपनियों को भी बेचा गया जिसमें मॉरिशस और साइप्रस की इकाइयां भी शामिल हैं.
जवाब: भारतीय कानूनों के तहत सभी सूचीबद्ध संस्थाओं के लिए न्यूनतम 25 प्रतिशत सार्वजनिक शेयरधारिता आवश्यक है. चूंकि एजीईएल के शेयर जून 2018 में एईएल से अलग होने के बाद सूचीबद्ध हुए थे, इसलिए एजीईएल को लिस्टिंग की तारीख से 12 महीने के भीतर विनियम 38 (न्यूनतम शेयरधारिता संबंधी) के प्रावधानों का पालन करना आवश्यक था. ओएफएस स्टॉक एक्सचेंज प्लेटफॉर्म के जरिए शेयर बेचने की एक प्रक्रिया है जिसमें नियमित तौर पर एक स्वनियंत्रित ऑर्डर बुक मैचिंग प्रक्रिया अपनाई जाती है.
आरोप: मॉरिशस की एक गोपनीय कंपनी ग्रोमोर ट्रेड ऐंड इनवेस्टमेंट ने अदाणी पावर के साथ स्टॉक विलय के माध्यम से रातोरात 42.3 करोड़ डॉलर (3,497 करोड़ रुपए) का लाभ कमाया. अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, ग्रोमोर का नियंत्रण चांग चुंग-लिंग नामक एक व्यक्ति के हाथ में है और उसका आवासीय पता वही है जो विनोद अदाणी का है. डीआरआइ की तरफ से लगाए गए धोखाधड़ी के आरोपों में उसे एक प्रमुख मध्यस्थ इकाई का निदेशक बताया गया है, जिसका इस्तेमाल अदाणी एंटरप्राइजेज से धन निकालने में किया गया.
जवाब: रिपोर्ट में जिस स्टॉक विलय का जिक्र किया जा रहा है, उसमें कंपनी अधिनियम और सेबी के नियमों के साथ-साथ सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का उचित ढंग से पालन किया गया था. स्टॉक विलय के मूल्यांकन में प्रतिष्ठित, स्वतंत्र तृतीय-पक्ष के मूल्यांकनकर्ताओं को शामिल किया गया था—अर्न्स्ट ऐंड यंग ने आइसीआइसीआइ सिक्योरिटीज की निष्पक्ष राय के साथ मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की थी.

