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डार्क मोड

दिल्ली में भी डबल इंजन

आम आदमी पार्टी ने भाजपा को पहली बार किसी सीधी चुनावी लड़ाई में शिकस्त देकर दिल्ली नगर निगम पर अपना परचम लहराया.

बल्ले बल्ले :एमसीडी चुनाव में बहुमत पाने के बाद आप मुख्यालय में आप प्रमुख केजरीवाल (बीचोबीच) और भगवंत मान
बल्ले बल्ले :एमसीडी चुनाव में बहुमत पाने के बाद आप मुख्यालय में आप प्रमुख केजरीवाल (बीचोबीच) और भगवंत मान
अपडेटेड 13 दिसंबर , 2022

अक्षरधाम मंदिर के पास बने कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज के मतगणना केंद्र की गहमागहमी 7 दिसंबर को करीब साढ़े बारह बजे तक खत्म हो गई और दिल्ली नगर निगम चुनाव (एमसीडी) जीत चुके आम आदमी पार्टी (आप) के पार्षदों का मजमा दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित पार्टी मुख्यालय पर लगने लगा.

पूरा रास्ता नीले-पीले गुब्बारों से अटा हुआ था, जो कि आप के नए झंडे के  रंग भी हैं. एक महिला पार्षद का पैर जमीन पर पड़े मीडिया के कैमरों के तारों में उलझा और लोगों ने उन्हें संभाल लिया. उन्हें चोट नहीं लगी, लेकिन चुनाव के नतीजों की चोट आप दफ्तर से चंद कदम की दूरी पर स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय और भाजपा मुख्यालय के नजारों में महसूस की जा सकती थी.

प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर में लगभग सन्नाटा पसरा था और भाजपा मुख्यालय में कारें आ-जा रही थीं, दिल्ली भाजपा दफ्तर में जोश कम था. आप दफ्तर की छत पर चढ़कर उद्घोषक भीड़ से मुख्यमंत्री केजरीवाल की अगवानी के वास्ते रास्ता खाली करने की अपील कर रहा था. करीब ढाई बजे काले रंग की चमचमाती मौरिस गराज (एमजी) ग्लोस्टर भीड़ को चीरती हुई भीतर आती है और केजरीवाल के उतरते ही ''मेरा रंग दे बसंती चोला’’ गाना बजने लगता है.

इसके बाद बारी-बारी से नेता विजयी भाषण शुरू करते हैं और ''भारत माता की जय’’, ''इंकलाब जिंदाबाद’’ जैसे जयघोष करते हैं. बाहर दूर खड़ा एक ऑटोवाला भी जिंदाबाद चिल्लाने लगता है, जो केजरीवाल के राजनीतिक असर और उनकी राजनीतिक सफलता को समझाने के लिए पर्याप्त है.

भाजपा को दिल्ली में आप की ताकत और अपनी कमजोरी का एहसास पहले से था. भाजपा ने इन नतीजों को इस साल अप्रैल में ही भांपते हुए दिल्ली के तीन नगर निगमों को मिलाकर एक कर दिया और हजारों कालोनियों को नियमित करने का ऐलान भी किया. पुनर्गठित निगम में ढाई सौ सीटें हैं और इनमें से 134 सीटें आप के कब्जे में आईं, जिसे एकतरफा जीत नहीं कहा जा सकता.

भाजपा को 104 सीटें पाकर विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला जिसे, एकतरफा हार भी नहीं कहा जा सकता. लेकिन हार तो हार होती है. नेताओं और पार्टियों ने सुविधानुसार इसकी व्याख्या भी की है. दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर कहते हैं, ''देखिए, हम जनता के फैसले को स्वीकार करते हैं. दिल्ली की जनता ने हमें मजबूत विपक्ष की तरह चुना है.

जनता ने सरकार के पांच बड़े चेहरों (मनीष सिसोदिया, सतेंद्र जैन, कैलाश गहलोत, आतिशी, गोपाल राय) को नकार दिया है. इनकी अपनी विधानसभाओं के नतीजे जीरो हैं.’’ आप नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा इस पर ऐतराज जताते हैं, ''आप को बहुमत मिला है, जिसे विधानसभा स्तर पर उतरकर विश्लेषण करने का प्रयास हो रहा है. तो फिर भाजपा सांसदों का रिकॉर्ड उठाकर देखिए, जहां वे लोग बहुत सारे वार्ड हार गए हैं.’’

चड्ढा ने आज तक चैनल से बातचीत में कहा, ''जनता ने हमें बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है. जनता ने सीधा संदेश दिया है कि हम काम करने वालों को वोट देते हैं, बदनाम करने वालों को नहीं. भाजपा ने भ्रष्टाचार के झूठे आरोपों पर चुनाव लड़ा, हमने बिजली, पानी, अस्पताल और सफाई के मुद्दों पर लड़ा.’’ अब सवाल यह उठता है कि क्या इन्हीं मुद्दों पर आप ने एमसीडी चुनाव जीत लिया?

इसका जवाब नेताओं के वेल्फेयर मॉडल यानी लोक कल्याण के ढांचे में छिपा है. हर नेता और पार्टी, चाहे नरेंद्र मोदी हों, अरविंद केजरीवाल हों या तेलंगाना में टीआरएस नेता के. चंद्रशेखर राव, सबका अपना-अपना वेल्फेयर मॉडल है और उसके चाहने वाले हैं.राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ''केजरीवाल के वेल्फेयर मॉडल के आइने में इनकी हार-जीत का आकलन हो सकता है.

यही एमसीडी में जीत की ठोस वजह भी नजर आता है. सस्ती बिजली, मुफ्त पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा पर जोर महानगरों की जनता को पसंद आया है. पंजाब के लोगों को भी यह पसंद आया. मोदी के लाभार्थी अलग तरह के हैं.’’ दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा भी यही कहते हैं.

कांग्रेस के प्रदर्शन पर उन्होंने कहा, ''ये लोग जो फ्री की रेवड़ियां बांट रहे हैं, चुनाव नतीजों पर उसका असर हुआ है. जब हमारी सरकार थी, तो हमने गरीबों से कभी बिजली-पानी का पैसा नहीं लेते थे, लेकिन इन्होंने मीडिया में इसका खूब प्रचार किया.’’

चुनावी रणनीति के लिहाज से भी एमसीडी चुनाव गौर करने लायक है. आप कहती है कि दिल्ली में इस छोटे-से चुनाव को भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर का बना दिया. भाजपा के सात मुख्यमंत्रियों, 17 केंद्रीय मंत्रियों और सौ से ज्यादा सांसदों ने प्रचार किया. पार्टियां तो अपने-अपने हिसाब से प्रचार की रणनीति बनाने के लिए स्वतंत्र हैं.

पर दुबे की राय में, भाजपा को बुरी तरह चुनाव हारने का अंदेशा था. ''लेकिन वह हार के असर को कम करने के अपने मकसद में कामयाब रही. इसके लिए निगमों का एकीकरण किया, इसके बाद वार्डों का परिसीमन भी किया, आप के कई नेताओं को जेल में डाला, चुनाव में देर की.

फिर भी आप से पार न पा सकी. भाजपा ने जो रणनीति अपनाई वह अध्ययन का विषय है कि हार को कैसे नरम कर सकते हैं और मौका पड़े तो जीत भी सकते हैं. इस लिहाज से आप को मिलीं 134 सीटें भी बहुत अधिक हैं.’’

वैसे 2020 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले आप के वोट शेयर में 11 फीसदी की कमी दिखी है और भाजपा इसे आप की घटती लोकप्रियता बता रही है. कपूर कहते हैं, ''2020 के चुनाव के लिहाज से देखा जाए, तो उस वक्त आप ने 220 वार्ड जीते थे इसलिए अब उसकी सीटें काफी घटी हैं.’’ लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि दो चुनावों के वोट प्रतिशत की तुलना बेमानी है.

निकाय चुनावों में ध्रुवीकरण कम होता है जबकि बड़े चुनाव में ज्यादा होता है. लेकिन भाजपा की समस्या वोट प्रतिशत का एक सीमा के बाद न बढ़ना है, इसी वजह से भगवा पार्टी लगातार छह विधानसभा चुनाव दिल्ली में हार चुकी है. दुबे इसकी दिलचस्प वजह गिनाते हैं, ''यूपी-बिहार के लोगों का दिल्ली की राजनीति में दबदबा बढ़ा है और इसको भाजपा ठीक से संबोधित नहीं कर पाई है. उसे पंजाबी, बनियों और पुराने लोगों की पार्टी माना जाता है. और इस काम में केजरीवाल काफी आगे निकल गए.’’

इस बीच कुछ भाजपा नेताओं की ओर से ''भाजपा का मेयर बनेगा’’ जैसे बयान आने पर भी बहस शुरू हो गई. कहा गया कि निगम चुनाव में दलबदल कानून और व्हिप लागू न होने की वजह से कुछ खेल होगा. लेकिन भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने अपनी टिप्पणियों में इसे रुझानों के वक्त का बयान करार दिया और कहा, ''जो जीता वही सिकंदर.

हम मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएंगे.’’ दिल्ली में सांसदों को भी मेयर चुनाव में वोट देने का अधिकार है. यानी भाजपा की सीटों में 7 और जोड़ लीजिए. फिर भी बात कहां बनने वाली! चड्ढा कहते हैं कि मेयर उसी पार्टी का बनेगा जिसे जनता ने आशीर्वाद दिया है.

एमसीडी में कांग्रेस के 9 में से 7 मुसलमान प्रत्याशी जीते हैं. कहा जा रहा है कि यह अल्पसंख्यक वोटों का कांग्रेस के प्रति बढ़ता रुझान है. कांग्रेसियों की राय में, अल्पसंख्यक समझ गए हैं कि आप का अल्पसंख्यकों से कोई लगाव नहीं है. इस पर आप नेता स्पष्ट करते हैं कि हर नतीजे को धर्म के चश्मे से नहीं देखा जा सकता.

हम ऐसी 90 सीटें गिना सकते हैं जहां धार्मिक अल्पसंख्यक हमारे साथ रहे. चोपड़ा कहते हैं कि वैसे ''कांग्रेस को सभी वर्गों ने वोट दिए हैं. जितना आप का वोट शेयर कम हो रहा है उतना कांग्रेस को फायदा हो रहा है. हमारा वोट शेयर बढ़ा है. आने वाला समय कांग्रेस का है.’’

जल्द ही मेयर का चुनाव होगा और इसके बाद ''एमसीडी में भी केजरीवाल’’ की अग्निपरीक्षा होने वाली है. आप को अभी यह नहीं मालूम कि एमसीडी के नौकरशाह उनका कितना सहयोग करेंगे. इसके अलावा गाजीपुर, ओखला और भलस्वा जैसे कूड़े के पहाड़ एमसीडी की नई स्थानीय सरकार का इम्तिहान लेने को पहले से तैयार हैं. अब गाजीपुर, ओखला और भलस्वा में कूड़े के पहाड़ एमसीडी की नई स्थानीय सरकार का इम्तिहान लेने को पहले से तैयार हैं.

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