
मैं दुर्लभ कश्यप की तरह मशहूर होना चाहता था...’’ 19 साल के शिव प्रसाद धुर्वे ने पुलिस पूछताछ के दौरान जब यह बात कही तो कई पुलिस अधिकारी भी चौंक गए. 19 साल के इस नौजवान ने मशहूर होने के लिए चार सिलसिलेवार हत्याओं को अंजाम दिया. 60 साल के शंभूनारायण दुबे धुर्वे के पहले शिकार बने. अगस्त की 30 तारीख को अलस्सुबह मध्य प्रदेश के सागर के आट्र्स ऐंड कॉमर्स कॉलेज के चौकीदार शम्भू नारायण दुबे का शव उनकी तैनाती वाली जगह पर पाया गया. 60 साल के शम्भू उस दिन नाइट ड्यूटी पर थे.
किसी ने उनका सिर कुचलकर हत्या कर दी थी. स्थानीय पुलिस के लिए यह बर्बर हत्या का एक मामला होता. लेकिन सागर में इससे ठीक एक दिन पहले हुई एक हत्या ने इस केस की तहकीकात का रुख बदल दिया था. शम्भू की हत्या से एक दिन पहले 57 साल के कल्याण लोधी की भी हत्या इसी तरह से हुई थी. लोधी सागर छावनी के इलाके में एक फैक्टरी के चौकीदार थे. शम्भू की लाश के पास से बरामद हुआ कल्याण लोधी का फोन इन दोनों हत्याओं के बीच संबंध स्थापित करने के लिए पहली लेकिन काफी मजबूत कड़ी था. लेकिन ये हत्याएं यहीं नहीं रुकी.
30 अगस्त को ही सागर में मंगल अहिरवार नाम के शख्स को भी सिर कुचल कर मार डाला गया. अहिरवार एक निर्माणाधीन इमारत के चौकीदार थे. हत्यारे ने उनका सिर फावड़े से कुचल दिया था. इन हत्याओं की प्रारंभिक जांच से यह जाहिर हो चुका था कि इनके पीछे कोई एक ही व्यक्ति है. इसके बाद हरकत में आए प्रशासन ने इस सीरियल किलर पर तीस हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया.
सागर में हुईं सिलसिलेवार तीन हत्याओं के एक दिन बाद 1 सितंबर को भोपाल के खजूरी इलाके में एक और चौकीदार की हत्या हो गई. एक मार्बल शोरूम की चौकीदारी कर रहे 27 साल के सोनू वर्मा की हत्या रात के डेढ़ बजे कर दी गई. इसी रात सागर पुलिस ने भोपाल में कोह-ए-फिजा इलाके के बस स्टैंड से सीरियल किलर शिव प्रसाद धुर्वे को धर दबोचा. गिरफ्तारी के वक्त धुर्वे ने पुलिस से हंसते हुए कहा, ''एक को और निपटा दिया.’’
19 साल के धुर्वे का ताल्लुक गोंड आदिवासी समुदाय से है. वह 15 साल की उम्र में घर से भागकर पुणे चला गया था. यहां कुछ दिन एक रेस्तरां में काम करने के बाद वह गोवा चला गया और हाल ही में सागर लौटा था. धुर्वे ने पुलिस को बताया कि किसी आदमी का काम के वक्त सोना उसे सख्त नापसंद था.
उसने जितने गार्ड की हत्या की, वे सब काम के वक्त सो रहे थे. हत्या करने से पहले धुर्वे केजीएफ फिल्म देखता था और उज्जैन का कुख्यात गैंगस्टर दुर्लभ कश्यप उसका रोल मॉडल था. वह भी दुर्लभ कश्यप की तरह कुख्यात होना चाहता था. लेकिन दुर्लभ की तो आपसी रंजिश के चलते 2020 के सितंबर में हत्या हो चुकी थी और उज्जैन पुलिस उसके गैंग के खत्म होने का दावा कर रही थी. लेकिन क्या ऐसा असल में था?
चयन बोहरा उर्फ बाबा, दुर्लभ गैंग का एक सदस्य, 14 जुलाई 2022 को इंस्टाग्राम पर लाइव देखा गया. लाइव में दिख रहा था कि चयन और उसके साथी किसी महफिल में शराब पी रहे हैं. इसमें जुर्रत की बात यह थी कि चयन बोहरा और उसके एक साथी ने दो दिन पहले ही इंदौर में अनिल दीक्षित नाम के एक हिस्ट्रीशीटर पर जान लेने के इरादे से गोलियां दागी थीं. जिस दिन चयन अपने इंस्टाग्राम पर यह लाइव कर रहा था, ठीक उसी दिन अनिल ने अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली.
चयन ने इस अपराध को अंजाम देने से पहले बाकायदा इंस्टाग्राम पर इसका ऐलान किया था. अनिल पर गोली चलाने के बाद भी वह लाइव हुआ था. इंदौर पुलिस ने आनन-फानन में इन दोनों पर 30,000 रुपए का इनाम घोषित किया, लेकिन इन अपराधियों में पुलिस का कितना खौफ था, इस बात का अंदाजा उनके लाइव से लग जाता है. हालांकि पुलिस ने इन दोनों को 10 दिन के भीतर गिरफ्तार कर लिया था.

लेकिन यह घटना दुर्लभ कश्यप गैंग के खत्म होने के पुलिस के दावों पर सवालिया निशान जरूर लगाती है. यही नहीं, दुर्लभ और उसके गैंग का असर सिर्फ मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों तक सीमित नहीं है. उज्जैन से 500 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के औरंगाबाद में कुछ ऐसा घट रहा था जो कि दुर्लभ की हत्या के बाद उसके कल्ट फिगर में तब्दील होने की गवाही देता है.
फरवरी, 2022. महाराष्ट्र के औरंगाबाद में पुलिस को शुभम नाम के युवक पर हमले की शिकायत मिली. शुभम के पिता मनगटे अपने घर में ही किराने की एक दुकान चलाते हैं. 6 फरवरी की रात कुछ लड़कों ने उनसे सिगरेट देने की मांग की. लेकिन मनगटे ने उन्हें समझाया कि आधी रात का वक्त हो गया है और वे दुकान बंद कर चुके हैं. इस पर इन युवकों ने मनगटे और उनके 22 साल के बेटे शुभम पर लोहे की रॉड और घारदार हथियारों से हमला कर दिया.
शुभम पर हमला करने वाले लड़के खुद को दुर्लभ कश्यप गैंग का बता रहे थे. पिछले कई दिनों से औरंगाबाद के हनुमान नगर, पुंडलीक नगर और भारत नगर इलाके में इस गैंग ने एक चौराहे को दुर्लभ का नाम दे रखा था. ये लोग दुकानदारों से मुफ्त सामान लेते, आने-जाने वाले लोगों को परेशान करते और ठेले वालों से पैसे छीन लेते. दिलचस्प बात है कि दुर्लभ कश्यप अपने जीवन में कभी औरंगाबाद नहीं आया था.
फिर उज्जैन से करीब 500 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के इस शहर में यह अपराधिक गैंग खुद के साथ दुर्लभ कश्यप का नाम क्यों जोड़ रही है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें दुर्लभ के बारे में जानना होगा.
साल 2001 में पैदा हुए दुर्लभ का बचपन बहुत अच्छे माहौल में नहीं बीता था. उसके पिता मनोज कश्यप और मां के बीच रिश्ते सुखद नहीं थे. दोनों एक-दूसरे से अलग रहा करते थे. दुर्लभ की मां एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थीं. मां-बाप के अलग होने बाद दुर्लभ अपनी मां के साथ ही रहा करता था. मां ने उसका दाखिला उज्जैन के एक नामी स्कूल में करवा दिया. सब कुछ पटरी पर चल रहा था, लेकिन 10वीं तक आते-आते दुर्लभ का ध्यान पढ़ाई से हटने लगा. नतीजतन वह 10वीं पास नहीं कर पाया.
साल 2016 उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ का साल था. हर 12 साल में होने वाला यह आयोजन उज्जैन के लिए धार्मिक और आर्थिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण है. यही साल दुर्लभ कश्यप के उभार की शुरुआत का साल था. कहानी शुरू हुई उज्जैन के फ्रीगंज इलाके में पड़ने वाले शहीद पार्क से.
यहां से हर साल 26 जनवरी को दुपहिया वाहन रैली निकलती है. स्कूल से मोहभंग के बाद दुर्लभ ने इस रैली पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया. रैली में डीजे, खाने-पीने की व्यवस्था दुर्लभ कर रहा था. पूरे इलाके में उसने गणतंत्र दिवस की शुभकामना वाले बैनर लगवाए जिन पर उसकी फोटो लगी हुई थी.
26 जनवरी की रैली के बाद इलाके में कई लोग दुर्लभ को जानने लगे. खासतौर पर अपनी उम्र के लड़कों के बीच वह काफी पॉपुलुर हो गया. दुर्लभ के बचपन का एक दोस्त बताता है, ''26 जनवरी के कार्यक्रम के बाद जब उसका काफी नाम हो गया तो उसका मन इस सब में लगने लगा. उसने उज्जैन के हर छोटे-बड़े बदमाश के साथ मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया. इस बीच वह हेमंत उर्फ बोखला के संपर्क में आया. हेमंत अपने इलाके का नामी बदमाश था. फिर दुर्लभ अपराध के रास्ते पर चल पड़ा.’’
फरवरी, 2017 में दुर्लभ के ऊपर पहली बार पुलिस ने मामला दर्ज किया. तब उसने अपने साथियों के साथ 18 साल के एक लड़के पर चाकू से वार किया था, हालांकि उसमें सामने वाला लड़के को कोई खास चोट-चपेट नहीं आई थी.
पुलिस सूत्रों के अनुसार, उज्जैन का दानी गेट इलाका दो रसूखदार परिवारों डागर और टाक परिवार के बीच दबदबे की लड़ाई का गवाह रहा है. इस लड़ाई का मुख्य मैदान है उज्जैन में होने वाले कार्तिक मेले में उठने वाला पार्किंग का ठेका. हेमंत बोखला के जरिए दुर्लभ डागर परिवार के करीबी राहुल किलोसिया के संपर्क में आया.
किलोसिया को भी अपना कारोबार चलाने के लिए लड़कों की जरूरत थी. नतीजतन उसने दुर्लभ और उसके साथियों को पनाह देना शुरू कर दिया. किलोसिया ने उज्जैन के बाहरी इलाके में मौजूद एक फार्म हाउस दुर्लभ और उसके साथियों के लिए खोल दिया. यह फार्म हाउस गैंग का अघोषित दफ्तर बन गया. गैंग के लड़के यहां पर नशा करने के लिए आने लगे. शराब और गांजे में डूबे यह नौजवान किसी भी अपराध को अंजाम देने के लिए तैयार थे.
इस बीच दुर्लभ और उसकी गैंग सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय होने लगी थी. ये लोग अपने किसी साथी का जन्मदिन बड़े उत्साह के साथ मनाया करते. गैंग के दर्जनों लड़के केक लेकर अपने साथी के घर पर पहुंचते. उसकी गली में आधी रात को पूरे शोर-शराबे के साथ केक काटा जाता. इस पूरी कार्रवाई का सोशल मीडिया पर जमकर प्रचार हुआ करता था. दुर्लभ ने इस तरीके से कई युवाओं को अपनी ओर खींचा. कई किशोर सुरक्षा के एहसास के चलते उसके गैंग के साथ तेजी से जुड़ने लगे.
जनवरी 2018 में दुर्लभ पर हत्या का पहला मुकदमा लगा. 11 और 12 जनवरी की दरम्यानी रात दुर्लभ और उसके साथियों की मुठभेड़ टाक परिवार से जुड़े कुछ लड़कों से हो गई थी. दोनों गुट अपने-अपने घायलों को लेकर जब उज्जैन के सिविल अस्पताल पहुंचे तो यहां फिर उनका झगड़ा हुआ.
दुर्लभ गैंग के लड़कों ने अर्पित उर्फ कान्हा पर चाकुओं से हमला किया. उसे गंभीर हालत में अस्पताल में दाखिल करवाया गया. 13 जनवरी को उसकी मौत हो गई. इस केस में दुर्लभ और उसके अन्य साथियों को आरोपी बनाया गया. दुर्लभ और उसका साथी राजदीप इस समय नाबालिग थे. लिहाजा उन्हें उज्जैन के बाल सुधार गृह भेज दिया गया. करीब चार महीने बाल सुधार गृह में रहने के बाद दोनों को इस केस में जमानत मिल गई.
जमानत पर बाहर आने के बाद दुर्लभ और उसके साथी उज्जैन के अपराध जगत में जाना-पहचाना नाम बन चुके थे. दुर्लभ गैंग का सदस्य रह चुका एक लड़का बताता है, ''दुर्लभ को फोटो खिंचवाने का बहुत शौक था. उसने उज्जैन के अलग-अलग पेशेवर फोटोग्राफरों से अपना फोटोशूट करवाया था.
हम सब लोग उज्जैन के ही थे. यहां महाकाल मंदिर के चलते सिर पर बड़ा टीका लगाने की परंपरा रही है. दानी गेट इलाके में जहां गैंग की बैठकी चलती थी वहां कई लोग शवों का दाह संस्कार करने का काम करते हैं. ये लोग काला पंछा (गमछा) रखते हैं. हम सबने भी वजनदार दिखने के लिए ऐसा ही पंछा डालना शुरू कर दिया. हम अपनी फोटो इंस्टाग्राम और फेसबुक पर डालते थे. धीरे-धीरे गैंग के दूसरे लड़के भी ऐसा ही करने लगे. पंछा और टीका हमारी पहचान बन गया.’’
यही वह दौर था जब दुर्लभ सोशल मीडिया पर खुद को 'पिवर अपराधी’ लिख रहा था. पिवर अंग्रेजी के शब्द 'प्योर’ का मालवी अपभ्रंश है. इस दौरान उसने फेसबुक प्रोफाइल का इंट्रो अपडेट करते हुए लिखा, ''कुख्यात बदमाश+हत्यारा +पिवर अपराधी. कोई सा भी कैसा भी विवाद करना हो तो मुझे संपर्क करें.’’
यह अक्तूबर 2018 की बात है. दुर्लभ और उसके साथियों की एक और स्थानीय बदमाश के साथ दिन-दहाड़े भिड़ंत हुई. इस दौरान उसने कई हवाई फायर किए और दोनों गुटों के बीच चाकूबाजी भी हुई. इस मामले में पुलिस को दुर्लभ और उसके साथियों की तलाश थी. इस बीच उज्जैन पुलिस की साइबर क्राइम यूनिट दुर्लभ और उसके साथियों पर नजर बनाए हुए थी. मोबाइल की लोकेशन का पीछा करते हुए पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.
उसको गिरफ्तार करने गई टीम में शामिल रहे एक पुलिस अफसर बताते हैं, ''तब वह 18 साल का भी नहीं था. जरा सा धमकाने पर ही उसने अपने सभी साथियों के पते बता दिए. उसकी निशानदेही पर हमने 50 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें से ज्यादातर नाबालिग थे. फिर पुलिस ने लड़कों की काउंसलिंग करवाई. इनके माता-पिता को बुलाकर समझाया गया. इसके बाद हमने ज्यादातर लड़कों को छोड़ दिया. दुर्लभ और उसके साथियों को हमने गिरफ्तार किया.’’
उज्जैन के तत्कालीन एसपी सचिन अतुलकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर दुर्लभ और उसके कुछ साथियों की मीडिया के सामने परेड करवाई. दो महीने बाद मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे थे. सूबे में आदर्श आचार संहिता लागू थी. सचिन अतुलकर की कोशिश थी कि वे चुनाव से पहले जिले के पेशेवर अपराधियों को नियंत्रण में कर सकें ताकि चुनाव प्रक्रिया में रुकावट न आए. लेकिन सचिन अतुलकर की यह मुहिम कितनी कामयाब हुई?
उज्जैन के स्थानीय पत्रकार अभय तिरवार तत्कालीन एसपी सचिन अतुलकर की इस मुहिम पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं. वे बताते है, ''मैं तीस साल से अपराध कवर कर रहा हूं. उज्जैन में चल रही हर छोटी-बड़ी आपराधिक गैंग मेरी जानकारी में रहती है. लेकिन तब तक हमने दुर्लभ का नाम तक नहीं सुना था.
इसी जिज्ञासा में एक पत्रकार साथी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अतुलकर से पूछ लिया कि लड़कों में से दुर्लभ कौन है. अतुलकर ने जवाब दिया, 'वह हाथ उठाकर बताएगा.’ इसके बाद दुर्लभ ने बड़े अनूठे अंदाज में अपना हाथ ऊपर किया, बाद में यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. अतुलकर ने यह प्रेस कॉन्फ्रेंस भले ही अच्छी नीयत से की हो, लेकिन इसने दुर्लभ को अपराध जगत के नए सितारे की तरह स्थापित कर दिया.’’
दुर्लभ और उसकी गैंग के साथियों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत सूबे की अलग-अलग जेलों में भेज दिया गया. दुर्लभ को शुरुआत में जबलपुर जेल भेजा गया. लेकिन उस समय उसके बालिग होने में कुछ महीने का वक्त बचा हुआ था. उसने उज्जैन पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ जबलपुर हाइकोर्ट में अपील कर दी. अप्रैल 2019 में हाइकोर्ट ने दुर्लभ के पक्ष में फैसला देते हुए उसे बाल सुधार गृह भेजने का आदेश दे दिया.
2019 में विशेष सुधार गृह से निकलने के बाद दुर्लभ और उसके कुछ दोस्तों ने इंदौर में एक फ्लैट किराए पर ले लिया. दुर्लभ का एक करीबी साथी राजदीप मंडलोई भी उस समय दुर्लभ के साथ था. वह दावा करता है, ''इस बार दुर्लभ में काफी बदलाव आ गए थे. वह नशा करना लगभग बंद कर चुका था और अपना बिजनेस शुरू करने की योजना बना रहा था. लेकिन कुछ ही महीनों बाद लॉकडाउन लग गया और हमें मजबूरी में उज्जैन लौटना पड़ा. वहां दुर्लभ की मम्मी ने घर का एक हिस्सा हमारे लिए खाली कर दिया था. हम वहीं बैठते थे.’’
2020 के सितंबर तक लॉकडाउन तो खुल चुका था लेकिन नाइट कर्फ्यू जारी था. इसी महीने की 6-7 तारीख की दरम्यानी रात दुर्लभ ने अपने साथियों को घर पर खाने के लिए बुलाया था. खाने-पीने के बीच उसके साथियों के पास सिगरेट खत्म हो गई. नाइट कर्फ्यू की वजह से सामान्य तौर पर रात को चलने वाली चाय की दूकानें और दूसरे ठीहे भी बंद हो चुके थे. दुर्लभ के एक साथी ने बताया कि वह अभी हेलावाड़ी इलाके से आ रहा है. वहां एक चाय की दुकान रात भर खुली रहती है. दुर्लभ और उसके साथी बाइक पर सवार होकर हेलावाड़ी पहुंचे.
हेलावाड़ी उज्जैन का वह इलाका है, जहां हेला मुस्लिम समुदाय के लोग बहुतायत में हैं. यहां पहले से दुर्लभ का एक विरोधी गैंग सक्रिय था. इस गैंग ने अपना नाम रखा था 'कुत्ता कमीना चीज’ या केकेसी. रमीज नाम का एक हिस्ट्रीशीटर इस गैंग का लीडर हुआ करता था. हेलावाड़ी में जिस दुकान पर दुर्लभ चाय पीने गया था, उसका मालिक अमन उर्फ भूरा रमीज का भाई है. दुर्लभ उस समय तक उज्जैन में काफी कुख्यात हो चुका था.
हेलावाड़ी के लड़के भी उसे जानते थे. उस दिन चाय की दुकान पर दुर्लभ और उसके विरोधी गैंग के लड़कों के बीच भारी झड़प हुई थी. इसके कुछ घंटों बाद पुलिस यहां पहुंची और उसे दुर्लभ की अधनंगी लाश गली में पसरी हुई मिली. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार दुर्लभ को 30 बार से ज्यादा चाकू से गोदा गया था. सोशल मीडिया पर दुर्लभ अपनी मौत के बाद एक कल्ट के तौर पर उभरने लगा. उज्जैन के जीवाजीगंज थाने के अधीक्षक गगन बादल बताते हैं, ''वह एक सामान्य अपराधी था. आप उस पर लगे मुकदमे देख लीजिए. ज्यादातर चाकूबाजी और मारपीट के हैं. लेकिन सोशल मीडिया ने उसे इतना बड़ा गैंगस्टर बना दिया.’’
मौत के बाद दुर्लभ की लोकप्रियता की बड़ी वजह सोशल मीडिया को माना जाता है. उज्जैन साइबर क्राइम के सब इंस्पेक्टर प्रतीक यादव बताते हैं, ''हम दुर्लभ और उसके गैंग से जुड़े तमाम सोशल मीडिया अकाउंट पर नजर रख रहे थे. दुर्लभ की अंतिम यात्रा सोशल मीडिया पर बड़ा इवेंट बन गई. कई ऐसे नौजवान जो दुर्लभ को व्यक्तिगत तौर पर जानते भी नहीं थे, उसकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए और इसे अपने सोशल मीडिया हैंडल से लाइव किया.’’
पुलिस ने ऐसे अकाउंट को लगातार निगरानी पर रखा. अब तक फेसबुक पर ऐसे 162 और इन्स्टाग्राम पर 92 अकाउंट बंद करवाए जा चुके हैं. इसके अलावा पुलिस काउंसलिंग के बाद कई सारे किशोरों और युवाओं ने स्वेच्छा से अकाउंट बंद कर दिए. हालांकि प्रतीक बताते हैं, ''इस किस्म के अकाउंट पर काबू पाना मशक्कत का काम है.
यह भी है कि आप एक अकाउंट बंद करवाओ तो दस नए खुल जाते हैं. दूसरी तरफ दुर्लभ की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर यूट्यूब पर चलने वाले छोटे-छोटे चैनलों ने उसके बारे वीडियो डालने शुरू कर दिए. इससे दुर्लभ को अप्रत्याशित लोकप्रियता मिल गई. आप यूट्यूब पर जाएंगे तो दुर्लभ से जुड़े सैकड़ों वीडियो मिल जाएंगे.’’
यूट्यूब पर 'कोहिनूर ऑफ उज्जैन’ नाम के एक चैनल ने सितंबर 2021 में दुर्लभ कश्यप पर एक वीडियो पोस्ट किया था. डेढ़ मिनट के इस वीडियो पर 2,78,895 व्यू और 9,000 से ज्यादा लाइक हैं. दीनू शाहू नाम के एक यूजर ने इस पोस्ट के कमेंट सेक्शन में लिखा है, ''आइ लव यू कोहिनूर. आइ रियली मिस यू. आप अब भी दिल में जिंदा हो और हमेशा रहोगे.’’
शिल्पा उपाध्याय नाम की एक यूजर लिखती हैं, ''हमने आपको कभी रियल में देखा भी नहीं. बट हम आपको इन वीडियो में रोज देखते हैं. आप प्लीज लौट आओ. आज भी आप लाखों लोगों के दिलों पर राज करते हो.’’ इसी तरह यूट्यूब शॉर्ट्स पर 'यश स्टाइलो’ नाम के एक यूजर ने दुर्लभ का पुलिस हिरासत के दौरान का एक वीडियो डाला. इस वीडियो को अब तक करीब 2.4 करोड़ लोग देख चुके हैं और 11 लाख से ज्यादा लोगों ने इसे लाइक किया है.
ऐसा ही एक चर्चित वीडियो 24 साल के गौतम कश्यप का है. वे पेशे से गायक हैं और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में रहते हैं. उन्होंने अगस्त 2021 में दुर्लभ कश्यप पर एक गाना अपने यूट्यूब चैनल पर डाला था. इसके बोल थे: ''कैसी यो अनहोनी हुई जो भाई साथ म्हारा छूट गया, दुर्लभ कश्यप यार मेरे तू क्यों हम सबसे रूठ गया.
इस गाने को एक साल के भीतर डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोग देख चुके हैं. इस गाने के बारे में गौतम कहते हैं, ''दुर्लभ की मौत के बाद से ही मेरे पास सैकड़ों की तादाद में मैसेज आने लग गए थे कि मुझे उन पर गाना बनाना चाहिए. उनकी मौत के तुरंत बाद मुझे गाना बनाना ठीक नहीं लगा. लेकिन जब छह-सात महीने तक लगातार मैसेज आते रहे तो मैंने सोचा कि मुझे गाना जरूर बनाना चाहिए. वे मेरे समाज के भी थे. इसके बाद मैंने यह गाना बनाया. मुझे उम्मीद नहीं थी कि यह इतना लोकप्रिय हो जाएगा.’’
गानों के अलावा दुर्लभ की जिंदगी पर दर्जनों की तादाद में शॉर्ट फिल्में यूट्यूब पर आपको मिल जाएंगी. इन फिल्मों को लाखों बार देखा जा चुका है. मसलन, दुर्लभ कश्यप: गैंगस्टर लाइफ नाम की शॉर्ट फिल्म को 52 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं. इसी तरह से फुल मूवी ऑफ दुर्लभ कश्यप को 32 लाख बार और दुर्लभ कश्यप किंग ऑफ उज्जैन नाम की शॉर्ट फिल्म को 13 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है.
यूट्यूब के अलावा दुर्लभ इन्सटाग्राम पर भी काफी पॉपुलर है. उसके नाम पर सैकड़ों की तादाद में अकाउंट बने हुए हैं. ऐसे ही एक अकाउंट 'दुर्लभ कश्यप फैन क्लब’ को 1.27 लाख लोग फॉलो करते हैं. इसी तरह 'दुर्लभ कश्यप ऑफिशियल’ नाम के एक अकाउंट पर एक लाख से ज्यादा फॉलोवर हैं. इन अकाउंट पर पोस्ट की जाने वाली फोटो और रील्स को हजारों लाइक मिलते हैं.
दुर्लभ कश्यप की लोकप्रियता के कई सिरे खोजे जा सकते हैं. पहला सिरा उसका पहनावा हो सकता है. लाल टीका, आंख में काजल और काला गमछा. कुछ-कुछ 1999 में आई फिल्म वास्तव में संजय दत्त के किरदार रघु जैसा. या फिर उसका सोशल मीडिया अकाउंट, जिस पर वह खुलेआम गांजा पीते हुए और हथियारों की नुमाइश करता नजर आता था. या फिर उसका खूनी अंजाम. लेकिन किशोरों की आपराधिक गोलबंदी का सिलसिला सिर्फ उज्जैन तक सिमटा हुआ नहीं है. उज्जैन से सटे इंदौर में भी इसी किस्म का एक गैंग सक्रिय है.
इंदौर के एमआइजी चौराहे से जब आप विजय नगर की तरफ बढ़ेंगे तो बीच में आपको एक मस्जिद दिखाई देगी. मस्जिद से सटी हुई गली इंदौर की उस बस्ती का मुहाना है, जिसे इंदौर में नया बसेरा के नाम से जाना जाता है. यहां मध्य प्रदेश के अपेक्षाकृत पिछड़े इलाके निमाड़ के मजदूर तबके के लोग बहुतायत में रहते हैं. इंदौर के इस स्लम इलाके को 1984 में अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री काल के दौरान एक पुर्नवास बस्ती के तौर पर बसाया गया था और इसे नाम दिया गया नया बसेरा.
पचास के पेटे में पहुंच रहे महेंद्र पचौरी पेशे से वकील हैं. उनका परिवार भी नया बसेरा में रह रहे सैकड़ों परिवारों में से एक है. पचौरी के घर की बैठक में दाखिल होते ही आपकी नजर दो चीजों पर अटक जाएगी. पहली, बाबा साहेब की तस्वीर. दूसरी उनके बिस्तर के सिराहने रखी 12 बोर की दुनाली बंदूक. महेंद्र पचौरी की शख्सियत और उनके सिरहाने रखी बंदूक एक विरोधाभास खड़ा करते हैं. मद्धम आवाज में ठहर-ठहरकर बोलने वाले पचौरी सिरहाने पड़ी दुनाली के पीछे की जो कहानी बताते हैं, उसका लब्बोलुबाब कुछ यूं है.
24 अगस्त, 2015 की रात 11 बजे पद्मा बाई नाम की महिला बदहवास हालात में अपने रिश्तेदारों के साथ महेंद्र पचौरी के घर पहुंची. पचौरी की तरह पद्मा बाई का ताल्लुक बलाई अनुसूचित जाति से है. दोनों परिवार निमाड़ के एक ही इलाके से आकर इंदौर के नया बसेरा में बस गए थे.
पद्मा ने पचौरी को बताया कि मोहल्ले के ही लईक उर्फ गोलू ने उनके बेटे शिव के साथ शाम के वक्त मारपीट की थी. वह अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ इसकी शिकायत लेकर लईक के घर पहुंची थी. लेकिन उनकी बात सुनने के बजाए लईक के बड़े भाई शादाब, रिजवान और छोटे भाई सलमान ने उनके साथ मारपीट की और जातिसूचक गालियां दी. पद्मा बाई पचौरी के पास गुहार लेकर आई थीं कि वे उनके साथ चलें और एमआइजी थाने में उनकी शिकायत दर्ज करवाएं.
आगे क्या हुआ, इसके बारे में पचौरी बताते हैं, ''मैं पद्मा बाई और उनके परिवार को लेकर अपने दो सहयोगियों के साथ एमआइजी थाने की तरफ जाने लगा. हम बाइकों पर थे. इससे पहले कि हम थाना पहुंचते शादाब, रिजवान, लईक और सलमान ने हमारा रास्ता रोक लिया. इन लोगों के पास तलवार और लाठी-डंडे थे. गाली-गलौज के बाद सलमान ने हमारे साथी पर तलवार से वार किया जो कि चूक गया.
इस बीच शादाब ने रिवॉल्वर निकाला और मेरे ऊपर फायर कर दिया जो मेरी बाइक की टंकी में लगा. इससे उसमें छेद हो गया और पेट्रोल रिसने लगा. फिर हम लोग वहां से किसी तरह जान बचाते हुए भागे और जैसे-तैसे थाना पहुंचे और उन लोगों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई. इसके बाद मैंने अपनी सुरक्षा के लिए हथियार का लाइसेंस लिया. यह दुनाली राइफल मैंने अपनी सुरक्षा के लिए रखी है.’’
इस केस में चारों भाइयों शादाब, रिजवान, लईक और सलमान पर आइपीसी की धारा-307 और एससी-एसटी ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ. इस वक्त सलमान की उम्र 17 साल थी. यह उस पर लगा पहला मुकदमा नहीं था. उसके आपराधिक जीवन की शुरुआत 2012 में हो चुकी थी. तब उसकी उम्र महज 14 साल थी. इस केस से पहले उसके खिलाफ नौ दूसरे मुकदमे थे. इनमें हत्या का प्रयास, गैंग रेप और फिरौती वसूलने जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज थे. आखिर 14 साल यह किशोर अपराध की दुनिया में कैसे आ गया था?
दुर्लभ कश्यप से उलट सलमान उर्फ लाला एक निम्न आय वर्ग परिवार से है. उसके पिता निजाम पहले इंदौर के पलासिया नाले पर रहा करते थे और कबाड़ी का काम किया करते थे. नया बसेरा में हुए पुनर्वास में उन्हें भी सरकार की तरफ से एक भूखंड मिला था और यह परिवार यहां आकर बस गया. उनके परिवार को करीब से जानने वाले एक शख्स बताते हैं कि जब उनके लड़के रास्ता भटकने लगे तो शुरुआत में निजाम ने कुछ सख्ती भी की. लेकिन लड़कों को अपने चाचा जावेद और मां शबाना का सहयोग हासिल था. कुछ समय बाद निजाम ने अपने बेटों से कुछ कहना ही छोड़ दिया.
सलमान अपने चार भाइयों में सबसे छोटा है. सबसे पहले उसके बड़े भाई शादाब ने इलाके में गुंडागर्दी शुरू की. धीरे-धीरे उसके छोटे भाई भी उसी राह पर चल निकले. सलमान और उसके ज्यादातर साथी नया बसेरा के रहने वाले थे. सबने पास ही में मौजूद सरकारी स्कूल में अपनी शुरुआती तालीम हासिल की थी. स्कूल में हुई दोस्ती ने शुरुआत में एक गोलबंदी की शक्ल अख्तियार की. इसमें सलमान के साथ उसके कुछ और दोस्त भी शामिल थे.
एमआइजी थाने में तैनात एक सब इंस्पेक्टर बताते हैं, ''शुरुआत में ये लड़के किसी किस्म के सीरियस क्राइम में शामिल नहीं थे. ये लोग बाइक पर इधर-उधर भटका करते थे. सलमान पर पहला मुदकमा लड़की भगाने को लेकर लगा. दोनों उस समय नाबालिग थे. लड़की हिन्दू थी और इस मामले ने सांप्रदायिक रंग ले लिया. इसके बाद सलमान पर मुकदमा लगा और उसे बाल सुधार गृह भेज दिया गया.
इस बीच थाने में एक नए अधीक्षक आए. उनके सामने सलमान की मां ने गुहार लगाई कि उनके बेटे को राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है. थाना अधीक्षक ने सलमान और उसके साथियों के प्रति थोड़ी नरमी बरती. इसका नतीजा यह हुआ कि यह स्कूली छात्र देखते ही देखते हिस्ट्रीशीटर बन गया.’’
जैसा कि ज्यादातर बाल अपराधियों के मामले में दिखता है, सलमान के उरूज में भी उसकी परवरिश काफी हद तक जिम्मेदार रही. एमआइजी थाने के एसएचओ रह चुके तहजीब काजी बताते हैं, ''जब मुझे एमआइजी थाने की जिम्मेदारी दी गई तो वहां ढाई सौ से ज्यादा हिस्ट्रीशीटर थे.
सलमान लाला और उसका गैंग इनमें अव्वल था. हमने सबसे पहले इन्हें ही नियंत्रण में करने की ठानी. जब मैंने अपने जवानों से सलमान को गिरफ्तार करने के लिए कहा तो मेरे जवान असहज हो रहे थे. मैंने कारण जानने की कोशिश की तो पता चला कि इसकी सबसे बड़ी वजह सलमान की मां है.’’
नया बसेरा ऐसा इलाका है जहां गाड़ी से जाना संभव नहीं है. गलियां बेहद संकरी है. ऐसे में सलमान के ठिकाने तक पहुंचने से पहले ही पुलिस आने की खबर इन चारों भाइयों को लग जाया करती थी. तहजीब काजी बताते हैं, ''जब हम उसे गिरफ्तार करने की कोशिश करते तो सलमान की मां शबाना शोर मचाने लगती.
कई दफा तो उसने अपने कपड़े भी फाड़ लिए. वह पुलिस पर दुर्व्यवहार की झूठी शिकायत मानवाधिकार आयोग से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक को भेजा करती. ऐसे में जवान विभागीय जांच के दायरे में आ जाते. कोई भी जवान इस पचड़े में पड़ना नहीं चाहता था. शुरुआत में मुझे अपने जवानों का मनोबल मजबूत करना पड़ा. हमने अपनी हर दबिश की वीडियोग्राफी करवाई ताकि आगे की जांच से बचा जा सके. धीरे-धीरे हमने इस गैंग को काबू में कर लिया.’’
साल 2019 की 20 फरवरी के रोज 26 साल की जया (बदला हुआ नाम) अपने साथ हुई स्नैचिंग की वारदात की रिपोर्ट करने के लिए इंदौर के संयोगिता गंज थाने में पहुंचीं. जया की शिकायत के मुताबिक स्कूटी पर सवार दो लड़के उनके गले में पहनी हुई सोने की चैन तोड़कर ले भागे थे. पुलिस ने सीसीटीवी की मदद से इस वारदात को अंजाम देने वाले दो अपराधियों को धर दबोचा. ये अपराधी इंदौर के अलग-अलग इलाकों में छिनैती की वारदातों को अंजाम दे रहे थे.
पकड़े गए दो अपराधियों में से एक इंदौर के प्रतिष्ठित परिवार से आने वाला 16 साल का एक नाबालिग था. उसे इस किस्म का अपराध करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? जब अपनी तहकीकात में पुलिस इंस्पेक्टर तहजीब काजी ने इस सवाल का जवाब ढूंढने का प्रयास किया तो इसने सलमान लाला गैंग के काम करने के तरीके की कई परतें खोल दी.
काजी बताते हैं, ''सलमान लाला ने 2018 के आस-पास उज्जैन के दुर्लभ कश्यप गैंग के वीडियो देखने शुरू कर दिए थे. दुर्लभ कश्यप और उसकी गैंग की बढ़ती फॉलोइंग देखकर सलमान ने भी सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी. उसके गैंग के लोग भी अपने साथियों का जन्मदिन दुर्लभ कश्यप की तर्ज पर मनाने लगे. इससे उसे इंदौर के लड़के पहचानने लगे.’’
इन करामात से सलमान ने अब ऐसे लड़कों को अपना शिकार बनाना शुरू किया जो पैसे वाले घर के होते थे और जिनका पारिवारिक माहौल अच्छा नहीं था. काजी बताते हैं कि चेन स्नैचिंग गैंग में जिस लड़के को गिरफ्तार किया गया उसके पिता बिल्डर थे और उनका वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं चल रहा था.
सलमान को यह लड़का सोशल मीडिया के जरिए जानता था. वह सबसे पहले उससे एक कैफे में मिला. सलमान ने इस लड़के का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया. धीरे-धीरे वह सलमान गैंग के करीब आता गया. इस बीच उसकी सलमान के साथ रहने वाली एक लड़की से बातचीत शुरू हो गई. दोनों में प्यार हुआ. आपसी मुलाकात के दौरान इस लड़की ने उसका एक अश्लील वीडियो बना लिया.
अब वह सलमान के ब्लैकमेल के दुश्चक्र में पड़ चुका था. पहले तो उसने घर से चोरी करके कुछ पैसे सलमान को देना शुरू किए. लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया. फिर सलमान ने उसके सामने एक और विकल्प रखा. अगर वह घर से पैसे नहीं ला सकता तो उसे सलमान के लिए वारदात को अंजाम देना होगा. चैन स्नैचिंग की वारदात में इस लड़के को स्कूटी चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी.
एक तरफ सलमान लाला सोशल मीडिया के जरिए नए लड़कों को अपनी गैंग में शामिल कर रहा था, दूसरी तरफ उसने शराब तस्करी और हफ्ता वसूली जैसे अपराधों में भी अपने हाथ आजमाना शुरू किया. सलमान लाला का अगल निशाना बना महाराजा यशवंत राव होल्कर अस्पताल. इंदौर का यह अस्पताल मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में स्थित सबसे बड़े अस्पतालों में से एक है. 22 जनवरी, 2022 की दोपहर को सलमान लाला अपने चार साथियों को लेकर एम्बुलेंस स्टैंड पर पहुंचा.
यहां उन्होंने सद्दाम नाम के एम्बुलेंस ड्राइवर को धमकी दी कि अगर वह यहां पर अपनी निजी एम्बुलेंस चलाएगा तो जान से मार दिया जाएगा. जब झगड़ा बढऩे लगा तो सद्दाम ने मौके पर अपने साथियों को भी बुला लिया. इस बीच सलमान लाला ने जान से मारने की धमकी देते हुए सद्दाम पर गोली चला दी. यह गोली सद्दाम के हाथ में लगी और बांह को चीरते हुए उसकी एम्बुलेंस में धंस गई. इसके बाद सलमान लाला और उसके साथी वहां से निकल गए.
यह सलमान लाला गैंग का इंदौर में अंजाम दिया हुआ ताजा अपराध है. इस अपराध के पीछे का अर्थशास्त्र बताते हुए एक स्थानीय पुलिस कांस्टेबल कहते हैं, ''इस अस्पताल में मालवा के दूर-दराज से लोग इलाज करवाने आते हैं. जिन पेशेंट को भोपाल रेफर किया जाता है या फिर जिनकी इलाज के दौरान मौत हो जाती है वे कई दफा निजी एम्बुलेंस किराए पर लेते हैं.
मजबूरी में उन्हें सरकार की तरफ से तय रेट से कई गुना अधिक पैसे देने होते हैं. यह ऐसा व्यवसाय है जिस पर इलाके के हर बदमाश की नजर है. सलमान लाला गैंग एम्बुलेंस स्टैंड पर अपना दबदबा चाहता है. इस वजह से उन्होंने यहां हमला किया ताकि वे एम्बुलेंस ड्राइवर से अपनी गाड़ी लगाने का हफ्ता वसूल कर सकें.’’
फिलहाल सलमान लाला इस केस में जेल में है. उस पर कुल 32 मुकदमे कोर्ट में विचाराधीन हैं. इनमें हत्या का प्रयास, हफ्ता वसूली, ब्लैकमेल और आर्म्स ऐक्ट के तहत आने वाली संगीन धाराओं के मुकदमे शामिल हैं. सलमान लाला ने अपराध की दुनिया में महज 14 साल की उम्र में कदम रख दिया था. लेकिन उसको असल बढ़ावा मिला सोशल मीडिया के जरिए और यह सीख उसे मिली थी दुर्लभ कश्यप से. हालांकि वह इस मामले में ज्यादा शातिर निकला.
उज्जैन और इंदौर के बीच की दूरी महज 70 किलोमीटर है. यहां पनपी इन दोनों गैंग के बीच कोई भी समानता नहीं है. दुर्लभ कश्यप और उसके साथियों से उलट सलमान और उसके साथी निचले सामाजिक और आर्थिक परिवेश से आते थे. जो एक कड़ी इन्हें आपस में जोड़ती है वह है, बचकानी उम्र में अपराध से साबका और सोशल मीडिया के जरिए अपराध की दुनिया में छा जाने की इच्छा.
सलमान ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल की तरकीब दुर्लभ को देखकर ही सीखी थी. अब वह भी दुर्लभ की तरह सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हो चला है. उसकी लोकप्रियता का अंदाज उससे जुड़ी हर पोस्ट को मिले लाइक और कमेंट से मिल जाता है. 'सलमान लाला की फौज’ नाम के यूट्यूब चैनल की तरफ से डाली गई एक पोस्ट में सलमान लाला और उसके साथी किसी दरगाह की जियारत करते हुए नजर आ रहे हैं. इस पोस्ट पर कमेन्ट करते हुए नाजिम खान नाम के यूजर ने लिखा है, ''सलमान भाई मैं 13 साल का हूं. मुझे अपनी गैंग में शामिल कर लो.’’
यूट्यूब के अलावा इन्स्टाग्राम पर भी सलमान लाला को पसंद करने वालों की संख्या अच्छी-खासी है. सलमान लाला के नाम से इन्स्टाग्राम पर कई अकाउंट बने हुए हैं, जिन्हें हजारों लोग फॉलो करते हैं. 'सलमानलाला9999’ नाम के एक अकाउंट के 1.19 लाख फॉलोअर हैं. इसी तरह 'सलमानलाला फैन क्लब’ नाम के अकाउंट को तकरीबन 40 हजार लोग फॉलो करते हैं. सलमान लाला और दुर्लभ कश्यप जैसे अपराधियों की सोशल मीडिया पर लोकप्रियता परेशान करने वाला ट्रेंड है.
किशोरों में अपराध के प्रति रुझान कोई नई समस्या नहीं है. लेकिन उनका संस्थागत अपराध में घुसना और सोशल मीडिया के जरिए उनका महिमामंडन जरूर नया चलन कहा जा सकता है. किशोर अपराधियों में इस चलन की शुरुआत मध्य प्रदेश से हुई मानी जा सकती है. एक तथ्य यह भी है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के हिसाब से मध्य प्रदेश किशोर अपराध के मामलों में पूरे देश में अव्वल है.
एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2020 में देशभर में कुल 29,768 मामले दर्ज किए गए, इनमें से सर्वाधिक 4,819 मामले अकेले मध्य प्रदेश से हैं. सूबे की पुलिस इस बारे में क्या ठोस कदम उठा रही है? मध्य प्रदेश पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (सीआइडी) जी.पी. सिंह कहते हैं, ''मध्य प्रदेश में किशोरों को आपराधिक गतिविधियों से बचाने के लिए हमने कानून के प्रति जागरूकता को लेकर एक कार्यक्रम शुरू किया है.

हमने विशेषज्ञों की एक टीम का गठन किया है जो किशोर अपराधियों के मामलों में पुलिस स्टेशनों के साथ मिलकर काम करेगी. हमारा अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में भी चलाया जाएगा क्योंकि इन इलाकों से किशोर अपराधियों के मामले ज्यादा आ रहे हैं. उम्मीद है कि दो-तीन साल बाद हमें इस अभियान के सकारात्मक नतीजे देखने को मिलेंगे.’’
मध्य प्रदेश पुलिस किशोर अपराधों को रोकने के लिए विशेषज्ञों की सलाह लेने की बात कह रही है. दूसरी तरफ किशोर अपराधों पर देश में पहले से कानून मौजूद हैं. निर्भया केस के बाद देश में किशोर अपराध और उसके रोकथाम के ऊपर नए सिरे से बहस छिड़ी हुई थी. 2015 में जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट (जेजे ऐक्ट) को उस समय एक उम्मीद की किरण की तरह देखा जा रहा था. इस कानून के तहत किशोर अपराधियों के सुधार के लिए विस्तृत सुझाव और निर्देश दिए गए हैं. यह कानून देश में पिछले सात साल से लागू है, लेकिन इसके कोई प्रभावी नतीजे नहीं मिल पाए हैं.
किशोर अपराधियों का पुनर्वास करने वाली संस्था 'हीलिंग डॉव’ की मैनेजिंग ट्रस्टी निकिता नागर इस हवाले से कहती हैं, ''जेजे ऐक्ट 2015 मुख्य रूप से 'आर’ पर टिका हुआ है. रिफॉर्म, रिहैबिलिटेशन, रीइंटीग्रेशन. यानी सुधार, पुनर्वास और समायोजन. यह कागजों पर बेहतरीन कानून है. लेकिन हमारी संस्थाएं इसको कायदे से लागू नहीं करतीं. उदाहरण के तौर पर किसी भी बाल सुधार गृह में दो किस्म के किशोर आते हैं.
पहले वे जो कानून का उल्लंघन करने के सिलसिले में बाल सुधार गृह पहुंचते हैं. दूसरे वे जो कानूनी सुरक्षा के तहत बाल सुधार गृह लाए जाते हैं. कानून के हिसाब से दोनों किस्म के बच्चों को अलग-अलग रखा जाना चाहिए. लेकिन अक्सर ऐसा होता नहीं है. इसके अलावा, बजट की कमी और सुधार गृहों के स्टाफ का किशोरों के प्रति बरताव भी बड़ी समस्या है.
शिक्षा और स्किल डेवलपपमेंट और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग जेजे ऐक्ट के निर्देशों का अहम हिस्सा हैं. लेकिन बाल सुधार गृहों के पास इन कार्यक्रमों के लिए न तो बजट होता है और न ही वहां का स्टाफ इसमें कोई दिलचस्पी लेता है. नतीजा यह होता है कि बाल सुधार गृह में सुधार के लिए आया किशोर बड़ा अपराधी बनकर वहां से निकलता है.’’
यह स्वाभाविक सी बात है कि अगर बाल सुधार गृहों में किशोर अपराधियों को सही मार्गदर्शन न मिले तो उनके आगे जाकर फिर आपराधिक दुनिया में फंसने की संभावना बढ़ जाती है. लेकिन किशोर अपराध की दुनिया की तरफ आकर्षित क्यों हो जाते हैं? इंदौर में काम करने वाली डॉ. अंचला दीक्षित पेशे से क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं. वे इस सवाल के जवाब में कहती हैं, ''किशोरों के अपराध की तरफ जाने की बड़ी वजह उनका बुरा बचपन है.
इसके कई कारण हो सकते हैं. मां-बाप के बीच अलगाव, मानसिक या शारीरिक शोषण, मां-बाप की तरफ से पर्याप्त तवज्जो या समय न मिलना या फिर शिक्षा का अभाव. ऐसे बच्चे खुद को समाज से काट लेते हैं. वे लोगों से मिलने में सहज नहीं रहते. समाज के प्रति उनके मन में एक गुस्सा पनपने लगता है. सही गाइडेंस के बिना वे अपराध और नशे की दुनिया की तरफ आकर्षित होने लगते हैं. फिर वे खुद अपराधी बन जाते हैं या अपराधियों को अपना हीरो मानने लगते हैं.’’
दुर्लभ कश्यप, सलमान और इनकी गैंग से जुड़े पचासों लड़के किसी आम किशोर की तरह हो सकते थे, अगर कोई उन्हें सही रास्ता दिखाने वाला होता. यह रास्ता उन्हें स्कूल में भी मिल सकता था, पुलिस-प्रशासन के जागरूकता अभियानों से और सबसे अहम, अपने परिवार से. लेकिन शायद ऐसा नहीं हो पाया. ऐसे में अगर कोई किशोर अपराधी बाल सुधार गृह पहुंच ही जाए तो फिर इन संस्थानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है कि ये लड़के वापस अपराध की तरफ न मुड़ें.
भारत अपनी आबादी में किशोरों की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी वाले मुल्कों में शामिल है. आपराधिक गिरोह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को खुद को ग्लैमराइज करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. अक्सर किशोर इस चकाचौंध में फंसकर अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं. एक समाज के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी नौजवान पीढ़ी को समझाएं कि शोहरत की शॉर्टकट वाली जिंदगी कभी-भी कट शॉर्ट हो सकती है. दुर्लभ और सलमान जैसे अपराधी इसके सबसे सटीक उदाहरण हैं.
'' दुर्लभ कश्यप गैंग अब खत्म हो चुकी है. मेरा नौजवान पीढ़ी से बस यही कहना है कि अगर वह सोशल मीडिया के जरिए दुर्लभ से प्रभावित है तो उसका अंजाम भी देख ले’’
सत्येंद्र कुमार शुक्ला, एसपी, उज्जैन
''कई मामलों में सोशल मीडिया के जरिए संपर्क में आकर कुछ किशोर अपना गैंग बना लेते हैं. हमारी साइबर क्राइम सेल इनकी सोशल मीडिया पोस्ट पर कड़ी निगाह रखती है’’
हरिनारायण चारी मिश्रा, पुलिस कमिशनर, इंदौर
''किशोरों के अपराध की तरफ जाने की बड़ी वजह उनका बुरा बचपन है. फिर सही गाइडेंस के बिना वे अपराध और नशे की दुनिया की तरफ आकर्षित होने लगते हैं’’
डॉ. अचला दीक्षित, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट
''जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट कागजों पर तो बेहतरीन कानून है, लेकिन हमारी संस्थाएं इसे कायदे से लागू नहीं करतीं. इसके अलावा सुधार गृहों में भी जरूरी व्यस्थाएं नहीं हैं’’
निकिता नागर, मैनेजिंग ट्रस्टी, हीलिंग डॉव.

