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महा तख्तापलट

कैसे एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे की गद्दी छीनी, और महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री के नाते क्या हैं चुनौतियां.

उद्धव ठाकरे
उद्धव ठाकरे
अपडेटेड 4 जुलाई , 2022

उद्धव ठाकरे हमेशा असहज वारिस थे. उनके पीछे दीवार पर लटकी तस्वीर से झांकते शख्स से उनकी तुलना कभी अनुकूल नहीं रही. केवल वफादारों की नजर में ही नहीं. सियासी शख्सियतों को गढ़ने वाली उस अपरिभाषित-सी चीज के लिहाज से—जिसे आप आभामंडल कहें, या करिश्मा—उद्धव की शख्सियत ऐसी थी कि वे हमेशा अपने पिता की छाया में ही चलते. बाल ठाकरे, वह कार्टूनिस्ट जिन्होंने बॉम्बे को मुंबई की शक्ल में उकेरा, पुश्त भर ऊंची शख्सियत के मालिक थे. जननायक की तरह भाषणबाजी में चहचहाता हास-परिहास मिलाकर, भावनात्मक स्थानीय गौरव को बेलगाम हिंदुत्व के साथ जोड़कर और शहरी नौजवानों के बीच जबरदस्त स्वीकार्यता में विचारधारा का तड़का लगाकर बाल ठाकरे अपने आप में एक समूची दुनिया बन गए थे.

शिवसेना के जनक बेशक वही थे—ऐसी पार्टी जिसने मराठी संस्कृति और राजनैतिक इतिहास की गहरी जड़ों से इस तरह ताकत ग्रहण की जैसे पहले कभी किसी ने नहीं की थी. उद्धव को विरासत में पार्टी का ढांचा मिला, पर उन्होंने एक बुनियादी जटिलता के साथ काम किया. उनकी शख्सियत बिल्कुल अलहदा थी—ज्यादा मृदुभाषी और तकरीबन शर्मीले. राजनीतिक के तौर पर उनकी विचारधारा कुछ कम तीखी और ज्यादा अनिश्चित थी. उन्हें इस बात का श्रेय देना होगा कि असंभव को आजमाने से वे झिझके नहीं—विरासत के मालिक थे पर उसे अपने ढंग से चलाया, विचारधारा के लिहाज से धुर विरोधियों के साथ गांठ बांधी पर व्यवहार में उसकी तीव्रता और असर को नियंत्रित किया. मगर अंतिम विश्लेषण में वे हमेशा वही होना चाहते थे जो उन्हें कभी कहा जाता था—ठाकरे जो मुकम्मल ठाकरे नहीं था.

यह उनके पतन का कारण हो या न हो, पर 31 महीनों तक महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) की सरकार की अगुआई के दौरान उनकी और भी कई नाकामियां सामने आईं, जिसका 29 जून की रात फेसबुक लाइव पर भावनात्मक विदाई और उसके बाद इस्तीफा देने के लिए खुद कार चलाते हुए राज्यपाल के निवास जाने के साथ पतन हो गया. उस मौके पर भी, वाकई अगले दिन शपथ-ग्रहण समारोह के दो घंटे पहले तक पूरी दुनिया यही कयास लगा रही थी कि भाजपा के देवेंद्र फडणवीस के माथे तीसरी बार सेहरा बंधेगा. लेकिन आखिरी मौके पर सबको चौंकते हुए फडणवीस ने ऐलान किया कि शिवसेना के बागी सिपहसालार एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बनेंगे. वजह?

बेहद सरल. एक, ठाकरे परिवार को मुंह की खिलाने के बाद अपने भले के लिए उसे पूरी तरह बर्बाद कर देना, शिवसेना को उसके पुश्तैनी ठिकाने से छीन लेना, और सत्ता तख्तापलट को वजूद तख्तापलट में इस तरह बदलना कि यह दोष न लगे कि भाजपा ने एक भगवा पार्टी से दगाबाजी की. दो, कुर्सी पर कठपुतली मुख्यमंत्री को बिठाकर असली सत्ता अपने हाथ रखो और मुफ्त में जाति समीकरण का लाभ उठा लो, शिंदे मराठा हैं जबकि फडणवीस के ब्राह्मण होना मुश्किल पैदा कर रहा था. तीन, इस ''असली शिवसेना’’ के काठ के घोड़े में छुपकर अकूत संपत्ति के किले बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी), खूब पैसे वाले ठाणे तथा पुणे के साथ दर्जनों स्थानीय निकायों में घुस जाना, जिसके लिए भाजपा लंबे समय से लालायित थी. इनके चुनाव अक्तूबर में होने तय हैं.

लहूलुहान कर देने वाली वजूद की इस लड़ाई के बाद अब जब उद्धव वीरान रणक्षेत्र को निहारते हुए अपने जख्म गिन रहे हैं, जानकार प्राथमिक तौर पर कार्यकर्ताओं के साथ उनकी भौतिक और मानसिक दूरी पर उंगली उठा रहे हैं, और उन दूसरे नेताओं के साथ भी, जो यत्र-तत्र बिखरे केंद्रबिंदुओं की तरह थे और जिनके इर्द-गिर्द शिवसेना की स्ट्रीट पावर एकजुट होती थी. शिवसेना ऐसी पार्टी है जिसके कार्यकर्ताओं का उल्लास और जीवंतता ही उसकी जीवनशक्ति है, लेकिन उद्धव ऐसे शख्स हैं जिनकी फितरत उस वक्त भी अपने खोल में दुबक जाने की है जब जमीन के साथ धड़कते हुए जुड़ाव की सबसे ज्यादा जरूरत होती है.

बाल ठाकरे अपना राजसी अलगाव गवारा कर सकते थे—उनके प्रति वफादारी खून में बसी थी. मगर उद्धव को—जो पहले ही शारीरिक तौर पर कमजोर थे और इस सबके कारण और भी कमजोर हो गए—जरूरत इस बात की थी कि वे नेता और वफादारों के बीच उस कड़ी में खुद नई जान फूंकते. इसके बजाए उन्होंने कुछ इने-गिने लोगों पर भरोसा किया और दूसरों को शक की नजर से देखा. व्यक्तित्व की यही दो खासियतें उनकी दुखती रग है.

आने वाली घटनाओं के संकेत उससे कुछ दिन पहले ही साफ दिखाई देने लगे थे जब राजनीति में अपने कच्ची उम्र से ही कट्टर शिवसैनिक एकनाथ शिंदे ने विद्रोह का झंडा उठा लिया. मुंबई के होटल वेस्टिन में 19 जून को पार्टी के 56वें स्थापना दिवस का आयोजन था. अगले दिन होने वाले विधान परिषद के चुनाव के ठीक पहले कुछ हद तक 'एकजुटता दिखाने’ के लिए शिवसेना के सभी 55 विधायक वहां इकट्ठा थे. बादामी रंग का, पूरी बांह का और हमेशा की तरह ऊपर तक बटन बंद कुर्ता पहने उद्धव मंच पर बीच की कुर्सी पर विराजमान थे.

उनकी दाहिनी तरफ उनके बेटे और पर्यावरण मंत्री आदित्य, फिर पार्टी के मराठवाड़ा के सरपरस्त दिवाकर रावते और उसके बाद ठाणे के दबंग राजनीतिक और विधानसभा में पार्टी के नेता यानी शिंदे बैठे थे, जो गंभीर दिखाई दे रहे थे. कुर्सी पर बैठे-बैठे उद्धव ने खुशगवार स्वर में पार्टी के इतिहास के बारे में बात की. फिर कहा, ''मुझे कल हमारी जीत का पूरा यकीन है... हमारे यहां कोई गद्दार नहीं है.’’ सबने तालियां बजाकर खुशी जाहिर की. शिंदे के अलावा. वे अपना चश्मा उतारकर पोछने लगे, मानो बेरुखी जता रहे हों.

शिंदे की इस मन:स्थिति की वजह थी. विधान परिषद के चुनाव में शिवसेना के दो उम्मीदवारों—आमशा पाडवी और सचिन अहीर—के लिए आवंटित वोटों के कोटे को लेकर एक दिन पहले उनकी आदित्य और पार्टी प्रवक्ता संजय राउत के साथ गरमागरम बहस हुई थी. शिंदे चाहते थे कि उनमें से हरेक को न्यूनतम जरूरी 26 वोटों के बदले 31 वोट मिलें, क्योंकि पार्टी के पास (55 विधायकों और सात संबद्ध सदस्यों के साथ) 62 वोट थे. आदित्य और राउत ने जोर दिया कि अतिरिक्त 10 वोट सद्भावना के तौर पर सहयोगी पार्टी कांग्रेस के उम्मीदवार को दे दिए जाएं.

एक सूत्र के मुताबिक, शिंदे ने कहा, ''आप कांग्रेस को मजबूत क्यों कर रहे हैं? हमारा ध्यान अपनी स्थिति मजबूत करने पर होना चाहिए.’’ वे केवल अतिरिक्त सावधानी बरत रहे थे, क्योंकि 11 जून को शिवसेना के उम्मीदवार संजय पवार वोटों के जरूरी कोटे का इंतजाम न कर पाने से राज्यसभा का चुनाव हार गए थे. पाडवी और अहीर 20 जून को विजेता बनकर उभरे, पर जल्द ही साफ हो गया कि शिवसेना के तीन विधायकों और छह सहयोगियों ने भाजपा के पक्ष में वोट दे दिया.

शिंदे की भाग-दौड़ 
आखिरी नतीजे आए भी नहीं थे कि परेशान शिंदे शाम को अपने उपनगरीय गृहनगर ठाणे में मेयर के बंगले में पहुंच गए. हर कोई जानता था कि येऊर हिल्स की तराई में सुरम्य उपवन झील के किनारे फैला पांच एकड़ का यह खूबसूरत परिसर सियासी दोस्तों के साथ गपशप और सलाह-मशविरा करने के लिए शिंदे की पसंदीदा जगह थी. इस बार उन्होंने शिवसेना के 23 से ज्यादा विधायकों को अपने साथ खाना खाने बुलाया... और उन्हें 11 और 12 की दो खेपों में दो मिनी बसों से सूरत रवाना कर दिया. ठाणे चहल-पहल भरा शहर है जो वहां से शुरू होता है जहां मुंबई खत्म होती है.

यही वह शहर है जिसने शिवसेना को बहुत पहले 1987 में उसकी पहली चुनावी कामयाबी दी थी, जब सतीश प्रधान मेयर चुने गए थे. मराठी कहावत—'शिवसेनेचे ठाणे, ठाण्येचे शिवसेना’—एक दूसरे का होने का एहसास बखूबी बयान करती है. अब इसी शहर से उसके प्रमुख अदाकारों में से एक ने शिवसेना के सबसे बड़े तख्तापलट को अंजाम दे दिया था.

चुप्पे और कर्मठ शिंदे को दिवंगत आनंद दिघे राजनीति में लाए, जो कभी बाल ठाकरे के बाद पार्टी के दूसरे सबसे ताकतवर नेता थे. सतारा जिले में दरे गांव के शिंदे उस वक्त एक केमिकल कंपनी में सुपरवाइजर का काम करते थे और छह सदस्यों के परिवार का पेट भरने की खातिर अतिरिक्त आमदनी के लिए ऑटोरिक्शा चलाते थे. दिघे के मार्गदर्शन में उनका ग्राफ तेजी से चढ़ा और 1997 में वे अंतत: ठाणे के पार्षद चुने गए. 2001 में दिघे की मौत से न शिंदे का उत्थान रुका और न ही ठाणे के सियासी फलक पर उनकी बढ़ती पकड़. 2004 में उन्हें ठाणे में ही कोपरी-पाचपाखाड़ी विधानसभा सीट से शिवसेना का उम्मीदवार बनाया गया और तभी से वे इस क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं. 

साल 2014 आते-आते शिंदे ठाणे और पालघर जिलों में खासी ताकत बन चुके थे, जहां विधानसभा की कुल 24 सीटें हैं. उनकी किस्मत में निर्णायक उछाल तब आया जब दिसंबर, 2014 में उद्धव देवेंद्र फडणवीस की अगुआई वाली भाजपा सरकार में शामिल हुए. शिवसेना के लिए यह अहम लम्हा था क्योंकि 15 साल बाद वह सत्ता में लौटी थी. शिंदे का अपना करियर सत्ता से वनवास के इन सालों में गढ़ा गया था, पर अब उन्हें लोक निर्माण (सार्वजनिक उपक्रम) मंत्री बनाया गया. उनके कार्यकाल में बुनियादी ढांचे की मेट्रो, राजमार्ग, फ्लाइओवर और पुलों सरीखी प्रमुख परियोजनाएं आईं. 

यहां वे गठबंधन की राजनीति और साथ ही जमीन से जुड़ी राजनीति के जटिल क्षेत्रों में खूब फले-फूले. अपने गृहनगर नागपुर और मुंबई के बीच सुपर एक्सप्रेसवे बनाने का फडणवीस का फैसला निर्णायक मोड़ साबित हुआ. उद्धव ने इस परियोजना का—जिसे बाद में 'समृद्धि महामार्ग’ नाम दिया—कड़ा विरोध किया और इसे अपने उपजाऊ खेत देने वाले किसानों के लिए विनाशकारी बताया.

उद्धव को मनाने के लिए फडणवीस ने शिंदे को आगे किया. शिंदे ने न केवल उद्धव को मना लिया बल्कि उनसे यह तक कहलवा लिया कि यह एक्सप्रेसवे गेम चेंजर होगा. फिर शिंदे ने पक्का किया कि मुआवजे की रकम सीधे किसानों के खातों में तत्काल ऑनलाइन पहुंच जाए, इससे जमीन पर विरोध भी नरम पड़ा. इस तरह इस एक्सप्रेसवे ने फडणवीस और शिंदे के बीच दोस्ती का पुल भी बनाया. 

लोगों के साथ उपयोगी मेलजोल कायम करने की शिंदे की क्षमता का प्रदर्शन अभी बस शुरू ही हुआ था. 2018 में केरल की बाढ़ के दौरान वे दवाइयों के डिब्बे और प्राथमिक उपचार का साजो-सामान लेकर जलमग्न राज्य पहुंचे. इससे उनकी राजनीति में एक और रचनात्मक मोड़ आया. पखवाड़े बाद मुंबई लौटकर उन्होंने चिकित्सा सेवा प्रकोष्ठ 'बालासाहेब ठाकरे शिवसेना वैद्यकीय मदत कक्ष’ शुरू किया, जिसकी जल्द ही महाराष्ट्र के सभी 36 जिलों में सक्रिय शाखाएं कायम हो गईं.

केरल के महज 18 महीने बाद जब महानगर में कोविड-19 की महामारी का प्रकोप फूटा, इस समानांतर ढांचे ने हजारों लोगों को राहत पहुंचाई. खासकर ग्रामीण इलाकों में दवाइयों और अस्पतालों में बिस्तरों के इंतजाम के साथ जरूरतमंदों की मदद करने में शिंदे की टीम सरकारी मशीनरी के मुकाबले ज्यादा तेज और चुस्त-दुरुस्त थी. ऐसे समय जब कृशकाय उद्धव घर में कैद रहने के लिए विवश थे. शिंदे उन इने-गिने मंत्रियों में थे जो अस्पतालों के नियमित दौरे करते और संकट से पार पाने में आगे बढ़कर मदद करते थे.

इससे मुसीबत में अच्छे मददगार की वह छवि और चमक उठी जिसे वे विकसित कर रहे थे और ठाणे के बाहर राजनैतिक नेटवर्क बनाने के लिए जिस पर रचनात्मक तरीके से दांव लगा रहे थे. प्रकोष्ठ के एक सदस्य कहते हैं, ''40 विधायकों ने जब उद्धव के बजाए शिंदे का समर्थन किया तो कइयों को हैरानी हुई. इसका राज चिकित्सा सेवाओं में है.’’

अब यह पता चल रहा है कि उद्धव को शिंदे के संभावित विद्रोह का अंदेशा था, हालांकि उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि यह इतने बड़े पैमाने पर होगा. उद्धव के एक करीबी सूत्र कहते हैं कि मुख्यमंत्री ने शिंदे की हरकतों पर नजर रखना शुरू कर दिया था. उन्होंने कहा, ''उद्धव जी ने मुझे और कुछ दूसरे लोगों से शिंदे की तमाम मेल-मुलाकातों की जानकारी इकट्ठा करने को कहा था. उन्हें हमेशा शक था कि शिंदे एक दिन उनकी पीठ में छूरा भोंक सकते हैं.’’ स्वायत्त भविष्य का पहला संकेत शिंदे ने अपने जन्मदिन 9 फरवरी को दिया जब वे शिवसेना के 16 विधायकों के साथ उद्धव से मिलने पहुंचे थे. जाहिरा तौर पर वे उद्धव का आशीर्वाद लेने गए थे; हकीकत में यह ताकत का प्रदर्शन था जिसे समझने में उद्धव नाकाम रहे.

इस बीच फडणवीस इन सारे घटनाक्रमों पर नजरें गड़ाए थे. उन्होंने शिंदे के साथ मेल-जोल बनाए रखा, जिसमें अन्य बातों के अलावा मुंबई के बुनियादी ढांचे के बारे में विचार साझा करना भी था. माना जाता है कि 2022 के शुरुआती महीनों में किसी वक्त फडणवीस ने शिंदे से संपर्क करके इस संभावना की थाह ली कि क्या वे विधायी दल में विभाजन के लिए जरूरी कम से कम 37 विधायक तोड़ सकते हैं. इससे महज तीन महीने पहले इंडिया टुडे से बातचीत में फडणवीस विधायकों में सेंध लगाने की किसी भी कोशिश से इनकार कर चुके थे.

पिछले नवंबर में यह पूछा गया कि क्या भाजपा ''एक और शिंदे’’ को शामिल करने पर विचार कर रही है, इन हिस्सों में अभी भी अपने गैर-अंग्रेजीकृत नाम 'शिंदे’ कहे जाने वाले ज्योदिरादित्य सिंधिया तब तक भाजपा में शामिल हो चुके थे. उन्होंने कहा था, ''हमारी तरफ कोई शिंदे नहीं है.’’ मगर जून आते-आते राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में शिवसेना के विधायकों से क्रॉस-वोटिंग करवाने में सफल होने के बाद फडणवीस को शायद एहसास हुआ कि 'ऑपरेशन शिंदे’ का वक्त आ गया है.

2019 में 78 घंटे की सरकार बनाकर अपनी उंगलियां जला चुकी भाजपा इस बार बहुत एहतियात बरतते हुए आगे बढ़ी—उसने अपने को नेपथ्य में रखा, भीतर से सेंध लगाए जाने को तरजीह दी, और केवल 'लॉजिस्टिक’ मदद प्रदान की. अविश्वास प्रस्ताव लाने के बजाए सदन में बहुमत के परीक्षण की मांग करने का फैसला संभावित दुष्परिणामों की गहन कानूनी छानबीन के बाद लिया गया. बागी विधायकों का कानूनी भविष्य अभी भी अधर में झूल रहा है और बाद में अगर उन्हें अयोग्य ठहराया जाता है तो भाजपा नहीं चाहती कि उस स्थिति में उसे शर्मसार होना पड़े.

पार्टी के एक बड़े नेता ने इंडिया टुडे से कहा, ''शिंदे ने अपने विद्रोह के बल पर एमवीए सरकार गिरा दी.’’ इससे उनकी बढ़त दोगुनी हो गई कि आंतरिक बगावत का रास्ता चुना और हमेशा जोर देते रहे कि असली शिवसेना वही है. भाजपा के रणनीतिकारों ने सब कुछ को ध्यान में रखकर चाल चली और अब उसका फल मिल रहा है. 

गुमराह ठाकरे 
उद्धव ने नवंबर 2019 में जब पदभार संभाला था तब माहौल एकदम अलग था. उन्होंने तब दावा किया कि भाजपा मुख्यमंत्री की कुर्सी को बारी-बारी से दोनों दलों के बीच बांटने के अपने वादे से मुकर गई इसलिए उन्हें राहें जुदा करनी पड़ रही हैं. राकांपा-कांग्रेस जैसे वैचारिक रूप से एकदम अलग दलों के साथ गठजोड़ के कारण पार्टी के काडर में उपजी बेचैनी आंशिक रूप से उद्धव के उस दावे से शांत हो गई थी.

पदभार ग्रहण करने के लिए जब उन्होंने पहली बार छह मंजिला मंत्रालय भवन में प्रवेश किया, तो सैकड़ों कर्मचारी ठाकरे की एक झलक पाने के लिए गलियारों, सीढ़ियों और लिफ्टों में खड़े थे. यह एक औसत मराठी मानुष के ठाकरे नाम के साथ उस भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाने के लिए काफी था जिसका आनंद ठाकरे परिवार ने दशकों से लिया है. उद्धव ने आखिरकार 17 नवंबर, 2012 को बालासाहेब की मृत्यु के बाद शिवसेना की विरासत को आगे बढ़ाया और उसे बरकरार रखा. माहौल जोश से भरा था और कुल मिलाकर जनता का मूड सकारात्मक लग रहा था. 

लेकिन उस समय भी, कलह के बीज दबे हुए थे. वफादार शिवसैनिकों ने भाजपा के खिलाफ उद्धव के गुस्से को तो समझा और स्वीकारा, लेकिन उनके लिए उन पार्टियों के साथ नए गठजोड़ को पूरी तरह से पचा पाना मुश्किल था, जिनसे सड़कों पर लड़ते हुए उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया था. उनके हाथ बंधे हुए थे, मन में निराशा पैदा हो गई थी. उद्धव भी अपने लोगों से कटे-कटे रहने लगे तो उनके मन के संदेह के मिटने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची.

दरअसल, उद्धव के उस दावे से ही वास्तव में जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ उनकी दूरी बढ़ गई थी कि राकांपा प्रमुख शरद पवार की जिद पर उन्होंने सीएम पद स्वीकार किया था. बागी विधायक बार-बार इसे उछाल रहे हैं और इसे उद्धव की बड़ी चूक बता रहे हैं. निवर्तमान वित्त मंत्री और कोंकण निर्वाचन क्षेत्र के विधायक दीपक केसरकर, जो शिंदे के विद्रोही खेमे में शामिल हो गए, ने कहा, ''उद्धव ने उन्हीं लोगों से हाथ मिला लिया जिनसे उनके लोग हमेशा से संघर्ष करते आए हैं. उन्होंने अपने लोगों की भावनाओं की कोई परवाह नहीं की.’’ 

और फिर, गठबंधन की राजनीति की अपनी जटिलताओं ने धीरे-धीरे दो स्तरों पर बुरा प्रभाव डाला—पहला असर तो वैचारिक स्तर पर था क्योंकि गठजोड़ के कारण शिवसेना की कट्टर हिंदुत्ववादी पार्टी की छवि को नुक्सान हुआ था; दूसरा राजनीति की जमीनी सच्चाई में क्योंकि पवार जैसा अनुभवी व्यक्ति हमेशा बाकी लोगों पर हावी रहता है. पहली परेशानी की बात करें तो भाजपा के साथ उद्धव की लड़ाई वैचारिक तो नहीं थी. उन्हें तो बस सत्ता की आपसी खटपट को ही राजनैतिक चतुराई का परिचय देते हुए सुलझाना था.

अक्तूबर, 2019 में विधानसभा चुनाव के नतीजों के तुरंत बाद खटास तब खुलकर सामने आई थी, जब उद्धव ने फडणवीस के इस दावे पर कड़ी आपत्ति जताई कि तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उद्धव के बीच ''मुख्यमंत्री के पद को शिवसेना के साथ साझा करने जैसी कोई बात नहीं’’ हुई थी. हालांकि, इस हफ्ते संजय राउत ने दावा किया कि यह मानते हुए कि भाजपा अपना वादा निभाएगी, उद्धव ने शिंदे को मुख्यमंत्री के रूप में चुना था. लेकिन उनका यह दावा जंग हार चुके योद्धा द्वारा शत्रु खेमे में भ्रम पैदा करने की बेताब अंतिम कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं था. शाह और उद्धव के बीच आमने-सामने की मुलाकात में जो कुछ हुआ वह अभी तक रहस्य बना हुआ है. 

हालांकि शिंदे तब दूसरे तरीके से सक्रिय थे. यह शिंदे ही थे जो राकांपा के दो विधायकों को पवार के पास वापस लेकर आए थे, जब उनके महत्वाकांक्षी भतीजे अजीत पवार ने फडणवीस के साथ सरकार बनाने के लिए विद्रोह कर दिया था. वह सरकार केवल 78 घंटे चली क्योंकि शरद पवार विद्रोह को खत्म करने और बागियों को वापस अपने पाले में लाने में कामयाब रहे. यह वह क्षण था जब फडणवीस की विश्वसनीयता सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी थी. इससे शिवसेना का आम कार्यकर्ता भी उतना ही चिढ़ गया था जितना कि नेतृत्व और वे चाहते थे कि भाजपा को सबक सिखाया जाए.

इसलिए जब उद्धव ने कांग्रेस-राकांपा से हाथ मिलाया तो वैचारिक रूप से दो ध्रुवों पर होने के बावजूद शिवसेना काडर वास्तव में दो कारणों से खुश था. एक, वे सत्ता में वापस आ गए थे और दूसरे, दोस्ती का लिहाज न करने वाली भाजपा को मुंह की खानी पड़ी. यह उनके लिए एक मीठे प्रतिशोध जैसा था. इसलिए चीजों के सुधरने की गुंजाइश भी थी. 

लेकिन पवार के साथ सरकार बनाने के खतरे—जिन्हें कई पर्यवेक्षक बिना किसी हिचकिचाहट के महाराष्ट्र के सबसे अविश्वसनीय राजनेता मानते हैं—जल्द ही दिखाई देने लगे थे. राकांपा, एमवीए में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी. उसके पास 53 विधायक थे, जबकि शिवसेना के पास शुरू में 56 थे (एक की मौत के बाद यह संख्या 55 हो गई). फिर भी, पवार राकांपा के लिए चार प्रमुख विभागों—वित्त, गृह, जल संसाधन और ग्रामीण विकास हासिल करने में कामयाब रहे.

विशेष रूप से वित्त मंत्रालय, जिसे अजीत पवार संभाल रहे थे, का पक्षपातपूर्ण व्यवहार असंतोष का एक बड़ा कारण बन गया. आंकड़े बताते हैं कि राज्य के फंड का लगभग 49 फीसद राकांपा के निर्वाचन क्षेत्रों में खर्च किए गए. वहीं कांग्रेस के खाते के निर्वाचन क्षेत्रों को 33 फीसद राशि मिली. 
शिवसेना के अपने क्षेत्रों को 17 फीसद राशि ही मिली. शिवसेना के विधायकों ने उद्धव के सामने इस सौतेले व्यवहार का हाल कहा, तो उन्होंने विधायकों को शांत रहने को कहा क्योंकि तब उनकी प्राथमिकता राकांपा के साथ रिश्ते मधुर बनाए रखने की थी. अजीत पवार का कहना है कि फंड वितरण में उनकी कोई भूमिका नहीं थी. वे कहते हैं, ''किसी विभाग के खर्च की जिम्मेदारी उस विभाग के मंत्री की होती है.’’

शिवसेना के विधायकों के लिए धन आवंटन की कमी जल्द ही राजनैतिक हलके में चर्चा का विषय बन गई. शिवसेना ने राकांपा-कांग्रेस के साथ गठजोड़ में जो भी चुनाव लड़े, लगभग सभी हारी. विधान परिषद के लिए अमरावती स्नातक सीट पद के लिए 2021 के चुनाव में श्रीकांत देशपांडे हारे. फिर इस साल जून में हुए राज्यसभा चुनाव में संजय पवार भी हार गए. काडर के लिए सबसे निराशाजनक क्षण तब रहा जब उद्धव ने कोल्हापुर विधानसभा सीट कांग्रेस के लिए छोड़ दी.

2019 में, कांग्रेस के चंद्रकांत जाधव ने शिवसेना के राजेश क्षीरसागर को हराकर यह सीट जीती थी. जाधव की मृत्यु के कारण अप्रैल में हुए उपचुनाव में, उद्धव ने इस सीट पर कांग्रेस के दावे को स्वीकार कर लिया और क्षीरसागर को कांग्रेस के लिए प्रचार करने के लिए कहा. कांग्रेस ने वह उपचुनाव जीता और क्षीरसागर उद्धव से छिटककर शिंदे खेमे में चले गए. 

बागी विधायक संजय गायकवाड़ का कहना है कि राकांपा वास्तव में उनके निर्वाचन क्षेत्र बुलढाणा में उनके प्रतिद्वंद्वी को फंड उपलब्ध करा रही थी, लेकिन उद्धव ने चुप रहना पसंद किया. वे कहते हैं, ''राकांपा, हमारे ही क्षेत्र में हमें योजनाबद्ध तरीके से घेरने के मिशन में जुटी थी. हमने साफ तौर पर साहब (उद्धव) से कहा था कि वे एनसीपी-कांग्रेस से नाता तोड़ लें क्योंकि वे शिवसेना को नुक्सान पहुंचा रहे हैं.’’

केसरकर भी कहते हैं, ''शिवसेना के कम से कम 45 विधायकों का या तो राकांपा या फिर कांग्रेस से सीधा मुकाबला है. हम अपना अस्तित्व बचाने के लिए लड़ रहे थे. हम उद्धवजी के पास मदद की उम्मीद से गए लेकिन वे कोई स्टैंड लेने को तैयार नहीं थे.’’ एक अन्य विद्रोही और जल संसाधन राज्यमंत्री गुलाबराव पाटिल कहते हैं, ''उद्धवजी सरकारी बंगला और अपने 40 विधायक गंवाने का जोखिम उठाने को तैयार थे लेकिन पवार को नहीं छोड़ पा रहे थे. उनका यह रवैया नुक्सानदेह था.’’ 

इसके साथ ही, ठाकरे के साथ भी वह परेशानी साफ दिख रही थी जो देश के राजनैतिक खानदानों में देखी जाती है—सत्ता को परिवार तक केंद्रित रखने की प्रवृत्ति. सभी विद्रोही बताते हैं कि उद्धव ने पार्टी कार्यकर्ताओं और मंत्रियों को बता दिया था कि उनका अनुभवहीन बेटा आदित्य सभी महत्वपूर्ण मामलों में हस्तक्षेप करेगा. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह बात नागवार गुजरी. आदित्य अपने पिता के बाद दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गए. उनके पास पर्यटन और पर्यावरण मंत्रालय था लेकिन जल्द ही उन्होंने दूसरे मंत्रालयों के अधिकारियों की मीटिंग लेनी शुरू कर दी.

शिंदे और अन्य लोगों ने स्वाभाविक रूप से इसे अनावश्यक दखलअंदाजी के रूप में देखा. यह बात आदित्य तक ही सीमित नहीं रही. उद्धव ने बिना विचारे परिवार के एक और नौसिखिए वरुण सरदेसाई को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर हावी होने की छूट दे दी. ठाकरे की महत्वाकांक्षी पत्नी रश्मि का 30 वर्षीय भतीजा भी, एक मिनी-पावर सेंटर बन गया और कथित तौर पर उद्धव की तरफ से निर्देश जारी करने लगा. इस पर सभी मंत्रियों ने नाराजगी जताई. 

पसंदीदा अधिकारियों की मंडली ने भी पार्टी के लोगों और अन्य अधिकारियों के बीच दूरियां बढ़ाने में भूमिका निभाई. पूर्व मुख्य सचिव अजय मेहता उद्धव की आंख और कान थे—सीएम द्वारा मंजूर (या उनके पास पहुंचने वाली फाइल) की जाने वाली हर एक फाइल मेहता से होकर ही गुजरती थी. और सेवानिवृत्ति के बाद, उद्धव ने मेहता को अपना सलाहकार नियुक्त किया. इससे अन्य अधिकारी बहुत खुश नहीं थे. आर.ए. राजीव एक अन्य ऐसे आइएएस अधिकारी थे, जिन पर उद्धव आंख मूंदकर भरोसा करते थे.

मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एमएमआरडीए) के तत्कालीन आयुक्त राजीव ने ही उद्धव को विवादास्पद मेट्रो कार शेड को आरे मिल्क कॉलोनी से कांजुरमार्ग स्थानांतरित करने की सलाह दी थी. इससे पर्यावरणविदों की नजर में उद्धव तो हीरो बन गए लेकिन राज्य के विकास कार्य को भी नुक्सान हुआ. केंद्र ने कांजुरमार्ग की जमीन राज्य को सौंपी ही नहीं और मुंबई का मेट्रो-3 प्रोजेक्ट ढाई साल से अटका हुआ है. इसके अलावा हर चीज पर पवार की जरूरी मुहर भी अपने आप में एक मुद्दा थी. राकांपा प्रमुख भले ही सरकार के रोजमर्रा के काम में हस्तक्षेप नहीं करते थे लेकिन लॉकडाउन मानदंडों को हटाना, प्रमुख नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति, धन आवंटन में चीनी जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देने, जैसे नीतिगत फैसलों में उनकी प्रमुख भूमिका रहती थी. 

बढ़ती निराशा के बीच वैचारिक रूप से अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े होने के प्रश्न ने भी खाई गहरी की. टकराव का एक बड़ा मौका 16 अप्रैल, 2020 की रात को अहमदाबाद की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर उत्तरी कोंकण के पालघर जिले में आया. आदिवासी भीड़ ने दो हिंदू संतों और उनके ड्राइवर की पीट-पीट कर हत्या कर दी. वे एक अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए गुजरात जा रहे थे और हाइवे के जाम से बचने के लिए वे गांव की सड़कों पर उतर गए थे. यह वास्तव में एक गैर-राजनैतिक घटना थी. आदिवासियों ने उन्हें बच्चा चोर समझ लिया था. लेकिन जो वीडियो सामने आया उसमें दिखा कि स्थानीय पुलिस भीड़ को रोकने में असमर्थ रही. भाजपा ने इसे हिंदुत्व को लेकर सरकार के बदले की भावना के रूप में प्रचारित किया.

इससे हिंदुओं में नाराजगी तो थी ही, उद्धव ने भी कुछ ऐसे फैसले लिए जो हिंदुत्वादी सोच रखने वालों को परेशान करने वाली थी और एक आम शिवसैनिक की मानसिकता पर इसका प्रभाव होता है. मदरसों को धन देना, निर्दलीय विधायक रवि राणा को मई में हनुमान चालीसा के पाठ की घोषणा के कारण गिरफ्तार करना, कुछ ऐसे ही फैसले रहे जिसे शिवसैनिकों ने खास पसंद नहीं किया. उद्धव ने स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की भूमिका पर भी सवाल उठाए, और दक्षिणपंथियों के कोपभाजन बने. मुंबई के आरएसएस सदस्य गौरव सिंह कहते हैं, ''उद्धवजी का भाजपा पर निशाना साधना समझ आता है. यह उनकी राजनीति का हिस्सा है. लेकिन आरएसएस पर हमले की वजह समझ से परे है. यह अनुचित और अकारण था.’’ उद्धव ने अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक में औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजी नगर किया. हालांकि पहले उन्होंने यह प्रस्ताव टाल दिया था.  

कुल मिलाकर देखा जाए तो उद्धव ठाकरे अपने कामकाज के अंदाज से कई बार पुरानी सोच से पीछे हटते नजर आए. सरकार के कामकाज से दूरी के पीछे एक बड़ी वजह उद्धव की खराब सेहत भी रही—वे हृदय रोगी हैं और उन्हें नौ स्टेंट लगाए गए हैं और पिछले नवंबर में उनकी रीढ़ की सर्जरी भी हुई थी. इसलिए बहुत अधिक सावधानी, विशेष रूप से महामारी को देखते हुए, समझ में आती थी. लेकिन जब वे समझ रहे थे कि उनके लिए ज्यादा यात्राएं करना संभव नहीं है तो उन्हें अपने मंत्रियों और विधायकों के साथ ऑनलाइन नेटवर्किंग की एक समानांतर प्रणाली विकसित करनी चाहिए थी.

इसके बजाए, उन्होंने उस कार्य को अपने बेटे और भतीजे और अन्य कुछ भरोसेमंद लोगों को सुपुर्द कर दिया और नई नवेली सत्ता का आनंद पार्टी खड़ी करने के लिए अपना खून-पसीना देने वालों की बजाए दूसरे लोग उठाने लगे. उद्धव पहले पार्टी के कामकाज को लेकर निचले पायदान पर खड़े पार्टी कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया करते थे लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने फीडबैक का कोई चैनल बनाना जरूरी नहीं समझा. और जहां अपनी पार्टी के नेताओं से वे दूरी बना रहे थे, तो वहीं पूर्व सहयोगी के साथ अपने निजी रिश्तों पर तो उन्होंने पूर्ण विराम लगा दिया था. उद्धव ने भाजपा के साथ बातचीत पूरी तरह से बंद करने का फैसला कर लिया, और केंद्र के साथ मोलभाव में पूरी तरह से पवार के बातचीत कौशल पर आश्रित हो गए.

ऐसा राजनीति में शायद ही कभी होता है. इस प्रकार महाराष्ट्र के सबसे बड़े राजनैतिक ब्रांड और देश में बड़े ब्रांड में से एक के उत्तराधिकारी, अपनी ही विरासत को नुक्सान पहुंचा रहे थे. ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने कोई अच्छा काम नहीं किया. उन्होंने किलों के संरक्षण, पर्यावरण नीति में और विशेष रूप से कोविड प्रबंधन में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी. उन्होंने सदी के सबसे बड़े स्वास्थ्य संकट कोविड, जिसमें महाराष्ट्र दुनिया का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बन सकता था, के प्रबंधन में प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया. न ही हिंदुत्व की मूल मातृभूमि में और कठिन समय में उन्होंने हिंदुत्व को इतना उबलने दिया कि वह परेशानी का सबब बन जाए. 

आगे की लड़ाई 
एक अपरिहार्य प्रश्न उठता है—आगे क्या होगा? इस अचानक झटके के बावजूद उद्धव एक अहम किरदार बने रहेंगे. लेकिन शिंदे को गद्दी देकर भाजपा ने उद्धव के लिए यह मुश्किल-सा कर दिया है कि वे सहानुभूति की लहर की सवारी कर सकें. आखिर शिवसेना जो सत्ता में है! दूसरी तरफ इससे शिंदे की स्वतंत्र छवि बनने में भी अंकुश लगेगा और वे पूरी तरह भाजपा पर निर्भर हो जाएंगे. साफ-साफ दो टुकड़ों में बांटकर शिवसेना को खत्म करने के बदले यह कुछ टेढ़ी, कुछ सीधी चाल अधिक मारक साबित हुई. आखिरी कील तब ठोकी गई, जब सरकार में शामिल न होने की बात कर चुके फडणवीस को भाजपा नेतृत्व ने उप-मुख्यमंत्री का पद मंजूर करने का मना लिया.

अगला मोर्चा अक्तूबर-नवंबर में होने वाले पैसे वाले 20 नगर निगमों, 25 जिला परिषदों और 210 नगर परिषदों के महत्वपूर्ण चुनावों में अपने प्रतिद्वंद्वी को मात देने का होगा. उद्धव के बारे में पहला सवाल हर कोई पिछले कुछ दिनों से पूछ रहा था, ''क्या उनकी सरकार बचेगी?’’ इसका संक्षिप्त-सा उत्तर था—नहीं. लेकिन दूसरा बड़ा सवाल यह है कि 'क्या ठाकरे ब्रांड खुद से बुलाई इस आपदा से उबर सकता है, पार्टी के विशाल संगठन और काडर पर पकड़ बनाए रख सकता है?’ इसका जवाब कुछ उलझाए लेख जैसा होगा, जो आने वाले महीनों और वर्षों में लिखा जाएगा. और उसे कुछ ज्यादा पेचीदा बनाने के लिए एकनाथ शिंदे नामक मराठा मौजूद होंगे.

—साथ में अनिलेश एस. महाजन

उद्धव राज
बतौर मुख्यमंत्री ढाई साल के कार्यकाल में उद्धव ठाकरे ने दो क्षेत्रों—पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन—में काफी अच्छा काम किया, लेकिन आर्थिक और इन्फ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर उनका प्रदर्शन मामूली-सा रहा

उपलब्धि
तीन वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र का विस्तार और नए संरक्षित क्षेत्र का ऐलान
पर्यटन नीति में बुनियादी बदलाव: कृषि-पर्यटन, एडवेंचर टूरिज्म, और किलों के पुनरोद्धार की शुरुआत
मुंबई में कोविड के प्रसार की रोकथाम, जो देश में सबसे अधिक संक्रमण का केंद्र रहा है
सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को वित्तीय और चिकित्सकीय मदद

नाकामी

मुंबई मेट्रो, समृद्धि  एक्सप्रेसवे, और मुंबई-अहमदाबाद हाइ स्पीड ट्रेन जैसी सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर की बड़ी परियोजनाओं का काम तय अवधि से काफी देर से चल रहा है
महंगाई पर काबू पाने की कोई योजना नहीं
कानून-व्यवस्था की खराब हालत
कोई नया निवेश या परियोजना नहीं
जैसा कि एक बागी ने कहा, ''उद्धव जी ने अपने सरकारी निवास और 40 विधायकों को गंवाना मंजूर किया, मगर पवार को नहीं. यह नुक्सानदेह साबित हुआ’’
शिवसैनिकों से अपना खुद का नेटवर्क स्थापित करने के बदले उद्धव ने इसका जिम्मा अपने बेटे, भतीजे वगैरह पर डाल दिया
फडणवीस को पहले नॉन-प्लेइंग कैप्टन की भूमिका निभाने के लिए चुना गया था, लेकिन भाजपा ने उन्हें उप-मुख्यमंत्री बनने के लिए मना लिया
 

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