बाल ठाकरे की शाही भव्यता, उनके बेटे उद्धव की तरह संकोची स्वभाव वाली शिष्टता, उनके चचेरे भाई राज की पेशवा-इन-वेटिंग जैसा बोध, देवेंद्र फडणवीस की सहज ब्राह्मण जैसी चतुराई...उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है. असल में, करिश्माई भाषण देने वालों के इर्द-गिर्द बनी शिवसेना सरीखी पार्टी में वे बहुत ज्यादा बोलते भी नहीं हैं. तो फिर एकनाथ शिंदे कौन हैं?
रूखे और सख्त मिजाज वाले, दाढ़ी रखने वाले, सफेद कपड़े पहनने वाले शिंदे उसी उपनगरीय साहस और धैर्य से बने हैं जिसने उन्हें तैयार किया. एक संकेत इस तथ्य में देखा जा सकता है कि उन्होंने अपनी ही पार्टी में तख्तापलट की अगुआई की. हां, उनमें एक आम आदमी की छवि है: शिंदे कुछ भी नहीं हैं अगर वे लाखों शिवसैनिकों के प्रतीक नहीं हों, जो पार्टी के आधार हैं. उनमें जमीनी हावभाव है. वे ऐसे हैं जिनके अपने गढ़ ठाणे में 9 फरवरी को 58वें जन्मदिन पर सम्मानित होने पर विनम्रता के आंसू छलक पड़े थे.
उनके पुराने सहयोगियों का कहना है कि उनका वर्णन करने के लिए सबसे बेहतर शब्द है: जिद्दी. देश ने इसे पिछले हफ्ते के घटनाक्रम में देखा. इससे पहले भी, ठाणेकर जानते थे कि वे उतार-चढ़ाव वाली अपनी निजी और सियासी जिंदगी में भी ऐसे ही थे. साल 1997 में ठाणे नगर निगम में पहली बार चुने जाने के दो साल बाद, शिंदे ने डूबने के एक हादसे में अपने तीन में से दो बेटों को खो दिया था.
सतारा में खेती करने के लिए वापस लौटने के लिए उन्होंने सियासत को लगभग छोड़ ही दिया था. यह उनके मार्गदर्शक-गुरू और सेना के दिग्गज आनंद दिघे थे जिन्होंने उन्हें ऐसा करने से रोका. दिघे उन्हें 1980 के दशक के शुरुआत में ले आए थे जब शिंदे एक रसायनिक फर्म में सुपरवाइजर के तौर पर काम कर रहे थे और अपनी आय में कुछ और जोड़ने के लिए ऑटोरिक्शा चला रहे थे.
शिवसेना से पहले भी उनका सियासी अतीत रहा है. ठाणे में अपने स्कूल के दिनों में वे आरएसएस के प्रति आकर्षित थे—पुराने समय के लोग बताते हैं कि वे किसान नगर में बच्चों की शाखा में शामिल होते थे. लेकिन मुखर किशोर के रूप में शिंदे ने सेना के बाहुबली तौर-तरीकों को पसंद करना शुरू किया. दीघे के नेतृत्व में काम करते हुए वे 1984 में शाखा प्रमुख बने और फिर कॉर्पोरेटर (पार्षद) बने.
उसके बाद वे विधायक (2004 से कोपरी पाचपाखाड़ी से), मंत्री और आखिरकार अब मुख्यमंत्री बन गए. जैसी वे दाढ़ी रखते हैं और घंटों लोगों की बात सुनते हुए वे उससे खेलते हैं, वे करिश्माई दिघे की तरह छवि पेश करते हैं. उनका सुनने का यह कौशल अब उन्हें अच्छी स्थिति में लाएगा.

