सुनील मेनन
उनकी आवाज शुद्ध और पवित्र करने वाले पानी की तरह थी. इसने देह को पवित्र किया. इसीलिए जब आप लता मंगेशकर को उनकी विरासत की पूर्णता में देखते हैं, तो मन में जटिल भावनाएं उभरती हैं—ऐसी जटिलता जो उनकी आवाज में नहीं थी. लता जैसी गायिका संगीत की आलमारियों में नहीं रहतीं, ज्यादा जरूरी मसलों से निबटने के बाद जिसकी दिन के आखिर में सुध ली जाए.
वे इतिहास के संपूर्ण समय की चौतरफा फैली उस तरन्नुम की तरह थीं जो भौतिक जगह को भर देती है. आलीशान दीवान के बगल में रखे रिकॉर्ड प्लेयर पर गोल घूमता तवा, धूल भरे निर्माण स्थल से पैदल लौटते प्रवासी मजदूर के कंधों पर झूलता ट्रांजिस्टर, कस्बे में मीठा बनारसी पान बेचने वाली नुक्कड़ की दुकान पर शाम की चहल-पहल, राजमार्ग के लंबे सफर पर अकेलेपन से घिरा ट्रक चालक, कान के पीछे फूल खोंसे ढलवां छत वाले मकानों में रेडिया सिलोन सुनते बहुत दूर के अंकल—वे हर जगह थीं. ऐसी सर्वव्यापी मौजूदगी की बारीकियों को आप कैसे समझते हैं?
शास्त्रीय और फिल्म संगीत के बीच फर्क को लेकर कलाकार और रसिक समान रूप से अक्सर अटक जाते हैं. अजीब बात है कि शास्त्रीय गायक फिल्मी गाने को बिरले ही अच्छे-से संभाल पाते हैं. क्या लता विपरीत दिशा में बह सकती थीं? शायद हां. स्वरोच्चारण के खालिस भौतिक पहलुओं के लिहाज से उनका नाता कोंकण तट के कलाकारों के महान वंशाणुओं से था—केसरबाई, मोगुबाई और उनकी बेटी किशोरी आमोणनकर (जो लता की लोकप्रियता जाहिरा तौर पर ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर सकती थीं). भिंडीबाजार घराने के उस्ताद अमान अली खां की थोड़े वक्त की शागिर्दी ने उन्हें पूर्ण किया.
उनका मालकौंस गाते 1950 का एक वीडियो है, जिसमें आप संगीत के इतिहास का एक काल्पनिक प्रश्न कि 'ऐसा होता तो क्या होता’ देख सकते हैं—वे उड़ान भरती श्वेत छोटी-सी चिड़िया हैं, समय की मेहराबों का नक्शा खींचती, मानो हवा से ऊपर उठती. फिर आश्चर्य क्या कि उस्ताद बड़े गुलाम अली खां ने झुंझलाहट में, जैसा कि अक्सर बताया जाता है, उनकी सराहना करते हुए कहा था, ''कमबख्त, भूल से भी बेसुरा नहीं गाती’’.
फिल्मों में लता के गाने के तौर पर हम जो याद करते हैं, वह देहाती सुंदरी भी है जो उस अजनबी मुसाफिर पर भरोसा करती है जिसे वह अपना दिल दे बैठी है—उदात्त पीड़ा में निकम्मी, अलौकिक मधुबाला, वक्त के हाथों थकान की झुर्रियां पड़ने से पहले वाली मीना कुमारी, खुले खेतों में कल्लोल करती नूतन, आतुरता से बारिश को निहारती माला सिन्हा—और बरसों बाद, जिंदगी के अतृप्त, उद्देश्यहीन बहाव को गाती, लता की प्रतिबिंब सुचित्रा सेन. इन स्त्रियों के ऊपर उनके सांगीतिक व्यक्तित्व का खाका बना था. अक्सर ये परित्यक्ताओं जैसी मासूम नायिकाएं हैं, जो कमजोर हैं और कौमार्य की निर्मलता के पहलुओं में फंसी हैं.
उद्योग ने इसे तेजी से समझ लिया और एक श्रम विभाजन किया, जिसमें आशा पर यौन रूप से कम संकोचशील भावों को बयां करने की जिम्मेदारी आ गई. जहां तक लता की बात है, उनकी गणिकाएं भी अंतत: शुद्ध और पवित्र थीं—मुगल-ए-आजम का वह युगल गीत देखिए, जिसमें निरभ्र-निर्मल मधुबाला का मुकाबला कुटिल प्रतिद्वंद्वी से है जिसे शोख शमशाद बेगम ने स्वर दिया था.
लता की सर्वोपरि मौजूदगी एक दूसरे किस्म का एकाधिकार लाई—असल में यह एक-फसल थी, जिसने भारत के अनंत सुरों से भरे ब्रह्मांड को अपना उपनिवेश बना लिया. जो चीजें मंच से रुखसत हो गईं, वे थीं दूसरी आवाजों से बहुत अलहदा ठुमरी की आवाज, तवायफ के तजुर्बे के गाने, भारी आवाज वाली लोक गायिकाएं, धरती का खारापन. यह उनकी गलती नहीं थी, उन दिनों अपनी खाम-ख्यालियों को हम इसी तरह पसंद करते थे—वर्जित और कटी-छंटी, दोषरहित. यही वह असली एकाधिकार है जिससे हम संघर्ष करते हैं. इसलिए हम लता के साथ रहते हैं.
—सुनील मेनन.

