वैक्सीन के उत्पादन में भारत को शुरुआत से ही कई विकसित देशों के मुकाबले बढ़त हासिल थी. भारत दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन उत्पादक देशों में है और देश में ही विकसित टीके सहित तमाम वैक्सीनों के शुरुआती मानव परीक्षणों में अच्छी संभावना दिखाई दी थी. केंद्र को पता था कि अगर इन टीकों को इस्तेमाल की मंजूरी मिल जाए तो ये भारत के लिए वायरस के खिलाफ भरोसेमंद रक्षाकवच बन सकते हैं. अगस्त आते-आते पहली लहर के शिखर तक पहुंचने से पहले केंद्र सरकार ने समग्र टीकाकरण नीति तैयार करने की खातिर कोविड-19 के लिए एक नेशनल एक्सपर्ट ग्रुप ऑन वैक्सीन एडमिनिस्ट्रेशन (एनईजीवीएसी) गठित कर दिया था.
इस ग्रुप ने टीके लगाने की राष्ट्रीय क्षमता के आकलन के लिए फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री) को आमंत्रित किया. उसने कंसल्टेंसी ईवाइ की भागीदारी में एक रणनीति पत्र सौंपा था जिसमें अनुमान जाहिर किया गया था कि प्राथमिकता समूहों के लोगों (करीब 30 करोड़) को अगस्त 2021 और पूरी वयस्क आबादी (करीब 80 करोड़) को 2022 के आखिर तक टीके लगाने और उसके तमाम इंतजामों के लिए 1,30,000-1,40,000 टीका केंद्रों, 1,00,000 पेशेवर स्वास्थ्य कर्मियों और 2,00,000 सहायक कर्मियों की जरूरत होगी.
उसने यह भी अनुमान लगाया था कि टीकाकरण केंद्रों के तौर पर स्वास्थ्य के करीब 60 फीसद बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी. उसने यह भी लिखा था कि सार्वजनिक क्षेत्र केवल 60-70 फीसद मानवबल की पूर्ति ही कर पाएगा यानी निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका की दरकार होगी.
इसके बाद चीजें जल्द ही गड़बड़ा गईं. आबादी के आकार और तेज रफ्तार की जरूरत को देखते हुए केंद्र को चाहिए था कि वह वैक्सीन बनाने के लिए चुनी गई दो संस्थाओं की क्षमता का वास्तविक ढंग से आकलन करता. दिग्गज वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआइआइ) ने कोविशील्ड के निर्माण के लिए एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से हाथ मिलाया था.
उधर भारत बायोटेक ने स्वदेश में ही कोवैक्सिन विकसित करने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को साथ लिया था. ये दोनों मिलकर महीने में 11 करोड़ खुराकें बनाने में सक्षम थीं. हरेक वैक्सीन की दो खुराक की जरूरत को देखते हुए भारत को अपनी पूरी वयस्क आबादी की रक्षा के लिए करीब 2 अरब डोज की जरूरत होती. इस तथ्य के मद्देनजर एनईजीवीएसी को कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर एडवांस बुकिंग की सिफारिश करनी चाहिए थी, जैसा कि अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे देशों ने दूसरे मैन्युफैक्चरर्स के साथ किया था.
यह जानते हुए कि इन दोनों फर्मों के लिए प्रभावी और जल्दी समय सीमा तक मांग पूरी करना व्यावहारिक तौर पर नामुमकिन होगा, उसे आगे बढ़-चढ़कर दूसरी कंपनियों के साथ भी करार की संभावनाएं टटोलनी चाहिए थीं. शांता बायोटेक्निक्स के संस्थापक और प्रेसीडेंट के.आइ. वाराप्रसाद रेड्डी कहते हैं, ''हम तेजी से काम करने में नाकाम रहे.’’
सितंबर के बाद पहली लहर के उतार पर आने की वजह से बेपरवाही से गुमराह होकर एनईजीवीएसी ने अपने सारे दांव भारतीय फर्मों पर लगा दिए. जनवरी में जब उसने टीकाकरण अभियान का ऐलान किया, तो वह बहुत सुस्त रक्रतार से शुरू हुआ. शुरुआत में अगली कतार के और स्वास्थ्यकर्मियों को और कहीं ज्यादा बड़े जोखिम से घिरे 60 साल के ऊपर के लोगों को टीके लगाए गए. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ ओडिशा के स्वास्थ्य अर्थशास्त्री सरित के. राउत कहते हैं, ''सर्वोच्च नीति निर्धारक स्तर पर बेपरवाही ने गफलत पैदा कर दी. सरकार ने मांग को कम करके आंका, यह मानकर कि उसने लड़ाई जीत ली है.’’
एनईजीवीएसी ने दूसरी गलती यह की कि अपनी कोशिशों में निजी क्षेत्र को शामिल नहीं किया. यह जानते हुए भी कि सरकारी सुविधाएं घोर नाकाफी होंगी. अग्रणी उद्योगपति अजीम प्रेमजी ने इस प्रक्रिया को रक्रतार देने के लिए निजी क्षेत्र को बड़े ढंग से शामिल करने की गुहार लगाई लेकिन वह बहरे कानों से टकराकर लौट आई. केंद्र सरकार ने आत्मतुष्ट ढंग से अपनी ढीली-ढाली नीति जारी रखी, जब तक कि मार्च में सूनामी की ताकत से दूसरी लहर ने धावा नहीं बोल दिया.
फिर केंद्र ने एक के बाद एक ताबड़तोड़ ढंग से पहले 45 से ऊपर के लोगों को टीके लगाने की घोषणा की और महीने भर बाद ही कहा कि अब 18 से ऊपर के लोग भी टीके लगाने के पात्र होंगे. रातोरात 75 करोड़ लोग टीकों की कतार में थे, बावजूद इसके कि दोनों भारतीय फर्मों ने कहा कि वे जुलाई तक ही उत्पादन बढ़ा पाएंगी (कमी को देखते हुए केवल नौ राज्य अब तक 18-44 आयु समूह को टीके लगाना शुरू कर पाए हैं).
इस बीच उसने उत्पादन बढ़ाने के लिए एसआइआइ और भारत बायोटेक को 4,500 करोड़ रुपए दिए, जो केंद्रीय खरीद के लिए कहीं ज्यादा सस्ती आपूर्ति की एवज में दिए गए. विशेषज्ञों के मुताबिक यह उसे छह महीने पहले करना चाहिए था. केंद्र ने आपातकालीन आधार पर रूसी वैक्सीन स्पुतनिक के आयात की इजाजत देने का भी ऐलान किया. उसने भारतीय कंपनियों को वैक्सीन बनाने के लिए दूसरी फार्मास्युटिकल कंपनियों के साथ हाथ मिलाने की इजाजत भी दे दी. सरकारी खरीद के एकाधिकार को खत्म करते हुए निजी अस्पतालों से भी कहा गया कि वे निर्माताओं से सीधे वैक्सीन खरीद सकते हैं.
कुछ लोगों का कहना है कि भारत पेटेंट तोड़कर दूसरे घरेलू निर्माता को यह काम सौंप सकता है, पर विशेषज्ञों का कहना है कि यह इतना आसान नहीं. पेटेंट विशेषज्ञ फर्म जीएनए पेटेंट गुरुकुल के संस्थापक और सीईओ गोपाकुमार जी. नैयर कहते हैं, ''पेटेंट कानून के प्रावधान सरकार को 'अनिवार्य लाइसेंसिंग’ का सहारा लेने की इजाजत देते हैं क्योंकि यह राष्ट्रीय आपातस्थिति है, पर मुद्दा यह है कि उन्हें बनाने की क्षमता और तकनीकी जानकारी किसके पास है.’’ खैर टीकों की शुरुआत को लेकर बेपरवाह केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को भारत के टीकाकरण अभियान के इतनी बुरी तरह लडख़ड़ाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेनी ही चाहिए.
—अमरनाथ के. मेनन और पी.बी. जयकुमार
क्या करने की जरूरत
नए लाइसेंस जारी करके वैक्सीन का घरेलू उत्पादन बढ़ाएं
टीकाकरण अभियान में निजी क्षेत्र की फर्मों को शामिल करें
बेहतर वितरण और आयातों के जरिए वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ानी चाहिए.

