महाराष्ट्र के थाणे में रहने वाले नरेश इंदुलकर को अस्पताल में गंभीर हालत में अपने एक रिश्तेदार के लिए फौरन रेमडेसिविर इंजेक्शन के तीन वायल की दरकार थी. आखिर छह घंटे की तलाश के बाद उन्हें दवा की दुकान मिली, जहां वह दवा थी. लेकिन, काउंटर के भीतर बैठा शख्स फुसफुसाया, ''एक वायल 22,000 रु.’’ हालांकि बाजार में उसकी खुदरा कीमत 1,800 रु. ही है. बेहद दुखी मन से इंदुलकर अपने अपार्टमेंट में वापस लौट आए.
उम्मीद की किरण उस समय झलकी, जब उन्होंने अपनी रिहायशी सोसायटी के व्हाट्सऐप ग्रुप पर एक अपील डाली तो एक पड़ोसी का जवाब आया. फोन करने पर पड़ोसी दो मंजिल ऊपर आए और अपने पास बचे रेमडेसिविर के तीन वायल इंदुलकर को देने की पेशकश की. इंदुलकर बताते हैं, ''वे अपने पिता के इलाज के लिए महंगे दाम पर आठ वायल खरीद कर लाए थे. पांच लग गए थे और बाकी वे मुझे बाजार दर पर ही दे गए, अपने घाटे की परवाह नहीं की.’’
उनकी तरह नसीब वाले लोग थोड़े ही होंगे. प्रयागराज के माजिद सबीर कानपुर के एक अस्पताल में दाखिल हुए तो उनके बेटे अब्दुल इस इंजेक्शन के लिए शहर में दवा की दुकानों की खाक छान आए. तब उनसे कहा गया कि जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. अनिल कुमार मिश्र से मिलकर पता लगाएं कि उनके पिता के नाम दवा की सप्लाई आवंटित हुई है या नहीं. लेकिन अब्दुल सीएमओ से मिलने का इंतजार ही कर रहे थे कि अस्पताल से फोन आया कि उनके अब्बा गुजर गए.
इस संकट के समाधान के लिए उत्तर प्रदेश ने हर जिले के जिला मजिस्ट्रेट और सीएमओ को निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए रेमडेसिविर इंजेक्शन का आवंटन करने के लिए नियुक्त किया है. हालांकि दवा की सप्लाई को नाकाफी बताते हुए लखनऊ मेडिकल एसोसिएशन के डॉ. सौरभ सोनकर कहते हैं, ‘‘वे आसानी से (आवंटन) पत्र नहीं देते और उसके बाद भी मरीज की स्थिति को देखकर दवा नहीं जारी की जाती है.’’
वहीं, राज्य के स्वास्थ्य अधिकारी किसी तरह की कमी से इनकार करते हैं. लखनऊ के सीएमओ डॉ. संजय भटनागर कहते हैं, ''निजी अस्पताल रेमडेसिविर इंजेक्शन का इस्तेमाल ठीक से नहीं कर रहे हैं. इसी वजह से मांग में तेजी आई है और लोग उसके लिए परेशान हैं.’’
दवा की कमी पूरे देश में हर ओर एक समान है. 4 मई को राजस्थान हाइकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार को आदेश दिया कि वह डॉक्टर के प्रेसक्रिप्शन के दो घंटे बाद तक मरीज को रेमडेसिविर जरूर मुहैया कराए. (राज्य सरकार ने रेमडेसिविर, टोसिलिजुमाब और कुछ दूसरी खास दवाइयों का वितरण अपने हाथ में ले लिया है.
इसके तहत राजस्थान मेडिकल सेवा निगम उनका भंडारण करेगा और मरीज के प्रेसक्रिप्शन की आवंटन समिति की समीक्षा के बाद दवा जारी कर देती है.) दुर्भाग्य से कई लोगों को इस संकट के समय में आसान कमाई का मौका सूझता है. भोपाल में रेमडेसिविर इंजेक्शन बालाबाजार में बेचने के लिए तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया. यही नहीं, सरकारी गांधी मेडिकल कॉलेज दवा स्टोर से 800 वायल गायब पाए गए. हैदराबाद में फर्जी दवा बनाने और बेचने के जुर्म में पांच लोग गिरफ्तार किए गए.
दवा की इस कमी की कई वजहें हैं. पिछले साल के आखिर में मांग घटने के बाद उत्पादन में कटौती और आपात भंडारण के निर्माण तथा उसके कायम रखने में सरकार की नाकामी भी इनमें शामिल है. दवा का ईजाद करने वाली जीलीड लाइफ साइंसेज ने पिछले साल इसे भारत में उत्पादन के लिए सात मैन्युफैक्चरर्स को लाइसेंस दिया.
ये कंपनियां हैं सिपला, हेटरो ड्रग्स, जाइडस कैडिला, माइलॉन लैब्स, डॉ. रेड्डीज लैब्स, सिनजीन और जुबिलेंट इंग्रेविया. सूत्रों का कहना है कि पिछले साल के अंत में मांग काफी घट गई थी, उत्पादन भी अवरुद्ध हो गया था. लेकिन जिस तेजी से संक्रमण में उछाल आया—फिलहाल तकरीबन 4,00,000 रोजोना—उससे मैन्युफैक्चरर्स और डिस्ट्रब्यूटर्स अवाक रह गए और जो भी भंडारण था, वह तेजी से खप गया.
मार्च में जब उत्पादन शुरू हुआ, तो सरकार ने उत्पादन बढ़ाने की अनुमति दी. इसमें हेटरो ड्रग्स सबसे बड़ा मैन्युफैक्चर है जो महीन में 13 लाख वायल का उत्पादन करता है. उसके बाद सिपला (7,60,000), जाइडस कैडिला (6,10,000), माइलान लैब्स (5,00,000) और डॉ. रेड्डीज लैब्स, सिनजीन और जुबिलैंट इंग्रेविया (2,40,000 प्रत्येक) का नंबर आता है. अप्रैल के आखिरी हक्रते में सरकार ने रेमडेसिविर उत्पादन के 25 और जगहों को मंजूरी दी, ताकि उत्पादन महीने में 90 लाख से ज्यादा बढ़ाया जा सके.
भारतीय दवा निर्माता संघ महासचिव दारा बी. पटेल कहते हैं, ''इन मैन्युफैक्चरिंग संयंत्रों में से केवल दस में ही उत्पादन शुरू हो पाया है.’’ केंद्रीय रसायन और उर्वरक राज्यमंत्री मनसुख मांडविया कहते हैं कि इन संयंत्रों में उत्पादन शुरू होते ही, देश में रेमडेसिविर का उत्पादन तीगुना हो जाएगा, ''और जल्दी ही हम बढ़ती हुई मांग को पूरा कर सकेंगे.’’
मेडिकल क्षेत्र में सरकारी उपक्रम एचएलएल लाइफ केअर ने भी अमेरिका के जीलीड साइंसेज और मिस्र के इवा फर्मा को रेमडेसिविर के 4,50,000 वायल का ऑर्डर दिया है. इसकी 75,000 वायल की पहली खेप आ भी चुकी है.
वहीं, घरेलू उत्पादन में तेजी लाने के लिए राजस्व विभाग ने 20 अप्रैल को रेमडेसिविर, उसके सक्रिय रासायनिक कच्चे माल और उत्पादन के इस्तेमाल में आने वाला रसायन बेटा—साइक्लोडेक्सट्रिन पर सीमा शुल्क 31 अक्तूबर तक माफ कर दिया है. इसकी कीमतों में अनाप-शनाप बढ़ोतरी पर लगाम लगाने की कोशिश में नेशनल फर्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने 17 अप्रैल को दवा की कीमत पर 3,500 रु. की अधिकतम सीमा लगा दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल को पूछा कि क्या केंद्र कोविड-19 की दवाइयों की उपलब्धता में सुधार करने के लिए पेटेंट्स ऐक्ट पर अमल करने की सोच रहा है, ताकि जीवनरक्षक दवाइयों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए पेटेंट संरक्षा को दरकिनार किया जा सके. रेमडेसिविर तो सिर्फ उनमें एक दवा है, जिनकी फिलहाल कमी जानलेवा साबित हो रही है. दूसरी दवाइयों में टोसिलिजुमाब और इवरमेक्टिन शामिल है. ऑक्सीजन की भारी कमी के साथ सप्लाई के इस संकट ने देश के लोगों के लिए महामारी को जानलेवा बना दिया है.
—साथ में पी.बी. जयकुमार
क्या करने की जरूरत
रेमडेसिविर और दूसरी दवाइयों का उत्पादन बढ़ाकर उनके वितरण को दुरुस्त किया जाए
दवा उत्पादन के लिए जरूरी हर कच्चे माल और दूसरे अवयव का आयात आसान किया जाए
तीसरी लहर को ध्यान में रखकर उत्पादन बढ़ाने और पर्याप्त भंडारण के लिए लाइसेंस अनिवार्य करें.

