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डार्क मोड

आवरण कथाः आखिर कहां है राज्य

सरकार ने तो खैर अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहते हुए भी सियासी लाभ हासिल करने पर ध्यान केंद्रित रखा, लेकिन न्यायपालिका और चुनाव आयोग से भी इससे ज्यादा की भूमिका भी अपेक्षा थी.

धर्म की जय हो महा शिवरात्रि पर 11 मार्च को कुंभ मेले में स्‍नान करते भक्त
धर्म की जय हो महा शिवरात्रि पर 11 मार्च को कुंभ मेले में स्‍नान करते भक्त
अपडेटेड 14 मई , 2021

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने जब पिछले साल देशव्यापी तालाबंदी की घोषणा की थी, उस समय देश में कोविड मामलों की संख्या 618 थी. इसके ठीक एक साल बाद, देश में कोविड संक्रमण के 30 लाख सक्रिय और कुल मिलाकर 1.10 करोड़ मामले हो चुकने के बाद भी भारत दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक कुंभ मेले की तैयारी कर रहा था जिसे 1 अप्रैल से शुरू होना था.

हालांकि देश भर के विशेषज्ञों ने इस आयोजन के खिलाफ चेतावनी दी थी, तब भी प्रशासन बहरा बना रहा. इस आयोजन के दौरान भी राज्य सरकार विज्ञापनों के माध्यम से कोविड से सुरक्षा के नियमों का पालन करने के बारे में जबानी जमा-खर्च करती रही. लेकिन सिरफिरों के अलावा सभी को मालूम था कि लाखों लोगों के इस मेले में कोविड नियमों का पालन करना संभव नहीं होगा. उत्तराखंड के मुक्चयमंत्री तीरथ सिंह रावत की घोषणा थी,   ''आस्था कोविड-19 के डर पर भारी पड़ेगी. ’’ अफसोस कि इससे बीमारी को भगाया नहीं जा सका.

हर दिन सामने आने वाले नए मामलों का आंकड़ा 2,00,000 के पार पहुंचने के बावजूद न तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने और न ही राज्य सरकार ने कुंभ को रोकने की इच्छा दिखाई. महीने भर चलने वाले इस आयोजन में प्रतीकात्मक रूप से भाग लेने का अनुरोध करने में प्रधानमंत्री मोदी को 17 दिन का समय लग गया. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने 11 राज्यों के अपने समकक्षों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान कोविड मामलों में आई तेजी के लिए जनता को जिम्मेदार ठहराया.

उन्होंने कहा, ''चुनाव और धार्मिक आयोजन हुए हैं... सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने वाले लोग नियमों का पालन नहीं करते, भीड़-भाड़ वाली बसों और ट्रेनों में भी मास्क नहीं पहनते.’’ यह कहते हुए वे भूले रहे कि उनकी ही सरकार ने ऐसे आयोजनों को बेरोकटोक होने दिया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय इन आयोजनों को रोकने के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम (डीएमए) को लागू कर सकता था. लेकिन इसके बजाय जब 27 अप्रैल को 25,000 लोगों की बिना मास्क लगाए भीड़ हरिद्वार में पवित्र स्नान के लिए पहुंची तो इसने नजरें फेर लीं.

खुद राजनेताओं के ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिनमें उन्होंने कोविड प्रोटोकॉल की खुलेआम धज्जियां उड़ाई हैं. उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र विकास अघाड़ी के संरक्षक और एनसीपी प्रमुख शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले को इस साल की शुरुआत में पुणे में एक शादी में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के निर्धारित मेहमानों की संख्या की अनिवार्य सीमा 50 से अधिक मेहमानों के साथ देखा गया था.

14 अप्रैल को बॉम्बे हाइ कोर्ट ने रमजान के दौरान नमाज अदा करने के लिए एक साथ 50 नमाजियों को आने देने की जुमा मस्जिद ट्रस्ट की याचिका खारिज कर दी. लेकिन इसके दो दिन बाद दिल्ली हाइ कोर्ट ने राजधानी के निजामुद्दीन मरकज को ऐसी ही अनुमति दे दी क्योंकि ''केंद्र सरकार अभी तक सभी धार्मिक स्थानों पर सभाओं पर प्रतिबंध लगाने के बारे में निर्णय नहीं ले पाई है’’ और दिल्ली से 200 किमी दूर कुंभ मेला चल रहा था.

इसी सब के बीच, देश ने असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुच्चेरी में बड़े पैमाने पर चुनावी रैलियां देखीं. प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत सभी शीर्ष नेताओं ने इन रैलियों में भाग लिया जिनमें हजारों लोग इकट्ठे हुए. इस दौरान चुनाव आयोग मूकदर्शक बना रहा. शाह पर डीएमए के तहत कोविड से संबंधित उपायों को लागू करने की जिम्मेदारी थी, लेकिन वे कई राज्यों में भीड़ भरी रैलियों को संबोधित करते रहे. 

अंतत: कोलकाता हाइ कोर्ट को हस्तक्षेप करते हुए चुनाव अधिकारियों को फटकारना पड़ा तब कहीं चुनाव आयोग हिला और कार्रवाई की. आयोग ने पश्चिम बंगाल में बड़ी रैलियों और रोडशो पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन तब तक राज्य में कोविड पॉजिटिविटी दर एक महीने पहले के दो प्रतिशत से 22 प्रतिशत तक पहुंच चुकी थी.

हालांकि चुनावी रैलियों और कोविड मामलों की वृद्धि के बीच सहसंबंध स्थापित करने वाले बहुत ज्यादा साक्ष्य नहीं हैं, फिर भी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाइ. कुरैशी का कहना है कि चुनाव आयोग के पास शक्ति थी कि वह सार्वजनिक बैठकों पर प्रतिबंध लगाकर केवल वर्चुअल प्रचार की अनुमति देता.उनका कहना है कि ''कोविड संबंधी दिशानिर्देशों में कोई कमी नहीं थी, लेकिन इन्हें लागू करवाना चुनाव आयोग के अधीन था, जिसमें वह विफल रहा.’’

26 अप्रैल को मद्रास हाइ कोर्ट ने दूसरी लहर के दौरान वायरस के प्रसार के लिए ‘अकेले’ चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया. लेकिन अदालतों की ये कार्रवाइयां स्वप्रेरित नहीं थीं बल्कि अधिकारियों से कार्रवाई करने की आम नागरिकों की अपीलों पर व्यन्न्त प्रतिक्रियाएं थीं. उधर, चुनाव आयोग अपनी गलतियों को स्वीकार करने के बजाए बचाव की मुद्रा में आ गया और संचार माध्यमों का मुंह बंद करवाने के प्रयास में लग गया. उसने मद्रास हाइ कोर्ट की टिप्पणी को भी ‘अवांछित’ बताया. उसकी अपीलें खारिज हो गईं, लेकिन नुकसान तो पहले ही हो चुका था.

क्या करने की जरूरत

टाले जा सकने योग्य सामाजिक और धार्मिक सार्वजनिक कार्यक्रमों के आयोजन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए; दें तो कोविड सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन करवाना चाहिए.

सभी सांविधानिक निकायों तथा सरकारी संगठनों को ऐसे कार्यक्रम स्थगित कर देने चाहिए जिनमें लोगों की भारी भीड़ जुटती हो.

न्यायपालिका को कोविड नियमों के किसी भी तरह के उल्लंघन का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए और सुधारात्मक निर्देश जारी करने चाहिए.

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