2020 में भारतीय अधिकारियों ने कोविड 19 के खिलाफ जंग में टी3 प्रोटोकॉल यानी टेस्ट, ट्रीट और ट्रैक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था. लेकिन, 2021 में दूसरी लहर के वक्त सबसे ज्यादा संक्रमण वाले राज्य भी इसका पालन करते नहीं दिखते. अनवार्य क्वारंटीन पर भी जोर नहीं दिया जा रहा है. दूसरी लहर में संक्रमण तेजी से फैलने की बड़ी वजह यही है.
मसलन, मध्य प्रदेश में हालात ज्यादातर राज्यों जैसे ही हैं. राज्य सरकार के एक आला अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘‘पिछले साल अप्रैल से अगस्त तक टी3 प्रोटोकॉल का बहुत प्रभावी ढंग से पालन किया गया था.’’ लेकिन अगस्त के बाद उसमें ढीलाई आती गई. वरिष्ठ अधिकारियों तथा सियासी नेतृत्व की तरफ से जिलाधिकारियों पर कोई दवाब न रह जाने के कारण पूरे राज्य में कोविड के संपर्क में आए लोगों की निगरानी (कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग) बंद हो गई.
इस साल अप्रैल के पहले हफ्ते में मामलों में आए उछाल ने राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को ध्वस्त कर दिया. स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, ''अब हमें हर तरह की मदद चाहिए. हमारे पास कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग लागू करने के लिए कर्मचारी नहीं हैं.’’
यह तब है जब गृह मंत्रालय ने 23 मार्च को राज्यों से टी3 प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करने के दिशा-निर्देश जारी कर दिए थे. फिर भी राज्य के कुछ अधिकारी इस ट्रेसिंग कार्यक्रम को स्थगित करने के फैसले को सही ठहरा रहे हैं. मध्य प्रदेश के मेडिकल शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग कहते हैं, ''हम बड़े पैमाने पर आक्रामक रूप से टेस्ट कर रहे हैं. रोजाना 60,000 टेस्ट किए जा रहे हैं. जब जागरूकता की कमी थी तब कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग वक्त की जरूरत थी. अब लोग जांच करवाने खुद आगे आ रहे हैं.’’
यहां तक कि दूसरी लहर की बुरी मार खाने वाले महाराष्ट्र में भी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग नगण्य है. 2 मई को घर पर क्वारंटी किए गए लोगों की संख्या 40 लाख थी, लेकिन राज्य के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी कहते हैं कि मरीजों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की निगरानी के लिए कोई व्यवस्था नहीं है. राज्य ने पिछले साल से इस मसले पर अपनी कोशिशें धीरे-धीरे कम कर दी हैं. जून, 2020 में सूबे में ‘चेज द वायरस’ कार्यक्रम लॉन्च किया गया था, जिसका मकसद हर कोविड पॉजिटिव शख्स के संपर्क में आए कम से कम 20 लोगों का पता लगाना था.
बाद में, इसकी जगह 'मेरा परिवार, मेरी जिम्मेदारी’ कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसमें जांच में पॉजिटिव आए लोगों की सूचना स्थानीय निकाय के अधिकारियों तक देने की जिम्मेदारी परिजनों पर डाल दी गई थी. इस साल फरवरी में सरकार ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की अपनी कदमों को पूरी तरह से समेट लिया, और एक नया कार्यक्रम शुरू किया गया जिसका मकसद मास्क पहनवाना और सैनिटाइजेशन पर जोर देना था. कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की कोशिशों पर महाराष्ट्र के अनमनेपन पर केंद्र सरकार की भी निगाह चली गई.
मार्च में केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव सीताराम कुंते को इस बाबत एक खत लिखा: 'क्वारंटीन के संपर्क में आए लोगों (महाराष्ट्र में) को ट्रैक, टेस्ट और आइसोलेट करने में सक्रिय कोशिशें बेहद सीमित हैं.’ राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे कहते हैं कि उन्होंने सभी जिलाधिकारियों और म्युनिसिपल कमिश्नरों को यह तय करने को कहा है कि कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की कोशिशों को मजबूत बनाया जाए, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति बहुत आशाजनक नहीं है, जहां अधिकारी पहले से ही चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के काम से दबे हुए हैं.
अन्य राज्यों मे भी हालात ऐसे ही हैं. पश्चिम बंगाल में अधिकारियों का कहना है कि कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर बुरा असर पड़ा है क्योंकि टेस्टिंग सुविधाओं का काफी बोझ है. एसोसिएशन ऑफ हेल्थ सर्विस डॉक्टर्स के सचिव डॉ. मानस गुम्टा कहते हैं, ''हम 55,000 टेस्ट रोजाना कर सकते हैं. और रोज के मरीजों की संख्या करीब 17,500 है. अगर मान लें कि हर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में सिर्फ चार लोग भी आए होंगे तो भी हमें 70,000 टेस्ट करने होंगे. हमारे पास इतनी क्षमता ही नहीं.’’
इसी वजह से जांच के नतीजे आने में कभी-कभी 72 घंटों तक की देरी होती है. डॉ. गुम्टा कहते हैं, ''इस देरी की वजह से बीमारी का तेजी से फैलाव हो रहा है क्योंकि ट्रेसिंग या ट्रैकिंग मुमकिन नहीं हो पा रही. हम उन लोगों की पहचान नहीं कर पा रहे जो मरीज के संपर्क में आए थे और जिन्हें आइसोलेट करने की जरूरत है. जब तक हम कोविड अस्पतालों, प्रयोगशालाओं और टेक्नीशियनों की संख्या नहीं बढ़ाएंगे, हम कोविड संक्रमण की दूसरी लहर को थाम नहीं पाएंगे.’’
यहां तक कि पहली लहर में बेहतर काम करने वाले राज्य भी इस दफा कमजोर साबित हो रहे हैं. बिहार में नए मामलों की संख्या जिस गति से बढ़ी है, उससे रहा-सहा चिकित्सा ढांचा भी भरभरा गया है. 2 मई तक राज्य में 1,00,000 से ज्यादा सक्रिय मामले थे, और सूबे ने अपनी प्राथमिकता ट्रेसिंग से हटाकर उपचार पर कर दी.
एक जिलाधिकारी की माने तो सरकारी अधिकारी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग करने को लेकर अनिच्छुक दिखते हैं. उक्त अधिकारी ने कहा, ‘‘यह अनकही सचाई है कि बीमारी कंटेनमेंट के उपायों के मुकाबले अधिक तेजी से फैल रही है—इसलिए ऐसा कुछ करने में अपने संसाधन बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं, जिसका कोई फायदा नहीं होने जा रहा.’’
हालांकि, अधिकतर राज्यों ने कर्मचारियों की कमी को सबसे अहम समस्या माना है, ऐसे में तकनीक लोगों की जरूरत को कम करने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती है. मसलन, पहली लहर के दौरान काफी प्रचारित किया गया कि केंद्र सरकार का आरोग्य सेतु ऐप सही दिशा में उठाया गया कदम था. जो लोग कोविड-19 पॉजिटिव पाए गए थे, उनसे उम्मीद की जाती थी कि वे जांच के नतीजे ऐप पर अपलोड करेंगे, इससे डाटा एंट्री के लिए कर्मचारियों की जरूरत कम होगी. इस निर्देश का पालन बेहद कम हुआ है.
यही स्थिति बरकरार रही तो एकमात्र विकल्प लॉकडाउन होगा ताकि संक्रमण के प्रकोप की कड़ी टूट सके और संक्रमण की दर कम की जा सके. बहरहाल, दूसरी लहर के आॢथक नतीजे भी भारी होंगे, जैसा कि पिछले साल के देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान दिखा था. यह बात मानी जा चुकी है कि सावधानी और परहेज हमेशा इलाज से बेहतर होती है. उस लिहाज से टी3 प्रोटोकॉल की व्यापक रूप से बहाली बेहद जरूरी है.
—साथ में किरण डी.तारे, रोमिता द्ता और अमिताभ श्रीवास्तव
40
लाख लोग
महाराष्ट्र में होम क्वारंटीन में थे 2 मई तक. अधिकारियों का कहना है कि उनके पास इनके कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की कोई व्यवस्था नहीं है
क्या करने की जरूरत
कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की प्रक्रिया प्राथमिकता के आधार पर बहाल की जाए, वरना इस वायरस के फैलाव पर रोक का कोई और रास्ता नहीं
कर्मचारियों की कमी पर ध्यान देना जरूरी, अधिक टेक्नीशियन, लैबकर्मी और मेडिकल पेशेवरों की जरूरत
तकनीक का इस्तेमाल हो—मसलन, आरोग्य सेतु ऐप के निर्देशों का अधिक पालन करने से ट्रेसिंग के लिए कम कर्मचारियों की जरूरत होगी.

