कोविड पॉजिटिव: 31 मार्च
स्थति: 14 अप्रैल को जांच में निगेटिव
जगह: दिल्ली
काइ फ्रीजे, मैनेजिंग एडिटर
आपदाओं के भी अपने मजेदार पक्ष होते होंगे, लेकिन हमारे दौर की यह कयामत की सी रात इतनी लंबी हो गई है कि इसमें कोई ह्यूमर देख पाना मुश्किल है. हां, अगर आप बोझिल, सारगर्भित, विडंबनापूर्ण चीजों में भी विनोद खोज सकें तो अलग बात है. ऐसी हालत में तो लगता है कि आप क्वारंटीन की एक लंबी डरावनी यात्रा पर हैं और खुद अलानिस मॉरुशेट मक्खी की तरह भुनभुना रहे हैं.
मैं सचमुच ऐसा आदमी हूं जो हवाई यात्रा से डरता था—और महामारी के बाद की अपनी पहली हवाई यात्रा से लौटने के अगले दिन मुझे कोविड होने का पता चला. मजे की बात देखिए कि उस दिन मैंने अपने कोविड के पहले टीके के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था. जाहिर है कि वह मौका बेकार गया—पर कितना विडंबनापूर्ण है! आपको नहीं लगता?
फिर सारी बातें व्यर्थ होने का बोध. दूसरों को संक्रमित करने के डर के अलावा—एक विडंबनापूर्ण विनोद यह भी था कि मैं ‘लुटियंस का तब्लीगी’ था—यह एक बहुत बड़ी बीमारी थी. मुझे पता है, मैं भाग्यशाली था और जब मेरा संक्रमण ठीक होने की ओर बढ़ रहा था, उस दौरान मेरे तीन दोस्तों को अस्पताल में भर्ती कराया गया.
एक और भद्दा मजाक यह था कि इसे कोविड की ‘सेलिब्रिटी लहर’ बताया जा रहा था, जिसने सचिन तेंडुलकर, आलिया भट्ट, फारुक अब्दुल्ला समेत कई बड़ी हस्तियों को अपनी चपेट में लिया था. उससे उस लोकप्रिय अफवाह को बल मिलता है कि यह अमीरों की बीमारी है. यह अपने आप में कहीं अधिक विडंबनापूर्ण आक्षेप था. असल में, मैं घरेलू सहायक का काम करने वाली उस महिला की तीखी फटकार के निशाने पर था, जिसने मेरे बीमार होने से एक दिन पहले एक दोस्त के घर पर मुझे रात का खाना परोसा था.
यह सुनने के बाद कि मैं कोविड संक्रमित पाया गया हूं, उसने काम पर आने से मना कर दिया और शिकायत की कि मैंने जांच कराके गलत किया है! यह कहते हुए कि जांच कराने से ही बीमारी होती है, उसने मेरे दोस्त को बताया कि बीते कुछ महीनों में उसमें कोविड के कई लक्षण दिखे थे, पर उसने कोविड की जांच कभी नहीं कराई और इसीलिए उसे कोविड नहीं हुआ!
मुझे यह काफी मजेदार लगा, बीमारी के लिए श्रोडिंजर के अनिश्चितता के सिद्धांत की तरह जो बिल्ली को एक ही समय जीवित भी मानता है और मृत भी. इस बीच, परिजनों-दोस्तों से मुझे तरह-तरह की सलाह मिलती रही जिसमें सभी ने ज्यादा भरोसा एक घरेलू उपाय पर जताया, ‘‘अपने फेफड़ों को मजबूत करने’’ के लिए भाप लेना.
यह क्वारंटीन की ऊब से भन्नाए व्यक्ति के साथ क्रूर मजाक जैसा लग रहा था, इसलिए मैंने अपने डॉक्टर से पूछा कि क्या वाकई यह काम करेगा? उस पर प्रतिक्रिया देते समय मैंने डॉक्टर की आंखों को अपने फोन स्क्रीन पर आंखे नचाते किसी इमोजी की तरह पाया. उन्होंने शालीन लेकिन वास्तविक विडंबना के साथ कहा, ‘‘जरूरी नहीं.’’

