scorecardresearch
डार्क मोड

सुर्खियों के सरताजः बदल गया जिंदगी का ढर्रा

सामाजिक कैद ने जिंदगी जीने का नया तरीका पैदा कर दिया. अचानक घर ही वह जगह थी जहां आप काम भी करते थे और खेलते भी थे तथा टेक्नोलॉजी हमें बाहर की दुनिया से जोड़ने वाला पुल बन गई.

सामंजस्य की कला अप्रैल, 2020 में लॉकडाउन के दौरान अमृतसर में अपने घर में क्रिकेट खेलते बच्चे
सामंजस्य की कला अप्रैल, 2020 में लॉकडाउन के दौरान अमृतसर में अपने घर में क्रिकेट खेलते बच्चे
अपडेटेड 9 जनवरी , 2021

सुर्खियों के सरताज
कोविड-19: घर और समाज

--चुमकी भारद्वाज और रिद्धि काले

यह कहना शायद मुनासिब होगा कि महामारी हमारे वक्त की सबसे बड़ी समतावादी साबित हुई है, जिसने सबको तकरीबन एक समान धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया. नई चुनौतियों ने जिंदगियों और आजीविकाओं पर विराम लगा दिया और हर किसी का हर रोज इस तरह बदल दिया जो तबाही दिखाने वाली जॉम्बी फिल्मों की याद दिलाता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रेयी कॉलेज में समाजशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर अनुऋता जालान कहती हैं, ‘‘कोविड-19 ने समाज, व्यक्तियों और परिवारों और उनके आपसी रिश्तों पर गहरा असर डालते हुए बड़े से छोटे स्तरों तक रिश्तों को नई इबारतों में ढाल दिया. उधर लोग अपने घरों में काम की जगहें निकाल रहे थे, इधर लैंगिक रिश्ते भी नए सांचों में ढल रहे थे.’’ बदकिस्मती से काम और घर के लिए साझा भौतिक जगह का मतलब घर के काम मिल-जुलकर करना ही नहीं है, यह औरतों और बच्चों के खिलाफ ज्यादा घरेलू हिंसा की शक्ल में भी सामने आया.

फोर्टिस हेल्थकेयर के मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार विज्ञान विभाग के डायरेक्टर डॉ. समीर पारिख के मुताबिक, महामारी बहुत सिखाना वाला तजुर्बा रही. वे कहते हैं, ‘‘हमें एहसास हुआ कि कम से कम में जिंदगी बसर करना भी संभव है और लोगों में खुद को ढालने की जबरदस्त क्षमता है—घर पर पढ़ाई-लिखाई इसकी अहम मिसाल है. नया सामाजिक जुड़ाव भी आया है.’’ डॉ. पारिख के लिए सबसे अलहदा टेलीमेडिसिन में इजाफा रहा, ''दूसरों तक पहुंचना शानदार रहा है. मैं कॉर्पोरेट, स्कूलों और विभिन्न लोगों से जुड़ पाया. टेलीमेडिसिन ने देश भर के मरीजों के घरों तक पहुंचने में हमारी मदद की.’’

परिवार पहले
वर्क फ्रॉम होम ने पारिवारिक रिश्तों को मजबूत किया, खासकर अलग-अलग पीढिय़ों के बीच के रिश्तों को, जैसे बच्चे टेक्नोलॉजी नहीं जानने वाले अपने दादा-दादी और नाना-नानी की मदद कर रहे थे. डॉ. पारिख कहते हैं, ‘‘सामाजिक दूरी बुजुर्गों के लिए कई चुनौतियों से भरी हो सकती है क्योंकि वे ज्यादा अकेला और अलग-थलग महसूस कर सकते हैं तथा रोजमर्रा की जिंदगी के तकाजों से निपटते हुए इस तजुर्बे ने उनकी व्यग्रता बढ़ा दी.’’ वे कहते हैं कि ऐसे वक्त में जुड़े रहने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तालमेल बिठाने की कोशिश ज्यादा हो सकता है.

चेन्नै की शिक्षिका 56 वर्षीय एन. अनुराधा, जो अपनी 80 बरस की मां के साथ रहती हैं, कहती हैं कि उनके माता-पिता को जो सबसे बड़ी लड़ाइयां लडऩी पड़ीं, वे दिमाग की लड़ाइयां थीं. वे कहती हैं, ‘‘2019 में मेरे पिता के गुजर जाने के बाद मेरी मां की भावनात्मक स्थिति अक्सर बिगड़ जाती थी. लॉकडाउन के वक्त से कहीं आ-जा न पाने के कारण यह और भी तीव्र हो गई.’’

आने-जाने पर रोक अकेली मुश्किल नहीं है. जालान कहती हैं, ‘‘कैद रहने और भौतिक जगह कम हो जाने के कारण पहले से तनातनी के रिश्तों वाले परिवारों में तनाव बढ़ गया और बुजुर्गों के साथ बदसुलूकियां हुई. अकेले लोगों के लिए भी अकेलेपन और असुरक्षा से लडऩा, वह भी आम तौर पर वैकल्पिक समर्थन आधार का काम करने वाले सामाजिक जुड़ावों के बगैर, खासी चुनौती रहा है.’’

हिंसा, नई आम बात
नई दिल्ली की मनोवैज्ञानिक और दो हेल्पलाइन—कोरोना क्राइसिस फॉर इंडिया (9151909090) और साइकोलॉजिस्ट फॉर इंडिया (9000070839)—से जुड़ी हिप्नोथिरैपिस्ट प्रेरणा भारद्वाज बताती हैं कि घरेलू हिंसा से परेशान लोगों के कॉल में 50 फीसद का उछाल आया.

वे कहती हैं, ‘‘लॉकडाउन के आसपास ये कॉल चरम पर थे, पर समस्या आज भी कायम है.’’ भावनात्मक बदसुलूकी झेल रहे लोगों में तेज इजाफा हुआ. वे कहती हैं, ‘‘ऐसे मामलों में चोटें दिखाई नहीं देतीं, पर नुक्सान शारीरिक बदसुलूकी जितना ही होता है.’’ भारद्वाज को शादी के झगड़े निपटाने के लिए कई कॉल मिले. जीवनसाथी के साथ घर पर ज्यादा वक्त बिताने के चलते ऐसे झगड़े और बढ़ गए.

बच्चों पर असर
लॉकडाउन ने बच्चों की भी मानसिक सेहत पर भी असर डाला. पढ़ाई ऑनलाइन होने लगी तो डिजिटल विभाजन की वजह से कइयों ने पीछे छूटा हुआ महसूस किया. जालान कहती हैं, ‘‘टेक्नोलॉजी (स्मार्टफोन, कंप्यूटर, इंटरनेट) कइयों के लिए लक्जरी है. वहीं, यह विशेष जरूरतों वाले लोगों को हाशिए पर डाल देती है.’’ दिल्ली की मनोवैज्ञानिक और स्पेशल एजुकेटर विजया दत्ता कहती हैं कि विशेष जरूरतों वाले बच्चों और उनके माता-पिता को मुश्किलें झेलनी पड़ीं. वे कहती हैं, ‘‘इन माता-पिता को बहुत जूझना पड़ा.’’

मुंबई की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट और साइकोथिरैपिस्ट वर्खा चुलानी कहती हैं कि 12 साल के कम उम्र के बच्चों को सामाजिक पाबंदियों से निपटने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. वे कहती हैं, ‘‘बच्चे बौद्धिक रूप से इतने विकसित नहीं होते कि उस स्थिति से निपट पाएं जिसमें आमने-सामने बातचीत की जगह सब कुछ वर्चुअल ढंग से हो रहा हो.

इसका असर उनकी शारीरिक सेहत पर भी पड़ा, उनका वजन बढ़ गया और आंखों तथा एंडोक्राइन सिस्टम में गड़बडिय़ां होने लगीं.’’ भीतर ही भीतर बढ़ रही हताशा और कुंठा से जूझ रहे किशोर-किशोरियों में उन्होंने दुश्चिंता की परेशानियां देखीं. वे कहती हैं, ‘‘सबके घर बड़े नहीं होते. सिकुड़े हुए माहौल की वजह से निराशा और मोहभंग कई गुना बढ़ गया. खुद को नुक्सान पहुंचाने के मामलों में भी इजाफा हुआ.’’

उज्जवल पक्ष यह रहा कि सामाजिक कैद की वजह से माता-पिता को अपने बच्चों के साथ ज्यादा जुडऩे और रचनात्मक होने का मौका मिला. नोएडा में रहने वाली 36 वर्षीय श्रेया शर्मा की बेटी अद्वैता को जब स्कूल से किताब के प्रिय किरदार की तरह सजने-संवरने का प्रोजेक्ट मिला, तो इसे उन्होंने अपनी पांच साल की बेटी को कला और कलाकारों के बारे में सिखाने के मौके की तरह लिया. शर्मा कहती हैं, ‘‘अद्वैता को न केवल खूब मजा आया बल्कि कलाकारों और उनके काम के बारे में उसकी जानकारी भी बहुत ज्यादा बढ़ गई है.’’

मगर चुलानी शायद इस बड़ी तस्वीर का लब्बोलुबाव बयान करती हैं जब वे कहती हैं कि ‘‘महामारी से लाभ हासिल करने वाले हर तीन बच्चों पर सात बच्चे ऐसे थे जिन्हें जद्दोजहद करनी पड़ी.’’

लॉकडाउन की सीख
लॉकडाउन की सीख

ऑनलाइन—नई जीवनरेखा
ऑनलाइन मीडियम ने जिंदगी को नाटकीय ढंग से बदल दिया है. ऑनलाइन क्लास हो या जूम पार्टियां, इंस्टाग्राम हों या फेसबुक फ्रेंडशिप या गूगल मीट सेशन, हमारी जिंदगियों का हर पहलू अब इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए व्यक्त हो रहा है. इस कदर कि मुंबई में स्टुडियो निशिता कामदार चलाने वाली आर्किटेक्ट निशिता कामदार के पास ग्राहकों की जूम/वीडियो बैकड्रॉप उक्वदा बना देने की मनुहारों की बाढ़ आ गई. वे कहती हैं, ''लोग अपने वॉलपेपर पर बड़े-बड़े छापे चाहते हैं क्योंकि ये वीडियो कॉल पर बेहतर दिखाई देते हैं.’’

मिशेलिन स्टार शेफ सुवीर सरन के लिए महामारी कायापलट करने वाली रही. वे कहते हैं, ''महामारी मुझे उन लोगों के और नजदीक ले आई जो मेरी जिंदगी को उम्मीद और प्रेरणा से भर देते हैं.’’ लोगों के साथ अपनी पाक शैलियां साझा करने के लिए सरन ने सोशल मीडिया का रुख किया. उनके फूड वीडियो में कई साथी शेफ के साथ बातचीत भी होती है. वे कहते हैं, ''एक दूसरे के साथ हमारी नोंक-झोंक और ईमानदार बातचीत में हमारे फॉलोवर्स को ध्यान बंटाने वाला तसल्लीबख्श हल्का-फुल्कापन मिलता है.

हमारे शुरू करने के बाद इंस्टाग्राम पर मेरे फॉलोवर तकरीबन चौगुने बढ़कर 1,57,000 हो गए.’’ टेक्नोलॉजी में राहत पाने वाले सरन अकेले नहीं हैं. दिल्ली के मार्केटिंग प्रोफेशनल शिवम दीवान ने नवंबर में अपनी शादी को फेसबुक पर लाइवस्ट्रीम करने का फैसला लिया ताकि उनके कई परिजन और दोस्त, खासकर विदेशों से आने वाले, इसमें शामिल होने से छूट न जाएं.

फलक के दूसरे छोर पर, दिल्ली के दोस्तों योगी सूरी, ऋषि राणा और मुदित पाराशर ने जून में एक दोस्त के अंतिम संस्कार से जुडऩे के लिए यूट्यूब लिंक का इस्तेमाल किया. उन्होंने मृतक दोस्त के मुंबई, पुणे और अमेरिका में रह रहे परिवारों के लिए हरिद्वार में उसका अस्थि विसर्जन लाइवस्ट्रीम किया. ऋषि कहते हैं, ''यह आदर्श तो नहीं था, पर मौजूदा हालात में हम एहसानमंद थे कि हम उम्मीद की उस किरण का पीछा कर पाए जो ललकारते काले बादलों के साथ आती है.’’ 

—चुमकी भारद्वाज और रिद्धि काले

ADVERTISEMENT
Advertisement