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आवरण कथाः नई शुरुआत की वेला

अमेरिका में जो बाइडन-कमला हैरिस प्रशासन के आखिर भारत और पूरी दुनिया के लिए क्या हैं मायने

अमेरिका चुनाव-2020 जो बाइडन-कमला हैरिस
अमेरिका चुनाव-2020 जो बाइडन-कमला हैरिस
अपडेटेड 12 नवंबर , 2020

जनवरी 2021 की 20 तारीख को जब जोसेफ रॉबिनेट बाइडन जूनियर को अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति की शपथ दिलवाई जाएगी, तब उनकी उम्र 78 वर्ष होगी और वे यह पद संभालने वाले अब तक के सबसे उम्रदराज नेता होंगे. उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में सबसे अधिक, यहां तक कि बराक ओबामा से भी अधिक,  लोकप्रिय वोट हासिल करने का गौरव भी हासिल होगा.


यह पूर्व उप-राष्ट्रपति के लिए कम बड़ी बात नहीं है जिन्हें गया-बीता मान लिया गया था, जब तक कि उन्होंने प्राइमरीज कहे जाने वाले पार्टियों के आंतरिक चुनाव में अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी के अग्रणी उम्मीदवारों को पीछे छोड़कर राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी हासिल नहीं कर ली. वे यहीं नहीं रुके. उन्होंने सत्तारूढ़ डोनाल्ड ट्रंप को हराकर राष्ट्रपति की कुर्सी भी जीत ली. उन्हीं ट्रंप को हराकर जिन्होंने उन्हें हिकारत से 'उनींदा जो’ कहकर खारिज कर दिया था. 


दूसरा पहलू यह है कि बाइडन उस देश की अगुआई करेंगे जो चुनाव में ही बंट गया और उसमें भारी ध्रुवीकरण का शिकार हो गया. वे नस्ल, वर्ग और क्षेत्र की गहरी होती स्थायी दरारों से मुकाबिल हैं. यह सब ऐसे वक्त हुआ है जब वैश्विक महामारी कोविड-19 ने 5 नवंबर तक 95 लाख मरीजों और 2,34,000 मौतों के साथ अमेरिका को सबसे जबरदस्त चोट पहुंचाई है.

इसने देश की अर्थव्यवस्था की चूलें पहले ही हिला दी हैं और 2 करोड़ से ज्यादा लोगों की नौकरियां छीन ली हैं. इस हद तक कि यह तबाही ग्रेट डिप्रेशन कही जाने वाली आर्थिक मंदी की याद दिलाती है. बदतर बात यह कि ट्रंप की 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’यानी अमेरिका को महान बनाओ की शेखी भरी बातें 'अमेरिका अलोन’या अलग-थलग अमेरिका में बदलकर रह गई हैं.

उन्होंने अमेरिका के भरोसेमंद सहयोगी देशों से झगड़े किए, संधियां और समझौते तोड़कर उनसे अलग हो गए, दुनिया का दादा होने से इनकार दिया और ट्वीट के जरिए उथल-पुथल मचा देने वाली कूटनीति को अंजाम दिया, जिसने दुनिया की सबसे अव्वल महाशक्ति महक की प्रतिष्ठा और कद में अच्छा-खासा पलीता लगा दिया. वह भी तब जब महामारी ने दुनिया भर में वैश्वीकरण को उलटने, अलगाव बढ़ाने और व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रताओं के घटते जाने की प्रक्रिया को बहुत तेज कर दिया है.

तो, अगले चार साल में बाइडन का दायित्व और जिम्मेदारियां काफी हद तक तय हो चुकी हैं. लेकिन क्या वे उन पर खरे उतरेंगे? और उनका राष्ट्रपति होना भारत और दुनिया के लिए क्या मायने रखता है?

आवरण कथा
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घर संभालने की जद्दोजहद
इन सवालों के जवाब उन हालात में हैं जिसके बल पर बाइडन राष्ट्रपति के पद तक पहुंचे हैं. चुनाव से पहले अमेरिका का सामना उस चीज से था जिसे विशेषज्ञों ने 'कयामत के चार घुड़सवार’कहा है, यानी महामारी और उसकी वजह से मारे गए अमेरिकी, उससे पैदा हुई तेज आर्थिक गिरावट, कठोर और अक्सर कट्टर नीतियों से पैदा हुए गहरे नस्लीय विभाजन और देश भर में सामाजिक अन्याय का बढ़ता अहसास.

अगर बाइडन लोकप्रिय मतों के भारी अनुपात से जीते और आखिरकार अमेरिका का यह चुनाव भी जीत लेते हैं, तो यह ट्रंप की नीतियों को पूरी तरह ठुकरा दिए जाने की वजह से नहीं था. राष्ट्र ने उन्हें गले लगाया तो इसकी बड़ी वजह यह थी कि देश को स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ी तकलीफों से बाहर निकालने की बेहतर योजना उनके पास दिखाई दी और देश भर के कुछ गहरे जख्मों को भरने के लिए उन्हें ट्रंप से कहीं ज्यादा जोडऩे वाली ताकत माना गया.

विदेश नीति की तरफ उनके झुकाव और विशेषज्ञता के बावजूद संभावना यही है कि बाइडन कार्यकाल का ज्यादातर वक्त बेहद अहम घरेलू मुद्दे सुलझाने में लगाएंगे. वे कितने ताकतवर राष्ट्रपति होंगे, यह इस बात से तय हो सकता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी सीनेट का नियंत्रण रिपब्लिकन पार्टी से छीन पाती है या नहीं और प्रतिनिधि सभा में अपना नियंत्रण बनाए रख पाती है या नहीं. अगर सीनेट का नियंत्रण रिपब्लिकन के हाथ में ही बना रहता है, तो फैसले लेने की बाइडन की शैली और रफ्तार काफी कुछ लडख़ड़ा जाएगी.

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ऐसा इसलिए है क्योंकि कांग्रेस की यह अहम शाखा विधेयकों की पुष्टि करने और संधियों को मंजूरी देने के अलावा प्रमुख नियुक्तियों का अनुमोदन भी करती है जिनमें राष्ट्रपति के कैबिनेट सेक्रेटरी और सुप्रीम कोर्ट के जज शामिल हैं. बाइडन के हक में यह बात है कि वे 36 साल से सेनेटर हैं और दोनों पक्षों से उनका अच्छा मेलजोल है और साथ ही वे अहम मुद्दों पर दलीय बाड़बंदी से ऊपर उठकर समर्थन जुटाने के लिए जाने जाते हैं.

बाइडन को सुधार या कायापलट करने वाले शख्स से कहीं ज्यादा चीजों को बहाल करने वाले शख्स के तौर पर भी देखा जाता है. स्टिम्सन सेंटर के सह-संस्थापक माइकल क्रेपन, जिन्होंने उनसे तब बातचीत की थी जब वे सत्ता में थे, उनके बारे में कहते हैं, ''एक भला आदमी—चमक-दमक वाली शक्चिसयत के बजाय एक किस्म के अंकल ज्यादा. हम उन्हें जानते हैं, यह भी कि उनकी सीमाएं क्या हैं और वे अपनी तरफ से अच्छा से अच्छा करने की कोशिश करेंगे.’ 

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सीनेट की विदेश मामलों की समिति के चेयरमैन होने के नाते बाइडन ने तब अमेरिका के सामने मौजूद प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी दूरदर्शिता से इस क्षेत्र के जानकारों को प्रभावित किया था. उप-राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को जल्दी वापस बुलाने पर जोर डाला था. स्टिक्वसन में क्रेपन के साथी समीर लालवानी कहते हैं, ''उनसे जुड़े लोगों ने बाइडन की निर्णय लेने की क्षमता की बारे में अच्छी बातें कही हैं. वे कहते हैं कि यह महज स्वाभाविक प्रवृत्ति से नहीं बल्कि समस्या के गहरे अध्ययन, तटस्थ आकलन और परंपरा से उलट अक्लमंदी से चलने की हिम्मत से आता था, जिन्होंने उन्हें प्रभावी नेता बनाया है.’’

अब बाइडन को अपने इस हुनर का इस्तेमाल देश के सामने मौजूद बेहद अहम घरेलू मुद्दों को सुलझाने के लिए करना होगा. इन मुद्दों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर महामारी की तीसरी लहर है. ट्रंप के विपरीत, बाइडन मास्क पहनने और सामाजिक दूरी बनाए रखने के जोशीले हिमायती हैं. हालांकि इस बात को लेकर चिंता है कि वे इसके प्रकोप को रोकने के लिए बार-बार लॉकडाउन का सहारा ले सकते हैं.

बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए बाइडन अफोर्डेबल केयर कानून, जो ओबामाकेयर के नाम से ज्यादा जाना जाता है, बहाल कर सकते हैं, जिसे ट्रंप ने किसी वैकल्पिक व्यवस्था के बगैर नकार दिया था. बाइडन की योजना बुजुर्गों को बनिस्बत कम खर्च पर बेहतर स्वास्थ्य देखभाल देने की है. उनके इस कदम को बुढ़ाते देश में जहां एक-तिहाई आबादी 60 साल से ऊपर की है, व्यापक समर्थन मिला था.  

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जहां तक अर्थव्यवस्था की बात है, बाइडन अमेरिका के बढ़ते मध्यम वर्ग की दशा सुधारने पर बहुत ज्यादा ध्यान देंगे, खासकर तब जब यह मध्यम वर्ग देश की रीढ़ बनकर उभरा है और अब उनका मुख्य समर्थन आधार माना जाता है. ट्रंप ने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस वगैरह) आधारित उपायों की तरफदारी की थी जबकि बाइडन ने हिम्मत के साथ स्वच्छ टेक्नोलॉजी पर जोर दिया है और बुनियादी ढांचे के जबरदस्त विस्तार के साथ ऊर्जा क्रांति का वादा किया है जो 1 करोड़ नौकरियों का सृजन करेगी. मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए निर्वाचित राष्ट्रपति 'बाय अमेरिका’ कार्यक्रम (जो ट्रंप के अमेरिका फस्र्ट की तरह मालूम देता है) की हिमायत कर रहे हैं जो अमेरिका में मैन्यूफैक्चर सामान और सेवाओं की 400 अरब डॉलर की सरकारी खरीद और टेक्नोलॉजी में नए अनुसंधान में पैसा लगाने के लिए 300 अरब डॉलर की मांग करता है.

अर्थव्यवस्था की खातिर वादों के लिए 700 अरब डॉलर की इन विस्तार योजनाओं के वास्ते धन जुटाने की गरज से बाइडन बेहद अमीर लोगों के अलावा कॉरपोरेट घरानों पर कर बढ़ाने का इरादा रखते हैं. वामपंथी झुकाव वाले डेमोक्रेटों के बड़े तबके को पक्ष में लाने के लिए बाइडन ने फेडरल न्यूनतम वेतन दोगुना बढ़ाकर 15 डॉलर प्रति घंटा करने की भी प्रतिबद्धता जाहिर की है. रिपब्लिकनों के नियंत्रण वाली सीनेट पहले ऐसा प्रस्ताव खारिज कर चुकी है और तब उसने इसकी वजह से कारोबार की लागत बढऩे का तर्क दिया था. श्रमिकों के अनुकूल कानूनों को मजबूत बनाने की भी उनकी योजना है. ये दोनों प्रस्ताव धुर वामपंथी डेमोक्रेट नेता बर्नी सैंडर्स के विशाल समर्थकों के वोट खींचने की गरज से रखे गए थे. सैंडर्स को उन्होंने प्राइमरीज में हराया था.

दुनिया के दादा की वापसी
जो बात साफ है, वह यह कि बाइडन की घरेलू आर्थिक योजनाओं का भारी असर उनकी विदेश नीति पर पड़ेगा. वे मानते हैं कि ट्रंप ने अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय हितों को चोट पहुंचाई है और उन्होंने ठान लिया है कि इसे उलटकर रहेंगे. उनके विदेश नीति सलाहकार ब्रायन मैकियन ने सितंबर में सीएनएन से एक इंटरव्यू में कहा था कि पद पर अपने पहले ही दिन बाइडन ''प्रमुख सहयोगी देशों से फोन पर बात करेंगे और कहेंगे कि अमेरिका लौट आया है और अमेरिका को आपका समर्थन हासिल है.’’मैकियन ने यह भी कहा था कि ट्रंप ने ''हमारे मित्रों और सहयोगियों की आंख में उंगली डाली है और उन्होंने दुनिया के हरेक तानाशाह को गले लगाया है... हमने अपने सारे दोस्त खो दिए.’’

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कार्नेगी एंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल अफेयर्स में सीनियर फेलो एश्ले टेलिस भी इस आकलन से इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं कि ट्रंप की कारगुजारियों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर है ''वैश्विक रिश्तों में अमेरिका की पारंपरिक भूमिका का संपूर्ण तिरस्कार और दूसरे विश्व युद्ध के वक्त से ही अमेरिका के हाथों बनाई गई वैश्विक व्यवस्थाओं की हिफाजत करने में पूरी बेपरवाही.’’टेलिस यह भी कहते हैं कि ट्रंप ने यूरोप और पूर्व एशिया में अमेरिका के घनिष्ट सहयोगियों और दोस्तों के साथ बेअदबी के साथ लेन-देन वाला बर्ताव किया. ट्रंप उन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को सहारा देने में भी नाकाम रहे, जिनका निर्माण अमेरिका ने इसलिए किया था ताकि उसे कठोर ताकत का इस्तेमाल ज्यादा न करना पड़े और वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ सके. इसका सबसे हालिया प्रमाण विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से अमेरिका को बाहर निकालना था.

ट्रंप ट्वीट के जरिए और मुद्दों पर रुख तेजी से बदलते हुए कूटनीति के संचालन में यकीन करते हैं, इसके विपरीत बाइडन से उम्मीद की जाती है कि वे अपनी विदेश नीति के संचालन में कम चंचल और ज्यादा सुसंगत होंगे. मनमोहन सिंह सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे शिवशंकर मेनन याद करते हैं कि बाइडन ने भारत-अमेरिका परमाणु करार को अंजाम पर पहुंचाने के मकसद से ओबामा को राजी करने के लिए कितना जोर लगाया था. मेनन मानते हैं कि बाइडन प्रक्रिया से संचालित होने वाले नेता हैं, जो अपने प्रशासन की सलाह पर भरोसा करेंगे. ट्रंप इसके बिल्कुल उलट थे, जिनके बारे में वे कहते हैं, ''ट्रंप के नीचे वाकई कोई ट्रंप प्रशासन नहीं हैं.’’अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत नवतेज सरना, जिनका ट्रंप प्रशासन से वास्ता पड़ा था, मेनन की बात से सहमत हैं. वे याद करते हैं, ''मैं प्रमुख सरकारी विभागों के भुतहा गलियारों में चक्कर लगाया करता था, जहां महीनों तक कमरों में कोई नहीं होता था. बाइडन के आने पर आकस्मिक चीजें कम होंगी और बात करने के लिए ज्यादा लोग होंगे.’’

प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर अमेरिका को बातचीत की मेज पर अगुआई की स्थिति में वापस लाने की बाइडन की प्रतिबद्धता का न केवल भारत बल्कि ज्यादातर दुनिया स्वागत करेगी. खासकर उनके इस बयान का कि वे पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते से बाहर होने के ट्रंप के फैसले को पलट देंगे. इस समझौते पर बराक ओबामा ने दस्तखत किए थे, तब बाइडन उपराष्ट्रपति थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस समझौते का समर्थन किया था और भारत ने भी तब मायूसी महसूस की थी जब अमेरिका अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने, जरूरतमंद देशों को धन देने और स्वच्छ टेक्नोलॉजी साझा करने के वचन से मुकर गया था. बाइडन ने यह भी संकेत दिया है कि वे अमेरिका और ईरान के बीच उस समझौते पर, जिसे ट्रंप ने तोड़ दिया था, दोबारा बातचीत शुरू करवाएंगे ताकि ईरान परमाणु हथियार बनाने की योजना छोड़ दे. ट्रंप ने भारत सहित उन तमाम देशों पर आर्थिक पाबंदियां थोप दी थीं जो ईरान से तेल खरीद रहे थे. हालांकि अफगानिस्तान पर बाइडन के विचार ट्रंप के जैसे ही हैं और वे अमेरिकी सैनिकों को वहां से वापस लाना चाहेंगे.

भारत जिस चीज पर खास दिलचस्पी के साथ नजर रखेगा, वह यह है कि बाइडन आक्रामक चीन से कैसे निपटते हैं. ट्रंप ने चीन पर बेतरतीब नीति का अनुसरण किया और मोटे तौर पर दोनों देशों के बीच अमेरिका का व्यापार घाटा कम करने पर ध्यान दिया. लेकिन वे इतने स्पष्टवादी भी थे कि उन्होंने चीन को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और प्रतिस्पर्धी करार दिया और राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के अंतिम महीनों में उसकी विस्तारवादी नीतियों का अक्रामक ढंग से मुकाबला भी किया. 

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इस बीच चीन ने कोविड महामारी के तथ्यों के साथ अपनी धोखाधड़ी और पारद‌र्शिता के अभाव, न केवल भारत बल्कि दक्षिण चीन सागर के तमाम दूसरे देशों के साथ अपने अक्रामक, अहंकारी और विस्तारवादी व्यवहार और विरोधियों के खिलाफ सोशल मीडिया का गुप्त हथियार के रूप में इस्तेमाल करने वाली 'वुल्फ वारियर’डिप्लोमेसी के साथ खुद को पूरी तरह उघाड़कर रख दिया. ट्रंप प्रशासन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी अक्रामकता से निपटने में भारत की पूरी सहायता की, वहीं बाइडन ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे विस्तारवादी चीन के खिलाफ हैं, यहां तक कि उन्होंने शी जिनपिंग को ''ठग’’करार दिया है और कहा है कि ''उनके शरीर में एक छोटी-सी भी लोकतांत्रिक हड्डी नहीं है.’’लिहाजा उम्मीद यही है कि बाइडन चीन के खिलाफ गतिरोध में भारत को सहायता देना जारी रखेंगे.

अलबत्ता जब अमेरिका पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते से दुबारा जुड़ जाएगा तब नए अमेरिकी राष्ट्रपति को चीन से बात करनी होगी ताकि शी पर अपने देश की वचनबद्धताएं पूरी करने के लिए जोर डाल सकें. इसके अलावा, वे जानते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था चीन के साथ गहराई से गुंथी है तथा उस पर निर्भर है और इसलिए वे उससे किसी ऐसे टकराव से बचेंगे जो उन्हें कमजोर करे. इसके बजाय उन्होंने नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्र के कानून का पालन करने के लिए चीन पर दबाव डालने की गरज से लोकतांत्रिक देशों के गठजोड़ की बात कही है जिसमें भारत प्रमुख खिलाड़ी होगा.

जैसा कि बाइडन के एक सहयोगी ने एक प्रेस इंटरव्यू में कहा, ''यह चीन के खिलाफ संभव भू-राजनीतिक गिरोहबंदी है. हमें लोकतांत्रिक विश्व को बटोरकर साथ लाने की जरूरत है. एक नए शीत युद्ध की तरह यह रसातल की दौड़ नहीं हो सकती.’’ब्रूकिंग्ज इंस्टीट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान कहती हैं कि भारत ''चाहता है कि अमेरिका चीन पर दबाव डालने के लिए 'गोल्डीलॉक तरीका’ अपनाए. चीन पर इतना ज्यादा दबाव भी न डाले कि स्थिति बेकाबू हो जाए और इतना कम भी नहीं कि वह चीन पर लगाम कसने में बेअसर हो.’’  

क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?
जहां तक अमेरिका के साथ संबंधों की बात है, भारत इस समय एक मधुर स्थिति में है. 1998 में हमारे परमाणु परीक्षणों के बाद दोनों देशों के आपसी संबंधों में बहुत खटास आ गई थी,लेकिन फिर लगातार संबंधों में सुधार हुआ और हाल के वर्षों में तो इसमें बहुत घनिष्ठता देखी गई. यह तीन रिपब्लिकन और तीन डेमोक्रेट सरकारों के दौर में हुआ है जिसमें अमेरिका की कमान चार राष्ट्रपतियों के हाथों में रही. यह दोनों दलों के साथ भारत के मजबूत समायोजन का संकेत देता है.

हालांकि मोदी वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ व्यवहार में बहुत कुशल हो गए थे, फिर भी बताया जाता है कि साउथ ब्लॉक थोड़ी राहत महसूस कर रहा है कि अब उन्हें ट्रंप की अप्रत्याशित और पल में बदलने वाली कूटनीतिक शैली के साथ व्यवाहर में अतिरिक्त ऊर्जा नहीं लगानी होगी. बाइडेन को तो पहले से तैयार मजबूत नींव पर आपसी संबंधों की नई इमारत खड़ी करनी है. हडसन इंस्टीट्यूट की सीनियर फेलो अपर्णा पांडे कहती हैं, ''भारत-अमेरिका के रिश्तों में पिछले दो दशकों में हमने जो बदलाव देखे हैं उनमें निरंतरता देखने को मिल रही है. हालांकि बाइडेन शायद, ''कुछ पाना है तो बदले में कुछ दो भी’ वाली नीति पर न चलें जिस पर ट्रंप चले थे.’’

भारत-अमेरिका संबंधों में निरतंरता और निकटता के बावजूद, चिंताएं बनी हुई हैं. रक्षा सहयोग दोनों देशों के संबंधों का मुख्य आधार रहा है. अमेरिका ने भारत को न केवल एक प्रमुख रक्षा साझेदार के रूप में मान्यता दी है, बल्कि ऐसे निकटतम सहयोगियों की श्रेणी में रखने को मंजूरी दी है जिन्हें अमेरिका की उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी की बिक्री की अनुमति है. पिछले दो दशकों में अमेरिका से भारत को रक्षा सामग्री की बिक्री में बड़ी वृद्धि देखी गई है, जो करीब 20 अरब डॉलर के बराबर है तथा इसमें और वृद्धि की संभावना है.

दोनों देशों ने चार बुनियादी समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुके हैं, उनके सामरिक संबंधों के और आगे बढऩे की उम्मीद है. हालांकि, जैसा कि टेलिस बताते हैं, ''तरकश में सबसे मजबूत तीर रक्षा सौदा भले हो सकता है, लेकिन भारत की ओर से अन्य देशों के साथ भी रक्षा सौदे जारी रखने के दृष्टिकोण पर भी नजर है.’’भारत की जीडीपी के 1.6 प्रतिशत से भी कम रक्षा बजट और अमेरिका के समर्थन में संयुक्त सैन्य अञ्जयास से परे जाने की भारत की अनिच्छा से अमेरिका असंतुष्ट है. 

हालांकि बाइडन भारत के साथ रक्षा सहयोग को मजबूत करना जारी रखेंगे, ट्रंप के शासन में दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों में बहुत अस्थिरता रही. भारत को 'टैरिफ किंग’बताकर वे चाहते थे कि भारत न केवल आयात शुल्क घटाए, बल्कि 28.9 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को भी कम करे. ट्रंप ने जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस (जीएसपी) के तहत भारत को मिला तरजीही दर्जा वापस ले लिया था और स्टील तथा एल्यूमीनियम पर शुल्क बढ़ा दिए थे.

जीएसपी के तहत भारत को लगभग 4.5 अरब डॉलर मूल्य की 2,000 से अधिक वस्तुएं अमेरिका में बिना शुल्क बेचने की अनुमति थी. भारत ने भी जवाबी कार्रवाई की और 28 अमेरिकी निर्मित वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया. फरवरी में ट्रंप और मोदी के बीच एक शिखर बैठक के बावजूद दोनों पक्ष एक नए व्यापार समझौते पर पहुंचने के काम को गति देने में विफल रहे. अमेरिका, भारत के बढ़ते संरक्षणवाद और उसके आत्मनिर्भर भारत अभियान से चिंतित है. संभावना है कि उत्पादन क्षेत्र में मौजूदा गिरावट थामने के लिए भारत को अमेरिकी कंपनियों के लिए अपने बाजार और अधिक खोलने के लिए कहा जाएगा.

ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के मदान का मानना है कि अमेरिका और अन्य देश चीन पर अपनी निर्भरता को कम करने को इच्छुक दिखते हैं.भारत को उस व्यापार अवसर का लाभ लेने के लिए वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के निर्माण के लिए तेजी से प्रयास करने चाहिए. डब्ल्यूएचओ की अध्यक्षता के अलावा, देश अगले वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष बनने के साथ इस साल के अंत में जी-20 की बैठक की अध्यक्षता भी करेगा. मदान कहते हैं, ''भारत को मौके का लाभ उठाना’’ चाहिए और अपने प्रभाव क्षेत्र और ताकत का विस्तार करना चाहिए.

बाइडन, चीन को एशियाई सदी को विशुद्ध रूप से चीनी सदी में परिवर्तित करने से रोकने के लिए उत्सुक हैं. यह अमेरिका के हित में होगा कि वह चीन के साथ शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए भारत को बढ़ावा दे. आव्रजन के मुद्दे पर, बाइडन के उन कार्यकारी आदेशों का सहारा लेने की संभावना नहीं है जिनका इस्तेमाल ट्रंप ने अमेरिका में प्रवास कर रहे कुशल भारतीय श्रमिकों पर प्रतिबंध लगाने के लिए किया था. भारत को बाइडन को यह समझाना होगा कि उसका प्रवासी वर्ग वह गर्भनाल है जो अमेरिका से भारत के संबंधों को मजबूत करता है, और प्रतिकूल आव्रजन नीति इसे क्षति पहुंचाएगी. 

मोदी सरकार को मानवाधिकारों के मुद्दों, अल्पसंख्यकों के साथ बर्ताव और धार्मिक सहिष्णुता पर बाइडन प्रशासन से दबाव झेलना पड़ सकता है. ट्रंप ने भारत को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 पर सहयोग किया और अमेरिका ने फ्रांस के साथ मिलकर चीन को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 निरस्त करने के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आने से रोक दिया. लेकिन बाइडन और डेमोक्रेटिक पार्टी मानवाधिकार मुद्दों पर ज्यादा मुखर हैं. हालांकि, राष्ट्रपति के रूप में इस बात की अधिक संभावना है कि, वे सार्वजनिक रूप से बयान देने की बजाय अपनी चिंताएं निजी वार्तालाप में रखना पसंद करें. स्टिमसंस के लालवानी कहते हैं कि जब अमेरिका लोकतंत्र सहित साझा मूल्यों की बात करता है, तो यह भारत को चीन में सत्तावादी और असहिष्णु शासन के विपरीत एक मॉडल देश के रूप में रखता है.

भारत, अमेरिका में अपना विस्तृत प्रभाव क्षेत्र बनाने में इसलिए सक्षम रहा है, क्योंकि उसका राजनैतिक वर्ग हमें उदार लोकतंत्र के रूप में देखता है, उसका व्यवसाय जगत हमें एक बड़े बाजार के रूप में देखता है और उसका रणनीतिकार समुदाय हमें ऐसे देश के रूप में देखता है जो चीन के सामने सीना तानकर खड़ा हो सकता है. वे कहते हैं, ''अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि भारत के पास क्षेत्रफल, आबादी और सैन्य क्षमता के रूप में एक बड़ी बढ़त है. भारत एशियाई क्षेत्र में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है. लेकिन इससे परे, भारत से यह उम्मीद भी रखी जाती है कि वह क्षेत्र का ऐसा उदार लोकतांत्रिक स्तंभ बने जो चीनी मॉडल को कड़ी चुनौती देने के लिए राजनैतिक रूप से स्थिर हो. सीएए को लेकर पूरे विवाद ने अमेरिका के कुछ प्रभावी हलकों को भारत के प्रति आशंकित किया है.’’

जहां तक बात पाकिस्तान की है, तो संभावना कम ही है कि बाइडन प्रशासन अतीत के गहरे जुड़ाव के दौर में वापस जाना चाहेगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर अफगानिस्तान से अमेरिका बाहर निकल जाता है, तो पाकिस्तान पर उसकी निर्भरता काफी कम हो जाएगी. जैसा कि क्रेपॉन कहते हैं, ''जो स्थिति एलओसी पर होती थी, वही स्थिति चीन की हाल की आक्रामकता को देखते हुए एलएसी पर बन गई है.’’लेकिन यह भारत के हक में हैं कि अमेरिका का पाकिस्तान के साथ सरोकार बना रहे ताकि वह इस्लामाबाद पर गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार न करने और सीमा पार आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए दबाव बना सके. 

कमला कनेक्शन
भारत में बाइडन के राष्ट्रपति अभियान ने जिन कारणों से सामान्य से अधिक ध्यान आकर्षित किया, उनमें एक बड़ी वजह बाइडन अपने सहयोगी के रूप में कमला हैरिस चयन थी. हैरिस की मां भारतीय मूल और पिता जमैका मूल के हैं. उनके नामांकन ने भारतीय मूल के 10 लाख मतदाताओं के बीच डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थन को मजबूत किया. जब वे 20 जनवरी को उपराष्ट्रपति पद की शपथ लेंगी, तो वे इस पद पर काबिज होने वाली पहली अश्वेत महिला होंगी.

कुछ वर्गों में चिंता जताई गई है कि उप-राष्ट्रपति के रूप में वे कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के सवाल उठा सकती हैं. पिछले साल, भारत में अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के दो महीने बाद उन्होंने कहा था, ''हमें कश्मीरियों को याद दिलाना होगा कि वे दुनिया में अकेले नहीं हैं. जरूरत पड़े तो हस्तक्षेप किया जाना चाहिए.’’हैरिस ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के कांग्रेस के कुछ सदस्यों के साथ पूर्व निर्धारित बैठक को रद्द करने पर भी चिंता व्यक्त की थी क्योंकि उसमें भारतीय मूल की अमेरिकी कांग्रेस प्रतिनिधि प्रमिला जयपाल भी भाग लेने वाली थीं. जयपाल,  मोदी सरकार के कश्मीर पर फैसलों के खिलाफ एक प्रस्ताव लेकर आई थीं. हालांकि वह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था.

इस बात पर लोगों की राय बंटी हुई है कि हैरिस भारत के लिए अच्छी साबित होंगी या तनाव का कारण बनेंगी. मेनन का मानना है कि भारतीय मूल के होने के कारण कमला, अपनी निष्पक्षता और अमेरिकी प्रतिबद्धता साबित करने के लिए भारत के प्रति कठोर हो सकती हैं. हडसन इंस्टीट्यूट के पांडे की तरह अन्य का मानना है कि वे अन्य घरेलू मुद्दों में व्यस्त होंगी और विदेश नीति पूरी तरह से राष्ट्रपति देखेंगे. हालांकि, उप-राष्ट्रपति होने के नाते,  बाइडन उन्हें अधिक अधिकार सौंपने का फैसला कर सकते हैं.

हैरिस को इस बात का लाभ मिलता है कि वे हर खांचे में फिट दिखती हैं—वे बाइडन की तुलना में अधिक उदार और प्रगतिशील हैं. वे अमेरिका में इंद्रधनुष गठबंधन का हिस्सा हैं, जो बड़े पैमाने पर आबादी की संरचना में बदलावों को देखते हुए देश में तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है. जो लोग उन्हें जानते हैं उनका कहना है कि उनमें पर्याप्त राजनैतिक समझ है. क्रेपॉन का मानना है कि बाइडन की उम्र को देखते हुए, वे एक बार ही राष्ट्रपति बनना चाहेंगे और अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद हैरिस को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लडऩे को तैयार कर सकते हैं. क्रेपोन के मुताबिक, ''हर किसी की इस बात पर नजर होगी कि कमला सत्ता में अपनी पैठ कैसे बढ़ाती हैं. वे प्रेसिडेंट-इन-वेटिंग (भविष्य की संभावित राष्ट्रपति) हैं.’’यह उचित है कि भारत उनका स्वागत अपने बीच के ही व्यक्ति के रूप में करे. 

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