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हॉटस्पॉट: कोरोना की नियंत्रण रेखा

कोरोना हॉटस्पॉट और उनके भीतर कंटेन्मेंट जोन वे क्षेत्र हैं जहां विशेष जोर देकर सरकारें लॉकडाउन की बढ़ाई गई अवधि का अधिकतम लाभ उठा सकती हैं.

मुंबई के धारावी में सुरक्षात्मक सूट पहनकर लोगों की जांच करता एक डॉक्टर
मुंबई के धारावी में सुरक्षात्मक सूट पहनकर लोगों की जांच करता एक डॉक्टर
अपडेटेड 21 अप्रैल , 2020

महाराष्ट्र में मुंबई की धारावी की 90 फुट चौड़ी सड़क पर, जहां हमेशा चहल-पहल रहती थी, लोगों को घर पर रहने की अपील करते हुए पुलिसकर्मियों ने फ्लैग मार्च निकाला. बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) की टीमें घर-घर जाकर तेज बुखार, लगातार खांसी और सांस लेने में कठिनाई जैसे कोविड-19 के लक्षणों वाले लोगों की जांच कर रही हैं. केवल 2.4 किलोमीटर क्षेत्र में फैले धारावी को एशिया की सबसे घनी आबादी वाला झुग्गी बस्ती माना जाता है और वहां के अनुमानित 8,50,000 निवासियों में से 86 लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई है और नौ की मौत (16 अप्रैल तक) हो चुकी है. इसने नगरपालिका अधिकारियों की चिंताएं बहुत बढ़ा दी हैं.

मध्य अप्रैल तक, बीएमसी ने पूरे मुंबई में लगभग 400 'प्रकोप कंटेन्मेंट जोन' को चिन्हित किया. केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से वर्गीकृत देश में कोरोनो वायरस के 170 हॉटस्पॉट और महाराष्ट्र के 14 हॉटस्पॉट में मुंबई सिटी और मुंबई सबअर्बन शामिल हैं.

दिल्ली में जहां मंत्रालय ने 10 हॉटस्पॉट की पहचान की है, वहां रोकथाम क्षेत्रों (कंटेन्मेंट जोन) की संख्या धीरे-धीरे बढ़कर 55 हो गई है. ये हॉटस्पॉट ही हैं, जहां केंद्र और राज्यों ने आने वाले हफ्तों में ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है. सरकारें अपनी ऊर्जा और संसाधन कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने में लगाएंगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 14 अप्रैल को राष्ट्र के नाम संबोधन से यह स्पष्ट हो गया था. मोदी ने कहा कि जो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने हॉटस्पॉट में कोविड पर प्रभावी रूप से नियंत्रण पाने में सफल होंगे उन्हें 20 अप्रैल के बाद मौजूदा प्रतिबंधों से कुछ ढील दी जा सकती है. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के बीच हुई विस्तृत चर्चा के बाद इस निर्णय पर पहुंचा गया है.

हॉटस्पॉट इलाकों में संक्रमण को रोकने संबंधी दिशा-निर्देशों को कड़ाई से लागू किया जाएगा ताकि संक्रमण के मामलों में वृद्धि न हो.

15 अप्रैल को 170 हॉटस्पॉट और 207 संभावित हॉटस्पॉट के अपने नए राष्ट्रीय-स्तर के वर्गीकरण की घोषणा करते हुए, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोविड-19 को उसी क्षेत्र के भीतर सीमित रखने (देखें, वायरस के निशान) की रणनीति सामने रखी.

नए प्रशासनिक निर्देशों के अनुसार, उन जिलों को हॉटस्पॉट कहा जाएगा जहां चार दिनों से भी कम समय में संक्रमण के मामलों की संख्या दोगुनी हो जाती है, अथवा वे जिले जहां से राज्य या देश में संक्रमण के कुल मामलों के 80 प्रतिशत मामले हैं.

मंत्रालय का यह वर्गीकरण एक हॉटस्पॉट में कंटेन्मेंट जोन या क्लस्टरों की संख्या पर आधारित था जहां 'बड़े प्रकोप' (123) या संक्रमण के 'क्लस्टर' (47) देखे गए हैं. मंत्रालय को उम्मीद थी कि ये 'रेड जोन' जल्द ही 'ऑरेंज जोन' की श्रेणी में आ सकते हैं, अगर 14 दिनों तक वहां कोई नया मामला सामने नहीं आता.

उसके बाद अगर अगले एक पखवाड़े में भी संक्रमण का कोई मामला नहीं मिलता तो उसे 'ग्रीन जोन' मान लिया जाएगा (अब तक, 15 राज्यों में 25 जिले ऑरेंज जोन में तब्दील हो गए हैं). संभावित हॉटस्पॉट के रूप में उन जिलों को रखा गया जो हॉटस्पॉट मानदंडों को तो पूरा नहीं करते हैं, लेकिन वहां कुछ मामलों की सूचना मिली है.

नियंत्रण की रणनीति

कोविड-19 के प्रसार की गति कम करने की राज्यों की रणनीति, हॉटस्पॉट में प्रकोप रोकथाम क्षेत्रों पर आधारित है (देखें, निगरानी करने वाले). अनुमान है कि देश भर में पहले से ही 1,500 से अधिक ऐसे क्षेत्र हैं और संक्रमण के मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अधिकारियों को ऐसे कई अन्य क्षेत्र बनने की आशंका है. राज्यों ने संक्रमण की पुष्टि की संख्या और संक्रमित लोगों के प्राथमिक संपर्कों के बीच संदिग्ध मामलों को आधार बनाकर अपने कंटेन्मेंट जोन चिन्हित किए हैं.

इसलिए एक कंटेन्मेंट जोन का क्षेत्र अलग-अलग होता है. उत्तर प्रदेश में जहां संक्रमण के कम से कम छह मामलों की पुष्टि हुई है उन्हें कंटेन्मेंट जोन के रूप में चिन्हित किया गया है. प्रकोप के शुरुआती दिनों में, मध्य प्रदेश प्रशासन ने किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए 1 किलोमीटर की बाहरी भौगौलिक सीमा को एक कंटेन्मेंट जोन के रूप में और अतिरिक्त 2 किलोमीटर क्षेत्र को बफर जोन के रूप में चिन्हित किया था. संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी के साथ इस परिभाषा में संशोधन किया गया था और स्वास्थ्य अधिकारियों ने संक्रमित व्यक्ति के घर को केंद्र और उसके चारों ओर के क्षेत्र को एक 'व्यावहारिक क्षेत्र' के रूप में निर्धारित किया था.

परिभाषाएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन सभी प्रकोप कंटेन्मेंट जोन में सैनिटेशन (स्वच्छता), संक्रमित लोगों के लिए आइसोलेशन, संदिग्ध मामलों की पहचान करके संक्रमण के प्रसार को नियंत्रित करना और उन्हें प्रयोगशाला परीक्षणों के लिए भेजने पर पूरा जोर लगाया जा रहा है. संक्रमण के हर नए मामले का पता लगने के बाद नियंत्रण क्षेत्र के भीतर और बाहर, दोनों ही जगहों पर उस संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों को ढूंढा जाता है.

कंटेन्मेंट जोन के निवासियों को अपने घरों के भीतर रखना उन इलाकों में थोड़ा आसान रहा है जहां लोगों में जागरूकता है. अन्यथा, लोगों को घरों में रखने के लिए अधिकारियों को भारी पुलिस गश्त और जोन की कांटेदार तारों की बाड़ से घेराबंदी जैसे सख्त कदम उठाने पड़े हैं. राज्यों में अब, निगरानी के लिए तकनीक पर निर्भरता बढ़ी है और ड्रोन का उपयोग हो रहा है.

मांग और आपूर्ति

लोगों को घरों के भीतर रखने की रणनीति को कारगर बनाने के लिए अधिकारियों की ओर से दैनिक जरूरत की वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा. लेकिन कई इलाकों में आपूर्ति न तो एक समान है और न ही नियमित. तेलंगाना सरकार संचालित अन्नपूर्णा कैंटीनों की ओर से हैदराबाद के कंटेन्मेंट जोन में गरीबों के लिए 5 रुपए में भोजन उपलब्ध कराया जाना सफल प्रयास माना जा सकता है.

दिल्ली के ऐतिहासिक निजामुद्दीन, जिससे सटे क्षेत्रों को कंटेन्मेंट जोन के रूप में सीमांकित किया गया है, में घेराबंदी किए गए इलाकों में सामाजिक और प्रशासनिक तनाव देखा जा सकता है. कई वर्षों से इलाके में काम कर रहे आगा खान फाउंडेशन के रतीश नंदा बताते हैं कि यह इलाका अब उन तब्लीगी जमात के धर्म-प्रचारकों में संक्रमण के लिए कुख्यात हो गया जो यहां स्थित अपने वैश्विक मुख्यालय में मार्च में एकत्र हुए थे, लेकिन ''निजामुद्दीन बस्ती में असल में बहुत ही कम मामले सामने आए हैं.''

नंदा कहते हैं कि 10 अलग-अलग मोहल्लों के साथ, यह इलाका सामाजिक रूप से बहुत ही विविध है. निजामुद्दीन पश्चिम में जहां बेहद समृद्ध लोग रहते हैं तो कुछ ब्लॉकों में स्थिति बेहद खराब है जहां एक ही कमरे में एक साथ 10 से अधिक लोग रहते हैं. वे कहते हैं, ''जाहिर है कि वे अपने छोटे कमरों से बाहर निकलकर सड़क पर आएंगे, और ऐसा होते ही पुलिस उनके पीछे पड़ सकती है.'' सरकार ट्रकों से राशन की नियमित अंतराल पर आपूर्ति करा रही है, लेकिन ये सभी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.

क्षेत्र के पूर्व पार्षद फरहाद सूरी कहते हैं, ''राशन केवल उन लोगों को मिलता है जो इंटरनेट पर डिलिवरी नोटिस हासिल कर पाते हैं.'' वे विशेष रूप से इस बात से खफा हैं कि पुलिस क्षेत्र में 200 से अधिक जरूरतमंद परिवारों को पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने की एक सामुदायिक पहल में कथित रूप से बाधा डाल रही है. सूरी का आरोप है कि जिन युवकों ने भोजन पहुंचाने की कोशिश की, उन्हें कई बार पीटा गया. इस बीच आगा खान फाउंडेशन ने इस सप्ताह से जरूरतमंद परिवारों को राशन के पैकेट बांटना शुरू कर दिया है.

सामाजिक दूरी बनाए रखने की आवश्यकता का उल्लंघन और लॉकडाउन नियमों की धज्जियां उड़ाने की लोगों की प्रवृत्ति अधिकारियों के लिए व्यावहारिक चुनौती बन गई है. लेकिन धारावी में एक सामाजिक कार्यकर्ता राजू कोर्डे, झुग्गी के निवासियों के इस तरह के व्यवहार के पीछे 'अपरिहार्य परिस्थितियों' की ओर इशारा करते हैं. वे कहते हैं, ''उनके घर माचिस के डिब्बों जैसे हैं जहां हवा तक नहीं पहुंचती. वे ताजा हवा में सांस लेने के लिए बाहर निकलते हैं.'' हैदराबाद के मल्लेपल्ली और सिकंदराबाद में शेर गली जैसी कई मुस्लिम बहुल क्लस्टर्स में भी स्थितियां अलग नहीं है.

अंकुश से लोगों को आवाजाही संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. मुंबई के गोरेगांव (पूर्व) उपनगर के बिंबिसार नगर में, जहां आठ अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स में करीब 2,000 लोग रहते हैं, जीवन कठिन बना हुआ है. यहां की निवासी 43 वर्षीया मनीषा एस. कहती हैं कि वे सीढ़ी या लिफ्ट का उपयोग करने तक से डरती हैं.

वे बताती हैं, ''मैंने किराने का सामान ऑनलाइन मंगवाया था, लेकिन सामान उन्हें डिलिवर नहीं किया जा सका क्योंकि हमारी सोसाइटी में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित कर दिया गया है.'' एक अन्य निवासी 36 वर्षीया ललिता तिवारी का कहना है कि लोगों को अलगाव का महत्व तभी महसूस हुआ जब उनके आवासीय सोसायटी को एक कंटेन्मेंट जोन घोषित किया गया. वे कहती हैं, ''सैर के लिए जाने वाले बुजुर्ग भी घर पर रह रहे हैं और दूसरों को भी बाहर न जाने की सलाह दे रहे हैं.''

महाराष्ट्र में, जहां किसी भी अन्य राज्य की तुलना में संक्रमण के अधिक मामले देखे गए हैं, दो डॉक्टरों, एक नर्स और दो स्वास्थ्य अधिकारियों वाली पांच सदस्यीय टीम को हर कंटेन्मेंट जोन में तैनात किया गया है जिसका काम नियमित रूप से निवासियों की जांच करना और जिन लोगों में कोविड-19 के लक्षण दिखें उन्हें जांच के लिए भेजना है. प्रोटोकॉल संदिग्ध मामलों की पहचान करने के लिए दो सदस्यीय स्वास्थ्य टीम की ओर से क्लस्टर में 30-50 घरों की दैनिक निगरानी की सिफारिश करता है. यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल क्योंकि मलेरिया, तपेदिक या अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में निगरानी का अनुभव रखने वाले पर्याप्त पेशेवर स्वास्थ्य कार्यकर्ता उपलब्ध ही नहीं हैं. कई क्षेत्रों में जिला कलेक्टरों, जो अपने प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में सभी कंटेन्मेंट जोन में कार्यों को चलाने के लिए जिम्मेदार नोडल अधिकारी हैं, को कर्मचारियों की किल्लत के कारण राजस्व विभाग और पुलिस को इस काम में लगाने के लिए विवश होना पड़ा है.

भरोसे का संकट

अक्सर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता गहन दैनिक सर्वेक्षण के लिए जाने से बचते हैं और संदिग्ध मामलों के उभरने का इंतजार करते हैं. लोगों का भरोसा जीतने में विफलता एक अन्य बाधा है. भोपाल में एक डॉक्टर याद करते हैं, ''हम भोपाल के पहले घोषित कंटेन्मेंट क्लस्टर, प्रोफेसर कॉलोनी में घर-घर गए. लेकिन ज्यादातर लोग हमसे मिलना नहीं चाहते थे. साथ ही, संक्रमण की पुष्टि होने के पांच दिन बाद इसे कंटेन्मेंट जोन घोषित किया गया. पर पहले ही नुक्सान हो चुका था.''

धारावी में, जब बीएमसी अधिकारियों ने पाया कि यहां के निवासी दौरा करने वाली मेडिकल टीम से मिलने को अनिच्छुक हैं, तो उन्होंने करीब 150 स्थानीय डॉक्टरों की मदद ली और उन्हें लोगों को राजी करने के काम में लगाया गया.

क्लस्टर्स का प्रबंधन करने वाले अधिकारियों का कहना है कि लोगों को शारीरिक रूप से घरों में बंद करा देना आसान है. असली चुनौती तो उन संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान करने की है जो जांच, अस्पताल में भर्ती होने और सामाजिक लांछन से डरते हैं और सहयोग के लिए आगे नहीं आना चाहते. कोरोना की जंग संक्रमित लोगों को सफलतापूर्वक अलग-थलग करने, उनके संपर्क में आए सभी लोगों की जांच, संक्रमण के लक्षणों वाले लोगों की पहचान और रैंडम जांच के जरिए ही जीती जा सकती है.

इसके लिए स्क्रीनिंग और टेस्ट प्रोटोकॉल की बड़ी सख्ती से कार्यान्वयन की आवश्यकता होगी, विशेष रूप से भीड़-भाड़ वाले इलाकों में, और इस काम को पूरा करने के लिए भरोसेमंद जांच किटों की भी पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति सुनिश्चित करानी होगी. दिल्ली सरकार का कहना है कि वह जल्द ही शहर के कंटेन्मेंट जोन में तेजी से जांच शुरू करेगी और इसके लिए 1,00,000 किट खरीद रही है. जब तक अन्य राज्य भी इसी तरह की प्रतिबद्धता नहीं दिखाते, तब तक इस घातक वायरस के प्रसार को सीमित करने के लिए किए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का मूल उद्देश्य पूरा नहीं होगा.

—साथ में किरण डी. तारे, सोनाली आचार्जी, राहुल नरोन्हा, गुलाम जीलानी, रोहित परिहार, रोमिता दत्ता और अमिताभ श्रीवास्तव

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