देश का मिज़ाज/महागठबंधन
बमुश्किल आठ महीने पहले विपक्षी पार्टियां बुरी तरह पस्त थीं. भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) 2019 के आम चुनाव में 353 सीटें जीत लीं. इसमें 303 सीटें अकेले भाजपा को मिलीं, जो पार्टी की अब तक की सबसे ज्यादा सीटें हैं. आज, फिजा में नई हलचल है, विपक्षी पार्टियों में खासा जोश-जज्बा भर गया है. पूर्व और पश्चिम से चली दो धाराएं ऐसी उर्वर जमीन तैयार कर चुकी हैं कि विपक्षी पार्टियां महागठबंधन बनाकर नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार से लोहा ले सकें.

पूर्वी धारा असम से बह रही है जहां राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाने की गड़बडिय़ों भरी कवायद से 19 लाख लोगों को 'बाहरी' घोषित कर दिया गया है. इससे असम और त्रिपुरा दोनों ही राज्यों में विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो उठे, इंटरनेट और ट्रेन सेवाएं रोकनी पड़ीं और सेना उतारनी पड़ी. फिर, जैसे ही केंद्र की एनडीए सरकार ने बहुमत के जोर से नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) 2019 पास कराया और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) तैयार करने का ऐलान किया, लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और देखते ही देखते यह जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल गया.

पश्चिमी धारा पिछले साल के अंत में महाराष्ट्र से बही. वहां शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस के गठबंधन महाविकास अघाड़ी ने भाजपा से सत्ता छीन ली. 28 नवंबर, 2019 को उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का शपथ ग्रहण विपक्ष के लिए गेमचेंजर साबित हुआ.
'अजेय' भाजपा के हाथ से देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक निकल चुका था और विडंबना यह कि विपक्ष ने एनडीए को तोड़कर यह कर दिखाया, जिसमें अब तक भगवा पार्टी की महारत मानी जा रही थी.
अगले ही महीने झारखंड में सत्ता-विरोधी लहर में रघुबर दास के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की विदाई हो गई. लगातार दो राज्यों में भाजपा ने अपनी सरकारें विपक्षी गठबंधन के हाथों गंवा दी गई थी.
राज्यों में भाजपा की सरकारों के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर की सुगबुगाहट तो 2018 की सर्दियों में ही दिखने लगी थी जब पार्टी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव हार गई थी.
हालांकि उसके बाद मई, 2019 के आम चुनावों की जीत ने माहौल को बदला. लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड ने फिर से हवा का रुख मोड़ दिया है. आज भाजपा का राज दिसंबर 2018 तक देश के 71 प्रतिशत भूभाग से आधा घटकर 35 प्रतिशत पर सिमट गया है.
महाविकास अघाड़ी को भाजपा नेता 'अवसरवादी गठबंधन' बताकर खारिज कर चुके हैं लेकिन 2020 में पहले देश का मिजाज जनमत सर्वेक्षण में 44 प्रतिशत लोगों की एकमत राय है कि इससे विपक्ष के महागठबंधन की नई राह खुली है.
महागठबंधन 2.0
मुंबई और रांची के घटनाक्रम महागठबंधन के लिए बड़े उत्प्रेरक साबित हुए हैं. नतीजतन, 13 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बुलाई बैठक में 20 विपक्षी दलों ने बड़े संजीदा मसौदे वाले प्रस्ताव पास करके मांग की कि एनडीए सरकार सीएए को फौरन वापस ले और एनआरसी-एनपीआर की प्रक्रिया रोक दे.
बसपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और दो राज्यों में कांग्रेस के सहयोगी द्रमुक (तमिलनाडु) और शिवसेना (महाराष्ट्र) बैठक में नहीं पहुंचे लेकिन बैठक में आगे की रणनीति तैयार की गई (हालांकि जिन दलों ने बैठक में शिरकत नहीं की, वे भी भाजपा/सीएए-विरोध के अपने रुख पर कायम हैं).
प्रस्ताव कहता है, ''सीएए, एनपीआर और एनआरसी एक पैकेज है जो असंवैधानिक है और विशेष रूप से गरीबों, दलितों, अनुसूचित जातियों/जनजातियों और भाषाई तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है.'' महागठबंधन ने एनआरसी लागू न करने के वादे कर चुके मुख्यमंत्रियों से मांग की है कि वे अपने राज्य में एनपीआर प्रक्रिया को रोकें क्योंकि यह 'नागरिक रजिस्टर' की पहली प्रक्रिया है.

बयान में प्रमुख आर्थिक और राजनैतिक मुद्दों को शामिल करके विपक्षी एजेंडे को और व्यापक किया गया. इसमें 'अर्थव्यवस्था को मंदी के कगार पर धकेल रहे' संकट की भी बात है और जम्मू-कश्मीर में पिछले पांच महीनों से 'नाकाबंदी' की भी चर्चा है.
मुख्य आर्थिक मुद्दों को शामिल करना प्रासंगिक था. अच्छी बारिश के बावजूद, ऊंची खाद्य महंगाई, घटती ग्रामीण मजदूरी और किसान विरोधी व्यापारिक शर्तों से कृषि संकट बना हुआ है. देश का मिजाज सर्वेक्षण में करीब आधे लोगों (48 प्रतिशत) का मानना है कि 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से किसानों की हालत बिगड़ती गई है या जस की तस बनी हुई है.
दो वैकल्पिक परिदृश्य
सीएए-एनआरसी-एनपीआर के खिलाफ गुस्सा इस कदर है कि केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब और अन्य राज्य सरकारों ने आधिकारिक तौर पर केंद्र को चुनौती दी है कि संघीय सूची में होने के बावजूद सीएए को लागू नहीं करेंगे. इससे देश की संघीय व्यवस्था संकट में पड़ती दिखती है.
विरोध प्रदर्शनों से राजनीति में एक नई गोलबंदी हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी बनाम संवैधानिक धर्मनिरपेक्षतावादी की खड़ी होती दिख रही है: देश का मिजाज सर्वेक्षण में इस नई गोलबंदी के मद्देनजर 'अन्य' श्रेणी को तोड़-जोड़कर और यूपीए तथा एनडीए को नए सिरे से परिभाषित करके दो नए संभावित परिदृश्यों की कल्पना की गई है.

नवंबर में एनडीए से बाहर हुई शिवसेना अब 'अन्य' में शामिल है (देखें, बेचैनी बेहिसाब). पहले संभावित परिदृश्य में 2019 में आगे यूपीए के कारवां में अन्य साथियों के साथ गठबंधन बैठक में मौजूद रहे वाम दल और अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा और मायावती के नेतृत्व वाली बसपा शामिल होकर महागठबंधन बना लेती हैं. उस स्थिति में अगर लोकसभा चुनाव आज होते हैं तो अनुमान है कि लगभग बराबर वोट प्रतिशत (एनडीए के 41 फीसद और यूपीए के 40 फीसद) के साथ एनडीए 282 सीटें हासिल कर सकेगा जबकि यूपीए को 172 सीटें मिलेंगी.
दूसरे परिदृश्य में, शिवसेना, आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस भी महागठबंधन में शामिल हो जाती हैं.
उस स्थिति में नतीजों में बड़ा बदलाव दिख सकता है. 264 सीटों के साथ एनडीए बहुमत के निशान से काफी पीछे रह सकता है जबकि यूपीए को 230 सीटें मिल सकती हैं. ऐसे में वोट शेयर यूपीए के पक्ष में जा सकता है.
यूपीए को 46 फीसद जबकि एनडीए को मात्र 41 फीसद वोट प्राप्त हो सकते हैं. लेकिन दोनों स्थितियों में भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए ही प्रमुख धुरी है. परिदृश्य 1 में, जहां एनडीए सरकार बना सकता है वहीं परिदृश्य 2 में दोनों पक्षों के लिए संभावनाओं के द्वार खुले दिखते हैं.
सड़कों पर आक्रोश
सीएए-एनआरसी-एनपीआर विरोध ही महागठबंधन 2.0 के लिए मुक्चय चुंबकीय ताकत है. इंडिया टुडे डेटा इंटेलिजेंस यूनिट के किए राज्य-दर-राज्य सर्वेक्षण से पता चलता है कि 44 फीसद आबादी वाले 10 राज्य एनआरसी के खिलाफ हैं, जबकि 33 फीसद आबादी वाले 15 राज्य समर्थन में हैं.
इन 10 राज्यों में वे राज्य भी शामिल हैं जहां एनडीए के सहयोगियों की अच्छी पैठ है—बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला जद(यू), पंजाब में अकाली दल और ओडिशा में नवीन पटनायक के नेतृत्व वाला बीजद. अगर भाजपा एनआरसी के अपने मुक्चय एजेंडे के लिए दबाव बनाती है, तो उसे इन सहयोगियों को गंवाने का जोखिम उठाना पड़ सकता है.
देश का मिजाज सर्वेक्षण से पता चलता है कि ज्यादातर लोग कश्मीर से जुड़े मुद्दे पर मोदी सरकार की कार्रवाई के पक्ष में हैं. अयोध्या के मुद्दे पर भी बड़ा बहुमत (59 फीसद) विवादित स्थल रामलला को सौंपने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में है. तो, फिर नागरिकता से जुड़े कानूनों और पहल पर लोग इतने गुस्से में क्यों हैं?

मुख्य कारण यह है कि सीएए-एनआरसी-एनपीआर को कानूनों की एक ऐसी शृंखला के रूप में देखा गया है जो प्रमुख संवैधानिक मूल्यों पर चोट करते हैं. संविधान सभा में बहस के दौरान यह सहमति बनी थी कि नागरिकता का मुख्य आधार 'जन्म' ही होगा. सीएए इसे धर्म आधारित बनाता है जो संविधान की मूल परिकल्पना का उल्लंघन है.
यह अनुच्छेद 14 को चुनौती देता है, जो कानून के समक्ष सभी को समानता की गारंटी देता है. विधि सिद्घांतकार गौतम भाटिया की दलील है, ''अगर राज्य व्यक्तियों में भेद करता है और उनके साथ असमान व्यवहार करता है तो यह संविधान की आत्मा और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.''
क्या सीएए-एनआरसी पर प्रस्तावित अमल से अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं? 52 फीसद लोगों ने 'हां' कहा जबकि 14 फीसद का मानना है इससे ''न केवल अल्पसंख्यक, बल्कि सामान्य आबादी भी असुरक्षा महसूस कर रही है.''
इसकी तुलना भाजपा के एक राज्यसभा सांसद की सनकी टिप्पणी से करिए कि ये विरोध ''मालाबार (केरल) में 1921 के मोपिला विद्रोह जैसे हैं, जब मुस्लिम खेतिहर मजदूर और छोटे किसान हिंदू जमींदारों के खिलाफ उठ खड़े हुए थे.''
देश का मिजाज सर्वेक्षण से पता चलता है कि विरोध-प्रदर्शन हर मायने में काफी व्यापक है और महागठबंधन के लिए चुंबकीय ताकत बन सकता है.
सवाल यह है कि क्या राज्यों में सत्ता विरोधी लहर और नागरिकता कानून को लेकर राष्ट्रव्यापी विरोध मिलकर एनडीए सरकार के खिलाफ व्यापक असंतोष पैदा कर सकते हैं?
क्या विपक्षी दल इसे अगले विधानसभा चुनावों में लहर में बदल सकते हैं? क्या प्रदर्शन जारी रह सकते हैं?
विरोध प्रदर्शनों और संसदीय राजनीति के संगम से देश में बड़े राजनैतिक बदलाव हुए हैं.
1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण की अगुआई में संपूर्ण क्रांति आंदोलन और 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल आंदोलन इसके प्रमाण हैं. क्या महागठबंधन एनडीए सरकार को कड़ी चुनौती देगा, या व्यक्तिगत अहं और सत्ता की राजनीति में इस ऐतिहासिक अवसर को गंवा देगा? यही यक्ष प्रश्न है.
प्र. क्या आप सोचते हैं कि महाराष्ट्र में शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस का महा विकास अघाड़ी विपक्ष के महागठबंधन की ओर उठा कदम है?

