मार्च की 11 तारीख को सूर्य कुछ ज्यादा चटख निकलेगा. उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रेंच राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों दो दर्जन राष्ट्रों और सरकारों के प्रमुखों के साथ अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आइएसए) के उद्घाटन सम्मेलन में शरीक होंगे.
आइएसए कर्क और मकर उष्णकटिबंधों के बीच पूरी तरह या आंशिक तौर पर आने वाले 121 देशों का गठबंधन है जो सौर संसाधनों से समृद्ध हैं. इसकी संकल्पना से लेकर तेजी से ठोस मुकाम पर लाने में मोदी ने सबसे अव्वल भूमिका अदा की है.
यह तो जगजाहिर ही है कि दुनिया के ऊर्जा संकट और ग्लोबल वार्मिंग के खतरे दोनों को सुलझाने की चाबी सौर ऊर्जा में है. मगर लागत (कोयले से बिजली बनाना सौर ऊर्जा के मुकाबले अब भी सस्ता है) टेक्नोलॉजी (सूर्यास्त के कारण 24 घंटे सौर ऊर्जा की सप्लाई मुमकिन नहीं) भारी-भरकम रकम (वाणिज्यिक सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने और इसे विकसित करने के लिए पैसा कौन देगा) और क्षमता (बड़े स्तर पर मांग को पूरा करने के लिए कोयले और गैस प्लांट की तरह सौर ऊर्जा का उत्पादन कैसे बढ़ेगा) इसके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावटें रही हैं.
2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन में सबसे पहले मोदी ने सौर संसाधन से समृद्ध देशों का गठबंधन बनाने और इसके जरिए ऊर्जा के विशाल बाजार में सौर ऊर्जा को हाशिए का खिलाड़ी बना देने वाली चारों रुकावटों को दूर करने की कोशिश करने का शानदार विचार रखा था. एक किस्म के साझा सौर बाजार में 121 देशों को एक साथ लाकर यह गठबंधन एक विशाल अर्थव्यवस्था को आकार देगा. मिली-जुली कोशिशों और नवोन्मेषी परियोजनाओं के जरिए साल 2030 तक 1,000 अरब डॉलर का निवेश जुटाने का लक्ष्य रखा गया है.
मोदी तथा उस वक्त फ्रेंच राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने पेरिस शिखर सम्मेलन में आइएसए को लॉन्च किया था. सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा था, ''सोलर तकनीक के विकास के साथ इसकी लागत घटेगी.'' पेरिस सम्मेलन में मोदी ने संकल्प लिया कि 2030 तक भारत अपनी जरूरत की 40 फीसदी बिजली अक्षय ऊर्जा से हासिल करेगा.
भारत सरकार हरियाणा के गुरुग्राम में आइएसए के मुख्यालय के निर्माण में 3 करोड़ डॉलर खर्च कर रही है. पिछले महीने 26 सदस्य देशों ने आइएसए के रूपरेखा समझौते का अनुमोदन कर दिया और इसी के साथ यह संयुक्त राष्ट्र का पहला संधि आधारित संगठन बन गया जिसका मुख्यालय भारत में है.
इस बीच आइएसए में और भी देशों ने दिलचस्पी दिखाई और 52 और देशों ने भी रूपरेखा समझौते पर दस्तखत कर दिए. गठबंधन का सबसे मुश्किल काम सौर ऊर्जा से जुड़े अनुसंधानों, परियोजनाओं और कार्यक्रमों की सहायता के लिए 2030 तक एक खरब डॉलर की रकम जुटाना होगा.
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के कार्यकारी निदेशक डॉ. फेथ बिरोल कहते हैं, ''2010 से फोटो वोल्टिक की कीमतों में 70 फीसदी कमी आई है जबकि बैटरी के दाम 40 फीसदी तक गिरे हैं.'' उनके मुताबिक, ये संकेत बताते हैं कि आने वाले दिन अक्षय ऊर्जा के हैं. आइएसए के अंतरिम डायरेक्टर जनरल उपेंद्र त्रिपाठी कहते हैं, ''हम जितने बड़े पैमाने पर रकम जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, उसको देखते हुए आखिरी विचार तो विश्व सौर बैंक की स्थापना का ही है.''
अलबत्ता आइएसए की कामयाबी जिस एक बात से तय होगी, नवीन और अक्षत ऊर्जा मंत्रालय के एक सलाहकार डॉ. पी.सी. मैथानी के मुताबिक, वह है ''उत्पादों के लिए सदस्य देशों की मांग को आपस में जोड़कर और एक विशाल अर्थव्यवस्था का निर्माण करके लागतों में कमी लाने की आइएसए की क्षमता.''
सौर ऊर्जा से संचालित कृषि पंप ऐसी ही एक कोशिश है. इनमें 21 देशों ने दिलचस्पी दिखाई है. आइएसए को उम्मीद है कि वह इन पंप सेटों की मांग को पांच लाख तक बढ़ा सकती है.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर एरिक सोलहेम चेतावनी देते हुए कहते हैं, ''आइएसए को और ज्यादा कामयाब बनाने के लिए अहम बात है वित्तपोषण पर ध्यान देना, क्योंकि इसके लिए जरूरी टेक्नोलॉजी तो पहले से मौजूद है.
ऐसा करने का तरीका यह है कि बुनियादी तौर पर निजी क्षेत्र की रकम लाई जाए और जोखिम के शमन के लिए गारंटियां खोजी जाएं.'' जाहिर है, सौर दुनिया परवान चढ़ सके, इसके लिए केवल धूप ही काफी नहीं है, बल्कि रोकड़े की भी खासी जरूरत होगी.
***

