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हिंदू बनाम हिंदुत्वः हिंदुत्व ब्रिगेड के लिए संविधान नहीं गाय पवित्र

आरएसएस का हिंदुत्व प्रोजेक्ट हमारे बुनियादी उदारवादी विचारों और सबको साथ लेकर चलने के भरोसे को खत्म कर रहा है

इलेस्ट्रशनः तन्मय चक्रव्रर्ती
इलेस्ट्रशनः तन्मय चक्रव्रर्ती

एक मिनट के लिए हम इस सीरीज के लिए पत्रिका के संपादकों की ओर से चुने गए शीर्षक पर नजर डालते हैं. जैसा कि हम सभी जानते हैं, हिंदुत्व का अर्थ है, ''हिंदू विचार, धर्म और आस्था का सार." अगर वाकई ऐसा है तो इस लेख का शीर्षक एक युग्म के रूप में ''हिंदू और हिंदुत्व " होना चाहिए था. लेकिन अगर इसे ''बनाम" शब्द से अलग कर दिया है तो इसकी वजह भी है.

''हिंदू बनाम हिंदुत्व" शीर्षक बिल्कुल उचित है क्योंकि कई कमियों के बावजूद पहले वाला शीर्षक एक खुले विचार वाला और समावेशी है जबकि बाद वाला शीर्षक कट्टरपंथी है. इसमें दलितों, मुसलमानों, ईसाइयों और हिंदू आस्था के अलावा किसी अन्य के लिए कोई जगह नहीं है. एक और बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए कि हिंदुत्व का विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी संबद्ध भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की धरोहर है.

हिंदूवाद और हिंदुत्व में एक अभिशाप समान है, और वह है जाति व्यवस्था. खासकर उसका वह हिस्सा जिसमें अछूतों, जिन्हें हम आजकल दलित कहते हैं, को समाज से बाहर कर दिया जाता है.

डॉ. आंबेडकर ने अपने लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करके अस्पृश्यता के इस अभिशाप को दूर करने की कोशिश की थी. यह बात बहस का विषय है कि उनके इस कदम से दलितों की स्थिति में बदलाव आया कि नहीं.

चुनाव का समय आने पर सभी बड़ी राजनैतिक पार्टियां दलितों को नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में ज्यादा आरक्षण का लालच देकर उन्हें लुभाने की कोशिश करती हैं. चुनाव खत्म होते ही सब कुछ फिर से पहले जैसा हो जाता हैः छोटी जाति के हिंदू एक बार फिर से उत्पीडऩ का शिकार हो सकते हैं.

कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही जोर-शोर से दावा करती हैं कि वे हिंदुओं में कथित बड़ी जातियों और दलितों के बीच कोई फर्क नहीं करतीं. लेकिन हकीकत यही है कि दोनों ही फर्क करती हैं.

फिर भी दोनों पार्टियों के विचारों में एक महत्वपूर्ण फर्क है. प्राचीन इतिहास का अध्ययन हमें बताता है कि आर्यों ने बहुत समय पहले भारत पर हमला किया और वे यहीं बस गए. हिंदुत्व के विचारकों को यह मानना अच्छा लगता है कि उन्होंने आर्यों के रक्तक्रम को हजारों वर्षों से सुरक्षित रखा है.

गोलवलकर और उनके जैसी सोच रखने वालों ने आर्य शुद्धता और श्रेष्ठता का वह झूठा मिथ यहां भी अपनाया जिसे हिटलर और उसकी फासिस्ट फौज ने प्रचारित किया था. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से आंबेडकर की धाराप्रवाह प्रशंसा के बावजूद आरएसएस और भाजपा दलितों की अवहेलना करती हैं.

यह विरोधाभास ही है कि हिंदू समाज (हिंदुत्व नहीं) के एक वर्ग के भीतर जाति व्यवस्था की अत्यंत कटु आलोचना की गई है. वे पुरजोर तरीके से कहते हैं कि दलित का लेबल हटाकर उन्हें समाज में शामिल किया जाए और उन्हें शिक्षा तथा नौकरियों में पर्याप्त जगह दी जाए.

यही वजह है कि तमाम खामियों के बावजूद हिंदू धर्म भारत में अब भी सबसे उदार और समावेशी है. गांधी जी, नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, वल्लभभाई पटेल, आंबेडकर और हमारी आजादी के आंदोलन के अधिकतर नेताओं की वजह से भारत का संविधान दुनिया के इस हिस्से में सबसे धर्मनिरपेक्ष और उदार है. लेकिन यह बयान तभी तक सही है जब तक कि हम इसके शब्दों और इसकी भावना पर अमल करते हैं.

हिंदू धर्म का सबसे बड़ा गुण उसका समावेशी होना था. इसकी बांहें हमेशा उन लोगों के स्वागत के लिए खुली थीं जो इसकी शरण में आए या जो इसके साथ जुड़े. भारत में आकर बसने वालों में पारसी सबसे पहले थे.

इसके बाद कुछ मुस्लिम आक्रमणकारी यहां आए और उन्होंने भारत को लूटा. कुछ ने तो भयानक नरसंहार भी किए. इसके बावजूद हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस उपमहाद्वीप में बसने वाले बहुत से आक्रमणकारियों ने निष्पक्षता और सौम्य तरीके से यहां शासन किया. मिसाल के लिए मुगलों ने बहुत से मामलों में भारत का गौरव बढ़ाया. इसके बाद पुर्तगाली ईसाई आए और फिर अंग्रेजों ने 300 वर्षों तक यहां उपनिवेश बनाया.

उस समय अटल बिहारी वाजपेयी देश के पहले भाजपाई प्रधानमंत्री थे और नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे जब गुजरात में भयंकर दंगे हुए. मोटे अनुमानों के अनुसार करीब एक हजार से ज्यादा मुसलमान उन दंगों में मारे गए थे और कई हजार मुसलमानों को अपना घर-बार छोडऩा पड़ा था.

हमें प्रधानमंत्री वाजपेयी की वह झिड़की नहीं भूलनी चाहिए जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नसीहत देते हुए कहा था कि ''यह राजधर्म नहीं है." निष्पक्षता के साथ कहें तो वाजपेयी के हिंदुत्व का नजरिया कहीं ज्यादा उदार था और उनके मंत्रिमंडल में अरुण शौरी तथा यशवंत सिन्हा जैसे अपने-अपने क्षेत्र के बेहतरीन विशेषज्ञों को जगह दी गई थी.

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने हुए तीन साल से ज्यादा समय हो चुका है. तमाम साहसिक बातों के बावजूद वे खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं और उन्होंने अपने इर्दगिर्द औसत दर्जे के लोगों को कैबिनेट में बिठा रखा है.

आरएसएस के साथ उनका संबंध न केवल ज्यादा खुले रूप में है, बल्कि हिंदुत्व के अत्यंत आक्रामक नए अवतार में दिखता है. अब तक देश में कोई मुसलमान-विरोधी दंगा तो नहीं हुआ है लेकिन सरकार की मौन सहमति के साथ जो चल रहा है, वह कहीं ज्यादा खतरनाक है.

हमें हमेशा के लिए यह समझ लेना चाहिए कि हिंदुत्व ब्रिगेड के लिए भले ही हमारा संविधान पवित्र नहीं है लेकिन गाय है. इतनी पवित्र कि बेचारी गाय सड़कों पर भूखी छोड़ दी जाती है और उसे प्लास्टिक की विषैली थैलियों से पेट भरने को मजबूर होना पड़ता है जबकि भाजपा सरकार ने गोहत्या और बीफ खाने तथा उसकी बिक्री को संज्ञेय अपराध घोषित कर रखा है.

इसकी वजह से हजारों मुसलमान रातोरात अपनी आजीविका गंवा चुके हैं. यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि देश का नागिरक जो कुछ भी खाता है, वह संविधान में निजता के कानून के तहत आता है. लेकिन गाय की राजनीति का सबसे निराशाजनक पहलू यह है कि यह हिंदुत्व के बारे में हमारी अज्ञानता का एक और उदाहरण है, जबकि संस्कृति, इतिहास और पौराणिक ग्रंथों में अलग ही उल्लेख मिलता है. उन्हें शायद यह पता नहीं है कि वेदों के अनुसार अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में गाय की बलि दी जाती थी.

संकीर्ण बुद्धि वालों के प्रतीक दीनानाथ बत्रा जैसे लोगों को बुद्धिजीवी माना जाता है और प्रधानमंत्री खुद भी बड़े गर्व के साथ भगवान गणेश का उदाहरण देते हुए हमें बताते हैं कि हमारे पूर्वज अंगों के ट्रांसप्लांट की तकनीक जानते थे.

हिंदुत्व के कुछ ज्यादा ही उत्साही और ज्ञानी विद्वानों को यह दावा करने में कोई हिचक नहीं होती है कि ताज महल मूल रूप से मंदिर था. यहां तक कि उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू देश को लूटने, तबाह करने और धोखा देने का आरोप लगाते हुए मुगलों (और अंग्रेजों) पर बरसे. क्या कोई उपराष्ट्रपति महोदय को बताएगा कि 1857 के विद्रोह के समय एक लाख ब्राह्मण सैनिकों ने आखिरी मुगल बादशाह के समर्थन में दिल्ली की तरफ मार्च किया था और उन्हें सिंहासन पर बैठाया था?

बहरहाल, बीफ पर प्रतिबंध कुछ और नहीं बल्कि गाय की राजनीति है और मुसलमानों को उत्पीड़ित करने तथा सरेआम मौत के घाट उतारने का एक बहाना है कि वे कानून तोड़ रहे हैं. तथाकथित गोरक्षक बार-बार निर्दोष लोगों की हत्या कर रहे हैं. यहां हम सिर्फ एक उदाहरण लेते हैं. राजस्थान के अलवर जिले में 55 वर्ष के पहलू खान की पीट-पीटकर जान ले ली गई थी जबकि उसके पास मिले कागजात बताते हैं कि उसने वैध तरीके से गायें खरीदी थीं.

उस घटना के लिए जिम्मेदार पांच हत्यारों को गिरक्रतार किया गया था और उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार भी किया था. मौजूदा न्यायशास्त्र में एक नई परिपाटी बन गई है. अपराधियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर ली गईं लेकिन कुछ दिन जेल में रखने के बाद उन्हें चुपचाप छोड़ दिया गया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कुछ साल पहले कई मामलों में अभियुक्त थे, इसके बावजूद उन्हें खुद ही अपने खिलाफ लगे आरोपों को वापस लेने की छूट दे दी गई. इस कहानी का सबक है—हिंदुत्व पर अमल करने के लाभों में से एक यह हैः निर्दोष की हत्या और दोषियों तथा हत्यारों को दंड से मुक्ति.

विदेशी मीडिया ने जब इन घटनाओं के बारे में सवाल किया तो नरेंद्र मोदी ने बड़प्पन दिखाते हुए कहा कि मुसलमानों की हत्या करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. लेकिन इसके बाद चुप्पी बनी रही. तीन साल में हिंदुत्व के सबसे बड़े प्रतिनिधि प्रधानमंत्री ने हमें सिखाया है कि भाषण अपनी जगह है और कार्रवाई अपनी जगह, दोनों अलग-अलग बातें हैं.

हिंदुत्व शासन की सबसे खतरनाक और आखिरकार आत्मविनाशी परियोजनाओं में यह रही है कि पुरानी बातों को बड़े सोचे-समझे तरीके से भुला दिया जाता है. गांधीजी, नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद और अन्य नेता तथा साधारण नागरिक, जिन्होंने दुनिया में पहली बार अहिंसा के हथियार से आजादी की लड़ाई लड़कर जीत हासिल की थी, वे ''गायब" हो चुके हैं. गांधी जी को केवल ''स्वच्छता" अभियान के किसी कार्यक्रम के समय याद किया जाता है.

मैं राष्ट्रपति रिचर्ड वॉन वीज़सैकर्स के उस असाधारण और बुद्धिमानीपूर्ण भाषण के अंशों के साथ अपनी बात खत्म करता हूं जो उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के अंत की 40वीं वर्षगांठ के अवसर पर दिया थाः ''युवा और पुरानी पीढिय़ां यह समझने में एक-दूसरे की मदद कर सकती हैं और उन्हें जरूर करनी चाहिए कि हमारी स्मृतियों को जिंदा रखना क्यों जरूरी है.

यह अतीत को सुधारने का मामला नहीं है. यह संभव नहीं है. उसे बदला नहीं जा सकता है. लेकिन जो अतीत की तरफ से आंखें मूंद लेता है, वर्तमान के प्रति अंधा हो जाता है. जो कोई किसी की अमानवीयता को याद नहीं करता है वह नए खतरे के संक्रमण का शिकार हो सकता है."

मैं प्रधानमंत्री मोदी से शुरू करते हुए, आरएसएस के श्री भागवत और हिंदुत्व के सभी नेताओं तथा उनके लाखों समर्थकों से अपील करूंगा कि वे इस भाषण को जरूर पढ़ें.

किरण नगरकर मशहूर उपन्यासकार, नाट्यलेखक, फिल्म और ड्रामा आलोचक, मराठी तथा अंग्रेजी में पटकथा लेखक हैं. उनकी ताजा कृति हार्पर कॉलिंस से प्रकाशित जसोदा है

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