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हिंदुत्व के आक्रामक होने का आरोप अकारण नहींः गोविंदाचार्य

हिंदुत्व का अर्थ हिंदू होने का गुण है, न कि पश्चिमी अवधारणाओं के मुताबिक हिंदू राष्ट्रवाद, लेकिन इसके अंतर्विरोध भी स्पष्ट हैं

इलेस्ट्रशनः नीलांजन दास
इलेस्ट्रशनः नीलांजन दास

जब हिंदू और हिंदुत्व की तुलना की जाती है तो मुझे 1980 के दशक की शुरुआत के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के अपने दिन याद आ जाते हैं. तब मेरे मार्गदर्शक यशंवत राव केलकर थे, जो पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक रह चुके थे.

वे कहा करते थे कि हिंदुत्व को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी की अलग समझ है, लालकृष्ण आडवाणी की भिन्न दृष्टि, के. सुदर्शन और अशोक सिंघल की अपनी अवधारणा है, विनय कटियार की अपनी और बजरंग दल की अपनी दृष्टि है. इसी तरह हिंदुत्व से हर किसी का अपना-अपना अभिप्राय है. हिंदुत्व को लेकर हर व्यक्ति की समझ में ऐसा सर्वथा भिन्न दृष्टिकोण क्यों झलकता है? उन्होंने कहा कि यह भविष्य में परेशानियां खड़ी करेगा.

केलकर ने कहा, हम सब अपने-अपने हिसाब से हिंदू होने के चार पहलुओं धर्म, संस्कृति, समाज और राष्ट्र की रक्षा और उसका पोषण कर रहे हैं. ये पहलू भिन्न हों तो उसका अर्थ और आशय भी बदल जाएगा. जब हम संकट की बात करते हैं तो इसका अभिप्राय धर्म पर संकट से नहीं, क्योंकि यह शाश्वत है.

संकट हिंदू समाज पर है. इससे भ्रम पैदा होता है जो हिंदुत्व के समर्थकों से होता हुआ उसके विरोधियों तक जाता है. वह अक्सर कहा करते थे कि संघ परिवार को इस पर चर्चा करनी चाहिए और भ्रम दूर करना चाहिए.

उन्होंने यह भी कहा कि परिवार की विभिन्न भुजाओं में एकता और समन्वय के साथ आत्मनिर्भरता और सहयोग के गुण विकसित होने चाहिए. इन लक्ष्यों को हम कैसे प्राप्त करेंगे, उसके साधन क्या होंगे और किन परिस्थितियों में प्राप्त करेंगे? इन प्रश्नों के उत्तर जरूरी हैं क्योंकि समय के साथ असहमति का बढऩा तय है.

 यही आज हो रहा है. एक भाव यह है कि हिंदुत्व सार्वभौमिकता का संदेश देता है. दूसरा भाव यह भी है कि हिंदुत्व एक प्रकार के उन्माद का नाम है जो मुसलमानों को निशाना बनाता है. ऐसा विरोधाभास अकारण नहीं है. फिर भी, हम सब जानते हैं कि राजनीति में धुएं के लिए आग का होना आवश्यक नहीं. राजनीति बिना आग के धुआं पैदा कर सकती है. मीडिया के दबदबे के दौर में इसका उलटा असर पड़ा है.

मैं हिंदुत्व का अर्थ गुणात्मक पद के रूप में लगाता हूं. इसका मतलब ''हिंदुपन" है, हिंदू धर्म नहीं. हालांकि हिंदू धर्म उसमें शामिल है. मेरे लिए इसके पांच गुण हैं. एक, हर आस्था और पूजा पद्धति के प्रति अटूट आदरभाव रखना, क्योंकि सभी प्रार्थनाएं एक ही दिव्य शक्ति को समर्पित होती हैं.

दूसरा, ईश्वरत्व सजीव और निर्जीव सबमें और सब ओर व्याप्त है, यह प्रज्ञा और आस्था का संगम है. तीसरा, मनुष्य प्रकृति का ही हिस्सा है, उसका विजेता नहीं क्योंकि संसार मानव के उपभोग के लिए ही नहीं रचा गया है (इसका अर्थ है कि सिर्फ मनुष्य ही नहीं, सभी जीवों और वनस्पतियों यहां तक कि भूमि, जलस्रोतों और वायुमंडल के भी अपने अधिकार हैं.)

चौथा, मातृत्व और ममत्व के लिए स्त्रियों पर पूर्ण निर्भरता के मद्देनजर समाज में महिलाओं को विशेष स्थान प्रदान करना. (मैं महिला अधिकारों के पक्ष और विपक्ष में दिए जाने वाले तर्कों से इसकी बराबरी नहीं करता क्योंकि ये पाश्चात्य संदर्भ की देन है.

दोनों के घालमेल से विकृति उपजेगी जिससे बात सुलझने के बजाए उलझती चली जाएगी.) पांचवां, एक सजीव चेतना के लिए जीवन में उपभोग और भौतिक संतुष्टि से आगे भी बहुत कुछ है. गैर-भौतिक लक्ष्य निर्वाण से लेकर मोक्ष तक अनंत हो सकते हैं. भौतिक समृद्धि सृजन का हर प्रयास हिंदू होने के इसी भाव पर आधारित होना चाहिए. ऐसी समृद्धि ही हर ओर पहुंच सकेगी.

राष्ट्र को उसके सांस्कृतिक संदर्भ में समझना चाहिए. यह राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के उस विचार जैसा नहीं है जो 1648 में जर्मनी के वेस्टफेलिया में 100 से अधिक यूरोपीय ताकतों के बीच हुए शांति समझौते से उपजा था.

वह यूरोप का इतिहास और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है, हमारी नहीं. व्यक्ति का राष्ट्र के साथ संबंध कैसा हो, व्यक्तिवाद के इस विषय पर यूरोप की अपनी अलग धारणा है. यह धारणा वहां विभिन्न कालक्रम में जो घटनाएं घटित हुईं, उसका फल है. इसी से राष्ट्र-राज्य और लोकतंत्र निकला.

भारत के विस्तृत इतिहास में यह तरीका नहीं रहा. यहां समाज, व्यक्ति या राज्य से अधिक शक्तिशाली इकाई रहा है. राष्ट्र शब्द संस्कृत शब्द राति से बना है जिसका अर्थ है प्रदान करना, योगदान देना. मैंने 1960 के दशक में उत्तर प्रदेश के एक बौद्धिक सत्र में डॉ.

फतेह सिंह से यह जाना. राष्ट्र के पीछे यही भाव है. राष्ट्र ''नेशन" का पर्यायवाची शब्द नहीं है और दोनों का प्रयोग एक ही अर्थ में करना, दोनों के प्रति अन्याय होगा. राष्ट्र का अभिप्राय ऐसी इकाई से है जहां भौतिक और अभौतिक संसाधन प्रयोग सबके हित के लिए किया जाए. मेरे लिए भारत का अर्थ यही है.

राष्ट्र ''नेशन-स्टेट" नहीं है. बल्कि यह शाश्वत सनातन परंपराओं के मूल्यों का चित्रण है. हमारे समाज ने इन विचारों को अपनाया और सदियों तक इसका परिष्कार किया और यह लोक विरासत हजारों साल पुरानी है. हम अपनी विरासत को संकुचित करके क्यों देखें?

हमारी शब्दावली, हमारे संदर्भ बिंदु वेस्टफेलिया संधि से क्यों उधार लिए हुए होने चाहिए? हमारी अपनी समस्याओं के समाधान का तरीका भी हमारा अपना होगा. यही हिंदुत्व है, यही हिंदू होने का भाव है, यही हिंदू राष्ट्र का अभिप्राय है.

हम इस लक्ष्य को कैसे हासिल करेंगे? मुझे तीन रास्ते समझ में आते हैं. एक तो वह है कि भारत एक राष्ट्र नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय उपमहाद्वीप है. कम्युनिस्ट पार्टी इसका उदाहरण है जो आजादी के समय भारत में 17 अलग-अलग राष्ट्रीयता के अस्तित्व की बात करती है.

दूसरा वह है कि भारत 15 अगस्त, 1947 को एक नवसृजित राष्ट्र-राज्य के रूप मं  जन्मा और महात्मा गांधी उसके राष्ट्रपिता हैं. इस दृष्टि में भारत उदीयमान देश नहीं बल्कि नवगठित देश है इसलिए इसमें नया भारत बनाने का आह्वान है.

तीसरी दृष्टि भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखती है जिसने अभी तक अपने गैर-भौतिकवादी मूल्यों के अनुसार राज्य का निर्माण कार्य पूरा नहीं किया है. मैं तीसरे में विश्वास करता हूं. उस भारत में जो प्राचीन हिंदू राष्ट्र है जिसकी एक संस्कृति, एक लोक परंपरा है.

मेरी दृष्टि में भारत माता हिमालय के दक्षिण में स्थित है जिसके तीन ओर सागर और द्वीप हैं. राष्ट्र समाज, संस्कृति और सीमाओं का समुच्चय है. इसके मूल्य, पहचान और इसकी आत्मा का निर्माण समय के साथ होता है. लेकिन समय इसकी चेतना को क्षति भी पहुंचाता है.

मेरे लिए सबसे बड़ा झटका 2001 में अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की मूर्ति के विध्वंस का था. आप पूर्वजों के किसी स्मारक को क्यों नष्ट करेंगे? यह एक बीमार मानसिकता और स्मृतिलोप का परिचायक है. तो हम इस स्थिति को कैसे सुधारेंगे?

जो शुरुआत करना चाहते हैं उन्हें, भारत के जिस हिस्से ने भी अपनी स्मृति और अपने विवेक को बचाए रखा है, उसे भौतिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत करने का प्रयास शुरू करना चाहिए. ऐसा भी नहीं है कि मुझे भारत के बाहर कोई वांछनीय गुण दिखे ही नहीं.

पश्चिम में नवीनतम और प्रासंगिक रहने का गुण है. जोखिम उठाने की साहसिकता भी उनका सुंदर गुण है. ईसाई मिशनरियों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में रहकर बिना किसी भौतिक लालसा के जो दुरुह प्रयास किए हैं, वे प्रशंसनीय हैं.

हमें अपने राष्ट्र के अंतर्विरोधों पर पुनर्विचार करना होगा.

लेखक राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन चलाते हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और भाजपा के महासचिव रहे हैं

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