अगर कोई एक ओलंपिक मुकाबला है जो भारत के प्रधानमंत्री होने के बराबर ठहर सके, तो वह डेकाथलॉन ही होगा. दुनिया के हर तरह से बेहतरीन एथलीट का फैसला करने वाले इस मुकाबले में ताकत, फुर्ती, रफ्तार, जीवट और दमखम का इम्तहान होता है. दो दिनों तक चलने वाली इस स्पर्धा में 10 ट्रैक और फील्ड विधाओं में अपने दमखम का जौहर दिखाना होता है. पहले दिन 100 मी. की दौड़, लंबी कूद, गोला फेंक, ऊंची कूद और 400 मी. की दौड़ और फिर अगले दिन 110 मी. की बाधा दौड़, चक्का फेंक, बांस कूद, भाला फेंक और 1,500 मी. की दौड़ होती है. हरेक मुकाबले के अंक दिए जाते हैं और सभी में जिसके अंकों का कुल जोड़ सबसे ज्यादा होता है, वह विजेता घोषित होता है.
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के मध्य में नरेंद्र मोदी को भी, डेकाथलॉन की तरह, अपने जबरदस्त चहुंमुखी हुनर और दमखम का जौहर दिखाना पड़ रहा है, ताकि वे उस काम पर अपनी पूरी पकड़ साबित कर सकें जिसे कुछ लिहाज से दुनिया का सबसे मुश्किल काम कहा जा सकता है. मोदी को एक धावक की तरह तेजी से एक के बाद एक कई बाधाओं को पार करते हुए उन तमाम कार्यक्रमों के लिए जन स्वीकृति हासिल करनी होती है जिनका उन्होंने ऐलान किया है. उनमें एक लंबी दूरी के धावक का दमखम भी होना ही चाहिए. लंबे वक्त से टलते आ रहे वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) विधेयक पर सियासी समर्थन हासिल करके उन्होंने साबित कर दिया कि यह दमखम उनमें है. उन्हें फील्ड स्पर्धाओं के लिए जरूरी ताकत और फुर्ती का प्रदर्शन भी करना है, ताकि वह अपने सामने आने वाली तमाम चुनौतियों वे निबट सकें, चाहे वह सीमा-पार का आतंकवाद हो या आर्थिक स्थिरता, सामाजिक तनाव हो या धार्मिक सौहार्द.
चैंपियन बनकर उभरने के लिए मोदी को और भी ढेरों मुकाबले जीतने हैं. मई 2014 में गद्दी संभालने के साथ ही एक धमाकेदार शुरुआत करने के तीन महीने बाद इंडिया टुडे के देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण में मोदी की लोकप्रियता ने आसमान छू लिया था और चुनाव में जीती 336 से भी ज्यादा सीटें एनडीए गठबंधन की झोली में डाल दी थीं. मगर उसके बाद उनकी जीत के साथ आई विराट आकांक्षाओं पर खरा उतरने का दबाव तारी होने लगा. ''अच्छे दिन" लाने में मोदी की अक्षमता को लेकर लोगों की बेसब्री ज्यों-ज्यों बढ़ती गई, छह महीनों के अंतराल पर हुए तीन देश का मिज़ाज सर्वेक्षणों में उनकी सरकार की लोकप्रियता भी तेजी से गोते लगाने लगी.
फरवरी 2016 के सर्वेक्षण में लोकसभा में एनडीए की सीटों की गिनती घटकर 286 पर आ गई थी और उनके बहुमत का फर्क बहुत कम रह गया था. बीजेपी का हिस्सा 2014 के आम चुनावों में उसे मिले बहुमत से कहीं नीचे आ गया था. मोदी के लिए इससे बदतर यह हुआ कि लोकसभा चुनाव में सिर्फ 59 सीटें जीतकर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुके कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए में फिर से जी उठने के संकेत दिखने लगे. उसके सीटों की गिनती चुनाव में जीती गई सीटों से दोगुने पर पहुंच गई. राहुल गांधी की सियासी किस्मत में खासी उछाल दिखाई देने लगी. वे मोदी के बड़े चैलेंजर के तौर पर उभरे.
अब जब मोदी अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के मध्य पड़ाव पर पहुंच रहे हैं, उनके लिए अच्छी खबर यह है कि इंडिया टुडे-कर्वी इनसाइट्स का ताजातरीन देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण बताता है कि प्रधानमंत्री ने फिर मजबूती के साथ वापसी की हैं. सर्वेक्षण का अनुमान है कि अगर अभी चुनाव हों तो एनडीए को 304 सीटें मिलेंगीः यह फरवरी 2016 के सर्वेक्षण से 18 सीटों का अहम सुधार है. मोदी के लिए एक और अहम बात यह है कि पिछले सर्वेक्षणों में कांग्रेस और राहुल गांधी का जो नए सिरे से उभार दिखाई दिया था, वह ठहर गया है. यूपीए की सीटों की गिनती घट गई है और यह 100 से भी नीचे आ गई है.
मोदी के लिए यह बात भी उत्साह बढ़ाने वाली है कि उनकी लोकप्रियता की रेटिंग 10 फीसदी की लंबी छलांग भरकर फिर 50 फीसदी पर पहुंच गई है, जबकि उनके चैलेंजर खासकर राहुल गांधी की लोकप्रियता में गिरावट आई है. तीसरे मोर्चे के ताकतवर नेता, जिन्होंने हाल ही के राज्य विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की थी, चाहे वे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी हों या तमिलनाडु में जे. जयललिता और उससे पहले बिहार में नीतीश कुमार हों या दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, मोदी और एनडीए सरकार के अव्वल होने को चुनौती देने की हालत में दिखाई नहीं दे रहे हैं. हालांकि नीतीश और केजरीवाल, 2019 के चुनाव में दोबारा चुनकर आने की कोशिश करने पर मोदी का मुकाबला करने वाले सबसे ताकतवर विपक्षी नेता के तौर पर राहुल से अपने फासले को कम कर रहे हैं.
जहां यह माना गया कि एनडीए सरकार पिछले छह महीनों में अपने कामकाज में सुधार लाई है, वहीं मोदी के लिए चिंता की बात यह है कि सर्वेक्षण के मुताबिक लोग नौकरियां, महंगाई और भ्रष्टाचार सरीखे अहम मुद्दों पर संतुष्ट नहीं हैं (साथ की रिपोर्टें देखें). बीजेपी की सीटों की गिनती अब भी बहुमत से नीचे है, ऐसे में वह लोकसभा में बहुमत के लिए एनडीए के सहयोगी दलों पर निर्भर है. इसलिए मोदी और बीजेपी को वह जमीन अब भी दोबारा हासिल करनी है जो उन्होंने सत्ता में अपने पिछले दो सालों के दौरान गंवा दी है.
मोदी की लोकप्रियता में फिर से उछाल की सबसे जाहिर कैफियत वह है जिसे चुनावी पंडित ''टीना", या विकल्पहीनता का फैक्टर कहते हैं. अगर आप सियासी फलक पर नजर डालें, तो पार्टी के भीतर और बाहर मोदी के वर्चस्व को कोई गंभीर चुनौती देने वाला नहीं है. मोदी को इतना विशाल और 30 साल में स्पष्ट बहुमत के साथ अपने दम पर सरकार बनाने का जनादेश मिला था, तो इसके पीछे बड़ी वजह यह थी कि लोग सरकार के शीर्ष पर फैसले लेने वाला एक ऐसा नेता चाहते थे, जो यूपीए-2 की हुकूमत के दौरान अनुभव की गई दुर्दशा को रोके और अर्थव्यवस्था को नौकरियों और समृद्धि के साथ ऊंची वृद्धि के रास्ते पर वापस लाए. लेकिन खेती-किसानी के मोर्चे पर सिलसिलेवार उठाए गए कुछ गलत कदमों, दो लगातार सूखे से हालत और बिगडऩे, दिल्ली और बिहार की चुनावी हार और ''सूट-बूट की सरकार" होने की धारणा की वजह से मोदी सरकार की लोकप्रियता ने तेजी ने गोता लगाया. हालांकि इस बीच भी प्रधानमंत्री की निजी लोकप्रियता ऊंची बनी रही.
क्या कोई विकल्प नहीं होने की कैफियत मौजूदा सर्वेक्षण के इस विरोधाभास को पूरी तरह से समझा पाती है कि मोदी और एनडीए जरूर मजबूती से फिर उभरकर आए हैं, मगर यह धारणा अब भी कायम है कि उनकी सरकार को कई अहम मुद्दों पर अभी नतीजे देने बाकी हैं? बीजेपी का मजबूत विकल्प खड़ा करने में विपक्ष की नाकामी को देखते हुए दोष और कलंक के बावजूद मोदी को अब भी सबसे अव्वल नेता की तरह देखा जाता है जो इस मुश्किल और आजमाइश भरे दौर से राष्ट्र को बाहर निकाल सकता है. तो भी इस वापसी की कैफियत सिर्फ ''टीना" फैक्टर में खोजना मोदी के साथ नाइंसाफी होगी. वे हमेशा मोर्चे पर आगे रहकर तो अगुआई करते ही हैं, वहीं पिछले छह महीनों में मोदी ने दिखाया है कि उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा है और अपनी सरकार को तेज रक्रतार दी है. उन्होंने कृषि क्षेत्र और गरीबी उन्मूलन के कामों को मजबूती देने के लिए आजादी के बाद की एकमुश्त सबसे बड़ी धनराशि आवंटित करके अपनी किसान-विरोधी और गरीब-विरोधी छवि को झटक फेंका. उन्होंने अर्थव्यवस्था में तेजी लाने और रोजगार पैदा करने के लिए सड़क, रेल, बंदरगाह और आवास के लिए बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में सरकारी खजाने की भारी-भरकम धनराशियां झोंक दीं.
मोदी इसके बाद हिम्मत के साथ और आगे बढ़े और उन्होंने अर्थव्यवस्था के अहम क्षेत्रों को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए और ज्यादा खोल दिया. एलपीजी की कीमतें बढ़ाते हुए और रसोई गैस की सब्सिडी को जरूरतमंदों तक सीमित करते हुए वे कठोर फैसले लेने से भी डरे नहीं. मोदी ने विपक्ष के प्रति अपनी अदावत से भी कमोबेश छुटकारा पाया और केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की मदद से जीएसटी विधेयक को संसद से पारित करवाकर हाल के वक्त के सबसे बड़े आर्थिक सुधार का सूत्रपात कर दिया. ''एक राष्ट्र एक कर" की इस योजना में न सिर्फ देश के जटिल कर ढांचे को सरल बनाने के बीज छिपे हैं, बल्कि इससे कारोबार करने में आसानी होगी, उपभोक्ता के लिए लागत में संभवतः कमी आएगी और आर्थिक वृद्धि को उछाल मिलेगी.
नतीजा यह है कि आरबीआइ के गवर्नर रघुराम राजन के विस्तार के मामले में खराब ढंग से निबटने के बावजूद वृहत-अर्थव्यवस्था के मोदी के प्रबंधन को ठोस और मजबूत माना जा रहा है. अर्थव्यवस्था की छोटे अरसे की सेहत के तीनों अहम संकेतक अच्छे मुकाम पर हैं. महंगाई पर हालांकि फतह हासिल नहीं हुई है, मगर फिर भी यह सुविधाजनक स्तर के भीतर है. वेतन आयोग से हुई तनख्वाहों में बढ़ोतरी और ''एक रैंक एक पेंशन" के भुगतान के बावजूद चालू खाते का घाटा और साथ ही राजकोषीय घाटा भी काबू में बना हुआ है. और जीडीपी की वृद्धि को आप चाहे जिस भी फीते से नापें, वह अब भी 7.5 फीसदी के सेहतमंद स्तर पर है और भारत को दुनिया की संभवतः सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था का दर्जा देती है, वह भी ऐसे वक्त में जब अंतरराष्ट्रीय माहौल अनुकूल नहीं है. अच्छा अर्थशास्त्र ही अच्छी राजनीति भी है.
अलबत्ता लंबे अरसे के गंभीर मुद्दे भी हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है. बेरोजगारी खौफनाक स्तरों तक बढ़ रही है और नौकरियों के बगैर वृद्धि सरकार को भरमा रही है. बैंकों का कर्जों के जाल में फंसा होना चिंता की बड़ी वजह है जिससे कर्ज की उपलब्धता पर संकट मंडरा रहा है. औद्योगिक वृद्धि की रक्रतार सुस्त बनी हुई है और निर्यात की भी यही हालत है. कंपनियां भुगतान को लेकर झगड़ों में उलझी हैं जिसके चलते बुनियादी ढांचे की बड़ी परियोजनाएं अदालती अड़चनों में फंसी हैं. गतिरोध तोडऩे के लिए सरकार को अभिनव उपाय लेकर आना होगा. इसके लिए उसे ऐसी कंपनियों को गारंटी पर धन मुहैया करवाना होगा और पंचाट की प्रक्रिया में हारने पर मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने से पहले दूरदर्शिता से काम लेना होगा. वादों के बावजूद कारोबार के काम में सरकार की अब भी ज्यादा मौजूदगी बनी हुई है.
मोदी की विशेषता यह है कि वे कभी थकते नहीं हैं, चीजों को विस्तार से समझना चाहते हैं, राजनैतिक सूझबूझ रखते हैं, और तेजी से विकास के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध हैं. वे खुद को ''पंक्ति में सबसे पीछे खड़ा होने वाला आदमी" कहते हैं. उनके कैबिनेट मंत्री पीयूष गोयल बताते हैं कि बैठकों में प्रधानमंत्री तीन चीजों पर जोर देते हैः मुझे परिणाम बताओ, यह बताओ कि आप कितनी तेजी से काम कर रहे हैं, और आप उन्हें कितना अच्छा कर सकते हैं. लगता है, पिछले साल मोदी नौकरशाही पर नकेल कसने में कामयाब रहे हैं. सरकार में ऊंचे स्तर पर भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा चुकी है और ज्यादातर बड़ी नियुक्तियां योग्यता के आधार पर की जा रही हैं. पहले चरण में शुरू किए गए स्वच्छ भारत और जन धन योजना जैसे ज्यादातर कार्यक्रमों का परिणाम अब दिखने लगा है.
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर निरर्थक बातें बोलने के बजाए प्रधानमंत्री ने इस अवसर का इस्तेमाल देश की प्रगति की रिपोर्ट पेश करने के लिए किया. हालांकि कुछ लोगों का कहना था कि उनका भाषण जरूरत से ज्यादा लंबा था, लेकिन सचाई यही है कि उन्हें देश को बहुत कुछ बताना था. विकास के अलावा, उन्होंने एक वरिष्ठ अधिकारी के शब्दों में ''थाली टेस्ट" पर जोर दिया ताकि लोग हर दिन वाजिब कीमतों पर भोजन पा सकें. प्रधानमंत्री कार्यालय दालों और सब्जियों की बढ़ती कीमतों से चिंतित है, लेकिन अच्छे मॉनसून के कारण पूरी उम्मीद है कि कीमतें काबू में आ जाएंगी.
विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी का काम निरंतर शानदार बना हुआ है, जैसा कि एक उच्च अधिकारी ने बताया कि ''वे हमेशा आगे बढ़कर खेलना पसंद करते हैं." मोदी का यह सिद्धांत कि भारत को संतुलनकारी देश बनने के बजाए अग्रणी शक्ति बनना चाहिए और उनके इस सिद्धांत का नतीजा भी दिखने लगा है. साथ ही वे सभी देशों के साथ सहयोग का व्यावहारिक रवैया भी रखते हैं. पड़ोसी देशों, खासकर पाकिस्तान के साथ कुछ खराब अनुभवों के बावजूद देश का मिज़ाज सर्वेक्षण दिखाता है कि लोग विदेशी नीति के मामले में उनके कामकाज से बहुत खुश हैं.
मोदी संकट से किनारा करने के बजाए उसे चुनौती के रूप में लेना पसंद करते हैं और जब दूसरे राष्ट्राध्यक्षों से मिलते हैं तो बड़ी साफगोई से अपनी बात रखते हैं, जैसा कि उन्होंने परमाणु आपूर्ति समूह के मुद्दे पर चीन के नेतृत्व के साथ किया. उन्होंने घरेलू लक्ष्यों और विदेश नीति के बीच एक मजबूत तालमेल बना लिया है और विदेशी निवेशकों का भरोसा और विदेशी निवेश में वृद्धि हासिल करने में कामयाब रहे हैं. वे जोखिम उठाने से जरा भी नहीं डरते और जरूरत पडऩे पर ताकत का प्रदर्शन करने से नहीं हिचकते. क्षेत्र में शांति कायम करने की कोशिशों को पाकिस्तानी सेना की ओर से झटका लगने के बाद मोदी ने बलूचिस्तान में पाकिस्तान की ओर से किए जा रहे मानवाधिकार हनन और पीओके पर पाकिस्तान के दावे पर सवाल खड़ा कर दिया.
हां, जब वे अपने कार्यकाल के नाजुक उत्तरार्ध की तरफ बढ़ रहे हैं तो बहुत-सी घरेलू समस्याएं उनके पीछे लगी हुई हैं. हालांकि पाकिस्तान को एक कठोर संदेश देना अच्छा है, फिर भी कश्मीर, जहां बीजेपी राज्य सरकार का हिस्सा है, में बिगड़ते हालात के लिए उनकी सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा. इसके अलावा गुजरात में जिस तरह उनकी पसंद के उत्तराधिकारी ने प्रशासन पर अपना नियंत्रण खो दिया था, वह भी चिंता की बात है. इसी के चलते वहां नेतृत्व में बदलाव करना पड़ा. उन्होंने आखिरकार जिस तरह से गोरक्षकों की ओर से दलितों पर हमलों का खुलकर विरोध किया, उससे भी उनकी काफी तारीफ हुई है. लेकिन इसी तरह अगर वे मुसलमानों के लिए भी आवाज बुलंद करते हैं तो विशाल हृदय वाले नेता के तौर पर कहीं अच्छा रहेगा. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में ये चिंताएं भी प्रतिबिंबित होती हैं. मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों ने अपनी शिकायतें व्यक्त की हैं.
सर्वेक्षण सरकार के कार्यकाल के मध्य में किया गया है, जो दोबारा चुनाव जीतने की सरकार की योग्यता का एक महत्वपूर्ण सूचक साबित हो सकता है. प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के मध्य में किए गए सर्वेक्षण ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की लोकप्रियता में भारी गिरावट दिखाई थी. भ्रष्टाचार के ढेरों आरोपों से घिरी यूपीए की सीटों की संख्या 2009 के आम चुनावों में 259 से घटकर अगस्त, 2011 के सर्वेक्षण में 197 हो गई थी. कांग्रेस ने उस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और 2014 में उसे सबसे करारी हार का मुंह देखना पड़ा था.
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने भी अगस्त 2001 में अपने कार्यकाल के मध्य में इसी तरह का रुझान दिखाया था. सर्वेक्षण में उसकी चुनावी संभावनाओं में भारी गिरावट का संकेत देखा गया था—सरकार को तब औसतन 217 सीटें ही मिली थीं, जबकि 1999 के आम चुनावों में उसे 304 सीटें मिली थीं. तीन साल बाद ''भारत उदय" के जोरदार प्रचार के बावजूद एनडीए को हार का सामना करना पड़ा था. इसके विपरीत यूपीए के पहले कार्यकाल के मध्य में जब सर्वेक्षण किया गया था तो उसकी सीटों में तेजी से बढ़ोतरी का संकेत देखा गया था, और 2009 में उसने दोबारा चुनाव जीत लिया था.
मोदी ने कार्यकाल के मध्य में लगता है अपनी सरकार का आकलन कर लिया है. वे कड़े फैसले लेते हैं, मन की बात बोलते हैं, और विकास के मार्ग पर तेजी से बढ़ रहे हैं. अब फिर से जब देश का मिज़ाज सर्वेक्षण उनके पक्ष में जाता दिख रहा है तो मोदी को मुख्य मुद्दों पर तेजी से काम करना चाहिए, जिससे उन्हें हमेशा भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जाए, न कि किसी एक खास पार्टी, खास क्षेत्र, खास गुट या समुदाय के प्रधानमंत्री के तौर पर. तभी वे 2019 के चुनावों में जीत हासिल कर पाएंगे.
देश का मिज़ाज: मोदी की फिर मजबूत वापसी
पिछले छह महीनों में प्रधानमंत्री ने अपनी गलतियों से सीखा और सरकारी कामकाज को चुस्त-दुरुस्त किया और इससे उन्हें लोकप्रियता में आई ढलान से उबरने और साख बहाली में भरपूर मदद मिली और वे फिर अजेय बनकर उभरे.

अपडेटेड 23 अगस्त , 2016
ADVERTISEMENT
Advertisement
