यह 2010 की बात है. मुंबई के निकट कल्याण का रहने वाला अरीब मजीद नवी मुंबई में वाशी के फादर एग्नेल्स पॉलीटेक्निक कॉलेज में डिप्लोमा इन सिविल इंजीनियरिंग के पांचवें सेमेस्टर का छात्र था. उन्हीं गर्मियों में उसने नवी मुंबई में एक बिल्डिंग प्रोजेक्ट में ट्रेनी सिविल इंजीनियर के तौर पर इंटर्नशिप की. फिर 2012 में आठवें सेमेस्टर के दौरान उसने दक्षिण मुंबई के ग्रांट रोड पर हाउसिंग प्रोजेक्ट में इंटर्नशिप की. उसी साल बाद में, 77 फीसदी अंकों के साथ अपना कोर्स पास कर लेने पर उसने पनवेल में ए.आर. कालसेकर डिग्री कॉलेज में दाखिला ले लिया.
इस तरह देखें तो यह मुंबई के किसी उपनगर के युवा की आम-सी कहानी अथवा बायोडाटा हो सकता है- एक जैसा, मध्यवर्गीय पैदाइश से बाहर निकलने की तड़प लिए. लेकिन ऐसा है नहीं.
अब 23 साल के हो चुके अरीब ने मुंबई में नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआइए) से पूछताछ के दौरान बताया, ‘‘मैंने मई 2014 में डिग्री कॉलेज छोड़ दिया और इराक के लिए रवाना हो गया.’’ फिर 24 मई को मुंबई से देश छोडऩे और 28 नवंबर को देश लौटने और नतीजतन गिरफ्तारी के बीच अरीब इराक, सीरिया तथा तुर्की में जाकर इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड सीरिया (आइएसआइएस) के जेहादी के तौर पर लड़ता रहा, गोलियां खाईं, मरा भी घोषित कर दिया गया, हवाई बमबारी में बचा, दो फिदाईन हमलों से भी सलामत रहा और फिर उसे लगा कि जेहादी के तौर पर उसने बहुत जी लिया. यह भारतीय जेहादी की कहानी है. यह कहानी उसने एनआइए में पूछताछ करने वालों को बतलाई-जो अब इंडिया टुडे के हाथ लगी है.
मजहबी दीक्षा
अरीब की पैदाइश कल्याण के मुस्लिम बहुल मध्यवर्गीय इलाके अंसारी चौक के उनके पुश्तैनी मकान में हुई थी. फिर 2007 में वह कल्याण (पश्चिम) के थोड़े बेहतर सर्वोदय रेजिडेंसी में पहुंच गया. उसके यूनानी डॉक्टर पिता एजाज मजीद अपने बच्चों को बेहतर जिंदगी देना चाहते थे. अरीब ने 2008 में लुअर्ड्स हाइस्कूल से 83 फीसदी अंकों के साथ दसवीं पास की.
उसका धर्म की तरफ झुकाव किशोरावस्था में ही हो गया था-2005 में जब वह आठवीं में पढ़ता था तो वह एक स्थानीय मस्जिद में मिशाल भाई नाम के शख्स के संपर्क में आया, जो स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन (एसआइओ) की कल्याण इकाई का प्रमुख होने का दावा करता था. अरीब पहली बार मई, 2005 में एसआइओ के दफ्तर गया और जल्दी ही उसका सदस्य बन गया. अगले ही महीने एसआइओ ने मुंबई के निकट छोटे-से हिल स्टेशन माथेरान के लिए दो दिन का ट्रिप आयोजित किया.
ट्रिप के बाद अरीब काफी धार्मिक बन गया. जांचकर्ताओं का कहना है कि इस्लाम में उसकी शुरुआती दिलचस्पी में इसने अहम भूमिका निभाई. अरीब का कहना है कि मुंबई के इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय रसूख वाले व्याख्याता डॉ. जाकिर नाइक के व्याख्यान सुनने के बाद उसके मन में इस्लाम के बारे में और पढऩे की दिलचस्पी जागी.
लगभग यही वह समय था जब उसके भीतर के उदार मुसलमान की जगह पनपते कट्टर मुसलमान ने ले ली. जनवरी 2013 में उसके कॉलेज जाना शुरू करने के बाद आइएसआइएस के इराक और सीरिया में खिलाफत स्थापित करने की खबरें आनी शुरू हो गईं. जल्द ही उसका फेसबुक अकाउंट इस सामग्री से अट गया. अरीब ने कहा, ‘‘मुझे उन फेसबुक पेज से जुड़े प्रोफाइल के संपर्क भी मिले. लेकिन उनमें से कोई मेरी मदद नहीं कर रहा था. मैंने ऑस्ट्रेलिया, तुर्की, सऊदी अरब, इराक, अमेरिका...के कई लोगों से बात करने की कोशिश की लेकिन वे सारे लोग बस इतना ही कहते थे कि पहले तुर्की पहुंच जाओ.’’
वह आइएसआइएस और जेहाद के बारे में ऑनलाइन वीडियो देखने के साथ-साथ काफी गहराई से पढऩे भी लगा. असलियत में निर्णायक रूप से अरीब को सीरिया की ओर ले जाने वाला हदीस का सबक था, जिसमें जब एक सहाबी (साथी) ने पैगंबर से पूछा कि हिजरत (माइग्रेशन) के लिए कहां जाना चाहिए तो उसे जवाब मिला, ‘‘सीरिया जाओ.’’ एक मुश्किल थी-न तो वह अकेला जा सकता था और न ही बिना किसी ठोस संपर्क के.
जमात और योजना
जब अरीब के जेहन में आइएसआइएस में शामिल होने का ख्याल तैरने लगा तो उसे अपने दोस्त फहद शेख की याद आई, जिससे कुछ महीने पहले वह इलाके की मस्जिद में मिला था. दोनों में जल्द ही गाढ़ी दोस्ती हो गई थी-ऑनलाइन भी और असलियत में भी. फहद ने दक्षिण मुंबई में नागपाड़ा कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी. अरीब का कहना था कि फहद को इस्लाम की गहरी जानकारी थी. फरवरी, 2014 में अरीब ने फहद से अपनी योजनाओं का खुलासा किया. फहद ने बताया कि उसके दो अन्य दोस्त-सहीम तंखी और अमान तंदील भी आइएसआइएस में शामिल होना चाहते हैं. एक पांचवें शख्स ने भी शुरू में दिलचस्पी दिखानी शुरू की थी लेकिन कथित तौर पर बाद में वह पीछे हट गया.
सीरिया जाने के रास्ते की 2013 से ही तलाश कर रहे अरीब को पता था कि सबसे आसान तरीका तुर्की के रास्ते ही जाने का था. सीरिया की सीमा से लगे देशों के वीजा की तलाश में मार्च, 2014 में वह ट्रैवल ऑपरेटर थॉमस कुक के कल्याण दफ्तर पहुंचा. उसे पता चला कि तुर्की का 11 दिन का पूरा पैकेज प्रति व्यक्ति 80,000 रु. का था-खासा महंगा. फिर अगला अड़ंगा उन दस्तावेजों को लेकर भी लगा, जो वीजा के लिए जरूरी थे-छह महीने के बैंक स्टेटमेंट, सेलरी स्लिप और पासपोर्ट. सारे कागज सफर से एक महीने पहले जमा कराने जरूरी थे.
लिहाजा तुर्की तो योजना से बाहर हुआ. वे लोग प्लान बी पर काम करने लगे. अरीब का कहना था, ‘‘इंटरनेट पर मुझे सबसे आसान तरीका इराक और वहां से सीरिया जाने का नजर आया.’’ इस बीच उसे यह भी पता चला कि कोई भी जियारत वीजा पर इराक जा सकता है, जिसके लिए किसी दस्तावेज की जरूरत नहीं होती. अरीब को राहत टूर्स नाम के एक ट्रैवल ऑपरेटर का पता चला जो उसके लिए सभी खर्च मिलाकर प्रति व्यक्ति 60,000 रु. का रिटर्न पैकेज उपलब्ध करा रहा था. उन्होंने पैसा किस्तों में अदा किया.
रास्ता बनता दिखा तो अरीब ने ताहिरा भट्ट नाम की फिलस्तीनी महिला से संपर्क साधा जिससे सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए उसका परिचय था. अरीब ने उससे मदद के लिए बगदाद में किसी संपर्क के बारे में पूछा. लेकिन ज्यादातर लोग खुद को जाहिर नहीं करना चाहते थे, इसलिए रवाना होने से महज 10 दिन पहले उन्हें मोसुल में एक अबू फातिमा का संपर्क मिल पाया.
एनआइए ने जो पूछताछ अरीब से की, उसकी रिपोर्ट में अरीब के ताहिरा से निकाह के कयासों को भी खारिज कर दिया गया है. अरीब ने कहा, ‘‘’(आइएसआइएस के साथ) मेरी ट्रेनिंग खत्म होने पर मैंने फोन पर ताहिरा से बात की और हमने निकाह करने का फैसला किया. कुछ दिन बाद मैंने इराक में एक फिदाईन मिशन पर जाने का फैसला कर लिया. उसने भी फिलस्तीन में ऐसा ही करने का रास्ता चुना. हम जानते थे कि हम मरने वाले हैं, लेकिन उसने फिलस्तीन जाने से पहले अपनी फेसबुक प्रोफाइल को अपडेट करके यह लिख दिया कि उसका अरीब मजीद से निकाह हो चुका है. इसका मकसद ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को ‘‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’’ भेजने के लिए लुभाना था ताकि जवाब में वह उन्हें सीरिया आने में मदद दे सके. ‘‘लेकिन हमारा निकाह कभी नहीं हुआ था.’’
बगदाद और मोसुल
मई की 24 तारीख को अरीब सवेरे साढ़े ग्यारह बजे घर से निकला. उसने अपनी अम्मी की दराज से 33,000 रु. निकाले और उन्हें वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर की शाखा से 538 डॉलर में बदलवाया. वह लगभग रात पौने बारह बजे छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पहुंचा और उन चारों ने सवेरे चार बजे एतिहाद एयरवेज की फ्लाइट संख्या ईवाई-205 से उड़ान भरी.
अरीब ने अगली सुबह अबु धाबी हवाई अड्डे से अपने अब्बा को फोन पर खबर दी कि वह हिजारत के लिए सीरिया जा रहा है. उसके अब्बा ने उसे लौटने के लिए राजी करने की हर मुमकिन कोशिश की लेकिन वह नहीं माना. 25 मई को दोपहर में वे बगदाद पहुंच गए.
बगदाद में अगले कुछ दिनों में उन्होंने दो संपर्कों-सहीम के संपर्क रहमान दौलती और ताहिरा की सुझाई अबू फातिमा को कई बार फोन किया और हर बार उन्हें एक ही जवाब मिला-थोड़ा सब्र रखिए. तब उन चारों ने इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसुल जाने का फैसला किया.
मोसुल में उनका पहला दिन 1 जून बर्बाद गया. उसके बाद उनके पास फातिमा से संदेशा आयाः दोपहर की नमाज के बाद सबुनजी मस्जिद में इंतजार करें. इंतजार के दौरान सेना के लोगों ने उन्हें पकड़ लिया क्योंकि उन सभी के पास बैग थे और जाहिरा तौर पर वे बाहर से आए लग रहे थे. वे उन्हें पूछताछ के लिए निकट ही मुख्यालय में ले गए. दो घंटे बाद उन्हें छोड़ दिया गया. ‘‘जैसे ही हम बाहर आए, अबू फातिमा ने मुझसे संपर्क किया और हमें फिर से मस्जिद के गेट के पास लौटकर इंतजार करने को कहा. जल्द ही एक सफेद हुंडई कार में दो लोग वहां पहुंचे. जिस ड्राइवर ने हमें कार में बैठने को कहा, उसने अपना नाम अली बताया था.’’
बीस मिनट की ड्राइव के बाद वे मोसुल के बाहरी इलाके में अली के घर पहुंचे. अरीब ने बताया कि तीन बच्चों का पिता अली आलीशान डुप्लेक्स घर में रहता है. ‘‘उसने हमारे बैगों की तलाशी ली, हमारे फोन से सिम कार्ड निकाल दिए और मेरे सैमसंग नोट-1 को छोड़कर बाकी सारे फोन ले लिए.’’ अरीब को गूगल ट्रांसलेटर के इस्तेमाल के लिए बिना सिम कार्ड के फोन रखने की इजाजत दी गई क्योंकि वहां कम ही लोग अंग्रेजी जानते थे. वे दो दिन तक अली के घर पर ही रहे , जिस दौरान उसने इस्लाम के बारे में उनकी जानकारी को परखा. ‘‘उसने हमें तजकिया के बारे में पूछा यानी आइएसआइएल (आइएसआइएस) में शामिल होने के लिए किसी मौजूदा आइएसआइएल सदस्य से अनिवार्य सिफारिश होती है. हमारे पास कोई तजकिया नहीं थी, अली हमें पड़ोस में ही अबू यूसुफ के घर ले गया.’’
वे चार और दिन यानी 6 जून तक यूसूफ के घर में रुके, और किसी सिफारिश के लिए उनकी सारी दरख्वास्तें खारिज हो गईं. एक मौके पर तो अली ने उन्हें भारत लौटने तक की सलाह दे दी. अरीब ने बताया कि आखिरी रास्ते के तौर पर अली ने चेचन लड़ाके और इराक तथा सीरिया के मिलिट्री कमांडर उमर शिशानी से बात की.
ट्रेनिंग
शिशानी के कहने पर उन चारों को जजीरा नाम की जगह पर ट्रेनिंग के लिए भेजा गया. वह छोटा-सा गांव था जिसमें 10-12 घर थे. वहां की आबादी 25-30 थी. ‘‘वे सभी आइएसआइएस के लड़ाके थे; वह एक कैंप सरीखा था. उस गांव में रहने वाले सारे लड़ाके इराक से थे, सिवाए ब्रिटेन से आए एक मीडिया प्रतिनिधि के.’’
लगभग 10-12 दिन की ट्रेनिंग के बाद, जिस दौरान आइएसआइएस ने मोसुल और इराक-सीरिया सीमा को कब्जे में कर लिया था, उन चारों को उत्तरी सीरिया में एक शहर रक्का भेज दिया गया. रक्का में आइएसआइएस ने एक स्कूल को ग्रुप के विदेशी सदस्यों के रजिस्ट्रेशन सेंटर में तब्दील कर दिया था. अरीब के अनुसार, उसका नाम हुदूद सेंटर था. वहां एक दिन रुकने के बाद लगभग 200 नए सदस्यों को 19 जून को आगे की ट्रेनिंग के लिए बसों में अलग-अलग जगहों पर भेज दिया गया. चारों भारतीय 60 लोगों के उस ग्रुप में शामिल थे जिन्हें नजदीकी कैंप ले जाया गया जिसे सराय मोअस्कर कहा जाता था. वहां विभिन्न देशों के लगभग 300 आइएसआइएस सदस्य थे. मोअस्कर में दो हफ्ते तक उन्हें हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई.
फिर एक दूसरा ट्रेनिंग कैंप मोअस्कर फल्लूजा में हुआ जहां उन्हें शारीरिक और हथियारों की ट्रेनिंग दी गई. कुल 15 दिन का यह कैंप 16 जुलाई को खत्म हुआ, जिसके बाद तीसरा चरण अब्दुल्ला अज्जम मोअस्कर में किया गया. यहां इन रंगरूटों को फर्टिलाइजर से बारूदी सुरंगें (उबवा) बनाने, सैन्य रणनीति और आमने-सामने की लड़ाई के बारे में सिखाया गया.
ऑपरेशन
ट्रेनिंग के बाद तीनों इंजीनियरों-फहद, अमान और अरीब को बाकी इंजीनियरों, डॉक्टरों और प्रोग्रामरों के साथ रखा गया. उन्हें ट्रेनिंग के दौरान दी गई एके-47 राइफलें अपने साथ रखने की इजाजत दी गई और इसके अलावा 30-30 राउंड भी दिए गए. सहीम को गार्ड के रूप में काम करने के लिए सीरिया-इराक सीमा पर रबीआ शहर में भेज दिया गया. लेकिन अरीब ने इसके लिए तो आइएसआइएस में खुद को शामिल नहीं किया था. ‘‘मैंने फिदायीन हमले पर जाने का फैसला किया. 3 अगस्त को मैं एक मिनीबस में इराक गया.’’
हालांकि आत्मघाती हमला हो नहीं पाया. उसी देर रात, अरीब को इराक के बाज शहर पर अमेरिकी हवाई हमलों में टांग में चोट लगी. वह 4 अगस्त को मोसुल पहुंचा और दस दिन के आराम के बाद अपने पहले फिदाईन हमले के लिए तैयार था. आठ और दिन गुजर जाने के बाद फिदाईन दस्ते के अमीर (प्रमुख), निजार ने अरीब को कहा कि उसके हमले की बारी आ गई है. उनकी योजना मोसुल बांध पर कब्जा करने की थी और अरीब को एक आत्मघाती इनसानी बम यानी ‘‘इस्तेशादी’’ बनना था.
उनकी योजना यह थी कि बांध की सुरक्षा कर रहे कुर्द गार्डों को धता बताकर ढाई टन विस्फोटकों से लदी एक सिविल वैन को उनसे जाकर भिड़ा दिया जाता. लेकिन यह इस बार भी नहीं होना था. अरीब ने बताया, ‘‘हमला बोलने से दो दिन पहले ही वह कार हवाई हमले का शिकार हो गई.’’
अरीब का दावा है कि अगले दिन वह इगिमासी के रूप में ट्रेनिंग लेने के लिए उत्तर-पश्चिम इराक के तल अफर शहर में चला गया. इगिमासी का आशय होता है कोई इनसान जितने हथियार और गोला-बारूद ढो सकता है, सब लेकर लड़ाई में उतर जाना और जब हथियार खत्म हो जाएं तो खुद को शहीद कर देना.
‘‘तीन दिन के बाद मैं और 11 अन्य इगिमासी (लड़ाके) मोसुल बांध की लड़ाई के लिए लौट पड़े.’’ अरीब ने बताया, ‘‘हम में से हरेक को एके-47, द्रगुनोव (स्नाइपर राइफल), पीकेसी मशीन गन, आरपीजी, पीकेसी के 1,000 राउंड, एके-47 के 300 राउंड, चार हैंड ग्रेनेड, ग्लॉक 19 (पिस्तौल), .9 एमएम के 50 कारतूस और एक चाकू दिया गया.’’
अरीब को इस लड़ाई में गोली लगी और वह आठ दिन तक अस्पताल में बेहोश रहा. हालत ठीक होने के बाद उसने फिर से खुद को फिदाईन हमले के लिए पेश करने का फैसला किया. इस बार कुर्दिस्तान के निकट जम्मार में. लेकिन 20 दिन तक दुश्मन ने उस इलाके पर हमला किया ही नहीं. अरीब तब रक्का लौट आया.
भारत वापसी
21 अक्तूबर को अरीब ने अपने परिवार से संपर्क साधा. वे लोग अब तक यह मान चुके थे कि वह सीरिया में लड़ाई में मारा जा चुका है. इस दौरान उसकी बहन रुश्ना का भी निकाह हो चुका था. ‘‘मैंने महसूस किया कि मेरे अब्बू-अम्मी सही कह रहे थे-मुझे जो चाहिए था, वह हासिल हो चुका था. मैं संतुष्ट था; मैं जो भी कर सकता था, मैंने किया और अब मैं लौटना चाहता था.’’
21 नवंबर को अरीब ने मेडिकल और पारिवारिक समस्याओं के आधार पर अपने कमांडर से छुट्टी की इजाजत मांगी. जवाब मिला, ‘‘अगर तुम भारत लौटते हो, तो तुम्हारी एकमात्र जगह जेल होगी.’’ लेकिन अरीब अड़ा रहा. तब अरीब को एक सेफ हाउस जाने की इजाजत मिल गई, जहां अलग-अलग देशों के 15 और लोग घर वापसी का इंतजार कर रहे थे.
वहां से पहले उन्हें सीरिया में जराबुलुस और फिर तुर्की में सीमा पार गजियांटेप ले जाया गया. उसके बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया.
अरीब मजीद 25 नवंबर को इस्तांबुल जाने वाली एक बस में सवार हो गया और अगले दिन दोपहर में दो बजे शहर पहुंच गया. उसने अपने अब्बू को फोन मिलाया, जिन्होंने तुरंत अरीब को वापस लाने के लिए भारतीय अधिकारियों से संपर्क साधा.
मुंबई का यह छात्र कैसे बना आइएसआइएस का लड़ाका, जानें पूरी दास्तान
मुंबई के कल्याण के इंजीनियरिंग छात्र अरीब मजीद की कहानी-कैसे वह देश लौटकर भारतीय पुलिस के हाथ लगने से पहले आइएसआइएस का लड़ाका बना. कैसे वह इराक, सीरिया तथा तुर्की में जाकर आइएसआइएस के जेहादी के तौर पर लड़ता रहा, गोलियां खाईं, मरा भी घोषित कर दिया गया.

अपडेटेड 2 फ़रवरी , 2015
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