इवा नाम के अंडाणु (ओवम) से सैमी नाम के शुक्राणु (स्पर्म) का मिलन होता है. हर तरह की चुनौतियों को पार करते हुए उससे मिलने वाला वह अकेला है. वह योनि (वजाइना) और गर्भाशय (सर्विक्स) के रास्ते लाखों शुक्राणुओं से जूझते हुए वहां तक पहुंचा है. इम्यून सेल्स ने उसे मारने की भरपूर कोशिश की. फैलोपियन ट्यूब में सिलिया सेल्स ने उसे फंसाने की कोशिश की. बाकी सब बदकिस्मत मारे गए. लेकिन सैमी सभी बाधाओं को पार करता हुआ इवा से जा मिला. सैमी और इवा ने मिलकर युग्मज (जाइगोट) बनाया, जो नए मानव जीवन की शुरुआत है.
फोटो: जी का जंजाल न बन जाए कम उम्र में 'संबंध'
सेक्स सर्वे 2011: मन के अंदर की बात
सेक्स सर्वे 2010: समाज में खुलेपन की बयार
पूरी क्लास ठहाकों से गूंज उठी. बायोलॉजी टीचर ने पलटकर पूछाः ‘‘कौन हंसा?’’ लेकिन पूरी क्लास खामोश रही. अच्छी बात यह थी कि क्लास का समय पूरा हो रहा था. घंटी बज गई. दिल्ली के एक स्कूल में नवीं क्लास के किशोर कमरे से बेसाख्ता हंसते हुए बाहर आए, ‘‘सैमी स्पर्म? हा हा हा. ये कितनी अजीब है, असल में किसी ने उसे सेक्स के बारे में बात करना सिखाया ही नहीं. ही ही ही.’’ वे शोर मचाते हैं और खीसें निपोरते हुए कहते हैं, ‘‘पहले ये हमें लंबे समय तक वन-पैरेंट बैक्टीरिया सेक्स के बारे में पढ़ाते रहे. फिर कहते हैं कि शुक्राणु और अंडों के बीच प्यार हो गया. ये आखिर हमको समझते क्या हैं, बच्चे? हम कोई बच्चे हैं?’’{mospagebreak}
एक तरह से कह सकते हैं, हां. लेकिन वास्तव में ये हैरी पॉटर और फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे के बीच कहीं है- स्मार्ट और जिंदादिल. लेकिन समझदार और सुलझे हुए. देश में किशोरों की उभरती ब्रिगेड में से 30 फीसदी शहरों में रहते हैं. इनका जन्म 1996 में इंटरनेट के पहली बार भारत में प्रवेश के बाद हुआ. यह वैश्विक जगत में जन्मे भारत के किशोर हैं- महत्वाकांक्षी और सजग, स्पर्धा करने वाले और आत्मविश्वासी, बड़बोले और पक्की सोच वाले. इनके पास वयस्क मस्तिष्क में झांकने की स्पष्ट सोच है- शादी से पहले सेक्स से मां-बाप परेशान नहीं होंगे, लेकिन खराब ग्रेड से होंगे, तो वर्जिनिटी की फिक्र किसे है? सेक्स का मतलब है मस्ती, दोस्ती और चैट, चैटर, एसएमएस, ट्विटर या फेसबुक पर बहुप्रचलित शब्दः एलओएलवी (ढेर सारा प्यार). सब जानते हैं.
इंडिया टुडे पिछले 11 साल से देश के सेक्स संबंध रुझानों पर से परदा उठाता रहा है. 12वें साल में इंडिया टुडे ग्रुप-एमडीआर सर्वे आपको अनजानी राह पर ले जाएगा-सेक्स और भारतीय किशोर. इसमें देश के 19 शहरों के करीब 5,000 किशोरों से बात कर यह जानने की कोशिश की गई है कि बचपन और वयस्कता के बीच की देहरी पर खड़े ये किशोर प्रेम, रोमांस, रिश्तों और सेक्सुअलिटी के बारे में क्या सोचते हैं? जब घर और स्कूल के बड़े चाहते हैं कि उनका ध्यान सिर्फ स्कूल की किताबों पर रहे तो ये अपने बदलते शरीर और इंद्रियों, आवेगों और संवेगों, इच्छाओं और आवश्यकताओं से कैसे जूझते हैं.
अगर हम इनकी जिंदगी को सिर्फ आंकड़ों में देखें तो माता-पिता को दिल का दौरा पड़ जाएगाः हमारे इस साल के सर्वे के अनुसार 10वीं क्लास के हर 10 में से तीन छात्र सेक्स कर चुके हैं. इसमें कोई हैरत नहीं कि 46 प्रतिशत किशोरों ने स्कूल या कॉलेज में इस्तेमाल किए हुए कंडोम देखे हैं. इनमें से 25 प्रतिशत ऐसी किशोरी को जानते हैं, जो गर्भवती हो गई थी. जरा कल और आज की तुलना करें- 2008 के इंडिया टुडे सेक्स सर्वे में सिर्फ 10 में से एक ने इस उम्र में सेक्स करने की बात कही थी. अब पहली बार सेक्स की उम्र करीब 15-16 वर्ष है. 2004 में हमारे पहले सेक्स सर्वे में पुरुषों और स्त्रियों ने पहली बार सेक्स की अपनी उम्र 18-26 वर्ष बताई थी. पिछली पीढ़ियों के मुकाबले आज के किशोरों को इंटरनेट की बेरोकटोक सेवा सुलभ है. करीब 26 प्रतिशत सेक्स से जुड़े संदेश भेजते या पाते हैं, 46 प्रतिशत ऑनलाइन अश्लील सामग्री देखते हैं और छह प्रतिशत ने सोशल नेटवर्क वाले मित्रों के साथ सेक्स संबंध बनाया है.{mospagebreak}
लेकिन यह उन्मुक्त पीढ़ी उत्सुकतावश या हार्मोंस के ज्वार को शांत करने के लिए सेक्स नहीं करती. यह प्रेम की भूखी है. सर्वे में शामिल आधे से अधिक किशोरों ने किसी लड़के या लड़की से कहा है कि वे उससे प्रेम करते हैं और 49 प्रतिशत किशोरों ने रोमांटिक मूड में किसी को चूमा है. सेक्स सुख ले चुके लगभग सभी किशोरों ने बताया कि उन्हें प्रेम था, इसलिए ऐसा किया. जिन्होंने सेक्स नहीं किया, उनके लिए भी वर्जिनिटी के खास मायने नहीं हैं. सिर्फ पांच प्रतिशत ही इसकी कद्र करते हैं. सिर्फ छह प्रतिशत ने सेक्स इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें अभी कोई मनपसंद साथी नहीं मिला है.
नई वयस्क पीढ़ी का उदय
बेंगलूरू की तितली (जिन्होंने इस रिपोर्ट में अपने बाकी साथियों की तरह उपनाम से बुलाया जाना पसंद किया) कक्षा नौ में पढ़ती हैं. लंबी, दुबली-पतली और हमेशा काली ड्रेस पहनने वाली इस लड़की को पढऩे का जुनून है. उन्होंने सेक्स के बारे में कैसे जाना? वे कहती हैं, ‘‘पक्की तरह तो याद नहीं कि यह शब्द पहली बार कब सुना था, लेकिन 11 साल की उम्र तक यह समझ गई थी कि यह ऐसा काम है जो बच्चे नहीं करते.’’ पहली बार यह शब्द छठी क्लास में स्कूल की वर्कशॉप में औपचारिक रूप से सुनने को मिला. वे बताती हैं, ‘‘काउंसलर्स वहां पर पीरियड, रिलेशनशिप और हमारे दिमाग में चलने वाली दूसरी बातों के बारे में बताते थे. हम कटा-कटा क्यों महसूस करते हैं, सेक्स की औपचारिक शिक्षा आठवीं क्लास में शुरू हुई, लेकिन वह बहुत ‘‘वैज्ञानिक’’ किस्म की थी. मैंने स्कूल की किताबों से ज्यादा दूसरी किताबों से सीखा. ऐसी बहुत-सी किताबें हैं जिनमें सेक्स सीन होते हैं. सब द फॉल्ट इन आर स्टार्स पढ़ते हैं.’’
जो दिखता है वह हमेशा सच नहीं होता. किताब या स्मार्टफोन या आइपैड में नजरें गड़ाए बैठा बेफिक्र किशोर भले ही कोई सामान्य किशोर दिखे लेकिन अक्सर उस किताब में वयस्क होने के सफर का उनका राज छिपा होता है. बाजार में वयस्क होते किशोरों के नए उपन्यासों का सैलाब है. इन उपन्यासों में ऐसे उत्तेजक दृश्य हैं कि माता-पिता के रोंगटे खड़े हो जाएं. हैरी पॉटर के बाद जॉन ग्रीन का द फॉल्ट इन आर स्टार्स और हारूकी मुराकानी का नॉर्वेजियन वुड सबसे चर्चित किताबें है. ये किताबें ज्यादातर इश्क होने, उसे खो देने और बेहिसाब सेक्सुअलिटी से भरी हैः एफ (फक) वर्ड की भरमार है. किशोर दीवानगी से एक-दूसरे को चूमते हैं. प्यार से एक-दूसरे को छूते हैं. पुचकारते हैं. वर्जिन होने के बारे में पता लगाते हैं. वयस्क न होने के बावजूद उपन्यासों के नायक-नायिकाएं सरेआम रोमांटिक डिनर में शैंपेन या वोदका पीते हैं. भारत के शहरी किशोर दुनिया भर के किशोरों की तरह ही इन किताबों का लुत्फ ले रहे हैं. कोलकाता के एक स्कूल के 12वीं क्लास के छात्र राहुल के मुताबिक, ‘‘ग्रीन को पढ़कर मेरी जिंदगी बदल गई. अब मुझे उन चीजों की बेहतर समझ है, जो जीवन में कीमती और बिंदास है. जैसे, लड़की कैसे रिझाई जाए.’’{mospagebreak}
बौड़म बनाम बिंदास
लड़की पटाने की कला सीखना? पुराने समय की बात लगती है. लेकिन राहुल जैसे बौड़मों के लिए खास तौर पर बड़ी बात है. बौड़म की पारंपरिक परिभाषा के अनुसार ये सोशल कौशल से वंचित बेहद उबाऊ मेहनती लोग होते हैं (ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी). लेकिन आज नए एडल्ट उपन्यासों की बदौलत बौड़म अब नया सेक्सी है. उनका ‘‘आइक्यू उनके वजन से अधिक होता है.’’ और वे ‘‘अविश्वसनीय हद तक आकर्षक होते हैं.’’ यह परिभाषा अर्बन डिक्शनरी की है. जॉन ग्रीन ने अपने यूट्यूब वीडियो ब्लॉग यानी वीब्लॉग पर किशोरों के लिए नया शब्द गढ़ा है, ‘‘नर्डफाइटर्स’’ उन्होंने नर्ड्स को ‘‘ऑसम’’ कहकर तारीफ की है. किशोरों की दुनिया धीरे-धीरे दो साफ वर्गों में बंट रही है, ‘‘नर्ड’’ और ‘‘कूल’’ (बिंदास). इस दौर में जब किसी वर्ग में फिट होना भी सेक्स जितना ही जरूरी है, तो ये दोनों वर्ग किशोर जीवन की दो सबसे अहम बातों-पढ़ाई और सेक्स के प्रति किशोरों का रुख तय करने के लिए जूझ रहे हैं.
चौदह वर्षीया लॉली ने पाला बदल लिया है. दिल्ली की इस लड़की ने कहा, ‘‘मैं बिंदास ग्रुप में हुआ करती थी.’’ इसका क्या मतलब है? ‘‘असल में बिंदास लड़के-लड़की सारे नियम तोड़ते हैं, इसलिए वे हीरो कहलाते हैं, जबकि ग्रेड सबसे खराब पाते हैं.’’ इसका मतलब-क्लास छोडऩा, शराब पीना, सिगरेट पीना, डेटिंग, रात की पार्टियां और सेक्स. कूल लड़कियां पारदर्शी कपड़ों में अपनी तस्वीरें इंटरनेट पर डालती हैं, खूब मेकअप करती हैं. लॉली की क्लास में एक लड़की ने मुहांसों के दाग हटाने के लिए लेजर उपचार कराया था. लॉली ने हिकारत से कहा, ‘‘वे हमेशा सेल्फी के लिए मुंह बनाते हैं, बड़ी चिढ़ होती है.’’
पंद्रह वर्षीया डायना से लॉली को जरूर चिढ़ होगी. वह मुंबई के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ती है, जहां हर दूसरे बच्चे की मां या बाप बॉलीवुड स्टार है. उसे सालाना परीक्षाएं खत्म होने का इंतजार है, ताकि वह ‘‘पार्टी...’’ कर सके. उसे हमेशा नए प्रेम की तलाश रहती है (‘‘मैं शायद अगले हफ्ते ब्रेकअप कर लूंगी’’) और एक साथ कई लड़कों के साथ डेटिंग करना एकदम सहज लगता है (‘‘मैं छह लड़कों से डेटिंग कर रही हूं, तो प्रॉब्लम क्या है?’’). वह बेहद पॉपुलर है क्योंकि वह अपने दोस्तों को दिलचस्प लड़कियों के प्रोफाइल फेसबुक में देखने में मदद करती है. उसका कहना है, ‘‘वे इन लड़कियों का शिकार कर सकते हैं.’’
जैसा कि लॉली बताती है, उसने पाला इसलिए बदला क्योंकि वह पढ़ाई में पिछडऩा नहीं चाहती. ‘‘तो अब मैं बौड़म हो गई हूं. मेरे सारे दोस्त बौड़म हैं.’’ उन्हें सबसे अच्छे ग्रेड मिले, ये फिट होने की परवाह नहीं करते, हमेशा स्मार्टफोन या आइपेड पर व्यस्त रहते हैं, मन की बात छिपाते नहीं और कपड़ों की ज्यादा परवाह नहीं करते. ‘‘मैं सिर्फ काजल और लिपबाम लगाती हूं और तैयार होने में सिर्फ दो से 10 मिनट लगते हैं.’’ बौड़म के लिए सेक्स कोई बड़ी बात नहीं है. ‘‘लड़कियां आकर्षण की बात करती हैं और लड़के छोटे-मोटे दिल आने की.’’ उसने माना कि लड़के सेक्स की बात बहुत ज्यादा करते हैं, ‘‘और हम में से कोई भी इनके बारे में लगातार बात नहीं करता.’’
क्लासरूम नाम की इस युद्धभूमि में बिंदास हों या बौड़म, दोनों पर सिर्फ प्रेम का भूत सवार है. बिंदास तो हमेशा प्रेम में डूबे रहते हैं (वैसे लॉली और उसके दोस्तों को शक है कि वे इस शब्द का मतलब भी समझते हैं).’’ वे जल्दी-जल्दी साथी बदलते हैं, जेब में कंडोम रखते हैं और स्कूल या कॉलेज के बाद सेक्स के प्रयोग करते हैं. बौड़म को प्रेम के विचार से प्रेरणा मिलती है. वे प्रेम को समझने के लिए नये वयस्क उपन्यास बहुत दिलचस्पी से पढ़ते हैं, लेकिन सेक्स से दूरी बनाए रहते हैं. या तो इसलिए कि पढ़ाई में बहुत डूबे रहते हैं या फिर उसके लिए तैयार नहीं हैं या सही साथी नहीं मिला है. ‘‘मैंने अपनी मां से कह दिया है कि अगर मुझे गहरा प्रेम हो गया और मैं गंभीर हूं और जानती हूं कि क्या कर रही हूं तो शादी से पहले सेक्स होना चाहिए.’’ उनकी मम्मी को यह बात कतई पसंद नहीं आई.{mospagebreak}
किशोर एहसासों की गंध
देश उन्हें कितनी अच्छी तरह समझता है? बच्चों के गलत रास्ते पर चलने का ख्याल आते ही अक्सर उभरने वाले शोर से तो ऐसा लगता है कि समझ पर्याप्त नहीं है. लेकिन जब भी हम नफे-नुक्सान के बारे में बहस करते हैं तो हमें पता लगता है कि हमें पूरी जानकारी नहीं है और उनकी वयस्क विषयों को सीखने, समझने और प्रोसेस करने की क्षमता को कम आंक लेते हैं. आइए भारत के किशोरों के इरॉटिक जीवन में झांककर देखें-किशोर के लिए इसका क्या अर्थ है, आजादी से लेकर साथियों के दबाव तक, शरीर की छवि से आत्मसम्मान तक, सेक्स उगलती भाषा से लेकर सेक्स के भूखे शिकारियों तक, रोमांस से डेटिंग तक, गर्भनिरोधकों से लेकर पोर्नोग्राफी तक.
किशोरों के लिखे स्तंभों और किस्सों से भरे हमारे विशेष अंक से पता चलता है कि किशोर असल में किशोरावस्था की तेजी से बदलती दुनिया के बीच से अपना रास्ता तलाशने में जुटे हैं. कुछ आपको कहने पर मजबूर करेंगे, ‘‘उफ्फ? तो कुछ ‘‘आउच’’ और कुछ ‘‘सपना देखिए.’’ तो जादुई कालीन पर सवार होकर किशोर मन की सैर करने के लिए तैयार हो जाइए.

