उत्तराखंड में तीर्थस्थल हरिद्वार की गहमागहमी से कुछ ही दूरी पर स्थित औद्योगिक क्षेत्र में साबुन से लेकर मोटरसाइकिल बनाने वाली फैक्टरियों की भरमार है. इस क्षेत्र का विकास राज्य सरकार ने किया है. पहली नजर में तो यह इलाका तीर्थस्थल की अपेक्षा काफी शांत लगता है.
लेकिन बिजली का सामान बनाने वाली कंपनी हैवेल्स की फैक्टरी में कदम रखते ही शोर शांति को भंग कर देता है. मशीनों के शोर के बीच नीली पोशाक और सफेद टोपी में कर्मचारी कॉयल्स बनाते हैं और मोटर, स्विच, स्टैंड और पंखे के डैने असेंबल करते हैं. इस फैक्टरी में हर 25 सेकंड में एक टेबल फैन बनता है.
दो साल पहले यहां ऐसा कुछ नहीं था. हैवेल्स कंपनी दशकभर से पंखे बेच रही है. इससे पहले वह टेबल फैन चीनी कंपनी मीडिया से मंगाती थी. मीडिया दुनिया की सबसे बड़ी फैन निर्माताओं में से है. मीडिया ने कई साल तक हैवेल्स से दाम बढ़ाने की मांग नहीं की पर 2010 में उसने बढ़ती मजदूरी लागत और बिजली की कमी का हवाला देकर अगले तीन साल में दाम 20 फीसदी तक बढ़ा दिए.
हैवेल्स के प्रेसिडेंट सुनील सिक्का कहते हैं, ‘‘ऐसा समय आया जब हमने कहा कि बहुत हो गया, अब हमें भारत में ही प्रोडक्शन की बात सोचनी चाहिए.’’ हैवेल्स ने हरिद्वार में प्रति महीने 1,00,000 टेबल फैन की क्षमता के साथ शुरुआत की. वहां वह पहले से सीलिंग फैन बनाती थी. अब वह टेबल फैन आयात नहीं करती, बल्कि चीन के मुकाबले उसकी लागत भी 10 फीसदी कम पड़ रही है. सिक्का बताते हैं, ‘‘मेरा मार्जिन बढ़ गया क्योंकि इस पर आने वाली लागत घट गई है.’’
हैवेल्स उन कंपनियों में से है जिन्होंने चीन में कीमत बढऩे पर वहां से माल मंगाना बंद किया और यहां उत्पादन शुरू किया या शुरू करने के बारे में सोच रही हैं, ताकि सस्ते भारतीय श्रम और अनुकूल करेंसी मार्केट का लाभ ले सकें. उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनी गोदरेज, मोबाइल फोन निर्माता माइक्रोमैक्स, ऑटो पार्ट्स कंपनी बॉश और स्टेशनरी निर्माता आइटीसी सभी ने भारत में उत्पादन शुरू किया या अपना विस्तार किया है. चीनी कंपनियां भी भारत में उत्पादन केंद्र बनाने के लिए साझीदारों के साथ संयुक्त उपक्रम स्थापित कर रही हैं.
अपने एयरकंडिशनर और वाशिंग मशीन का उत्पादन भारत में शुरू करने वाले गोदरेज समूह के चेयरमैन आदि गोदरेज कहते हैं, ‘‘चीन में लागत बढ़ रही है, इसलिए चीन के बदले यहां प्रोडक्शन शुरू करने का यह सही समय है.’’ उनकी राय में यह रुझान अगले 20 साल तक बना रहेगा. वे कहते हैं, ‘‘जितनी जल्दी भारत इस रुझान का फायदा उठा लेगा, वह उतनी बेहतर स्थिति में रहेगा. अगर हम जल्दी इसका लाभ नहीं लेंगे तो दूसरे देश इसे भुना लेंगे.’’
दरअसल, दूसरे देश भी चीन के प्रतिस्पर्धा में बढ़त गंवाने से फायदा उठाने लगे हैं. चीन की बढ़त से दुनियाभर की कंपनियां उसकी ओर आकर्षित हुई थीं. भारत के नेशनल मैन्युफैक्चरिंग कम्पीटिटिवनेस काउंसिल के सदस्य सचिव अजय शंकर के मुताबिक अगले कुछ साल में चीन में श्रम आधारित उद्योगों में अनुमानित 10 करोड़ नौकरियां खत्म हो जाएंगी. कई अमेरिकी, यूरोपीय और जापानी कंपनियां चीन में प्रोडक्शन बंद करके दक्षिण एशिया के कम लागत वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रही हैं.
दशकभर से अर्थव्यवस्था की धीमी गति की वजह से पिछले कुछ साल में एयरकंडिशनर और ऑटोमोबाइल्स जैसे उत्पादों की मांग घटने का असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ा है. भारत में उत्पादन 2005 और 2011 के बीच 10 फीसदी की दर से वृद्धि के बाद 2011-12 में 2.7 फीसदी और पिछले साल एक फीसदी की दर से ही बढ़ा. देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगातार दूसरी बार घट गई है. यह हिस्सेदारी 2010-11 में सर्वाधिक 16.2 फीसदी से 2012-13 में 15.1 फीसदी और अब पिछले 10 साल में सबसे कम है. हमारे जीवन की जरूरतों पर अब भी चीनी सामान का बोलबाला है, चाहे वह वालपेपर हो या फर्नीचर अथवा इलेक्ट्रॉनिक्स या औद्योगिक उपकरण.

रुपए, डॉलर और युआन का खेल
भारत में प्रोडक्शन शुरू करने की बड़ी वजह विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में अनुकूल माहौल है. चीन की करेंसी युआन पिछले तीन साल में डॉलर के मुकाबले 7.2 फीसदी और पिछले एक दशक में 35.3 फीसदी ऊपर गई है, इससे चीन से निर्यात महंगा हो गया है. इस बीच रुपया पिछले तीन साल में 26.7 फीसदी गिरा है, जिसने विदेशी माल को महंगा बना दिया है.
बॉश डीजल सिस्टम्स इंडिया में मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी के वाइस प्रेसिडेंट सुरेश बी.आर. कहते हैं कि हमारी ऑटो पार्ट्स की कंपनी इलेक्ट्रॉनिक डीजल इंजन चीन से मंगाती थी लेकिन तीन साल पहले भारत में उत्पादन शुरू कर दिया, ताकि मुद्रा विनिमय के उतार-चढ़ाव का जोखिम कम किया जा सके और कीमत घटाने के साथ-साथ क्वालिटी बढ़ाई जा सके.
पावर और ऑटोमेशन टेक्नोलॉजी की कंपनी एबीबी के मुताबिक, चीनी कंपनियां ट्रांसफॉर्मर और सब-स्टेशन के लिए पहले से 10 से 15 फीसदी अधिक कीमत की मांग कर रही हैं. एबीबी इंडिया में पावर सिस्टम्स के प्रेसिडेंट एन. वेणु कहते हैं, ‘‘दो साल पहले हम पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन का एक भी टेंडर लेने में कामयाब नहीं हो सके थे. आज, हम चीनियों से कीमत के मामले में होड़ लेने के काबिल हो गए हैं.’’
उत्पादन क्षेत्र के कई दिग्गजों का मानना है कि भारत की मुद्रा बाजार में यह प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कुछ समय तक कायम रहने वाली है. कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआइआइ) के लॉबी ग्रुप और बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के उत्पादन क्षेत्र की कंपनियों के ताजा सर्वेक्षण में 59 फीसदी ने कहा कि कमजोर रुपए से देश लंबे समय तक निर्यात के क्षेत्र में टक्कर दे सकेगा.
दक्षिण अफ्रीकी कर्जदाता फर्स्टरैंड बैंक की भारतीय शाखा के ट्रेजरर (कोषाध्यक्ष) हरिहर कृष्णमूर्ति के मुताबिक युआन की डॉलर के मुकाबले बढ़त जारी रहेगी जबकि रुपया स्थिर बना रहेगा. वे कहते हैं कि जब तक भारत का व्यापार घाटा काबू में रहता है, सॉफ्टवेयर निर्यात और एनआरआइ भारतीयों से पैसा आना जारी रहता है और विदेशी इन्वेस्टर्स को लगेगा कि आर्थिक वृद्धि निचले स्तर पर रहेगी, रुपया 61-63 की दर पर बना रहेगा. यानी भारत का करेंसी बाजार भविष्य में भी प्रतिस्पर्धात्मक बना रहेगा और ज्यादा से ज्यादा उत्पादक इसे अपना ठिकाना बना सकते हैं.

सिकुड़ता श्रम बाजार
चीन में मजदूरी में बढ़ोतरी ने भी भारतीय कंपनियों के देश में ही उत्पादन करने के फैसले में बड़ी भूमिका निभाई है. खासकर टेक्सटाइल और खिलौना बनाने वाले जैसे श्रमसाध्य उद्योगों के मामले में तो यह एकदम सही है. चीन और खासकर उसके तटीय इलाकों में जहां ज्यादातर कंपनियां स्थित हैं, मजदूरी भारत से अधिक है और 10 फीसदी की दर से सालाना बढ़ रही है.
नोएडा में कैपेसिटर बनाने वाली डेकी इलेक्ट्रॉनिक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर विनोद शर्मा बताते हैं कि नोएडा में कर्मचारी 7,000 रु. प्रति माह में मिल जाता है और कंपनी का उस पर कुल खर्च 8,000-10,000 रु. यानी करीब 130-160 डॉलर आता है. शर्मा कहते हैं, ‘‘चीन के तटीय इलाकों में आठ घंटे के लिए न्यूनतम वेतन 300 डॉलर है. तो, क्या चीन में मजदूरी घटने जा रही है? जवाब है, नहीं. फर्क तो बढ़ता ही जाएगा.’’
शर्मा बताते हैं कि 1984 में शुरू हुई डेकी ने भारत में छह साल पहले विस्तार की योजना बनाई तो कुछ सरकारी अधिकारियों ने भूमि आवंटन के लिए रिश्वत की मांग की. तब डेकी ने चीन के गुआंगडोंग प्रांत की ओर रुख किया और सनजेन नामक कंपनी में इन्वेस्ट किया. यह कंपनी रोजाना 10 लाख कैपेसिटर बना सकती थी. पिछले साल गुआंगडोंग फैक्टरी की क्षमता आधी कर दी गई और कंपनी ने करीब 100 कर्मचारियों की नियुक्ति के साथ भारत का रुख किया.
आइटीसी के एजुकेशन और स्टेशनरी उत्पादों के कारोबार के चीफ एग्जीक्यूटिव चंदन दास बताते हैं कि उन्होंने भारत में प्रोडक्शन शुरू कर दिया है क्योंकि उनके क्षेत्र में चीन में मजदूरी सालाना 15 फीसदी की दर से बढ़ रही है. वे कहते हैं, ‘‘अब चीन से सामान मंगाना मुनासिब नहीं रहा.’’ आइटीसी ने 2008 में चीन से पेंसिल, ज्योमेट्री बॉक्स और आर्ट स्टेशनरी खरीदनी शुरू की थी. लेकिन पिछले 18 महीने से उसने भारतीय वेंडरों को चेन्नै, जम्मू और दिल्ली के पास उत्पादन इकाइयां स्थापित करने में मदद की है जिससे 1,200 लोगों को नौकरियां मिलीं.
चीन में वर्षों की मजबूत आर्थिक वृद्धि से न सिर्फ वेतन बढ़ गए, बल्कि मजदूरों की इच्छाएं भी बढ़ गई हैं. बहुत सारे चीनी लोग अब मेहनत-मजदूरी नहीं करना चाहते. खिलौना बनाने और कपड़े सिलने की जगह अब वे चिप फैब्रिकेशन कारखानों में काम करना पसंद करते हैं. फनस्कूल के सीईओ जॉन बेबी कहते हैं कि खिलौना उद्योग में उत्पादन क्षेत्र बदलने का सिलसिला दो साल पहले शुरू हुआ. उनके मुताबिक फनस्कूल को मोल्डेड प्लास्टिक के खिलौने बनाने का ऑर्डर मिलना शुरू हो गया है और 2014-15 में आयात 25 से 40 फीसदी बढऩे का अनुमान है.
सालाना एक करोड़ डॉलर के कारोबार वाली चाइनीज सॉफ्ट टॉय कंपनी पाल्स प्लश अपने देश के मुकाबले भारत में तेजी से विस्तार कर रही है. भारत में चेन्नै बंदरगाह से 60 किलोमीटर की दूरी पर उसकी फैक्टरी डेढ़ साल पहले 20 लाख डॉलर के इन्वेस्टमेंट के साथ शुरू हुई. यहां उसके पास 250 सिलाई मशीनें हैं जबकि चीन में सिर्फ 120 ही हैं. भारत में 400 कर्मचारी हैं जबकि चीन में 200 ही हैं.
पाल्स प्लश की डायरेक्टर सीमा नेहरा का कहना है कि वे अपनी भारतीय फैक्टरी से अमेरिका और यूरोपीय फर्मों को खिलौने भेजती हैं. इनमें डिज्नी, आर्गोस होम रिटेल और पेटिंग जू जैसे ग्राहक हैं. नेहरा बताती हैं कि चीन से निकलने की योजना बनाने पर बांग्लादेश और दूसरे दक्षिण एशियाई देशों के विकल्प पर भी विचार किया गया था. लेकिन भारत को चुना गया क्योंकि यहां का बाजार बड़ा है और शिपिंग पर लागत भी कम है. शंघाई से ब्रिटेन की शिपिंग चेन्नै के मुकाबले पांच से सात फीसदी अधिक है.
टेक्सटाइल क्षेत्र में भी इन्वेस्टमेंट बढऩे लगा है. विशाखापत्तनम में द ब्रैंडिक्स इंडिया एपेरल सिटी में कपड़ा कंपनियों खासकर अंडरगारमेंट निर्माताओं का हब बनता जा रहा है. करीब 1,000 एकड़ में फैले इस औद्योगिक पार्क का संचालन श्रीलंका की कपड़ा निर्यातक कंपनी ब्रैंडिक्स लंका लिमिटेड करती है. औद्योगिक पार्क में ब्रैंडिक्स भी अपनी फैक्टरी चलाती है.
इसके अलावा उसने अमेरिकी ब्रांड विक्टोरियाज सिक्रेट के ब्रा और ब्रालेट्स बनाने के लिए चार कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम भी लगाया है. इस संयुक्त उपक्रम में 2,400 कर्मचारी काम करते हैं और इसकी उत्पादन क्षमता हर महीने 7,50,000 पीस है. पार्क में ब्रा के लिए अंडर वायर बनाने वाली अमेरिकी कंपनी एसऐंडएस की भी फैक्टरी है जिसकी उत्पादन क्षमता सालाना 10.6 करोड़ यूनिट की है. यह कंपनी अभी तक अमेरिका, होंडुरस और चीन में ही उत्पादन करती थी.
कई भारतीय टाइल निर्माता भी अब देश में उत्पादन के बारे में सोच रहे हैं जो अभी तक चीन से आयात करके ही खुश थे. देश के आला पांच टाइल निर्माताओं में से एक एशियन ग्रेनिटो इंडिया ने गुजरात में ग्लेज्ड फ्लोर टाइल का निर्माण शुरू कर दिया है. यहां प्रति दिन 2,000 वर्ग मीटर टाइल बनाई जाती है. एशियन ग्रेनिटो के डायरेक्टर भवेश पटेल बताते हैं कि भारत में निर्मित टाइल की कीमत चीन के मुकाबले प्रति वर्ग फुट 20-30 रु. कम बैठती है.

घर में बनते घरेलू सामान
बिजली के सामान और घरेलू उपकरणों के उत्पादन की भी भारत में वापसी हो रही है. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज प्रोवाइडर डिक्सन की फैक्टरी है. पिछले आठ महीने में इस फैक्टरी में कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों और जापान सरकार की संस्थाओं के बड़े अधिकारी पहुंचे. ये सभी यह जानना चाहते थे कि क्या भारत हार्डवेयर उत्पादन में चीन का विकल्प बन सकता है. चीन के साथ राजनैतिक तनाव जापान को आशंकित कर रहा है. चीन में जापान का प्रत्यक्ष पूंजी निवेश 2013 में 4.3 फीसदी गिरकर 7.1 अरब डॉलर आ गया है.
यह भारत के लिए मुफीद माहौल है. डिक्सन पहले ही जापानी कंपनियों पैनासोनिक और तोशिबा के लिए फ्लैट-पैनल टीवी बना रही है. कंपनी के चेयरमैन तथा मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील वाछानी के मुताबिक घरेलू उपकरणों के उत्पादन के मामले में भारत के लिए उम्मीदें नजर आने लगी हैं. उनके मुताबिक, उनकी कंपनी के कुछ कारखानों में उत्पादन चीन से ज्यादा होता है.
वे अपनी असेंबली लाइन की मिसाल देते हैं कि वहां सिर्फ 45 लोग रोजाना 7,000 डीवीडी प्लेयर बनाते हैं. कंपनी गोदरेज और चीनी कंपनी हेयर के लिए वाशिंग मशीन भी बनाती है. डिक्सन का कारोबार कुछेक साल में बड़ी तेजी से बढ़ा है और श्रमिकों की संख्या दोगुनी होकर 4,000 हो गई.
गोदरेज भी उत्पादन में पीछे नहीं है. उसने 2012 में एअरकंडिशनर का उत्पादन शुरू किया और अगले साल फाइबर बॉडी वाशिंग मशीन का उत्पादन चीन के बदले भारत में शुरू किया. कंपनी ने 5,00,000 एसी और सेमी-ऑटोमेटिक मशीन उत्पादन की क्षमता हासिल कर ली.
गोदरेज के अलावा उपभोक्ता उपकरण निर्माता कंपनी ब्लूस्टार भी अपना उत्पादन भारत में करने लगी है. चीन के शंघाई हाइली ग्रुप कंपनी और हिटाची अप्लाइंसेज ने संयुक्त उपक्रम के तहत गुजरात में एसी कंप्रेसर की फैक्टरी लगाई है. हेयर पहले ही वाशिंग मशीन और एसी के कुछ मॉडल भारत में बना रही है, अब उसने इस साल वाटर हीटर के उत्पादन की भी योजना बनाई है.
सिर्फ जापानी कंपनियां ही जोखिम कम करने के लिए भारत की ओर रुख नहीं कर रही हैं, बल्कि चीन से निर्यात पर पूरी तरह निर्भर भारतीय कंपनियां भी अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने लगी हैं. मोबाइल फोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के मामले में चीन को अब भी बढ़त है और भारत में इनका उत्पादन खर्चीला है. मोबाइल फोन निर्माता माइक्रोमैक्स ने उत्तराखंड के रुद्रपुर की नई फैक्टरी में 1,00,000 डिवाइसेज बनाने शुरू कर दिए हैं.
इस फैक्टरी में महीने में 6,00,000 फोन बनाए जा सकते हैं जो उसकी कुल बिक्री का करीब 20 फीसदी है. माइक्रोमैक्स के सह-संस्थापक विकास जैन कहते हैं कि चीन के मुकाबले भारत में फोन बनाने का खर्च 2.5 से 3 प्रतिशत ज्यादा आता है लेकिन कंपनी इस अंतर को 2 फीसदी से भी कम करने की कोशिश में है. उनका कहना है कि भारत में उत्पादन का फैसला किसी एक देश पर निर्भर रहने के जोखिम को देखकर करना पड़ा.

कांटों भरी राह
माइक्रोमैक्स जैसी कंपनियां अब भी कम ही हैं. ये कंपनियां भी कई तरह के पार्ट्स चीन से ही मंगा रही हैं क्योंकि भारत में उपकरण निर्माण की शृंखला अभी पूरी तरह जमी नहीं है. आयात की इस मजबूरी के कारण उपभोक्ता सामान निर्माता अभी चीन में बढ़ती कीमत और कमजोर रुपए का लाभ पूरी तरह नहीं उठा पा रहे हैं.
तो, सवाल है कि क्या मैन्युफैक्चरर्स के बीच बह रही यह हल्की बयार आंधी का रूप लेगी? मैन्युफैक्चरर्स का कहना है कि सरकार को उपकरण आपूर्तिकर्ताओं को मदद देने की जरूरत है. सरकार को हाइवे, बिजली सप्लाई और बंदरगाह बनाकर बुनियादी संरचना दुरुस्त करनी चाहिए.
नोबेल विजेता अर्थशास्त्री जोसफ स्टिगलिट्ज को भारत के उत्पादन क्षेत्र में बढ़त ले पाने में आशंका है. वे कहते हैं, ‘‘अगर आपके पास बिजली नहीं है या बिजली की दर अधिक है तो श्रम सस्ता होने के बावजूद उत्पादन क्षेत्र को मदद नहीं मिलेगी. इस मामले में मेक्सिको जैसे कुछ देश फायदे में लग रहे हैं. मुझे आशंका है कि जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव भारत में उत्पादन क्षेत्र की राह में अड़चन बन सकता है.’’ लेकिन इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि बदलाव शुरू हो चुका है.
लेकिन बिजली का सामान बनाने वाली कंपनी हैवेल्स की फैक्टरी में कदम रखते ही शोर शांति को भंग कर देता है. मशीनों के शोर के बीच नीली पोशाक और सफेद टोपी में कर्मचारी कॉयल्स बनाते हैं और मोटर, स्विच, स्टैंड और पंखे के डैने असेंबल करते हैं. इस फैक्टरी में हर 25 सेकंड में एक टेबल फैन बनता है.
दो साल पहले यहां ऐसा कुछ नहीं था. हैवेल्स कंपनी दशकभर से पंखे बेच रही है. इससे पहले वह टेबल फैन चीनी कंपनी मीडिया से मंगाती थी. मीडिया दुनिया की सबसे बड़ी फैन निर्माताओं में से है. मीडिया ने कई साल तक हैवेल्स से दाम बढ़ाने की मांग नहीं की पर 2010 में उसने बढ़ती मजदूरी लागत और बिजली की कमी का हवाला देकर अगले तीन साल में दाम 20 फीसदी तक बढ़ा दिए.
हैवेल्स के प्रेसिडेंट सुनील सिक्का कहते हैं, ‘‘ऐसा समय आया जब हमने कहा कि बहुत हो गया, अब हमें भारत में ही प्रोडक्शन की बात सोचनी चाहिए.’’ हैवेल्स ने हरिद्वार में प्रति महीने 1,00,000 टेबल फैन की क्षमता के साथ शुरुआत की. वहां वह पहले से सीलिंग फैन बनाती थी. अब वह टेबल फैन आयात नहीं करती, बल्कि चीन के मुकाबले उसकी लागत भी 10 फीसदी कम पड़ रही है. सिक्का बताते हैं, ‘‘मेरा मार्जिन बढ़ गया क्योंकि इस पर आने वाली लागत घट गई है.’’
हैवेल्स उन कंपनियों में से है जिन्होंने चीन में कीमत बढऩे पर वहां से माल मंगाना बंद किया और यहां उत्पादन शुरू किया या शुरू करने के बारे में सोच रही हैं, ताकि सस्ते भारतीय श्रम और अनुकूल करेंसी मार्केट का लाभ ले सकें. उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनी गोदरेज, मोबाइल फोन निर्माता माइक्रोमैक्स, ऑटो पार्ट्स कंपनी बॉश और स्टेशनरी निर्माता आइटीसी सभी ने भारत में उत्पादन शुरू किया या अपना विस्तार किया है. चीनी कंपनियां भी भारत में उत्पादन केंद्र बनाने के लिए साझीदारों के साथ संयुक्त उपक्रम स्थापित कर रही हैं.
अपने एयरकंडिशनर और वाशिंग मशीन का उत्पादन भारत में शुरू करने वाले गोदरेज समूह के चेयरमैन आदि गोदरेज कहते हैं, ‘‘चीन में लागत बढ़ रही है, इसलिए चीन के बदले यहां प्रोडक्शन शुरू करने का यह सही समय है.’’ उनकी राय में यह रुझान अगले 20 साल तक बना रहेगा. वे कहते हैं, ‘‘जितनी जल्दी भारत इस रुझान का फायदा उठा लेगा, वह उतनी बेहतर स्थिति में रहेगा. अगर हम जल्दी इसका लाभ नहीं लेंगे तो दूसरे देश इसे भुना लेंगे.’’
दरअसल, दूसरे देश भी चीन के प्रतिस्पर्धा में बढ़त गंवाने से फायदा उठाने लगे हैं. चीन की बढ़त से दुनियाभर की कंपनियां उसकी ओर आकर्षित हुई थीं. भारत के नेशनल मैन्युफैक्चरिंग कम्पीटिटिवनेस काउंसिल के सदस्य सचिव अजय शंकर के मुताबिक अगले कुछ साल में चीन में श्रम आधारित उद्योगों में अनुमानित 10 करोड़ नौकरियां खत्म हो जाएंगी. कई अमेरिकी, यूरोपीय और जापानी कंपनियां चीन में प्रोडक्शन बंद करके दक्षिण एशिया के कम लागत वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रही हैं.
दशकभर से अर्थव्यवस्था की धीमी गति की वजह से पिछले कुछ साल में एयरकंडिशनर और ऑटोमोबाइल्स जैसे उत्पादों की मांग घटने का असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ा है. भारत में उत्पादन 2005 और 2011 के बीच 10 फीसदी की दर से वृद्धि के बाद 2011-12 में 2.7 फीसदी और पिछले साल एक फीसदी की दर से ही बढ़ा. देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगातार दूसरी बार घट गई है. यह हिस्सेदारी 2010-11 में सर्वाधिक 16.2 फीसदी से 2012-13 में 15.1 फीसदी और अब पिछले 10 साल में सबसे कम है. हमारे जीवन की जरूरतों पर अब भी चीनी सामान का बोलबाला है, चाहे वह वालपेपर हो या फर्नीचर अथवा इलेक्ट्रॉनिक्स या औद्योगिक उपकरण.

रुपए, डॉलर और युआन का खेल
भारत में प्रोडक्शन शुरू करने की बड़ी वजह विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में अनुकूल माहौल है. चीन की करेंसी युआन पिछले तीन साल में डॉलर के मुकाबले 7.2 फीसदी और पिछले एक दशक में 35.3 फीसदी ऊपर गई है, इससे चीन से निर्यात महंगा हो गया है. इस बीच रुपया पिछले तीन साल में 26.7 फीसदी गिरा है, जिसने विदेशी माल को महंगा बना दिया है.
बॉश डीजल सिस्टम्स इंडिया में मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी के वाइस प्रेसिडेंट सुरेश बी.आर. कहते हैं कि हमारी ऑटो पार्ट्स की कंपनी इलेक्ट्रॉनिक डीजल इंजन चीन से मंगाती थी लेकिन तीन साल पहले भारत में उत्पादन शुरू कर दिया, ताकि मुद्रा विनिमय के उतार-चढ़ाव का जोखिम कम किया जा सके और कीमत घटाने के साथ-साथ क्वालिटी बढ़ाई जा सके.
पावर और ऑटोमेशन टेक्नोलॉजी की कंपनी एबीबी के मुताबिक, चीनी कंपनियां ट्रांसफॉर्मर और सब-स्टेशन के लिए पहले से 10 से 15 फीसदी अधिक कीमत की मांग कर रही हैं. एबीबी इंडिया में पावर सिस्टम्स के प्रेसिडेंट एन. वेणु कहते हैं, ‘‘दो साल पहले हम पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन का एक भी टेंडर लेने में कामयाब नहीं हो सके थे. आज, हम चीनियों से कीमत के मामले में होड़ लेने के काबिल हो गए हैं.’’
उत्पादन क्षेत्र के कई दिग्गजों का मानना है कि भारत की मुद्रा बाजार में यह प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कुछ समय तक कायम रहने वाली है. कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआइआइ) के लॉबी ग्रुप और बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के उत्पादन क्षेत्र की कंपनियों के ताजा सर्वेक्षण में 59 फीसदी ने कहा कि कमजोर रुपए से देश लंबे समय तक निर्यात के क्षेत्र में टक्कर दे सकेगा.
दक्षिण अफ्रीकी कर्जदाता फर्स्टरैंड बैंक की भारतीय शाखा के ट्रेजरर (कोषाध्यक्ष) हरिहर कृष्णमूर्ति के मुताबिक युआन की डॉलर के मुकाबले बढ़त जारी रहेगी जबकि रुपया स्थिर बना रहेगा. वे कहते हैं कि जब तक भारत का व्यापार घाटा काबू में रहता है, सॉफ्टवेयर निर्यात और एनआरआइ भारतीयों से पैसा आना जारी रहता है और विदेशी इन्वेस्टर्स को लगेगा कि आर्थिक वृद्धि निचले स्तर पर रहेगी, रुपया 61-63 की दर पर बना रहेगा. यानी भारत का करेंसी बाजार भविष्य में भी प्रतिस्पर्धात्मक बना रहेगा और ज्यादा से ज्यादा उत्पादक इसे अपना ठिकाना बना सकते हैं.

सिकुड़ता श्रम बाजार
चीन में मजदूरी में बढ़ोतरी ने भी भारतीय कंपनियों के देश में ही उत्पादन करने के फैसले में बड़ी भूमिका निभाई है. खासकर टेक्सटाइल और खिलौना बनाने वाले जैसे श्रमसाध्य उद्योगों के मामले में तो यह एकदम सही है. चीन और खासकर उसके तटीय इलाकों में जहां ज्यादातर कंपनियां स्थित हैं, मजदूरी भारत से अधिक है और 10 फीसदी की दर से सालाना बढ़ रही है.
नोएडा में कैपेसिटर बनाने वाली डेकी इलेक्ट्रॉनिक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर विनोद शर्मा बताते हैं कि नोएडा में कर्मचारी 7,000 रु. प्रति माह में मिल जाता है और कंपनी का उस पर कुल खर्च 8,000-10,000 रु. यानी करीब 130-160 डॉलर आता है. शर्मा कहते हैं, ‘‘चीन के तटीय इलाकों में आठ घंटे के लिए न्यूनतम वेतन 300 डॉलर है. तो, क्या चीन में मजदूरी घटने जा रही है? जवाब है, नहीं. फर्क तो बढ़ता ही जाएगा.’’
शर्मा बताते हैं कि 1984 में शुरू हुई डेकी ने भारत में छह साल पहले विस्तार की योजना बनाई तो कुछ सरकारी अधिकारियों ने भूमि आवंटन के लिए रिश्वत की मांग की. तब डेकी ने चीन के गुआंगडोंग प्रांत की ओर रुख किया और सनजेन नामक कंपनी में इन्वेस्ट किया. यह कंपनी रोजाना 10 लाख कैपेसिटर बना सकती थी. पिछले साल गुआंगडोंग फैक्टरी की क्षमता आधी कर दी गई और कंपनी ने करीब 100 कर्मचारियों की नियुक्ति के साथ भारत का रुख किया.
आइटीसी के एजुकेशन और स्टेशनरी उत्पादों के कारोबार के चीफ एग्जीक्यूटिव चंदन दास बताते हैं कि उन्होंने भारत में प्रोडक्शन शुरू कर दिया है क्योंकि उनके क्षेत्र में चीन में मजदूरी सालाना 15 फीसदी की दर से बढ़ रही है. वे कहते हैं, ‘‘अब चीन से सामान मंगाना मुनासिब नहीं रहा.’’ आइटीसी ने 2008 में चीन से पेंसिल, ज्योमेट्री बॉक्स और आर्ट स्टेशनरी खरीदनी शुरू की थी. लेकिन पिछले 18 महीने से उसने भारतीय वेंडरों को चेन्नै, जम्मू और दिल्ली के पास उत्पादन इकाइयां स्थापित करने में मदद की है जिससे 1,200 लोगों को नौकरियां मिलीं.चीन में वर्षों की मजबूत आर्थिक वृद्धि से न सिर्फ वेतन बढ़ गए, बल्कि मजदूरों की इच्छाएं भी बढ़ गई हैं. बहुत सारे चीनी लोग अब मेहनत-मजदूरी नहीं करना चाहते. खिलौना बनाने और कपड़े सिलने की जगह अब वे चिप फैब्रिकेशन कारखानों में काम करना पसंद करते हैं. फनस्कूल के सीईओ जॉन बेबी कहते हैं कि खिलौना उद्योग में उत्पादन क्षेत्र बदलने का सिलसिला दो साल पहले शुरू हुआ. उनके मुताबिक फनस्कूल को मोल्डेड प्लास्टिक के खिलौने बनाने का ऑर्डर मिलना शुरू हो गया है और 2014-15 में आयात 25 से 40 फीसदी बढऩे का अनुमान है.
सालाना एक करोड़ डॉलर के कारोबार वाली चाइनीज सॉफ्ट टॉय कंपनी पाल्स प्लश अपने देश के मुकाबले भारत में तेजी से विस्तार कर रही है. भारत में चेन्नै बंदरगाह से 60 किलोमीटर की दूरी पर उसकी फैक्टरी डेढ़ साल पहले 20 लाख डॉलर के इन्वेस्टमेंट के साथ शुरू हुई. यहां उसके पास 250 सिलाई मशीनें हैं जबकि चीन में सिर्फ 120 ही हैं. भारत में 400 कर्मचारी हैं जबकि चीन में 200 ही हैं.
पाल्स प्लश की डायरेक्टर सीमा नेहरा का कहना है कि वे अपनी भारतीय फैक्टरी से अमेरिका और यूरोपीय फर्मों को खिलौने भेजती हैं. इनमें डिज्नी, आर्गोस होम रिटेल और पेटिंग जू जैसे ग्राहक हैं. नेहरा बताती हैं कि चीन से निकलने की योजना बनाने पर बांग्लादेश और दूसरे दक्षिण एशियाई देशों के विकल्प पर भी विचार किया गया था. लेकिन भारत को चुना गया क्योंकि यहां का बाजार बड़ा है और शिपिंग पर लागत भी कम है. शंघाई से ब्रिटेन की शिपिंग चेन्नै के मुकाबले पांच से सात फीसदी अधिक है.
टेक्सटाइल क्षेत्र में भी इन्वेस्टमेंट बढऩे लगा है. विशाखापत्तनम में द ब्रैंडिक्स इंडिया एपेरल सिटी में कपड़ा कंपनियों खासकर अंडरगारमेंट निर्माताओं का हब बनता जा रहा है. करीब 1,000 एकड़ में फैले इस औद्योगिक पार्क का संचालन श्रीलंका की कपड़ा निर्यातक कंपनी ब्रैंडिक्स लंका लिमिटेड करती है. औद्योगिक पार्क में ब्रैंडिक्स भी अपनी फैक्टरी चलाती है.
इसके अलावा उसने अमेरिकी ब्रांड विक्टोरियाज सिक्रेट के ब्रा और ब्रालेट्स बनाने के लिए चार कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम भी लगाया है. इस संयुक्त उपक्रम में 2,400 कर्मचारी काम करते हैं और इसकी उत्पादन क्षमता हर महीने 7,50,000 पीस है. पार्क में ब्रा के लिए अंडर वायर बनाने वाली अमेरिकी कंपनी एसऐंडएस की भी फैक्टरी है जिसकी उत्पादन क्षमता सालाना 10.6 करोड़ यूनिट की है. यह कंपनी अभी तक अमेरिका, होंडुरस और चीन में ही उत्पादन करती थी.
कई भारतीय टाइल निर्माता भी अब देश में उत्पादन के बारे में सोच रहे हैं जो अभी तक चीन से आयात करके ही खुश थे. देश के आला पांच टाइल निर्माताओं में से एक एशियन ग्रेनिटो इंडिया ने गुजरात में ग्लेज्ड फ्लोर टाइल का निर्माण शुरू कर दिया है. यहां प्रति दिन 2,000 वर्ग मीटर टाइल बनाई जाती है. एशियन ग्रेनिटो के डायरेक्टर भवेश पटेल बताते हैं कि भारत में निर्मित टाइल की कीमत चीन के मुकाबले प्रति वर्ग फुट 20-30 रु. कम बैठती है.

घर में बनते घरेलू सामान
बिजली के सामान और घरेलू उपकरणों के उत्पादन की भी भारत में वापसी हो रही है. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज प्रोवाइडर डिक्सन की फैक्टरी है. पिछले आठ महीने में इस फैक्टरी में कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों और जापान सरकार की संस्थाओं के बड़े अधिकारी पहुंचे. ये सभी यह जानना चाहते थे कि क्या भारत हार्डवेयर उत्पादन में चीन का विकल्प बन सकता है. चीन के साथ राजनैतिक तनाव जापान को आशंकित कर रहा है. चीन में जापान का प्रत्यक्ष पूंजी निवेश 2013 में 4.3 फीसदी गिरकर 7.1 अरब डॉलर आ गया है.
यह भारत के लिए मुफीद माहौल है. डिक्सन पहले ही जापानी कंपनियों पैनासोनिक और तोशिबा के लिए फ्लैट-पैनल टीवी बना रही है. कंपनी के चेयरमैन तथा मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील वाछानी के मुताबिक घरेलू उपकरणों के उत्पादन के मामले में भारत के लिए उम्मीदें नजर आने लगी हैं. उनके मुताबिक, उनकी कंपनी के कुछ कारखानों में उत्पादन चीन से ज्यादा होता है.
वे अपनी असेंबली लाइन की मिसाल देते हैं कि वहां सिर्फ 45 लोग रोजाना 7,000 डीवीडी प्लेयर बनाते हैं. कंपनी गोदरेज और चीनी कंपनी हेयर के लिए वाशिंग मशीन भी बनाती है. डिक्सन का कारोबार कुछेक साल में बड़ी तेजी से बढ़ा है और श्रमिकों की संख्या दोगुनी होकर 4,000 हो गई.
गोदरेज भी उत्पादन में पीछे नहीं है. उसने 2012 में एअरकंडिशनर का उत्पादन शुरू किया और अगले साल फाइबर बॉडी वाशिंग मशीन का उत्पादन चीन के बदले भारत में शुरू किया. कंपनी ने 5,00,000 एसी और सेमी-ऑटोमेटिक मशीन उत्पादन की क्षमता हासिल कर ली.
गोदरेज के अलावा उपभोक्ता उपकरण निर्माता कंपनी ब्लूस्टार भी अपना उत्पादन भारत में करने लगी है. चीन के शंघाई हाइली ग्रुप कंपनी और हिटाची अप्लाइंसेज ने संयुक्त उपक्रम के तहत गुजरात में एसी कंप्रेसर की फैक्टरी लगाई है. हेयर पहले ही वाशिंग मशीन और एसी के कुछ मॉडल भारत में बना रही है, अब उसने इस साल वाटर हीटर के उत्पादन की भी योजना बनाई है.
सिर्फ जापानी कंपनियां ही जोखिम कम करने के लिए भारत की ओर रुख नहीं कर रही हैं, बल्कि चीन से निर्यात पर पूरी तरह निर्भर भारतीय कंपनियां भी अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने लगी हैं. मोबाइल फोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के मामले में चीन को अब भी बढ़त है और भारत में इनका उत्पादन खर्चीला है. मोबाइल फोन निर्माता माइक्रोमैक्स ने उत्तराखंड के रुद्रपुर की नई फैक्टरी में 1,00,000 डिवाइसेज बनाने शुरू कर दिए हैं.
इस फैक्टरी में महीने में 6,00,000 फोन बनाए जा सकते हैं जो उसकी कुल बिक्री का करीब 20 फीसदी है. माइक्रोमैक्स के सह-संस्थापक विकास जैन कहते हैं कि चीन के मुकाबले भारत में फोन बनाने का खर्च 2.5 से 3 प्रतिशत ज्यादा आता है लेकिन कंपनी इस अंतर को 2 फीसदी से भी कम करने की कोशिश में है. उनका कहना है कि भारत में उत्पादन का फैसला किसी एक देश पर निर्भर रहने के जोखिम को देखकर करना पड़ा.

कांटों भरी राह
माइक्रोमैक्स जैसी कंपनियां अब भी कम ही हैं. ये कंपनियां भी कई तरह के पार्ट्स चीन से ही मंगा रही हैं क्योंकि भारत में उपकरण निर्माण की शृंखला अभी पूरी तरह जमी नहीं है. आयात की इस मजबूरी के कारण उपभोक्ता सामान निर्माता अभी चीन में बढ़ती कीमत और कमजोर रुपए का लाभ पूरी तरह नहीं उठा पा रहे हैं.
तो, सवाल है कि क्या मैन्युफैक्चरर्स के बीच बह रही यह हल्की बयार आंधी का रूप लेगी? मैन्युफैक्चरर्स का कहना है कि सरकार को उपकरण आपूर्तिकर्ताओं को मदद देने की जरूरत है. सरकार को हाइवे, बिजली सप्लाई और बंदरगाह बनाकर बुनियादी संरचना दुरुस्त करनी चाहिए.
नोबेल विजेता अर्थशास्त्री जोसफ स्टिगलिट्ज को भारत के उत्पादन क्षेत्र में बढ़त ले पाने में आशंका है. वे कहते हैं, ‘‘अगर आपके पास बिजली नहीं है या बिजली की दर अधिक है तो श्रम सस्ता होने के बावजूद उत्पादन क्षेत्र को मदद नहीं मिलेगी. इस मामले में मेक्सिको जैसे कुछ देश फायदे में लग रहे हैं. मुझे आशंका है कि जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव भारत में उत्पादन क्षेत्र की राह में अड़चन बन सकता है.’’ लेकिन इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि बदलाव शुरू हो चुका है.

