इस साल 27 अगस्त को मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में शहनवाज की कथित तौर पर एक लड़की को छेडऩे पर हत्या कर दी गई. गांववालों ने उसे मारने वाले सचिन कुमार और गौरव तालियान को पकड़ लिया और उन्हें पीट-पीट कर मार डाला.
पुलिस ने मुस्लिम समुदाय के सात मर्दों को पकड़ा लेकिन दबाव पडऩे पर छोड़ दिया. इससे जाटों में गुस्सा भड़का और दंगे शुरू हुए, जिसमें कम-से-कम 62 लोगों की जान गई और करीब 40,000 बेघर हो गए. भयावह हिंसा के उन दो हफ्तों में उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्याप्त पुलिस बल तैनात नहीं किया और एक के बाद दूसरे गांव को जलते देखती रही.
मुजफ्फरनगर के इस पागलपन का कौन गुनहगार है? किसे इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाए? कैसे उनका न्याय होगा? और कैसे ऐसी हिंसा रोकी जा सकती है? सांप्रदायिक दंगों के समूचे इतिहास में देश की अदालतें, विधिवेत्ता और विद्वान हमेशा ही ऐसे सवालों से रू-ब-रू होते रहे हैं. लेकिन इनके जवाब आसान नहीं हैं.
अब यूपीए सरकार इसके जवाब में सांप्रदायिक हिंसा व लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक ला रही है. 5 दिसंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में इस विधेयक को पेश करने की योजना है. विधेयक में सांप्रदायिक हिंसा की वजह बने सरकारी अधिकारियों को उनके व्यवहार के लिए जवाबदेह ठहराने का प्रावधान है.
लेकिन, 2014 में आम चुनावों के कुछेक महीने पहले इसे लाने के समय पर सवाल उठाया जा रहा है. वैसे यह ऐसे वक्त में भी लाया जा रहा है जब सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है. इस साल अभी तक देश में सांप्रदायिक तनाव की 451 वारदातें हो चुकी हैं.
प्रस्तावित विधेयक इसके पहले 2005 में सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम, नियंत्रण व पीड़ित पुनर्वास विधेयक के रूप में लाया गया था. तब इसका मजमून गुजरात दंगों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था और उसका जिक्र 2004 में कांग्रेस के घोषणा-पत्र में भी था.
उसके प्रावधानों में राज्य को किसी खास इलाके को कुछ शर्तों के साथ सांप्रदायिक अशांति वाला क्षेत्र घोषित करके दंगों पर काबू पाने के लिए अतिरिक्त उपाय करने का अधिकार दिया गया था, जो सामान्य समय में कानून से परे माने जाते हैं. हिंसा ज्यादा फैलने पर केंद्र को भी हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया गया था.
लेकिन इस विधेयक को बाकी राजनैतिक पार्टियों ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि केंद्र के हस्तक्षेप वाले प्रावधान से देश के संघीय ढांचे को खतरा पैदा होता है. सिविल सोसाइटी समूहों की आपत्ति थी कि इसमें सांप्रदायिक हिंसा की मूल वजहों से निबटने का कोई उपाय नहीं है. उसके बाद वह विधेयक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा.
जुलाई, 2010 में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने इसमें संशोधन करने का फैसला किया. उसके सदस्यों-फरह नकवी और हर्ष मंदर-ने एक समिति बनाई, जिसने गृह मंत्रालय के लिए जुलाई, 2010 में एक मजमून तैयार किया. सरकार अब विधेयक के उसी मजमून को संसद में पेश कर रही है.
एनएसी के सांप्रदायिक हिंसा व लक्षित हिंसा (क्षतिपूर्ति और न्याय) विधेयक, 2011 के मजमून में ‘‘ड्यूटी में लापरवाही’’ की परिभाषा में उन अधिकारियों को जवाबदेह बनाया गया है, जिनके पास ‘‘वास्तविक प्रभार’’ हो और इस अपराध के लिए 10 साल तक की जेल की सजा का प्रावधान किया गया है.
मंदर कहते हैं, ‘‘पहले वाले विधेयक में यह माना गया था कि राज्यों के पास हिंसा से निबटने के पर्याप्त अधिकार नहीं हैं, इसलिए उसमें उन अधिकारों की बात थी. हम यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि फौरी कार्रवाई से दंगे की स्थितियों पर दो या तीन दिन में काबू पाया जा सकता है.’’ इसमें आपराधिक न्याय व्यवस्था के तहत पीड़ित को अधिकार देने पर जोर है और सभी राज्यों में एक समान मुआवजे की व्यवस्था है
घटना के महीने भर के भीतर मरने वाले के परिजनों को कम-से-कम 15 लाख रु. और बलात्कार पीड़िता को 3 लाख रु. दिए जाएंगे. विधेयक में हिंसा और ड्यूटी में लापरवाही की शिकायतों, और राहत की निगरानी के लिए राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भाव, न्याय और पुनर्वास प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव है. यह राज्यों को कार्रवाई करने को मजबूर नहीं करेगा लेकिन अदालतों से निर्देश देने की अपील कर पाएगा.
विधेयक के इस मजमून पर विरोध भी अप्रत्याशित नहीं है. आलोचकों का सवाल है कि क्या 2005 के विधेयक के विपरीत यह मजमून सांप्रदायिक हिंसा की मूल वजहों से निबट पाएगा. समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता की दलील है कि समस्या पुलिस और सरकारी अफसरों के ड्यूटी ठीक से न करने की नहीं है, बल्कि दंगा भड़काने वाले नेताओं से है.
वे कहते हैं, ‘‘विधेयक में इसकी कोई चर्चा नहीं है. अगर कोई प्रभावी कानून बनाना है तो नेताओं की शिरकत की भी जांच की व्यवस्था करनी पड़ेगी.’’
बीजेपी इसे लाने के समय को लेकर सवाल उठा रही है. पार्टी प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं, ‘‘कांग्रेस को वोट बैंक का इस्तेमाल करने में महारत हासिल है. यह विधेयक समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश है.’’ बीजेपी के नेता विधेयक के मजमून में सांप्रदायिक हिंसा की इस परिभाषा पर ही सवाल उठाते हैः
किसी धार्मिक या भाषायी अल्पसंख्यक अथवा अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्य के नाते किसी व्यक्ति के खिलाफ लक्षित हिंसा. उनकी दलील है कि इससे यह विधेयक अल्पसंख्यक समर्थक हो जाता है क्योंकि यह बहुसंख्यक समुदाय के खिलाफ अपराध को शामिल नहीं करता.
बीजेपी के एक नेता कहते हैं, ‘‘हम सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए कानून का समर्थन करते हैं लेकिन इस विधेयक में कुछ खास संगठनों और समूहों को निशाना बनाने के प्रावधान किए गए हैं.’’ वामपंथी दल, समाजवादी पार्टी, अन्ना द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस प्रस्तावित राष्ट्रीय प्राधिकरण के खिलाफ हैं.
उनका कहना है कि इस प्राधिकरण को कानून-व्यवस्था के मामलों में हस्तक्षेप करने के असामान्य अधिकार दिए गए हैं, इसलिए यह देश की संघीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं है. मंदर इन आपत्तियों का खंडन करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘सांदायिक हिंसा की परिभाषा इस तथ्य को ध्यान में रखकर की गई है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक व्यवस्थागत पूर्वाग्रह है.
हमने अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीडऩ रोकथाम कानून, 1989 की तर्ज पर मजमून तैयार किया है. राष्ट्रीय प्राधिकरण की भी भूमिका सलाहकार की है, न कि हस्तक्षेप करने वाले की.’’ हालांकि मंदर कहते हैं कि विधेयक को पारित कराने के लिए इन प्रावधानों को छोड़ा भी जा सकता है. तो, क्या गेंद विपक्ष के पाले में है?
पुलिस ने मुस्लिम समुदाय के सात मर्दों को पकड़ा लेकिन दबाव पडऩे पर छोड़ दिया. इससे जाटों में गुस्सा भड़का और दंगे शुरू हुए, जिसमें कम-से-कम 62 लोगों की जान गई और करीब 40,000 बेघर हो गए. भयावह हिंसा के उन दो हफ्तों में उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्याप्त पुलिस बल तैनात नहीं किया और एक के बाद दूसरे गांव को जलते देखती रही.
मुजफ्फरनगर के इस पागलपन का कौन गुनहगार है? किसे इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाए? कैसे उनका न्याय होगा? और कैसे ऐसी हिंसा रोकी जा सकती है? सांप्रदायिक दंगों के समूचे इतिहास में देश की अदालतें, विधिवेत्ता और विद्वान हमेशा ही ऐसे सवालों से रू-ब-रू होते रहे हैं. लेकिन इनके जवाब आसान नहीं हैं.
अब यूपीए सरकार इसके जवाब में सांप्रदायिक हिंसा व लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक ला रही है. 5 दिसंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में इस विधेयक को पेश करने की योजना है. विधेयक में सांप्रदायिक हिंसा की वजह बने सरकारी अधिकारियों को उनके व्यवहार के लिए जवाबदेह ठहराने का प्रावधान है.
लेकिन, 2014 में आम चुनावों के कुछेक महीने पहले इसे लाने के समय पर सवाल उठाया जा रहा है. वैसे यह ऐसे वक्त में भी लाया जा रहा है जब सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है. इस साल अभी तक देश में सांप्रदायिक तनाव की 451 वारदातें हो चुकी हैं.
प्रस्तावित विधेयक इसके पहले 2005 में सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम, नियंत्रण व पीड़ित पुनर्वास विधेयक के रूप में लाया गया था. तब इसका मजमून गुजरात दंगों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था और उसका जिक्र 2004 में कांग्रेस के घोषणा-पत्र में भी था.
उसके प्रावधानों में राज्य को किसी खास इलाके को कुछ शर्तों के साथ सांप्रदायिक अशांति वाला क्षेत्र घोषित करके दंगों पर काबू पाने के लिए अतिरिक्त उपाय करने का अधिकार दिया गया था, जो सामान्य समय में कानून से परे माने जाते हैं. हिंसा ज्यादा फैलने पर केंद्र को भी हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया गया था.
लेकिन इस विधेयक को बाकी राजनैतिक पार्टियों ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि केंद्र के हस्तक्षेप वाले प्रावधान से देश के संघीय ढांचे को खतरा पैदा होता है. सिविल सोसाइटी समूहों की आपत्ति थी कि इसमें सांप्रदायिक हिंसा की मूल वजहों से निबटने का कोई उपाय नहीं है. उसके बाद वह विधेयक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा.
जुलाई, 2010 में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने इसमें संशोधन करने का फैसला किया. उसके सदस्यों-फरह नकवी और हर्ष मंदर-ने एक समिति बनाई, जिसने गृह मंत्रालय के लिए जुलाई, 2010 में एक मजमून तैयार किया. सरकार अब विधेयक के उसी मजमून को संसद में पेश कर रही है.
एनएसी के सांप्रदायिक हिंसा व लक्षित हिंसा (क्षतिपूर्ति और न्याय) विधेयक, 2011 के मजमून में ‘‘ड्यूटी में लापरवाही’’ की परिभाषा में उन अधिकारियों को जवाबदेह बनाया गया है, जिनके पास ‘‘वास्तविक प्रभार’’ हो और इस अपराध के लिए 10 साल तक की जेल की सजा का प्रावधान किया गया है.
मंदर कहते हैं, ‘‘पहले वाले विधेयक में यह माना गया था कि राज्यों के पास हिंसा से निबटने के पर्याप्त अधिकार नहीं हैं, इसलिए उसमें उन अधिकारों की बात थी. हम यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि फौरी कार्रवाई से दंगे की स्थितियों पर दो या तीन दिन में काबू पाया जा सकता है.’’ इसमें आपराधिक न्याय व्यवस्था के तहत पीड़ित को अधिकार देने पर जोर है और सभी राज्यों में एक समान मुआवजे की व्यवस्था है
घटना के महीने भर के भीतर मरने वाले के परिजनों को कम-से-कम 15 लाख रु. और बलात्कार पीड़िता को 3 लाख रु. दिए जाएंगे. विधेयक में हिंसा और ड्यूटी में लापरवाही की शिकायतों, और राहत की निगरानी के लिए राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भाव, न्याय और पुनर्वास प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव है. यह राज्यों को कार्रवाई करने को मजबूर नहीं करेगा लेकिन अदालतों से निर्देश देने की अपील कर पाएगा.
विधेयक के इस मजमून पर विरोध भी अप्रत्याशित नहीं है. आलोचकों का सवाल है कि क्या 2005 के विधेयक के विपरीत यह मजमून सांप्रदायिक हिंसा की मूल वजहों से निबट पाएगा. समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता की दलील है कि समस्या पुलिस और सरकारी अफसरों के ड्यूटी ठीक से न करने की नहीं है, बल्कि दंगा भड़काने वाले नेताओं से है.
वे कहते हैं, ‘‘विधेयक में इसकी कोई चर्चा नहीं है. अगर कोई प्रभावी कानून बनाना है तो नेताओं की शिरकत की भी जांच की व्यवस्था करनी पड़ेगी.’’
बीजेपी इसे लाने के समय को लेकर सवाल उठा रही है. पार्टी प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं, ‘‘कांग्रेस को वोट बैंक का इस्तेमाल करने में महारत हासिल है. यह विधेयक समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश है.’’ बीजेपी के नेता विधेयक के मजमून में सांप्रदायिक हिंसा की इस परिभाषा पर ही सवाल उठाते हैः
किसी धार्मिक या भाषायी अल्पसंख्यक अथवा अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्य के नाते किसी व्यक्ति के खिलाफ लक्षित हिंसा. उनकी दलील है कि इससे यह विधेयक अल्पसंख्यक समर्थक हो जाता है क्योंकि यह बहुसंख्यक समुदाय के खिलाफ अपराध को शामिल नहीं करता.
बीजेपी के एक नेता कहते हैं, ‘‘हम सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए कानून का समर्थन करते हैं लेकिन इस विधेयक में कुछ खास संगठनों और समूहों को निशाना बनाने के प्रावधान किए गए हैं.’’ वामपंथी दल, समाजवादी पार्टी, अन्ना द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस प्रस्तावित राष्ट्रीय प्राधिकरण के खिलाफ हैं.
उनका कहना है कि इस प्राधिकरण को कानून-व्यवस्था के मामलों में हस्तक्षेप करने के असामान्य अधिकार दिए गए हैं, इसलिए यह देश की संघीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं है. मंदर इन आपत्तियों का खंडन करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘सांदायिक हिंसा की परिभाषा इस तथ्य को ध्यान में रखकर की गई है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक व्यवस्थागत पूर्वाग्रह है.
हमने अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीडऩ रोकथाम कानून, 1989 की तर्ज पर मजमून तैयार किया है. राष्ट्रीय प्राधिकरण की भी भूमिका सलाहकार की है, न कि हस्तक्षेप करने वाले की.’’ हालांकि मंदर कहते हैं कि विधेयक को पारित कराने के लिए इन प्रावधानों को छोड़ा भी जा सकता है. तो, क्या गेंद विपक्ष के पाले में है?

