भारत की कारोबारी राजधानी कही जाने वाली मुंबई में मीडिया कंपनी में वरिष्ठ संवाददाता 32 वर्षीय प्रदीप चटर्जी (बदला हुआ नाम) के पास वह सब कुछ था, जो वे चाहते थे—अच्छी नौकरी, बढिय़ा तनख्वाह और बोरीवली में आठ साल के बेटे के स्कूल के पास ही दो बेडरूम का अपना नया फ्लैट.
लेकिन इस महीने के शुरू में सुनने में आया कि उनकी कंपनी 300 लोगों की छंटनी करने जा रही है, जिनमें उनकी ऑनलाइन टीम के लोग भी शामिल हैं. प्रदीप इसी ऑनलाइन टीम में काम करते थे. 23 अगस्त को प्रदीप का डर सच साबित हो गया.
एचआर हेड ने 44 अन्य लोगों के साथ उन्हें भी दो महीने की तनख्वाह के साथ चलता कर दिया. इस झटके से प्रदीप इतने दुखी हुए कि वे रो पड़े. वे कहते हैं, ''अगर मुझे मेरा काम पसंद न आने की वजह से निकाला गया होता तो मुझे इतना दुख नहीं होता.”
मीडिया में काम करने वाले प्रदीप की तरह सैकड़ों लोगों को पिछले दो महीने में नौकरी से निकाला गया है. यह दशा सिर्फ मीडिया तक सीमित नहीं है. ऑटोमोबाइल, इन्फ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग और इंजीनियरिंग जैसे दूसरे सेक्टरों में भी हजारों लोगों को आर्थिक मंदी की वजह से नौकरी से हाथ धोना पड़ा है.
जून में नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) के अनुसार, 2011-12 में भारत में नौकरी पाने वालों का अनुपात गिरकर 35.4 प्रतिशत हो गया, जबकि 2009-10 में यह अनुपात 36.5 प्रतिशत था. यह 2004-05 में यूपीए सरकार के सत्ता में आने के समय रोजगार पाने वालों की दर 42 प्रतिशत के मुकाबले यह भारी गिरावट है.
कंसल्टेंट्स का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो 2013-14 के अंत तक देश में नौकरी से हाथ धोने वालों की संख्या 5,00,000 तक पहुंच सकती है, जैसा कि 2008-09 में आर्थिक मंदी के दौरान देखने को मिला था. योजना आयोग ने इस साल मार्च में बताया था कि भारत में 2005 से 2010 के बीच पांच साल के भीतर कुल 50,00,000 नौकरियां खत्म हुई हैं जबकि इस बीच नई नौकरियों की संख्या सिर्फ 27.6 लाख ही रही है.
जुलाई में Naukri.com के सर्वे के अनुसार इस साल जून के बाद से रोजगार का माहौल बहुत सुस्त रहा है जबकि साल के शुरू में यह माहौल कहीं बेहतर था. सिर्फ 43 प्रतिशत रोजगारदाता ही साल के बाकी बचे महीनों में नई नौकरियों की भविष्यवाणी कर रहे हैं. Naukri.com के सीएफओ अम्बरीष रघुवंशी कहते हैं, ''अर्थव्यस्था के हालात सही नहीं हैं. रिक्रूटमेंट पर भी इसका असर पड़ा और मंदी की मार साफ नजर आती है.”
2013 की तीसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के लिए मैनपोवर एम्प्लॉयमेंट आउटलुक सर्वे का कहना था कि भारत में इस दौरान एम्प्लॉयर्स ने जो भर्ती की, वह पूरे एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में आठ वर्षों में सबसे कम थी. अनुमान के मुताबिक भारतीय बाजार में हर साल करीब 45 लाख लोग नौकरी के लिए आते हैं, जिनमें 7,50,000 इंजीनियर, 5,00,000 एमबीए और कम-से-कम 30 लाख दूसरे ग्रेजुएट होते हैं.
फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) की अध्यक्ष और एचएसबीसी इंडिया की कंट्री हेड नैना लाल किदवई कहती हैं, ''उत्पादन और निर्यात में मंदी आने से कंपनियों में रोजगार का माहौल बहुत कमजोर दिखता है.” फिक्की बिजनेस कॉन्फिडेंस सर्वे के मुताबिक 2013 के वित्त वर्ष की पिछली तिमाही में रोजगार की संभावना एक साल पहले की तुलना में बहुत कम थी.
सर्वे में भाग लेने वाले 65 प्रतिशत लोगों का कहना था कि 2013-14 के वित्त वर्ष की पहली दो तिमाही में कोई नई भर्ती नहीं हुई है.”
आज की स्थिति 2008 से ज्यादा खराब है. उस समय दुनिया भर में आई आर्थिक मंदी का असर भारतीय कंपनियों पर ज्यादा नहीं पड़ा था और उन्होंने अपना विस्तार करते हुए विदेशों में भी अधिग्रहण किए थे. एग्जीक्यूटिव सर्च फर्म एकॉर्ड ग्रुप इंडिया की सीईओ सोनल अग्रवाल कहती हैं, ''जब तक ग्लोबल और घरेलू अर्थव्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता है, तब तक यही मूड बना रहेगा.”
ह्यूमन एचआर एक्सपर्ट कंसल्टेंसी रैंडस्टैड इंडिया के पूर्व सीईओ और एचआर विशेषज्ञ ई. बालाजी कहते हैं, ''2008 की मंदी विश्व स्तर पर थी और उसकी जड़ें अमेरिका में थीं. लेकिन पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएं अब सुधर रही हैं.” इसका मतलब है कि मौजूदा संकट हमारे अपने देश की उपज है, जिसके लिए भारत किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता है.
यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में एक के बाद एक घोटालों, नीतियों में ढिलाई और टैक्स संबंधी कारोबार विरोधी फैसलों ने संभावित विदेशी इन्वेस्टर्स को दूर कर दिया. रिटेल ह्नेत्र में विदेशी इन्वेस्टर्स के लिए दरवाजा खोलने के बावजूद एक भी बहुराष्ट्रीय कंपनी आगे नहीं आई है. इस आर्थिक कुप्रबंधन का सबसे ज्यादा असर भारत में नौकरियों पर पड़ रहा है.
इस साल ऑटोमोबाइल सेक्टर में अप्रैल से जून के बीच कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी करने वाले हजारों कर्मचारी अपनी नौकरी गंवा चुके हैं क्योंकि कारों की बिक्री पिछले आठ महीनों से लगातार गिर रही है और भारी वाहनों की बिक्री में पिछले 17 महीनों से गिरावट हो रही है. इस क्षेत्र में 1.9 करोड़ लोग नौकरी कर रहे हैं.
महिंद्रा ऐंड महिंद्रा (एमऐंडएम) ने महाराष्ट्र में अपने चाकन प्लांट में 500 अस्थायी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है जबकि इस कंपनी की स्थिति भारतीय ऑटो बाजार में अपेक्षाकृत बेहतर है और एसयूवी के बाजार में उसकी 60 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सेदारी है. अभी नौकरियों में और भी कटौती की जा सकती है. एमऐंडएम में ग्रुप एचआर प्रेसिडेंट राजीव दुबे कहते हैं, ''अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो हमें मजबूरन छंटनी करनी पड़ सकती है.”
हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि टाटा मोटर्स ने भी उत्तराखंड में पंतनगर के प्लांट में अपने 21 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी की है. वहां 5,838 कर्मचारी काम कर रहे थे. टाटा मोटर्स के यात्री वाहनों की बिक्री जुलाई में 56 प्रतिशत गिरकर 10,824 यूनिट रह गई जबकि साल भर पहले यह संख्या 26,240 थी. अशोक लीलैंड और मारुति उद्योग में भी छंटनी हुई है.
उद्योग संस्था सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स (सियाम) के महानिदेशक विष्णु माथुर कहते हैं, ''मौजूदा मंदी 2008 की मंदी के मुकाबले ज्यादा लंबी है. निर्यात में तेजी नहीं आ रही है और यूरोपीय बाजार से कोई अच्छा संकेत नहीं मिल रहा है.” माथुर मानते हैं कि कुछ ऑटो कंपनियों ने अस्थायी कर्मचारियों की छंटनी की है, लेकिन स्थायी कर्मचारियों पर अभी तक कोई असर नहीं पड़ा है.
दरकता बुनियादी ढांचा
बुनियादी संरचना के क्षेत्र में नीतिगत निष्क्रियता और अनिश्चितताओं के चलते सैकड़ों प्रोजेक्ट अधर में लटके हैं जिससे हजारों लोगों के बेरोजगार हो जाने का खतरा पैदा हो गया है. एसोचैम के अनुसार बंदरगाहों से संबंधित 50,000 करोड़ रु. की लागत के प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण संबंधी मंजूरी का इंतजार है.
सड़क क्षेत्र में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) ने किसी नए प्रोजेक्ट के बीओटी (बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर) आदेश नहीं जारी किए हैं क्योंकि उसकी पिछली सूची के कई प्रोजेक्ट आज भी लंबित हैं. 25,000 करोड़ रु. के लगभग 2,500 किलोमीटर के सड़क प्रोजेक्ट मार्च से पर्यावरण संबंधी मंजूरी के इंतजार में हैं.
प्रत्येक 100 किलोमीटर की सड़क से 1,000 लोगों को रोजगार मिलता है और अगर शीघ्र ही इन प्रोजेक्टों को मंजूरी न दी गई तो इससे 25 लाख श्रमिक प्रभावित होंगे.
मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे बनाने वाली और 8,500 लोगों को रोजगार दे रही आइआरबी इन्फ्रास्ट्रक्चर के सीएमडी वीरेंद्र महिस्कर कहते हैं, ''एनएचएआइ सड़क बनाने के कोई नए आदेश नहीं दे रही है. निर्माण संबंधी कोई काम न होने पर नौकरी देने का सिलसिला टूट जाएगा.”
इस क्षेत्र के बहुत से खिलाडिय़ों ने बाजार से कर्ज लिया है इसलिए उन्हें नई फंडिंग में समस्या हो रही है. एयरपोर्ट और अस्पतालों का निर्माण करने वाली यूनिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर का कहना है कि इस साल अब तक वह अपने वार्षिक लक्ष्य का सिर्फ 20-25 प्रतिशत ही हासिल कर पाई है.
बैंकों पर भी मार
प्रीतिश नय्यर (बदला हुआ नाम) के लिए सब कुछ ठीक चल रहा था. 48 वर्षीय प्रीतिश मुंबई के एक बैंक में एग्जीक्यूटिव थे, लेकिन इस साल मई महीने में उन्हें तब झ्टका लगा जब वे वीकेंड के बाद केरल में छुट्टियां मनाकर लौटे और उन्हें आते ही टर्मिनेशन लेटर थमा दिया गया. प्रीतिश बताते हैं, ''मैंने अचानक से लिए गए इस फैसले की वजह जाननी चाही, लेकिन एचआर विभाग के प्रमुख ने कुछ भी नहीं बताया.
इतना ही कहा कि मेरी जरूरत नहीं है.” प्रीतिश अब बुरी तरह परेशान हैं. उनका 16 वर्षीय बेटा स्कूल में है और परिवार के बाकी खर्चों को पूरा करने की चिंता भी उन्हें सता रही है. प्रीतिश को अन्य भत्ते मिलाकर लगभग एक करोड़ रु. सालाना वेतन मिलता था.
प्रीतिश की तरह ही बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं में काम करने वाले हजारों कर्मचारी इन दिनों आई वित्तीय अस्थिरता पर नजर रख रहे हैं जिसकी वजह से बैकों में छंटनी का काम शुरू हो गया है. बीते साल अप्रैल महीने में एचएसबीसी ने अपने पुणे ऑफिस के 350 और हैदराबाद के 200 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया था.
ये सिलसिला 2013 में भी जारी है और बाकी बैंक भी इस राह पर चल निकले हैं. ऐसी खबर है कि यूबीएस ने अपनी कॉमर्शियल बैंक शाखा से स्टाफ की छंटनी शुरू कर दी है. 21 जून को बैंक ने अपना लाइसेंस आरबीआइ को सौंपना तय कर लिया. ठीक इसी तरह रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड ने अपनी कुछ ब्रांच बंद करने और अपने स्टाफ में 25 फीसदी की कटौती करना तय किया है.
एग्जीक्यूटिव सर्च फर्म ईएमए पार्टनर्स इंटरनेशनल भारत के मैनेजिंग पार्टनर के. सुदर्शन कहते हैं, ''इस बार हालात 2008 से अलग हैं. जहां 2008 में मंदी का असर अचानक हुआ था और कंपनियां अनजान थीं, वहीं अब स्टाफ में कटौती धीरे-धीरे हो रही है.”
जानकार इन हालात के लिए ऊंची ब्याज दर, सुस्त औद्योगिक उत्पादन और घरेलू खपत में गिरावट को जिम्मेदार मानते हैं जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था ठहर गई है. कर्ज लेने की दर भी घटी है. रिजर्व बैंक के मुताबिक वित्त वर्ष 2012 में कॉमर्शियल बैकों का संपूर्ण क्रेडिट धीमी रफ्तार में बढ़ा. जहां वित्त वर्ष 2011 में यह 21.5 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा था तो उसके बाद के साल में यह महज 17 प्रतिशत रहा.
इंजीनियरिंग क्षेत्र भी चपेट में
प्रमुख कैपिटल गुड्स के निर्माण की रफ्तार धीमी होने की वजह से आधारभूत ढांचे के लिए निर्माण करने वाली इंजीनियरिंग कंपनियां मंदी का सामना कर रही हैं. इसका पहला शिकार जर्मन इंजनियरिंग कंपनी सीमेंस एजी की भारतीय कंपनी सीमेंस लिमिटेड है. मुनाफे में होने वाली भारी गिरावट की वजह से कंपनी ने देश भर की अपनी कई यूनिटों से 200 लोगों को बाहर कर दिया. ऐसी खबर है कि कंपनी अभी 400 और लोगों को बाहर कर सकती है.
केपीएमजी में पार्टनर और इसके एनर्जी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और गवर्नमेंट सेक्टर के प्रमुख अरविंद महाजन कहते हैं कि सड़क और पावर उद्योगों के लिए निर्माण करने वाली कंपनियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं. वे कहते हैं, ''दोनों सेक्टरों के सुस्त होने की बहुत-सी वजहें हैं. कुछ मामलों में निवेश और पूंजी की कमी इसके लिए जिम्मेदार है तो कहीं कच्चे माल का उपलब्ध न होना इसकी वजह रही है.
उदाहरण के तौर पर पावर सेक्टर में आई मंदी टरबाइन और ट्रांसफार्मर जैसे उत्पादों की मांग को प्रभावित करेगी. जैसे-जैसे बड़ी कंपनियों ने अपने विस्तार की योजनाएं टाली हैं, उसकी मार मशीनों के कल-पुर्जों का निर्माण करने वाली छोटी और मझोली कंपनियों पर पड़ी है.” टेक्सटाइल उद्योग पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है.
केंद्रीय कपड़ा मंत्री आनंद शर्मा ने मार्च में संसद को बताया कि लगभग सौ कपड़ा यूनिटें पिछले चार साल में बंद हो गई हैं और इससे 29,000 लोगों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा. उन्होंने कहा, ''पिछले तीन साल में 89 कपड़ा मिलें और साल 2012-13 में बारह कपड़ा मिलें बंद हो गई हैं.”
न्यूजरूम में हलचल
मीडिया उद्योग भी इससे प्रभावित हुआ है. सीएनएन-आइबीएन, सीएनबीसी-टीवी18 और आइबीएन 7, जैसे चैनलों को चलाने वाले टीवी18 ब्रॉडकास्ट लिमिटेड समूह ने 350 कर्मचारियों को निकाला है जबकि एनडीटीवी प्रॉफिट ने अपने मुंबई ऑपरेशंस पर लगाम लगाते हुए 50 लोगों को बाहर निकाल दिया.
सामान्य तौर पर व्यस्त रहने वाले सीएनएन-आइबीएन के समाचार कक्ष में बीते 16 अगस्त को तब चुप्पी पसर गई थी जब कंपनी की एचआर टीम ने कर्मचारियों को एक-एक करके बुलाना शुरू किया उनमें सबसे पहले तकनीकी और सेल्स और मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव थे और उसके बाद कुछ सीनियर और जूनियर ओहदों पर काम करने वाले पत्रकार थे. स्टुडियो से विदा होने वाले कई पत्रकार ऐसे भी थे जो लाइव शो करके आए ही थे.
एक पूर्व कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सभी कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने वाले ऐसे लेटर पर साइन करने के लिए कहा गया जिस पर लिखा था कि वे अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ रहे हैं. एक कर्मचारी ने कहा कि ''कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई, लेकिन इससे इतना तो समझ आ गया कि कंपनी के मालिक अपनी शेयर वैल्यू बढ़ाना चाहते हैं और इसके लिए सिर्फ एक ही रास्ता था कि वे स्टाफ में कटौती कर दें.”
इस मामले में टीवी18 के अधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका. कुछ हफ्ते पहले 27 जुलाई को आउटलुक समूह ने अपनी अंतरराष्ट्रीय फ्रेंचाइजी मैगजीन पीपल, जिओ और मैरी क्लेयर के स्थानीय संस्करण बंद करने का फैसला किया था. समूह के इस कदम से करीब 120 लोगों की नौकरी चली गई.
मैरी क्लेयर के कर्मचारियों को तो ट्विटर के जरिए इस फैसले के बारे में तब पता चला जब वे मैगजीन के अगस्त संस्करण को अंतिम रूप देने में जुटे थे. एबीसी कंसल्टेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर शिव अग्रवाल के अनुसार, ''कंपनियों के विज्ञापन खर्च में कटौती और विज्ञापन के मिनट तय किए जाने का मिला-जुला असर है. जाहिर है कि इसका पहला असर कर्मचारियों की भर्ती पर पड़ेगा.”
सरकार की योजना
साल 2012-13 के आर्थिक सर्वे के अनुसार 12,000 औद्योगिक यूनिटों के नॉन परफॉर्मिंग एसेट की श्रेणी में आने की वजह से अनुमानत: 2,50,000 से 3,00,000 के बीच लोगों को अपने काम से हाथ धोना पड़ा है. इसकी सबसे बड़ी वजह मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के प्रति सरकार के उदासीन रवैये को माना जाता रहा है.
योजना आयोग के सदस्य अरुण मायरा कहते हैं, ''अब यह स्पष्ट है कि उदारीकरण के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र ने कोई प्रगति नहीं की है, जबकि बाकी क्षेत्रों में सुधार आया है.” वे कहते हैं कि आकलन से पता चलता है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र 10 करोड़ नौकरियां पैदा कर सकता है.
सरकार में अब हालात सुधारने की उतावली दिखाई दे रही है. 26 अगस्त को इन्वेस्टमेंट पर कैबिनेट समिति (सीसीआइ) ने पावर, तेल, गैस, सड़कों और रेलवे सेक्टर से जुड़े 36 प्रोजेक्टों को मंजूरी दी जिनकी कुल निवेश 1,83,000 करोड़ रु. था. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा, ''हम यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि इन्वेस्टमेंट का सिलसिला शुरू हो चुका है और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, ये रफ्तार पकड़ेगी.”
लेकिन उद्योग जगत इन घोषणाओं से बहुत उत्साहित नहीं है. बजाज ऑटो के अध्यक्ष राहुल बजाज ने इंडिया टुडे को बताया, ''बात चाहे राजकोषीय घाटे की हो, चालू खाते के घाटे की हो, रुपए के गिरने की हो, जीडीपी की सुस्त रफ्तार की हो या औद्योगिक उत्पादन इंडेक्स की हो, हर ओर से भारतीय अर्थव्यवस्था ने इतने मुश्किल दौर का सामना पहले नहीं किया.”
वीडियोकॉन इंडस्ट्री के अध्यक्ष वेणुगोपाल एन. धूत कहते हैं, ''भारतीय अर्थव्यवस्था ने इन्वेस्टर्स के बीच कायम भरोसे को खो दिया है. कोई भी कंपनी नया प्रोजेक्ट लगाने को तैयार नहीं है, तो नए रोजगार आएंगे कहां से?” 2011-12 की तुलना में 46.6 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश गिरकर 2012-13 में 36.9 अरब डॉलर रह गया.
इसके उलट चीन में 2012 में 111.6 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेश निवेश हुआ. धूत पूछते हैं, ''एक ऐसे माहौल में जब हम पूंजी को नियंत्रित कर रहे हैं और कारोबारियों को डराने वाले टैक्स संशोधन कर रहे हैं, तो कोई इन्वेस्ट क्यों करना चाहेगा?” निराशा की यह स्थिति रोजगार की तस्वीर में किसी भी सुधार की संभावना को कम कर देती है.
—जयंत श्रीराम और अदिति पै.

