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आडवाणी के चक्रव्यूह में नरेंद्र मोदी

आडवाणी के अचूक निशाने ने बीजेपी के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को विवादास्पद बना दिया. पार्टी के भीतर से हो रहे लगातार हमलों से क्या उबर पाएंगे मोदी. मोदी को अपनी ही पार्टी के विरोधी खेमा और कांग्रेस दोनों से पार पाना होगा.

अपडेटेड 5 अगस्त , 2013
यात्रा तो मेरे जीवन से जुड़ी हुई है. अगर कोई पद छोडऩे का मतलब यह निकालता है कि आडवाणी सक्रियता छोड़ देंगे, तो वह मुगालते में है. मैं 14 साल की उम्र से रथयात्री बना, वक्त के साथ सिर्फ मकसद बदलता गया. मैं कभी यात्रा छोडऩे वाला नहीं, जीवन भर मेरी यात्रा चलेगी.” 18 दिसंबर, 2009 की शाम पार्लियामेंट एनेक्सी में लालकृष्ण आडवाणी ने यह उद्घोष तब किया, जब संघ के दबाव में पार्टी पीढ़ीगत बदलाव के मुहाने पर खड़ी थी.

आडवाणी ने दूसरी पीढ़ी को कमान तो सौंप दी लेकिन संसदीय दल के अध्यक्ष का नया पद सृजित करवाने और उस पर काबिज होने के बाद. जिन्ना प्रकरण में संघ से रार ठान उसे खरी-खरी सुनाना या फिर 2009 के आम चुनाव में संघ का लाडला बन 'पीएम इन वेटिंग’ बन जाना, 86 वर्षीय आडवाणी को बीजेपी की राजनीति में मास्टर स्ट्रोक खेलना बखूबी आता है.

रार ठानूंगा, हार नहीं मानूंगा
15वीं लोकसभा के गठन के बाद रिटायरमेंट की ओर बढ़े आडवाणी एक बार फिर पूरे दम-खम के साथ मैदान में डट गए हैं. यह आडवाणी का मास्टर स्ट्रोक ही है कि गोवा कार्यकारिणी में 62 वर्षीय नरेंद्र मोदी को 'समकक्षों में वरिष्ठ’ का दर्जा देते हुए बीजेपी की चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाया गया तो आडवाणी के एक स्ट्रोक ने मोदी की छवि को पार्टी में ही निर्विवाद नहीं रहने दिया.

कार्यकारिणी का बायकॉट और मोदी को कमान सौंपे जाने के बाद 10 जून को इस्तीफे का दांव चल आडवाणी ने संदेश दिया कि एक विवादित व्यक्ति देश का नेतृत्व कैसे कर सकता है. आडवाणी समर्थक सांसद शत्रुघ्न सिन्हा का वह बयान, ''अभी पीएम उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई, लेकिन उससे पहले ही महसूस किया जाने लगा कि वे (मोदी) सबको साथ लेकर नहीं चल सकते” इशारा करता है कि मोदी की राह में कांटे बिछ चुके हैं और कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश कर रही बीजेपी दो धड़ों में बंट चुकी है.

कम बोलना, लेकिन मारक प्रहार से विरोधियों को चित करना आडवाणी की अदा है. इस्तीफा प्रकरण के बाद के नाटकीय घटनाक्रम ने जता दिया कि वे अभी चुके नहीं हैं और कदम पीछे खींच पार्टी का बुजुर्ग संरक्षक बनने की भूमिका अख्तियार करने को तैयार नहीं हैं. इसलिए बीजेपी के सबसे बुजुर्ग नेता ने 12 जुलाई को एक पुस्तक विमोचन समारोह में व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ''मुझे ब्लॉग लिखना अच्छा लगता है. आजकल मैं ब्लॉगर ज्यादा हूं और राजनैतिक कार्यकर्ता कम.

इसीलिए कुछ लोग सहानुभूति में कहते हैं कि मैं मझधार में अटका हूं.” नियमित तौर पर अपने विचारों को ब्लॉग पर जाहिर करने वाले आडवाणी का यह कथन सचाई से कोसों दूर था. दरअसल उनके भीतर का राजनैतिक कार्यकर्ता पहले जैसा ही युवा, उत्साही और सक्रिय है. वे इकलौते शख्स हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर उभरते जा रहे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव को कम करने का माद्दा रखते हैं.

मोदी पर मुखर विरोधी खेमा
पार्टी के भीतर असहमति की आवाजें अभी खत्म नहीं हुई हैं. भले इनमें कुछ मुखर हैं तो कुछ मद्धम. कुछ ऐसे नेता हैं जो खुले तौर पर आडवाणी के लिए समर्थन जाहिर करने में कोई संकोच नहीं करते. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आडवाणी को लगातार मोदी के ऊपर रखा है. चौहान ने 25 जुलाई को दिए इंटरव्यू में मोदी को अपना 'बड़ा भाई’ कहा और इस बात पर जोर दिया कि पार्टी में सभी लोगों के लिए आडवाणी ही 'सुप्रीम नेता’ हैं.

इस रिश्ते को समझना मुश्किल नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री के बतौर अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहे चौहान को आडवाणी लगातार मोदी के बराबर पेश करते रहे हैं. उनके बयान से दो दिन पहले ही शत्रुघ्न सिन्हा खुलकर आडवाणी के समर्थन में आ गए थे. उन्होंने कहा था कि आडवाणी पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं और उनके आशीर्वाद के बगैर किसी को भी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जा सकता. उन्होंने साफ कर दिया कि उनके लिए आडवाणी ही इकलौते उपयुक्त शख्स हैं जो अगले लोकसभा चुनाव में देश को नेतृत्व दे सकते हैं. सुषमा स्वराज, यशवंत सिन्हा और उमा भारती सरीखे नेता पहले से ही मौके-बेमौके आडवाणी को प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल बताते आ रहे हैं.

इसके अलावा आडवाणी की एक शांत टीम भी है जो उनके समर्थन में खुलकर तो सामने नहीं आ रही लेकिन मोदी के उदय को छांटने के लिए खामोशी से काम कर रही है. बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अमेरिका में बैठकर मोदी को 'राष्ट्रीय अपील वाला इकलौता नेता’ घोषित किया तो दिल्ली में आडवाणी कैंप में हलचल मच गई. राजनाथ के इसी तरह के पूर्व के बयान को सुषमा स्वराज निजी मत बता खारिज कर चुकी हैं.

22 अप्रैल को स्वराज ने कहा था, ''यह उनका निजी मत है. इसका मतलब यह नहीं कि बीजेपी में और नेता पॉपुलर नहीं हैं.” सिन्हा का हालिया बयान मोदी विरोधी धड़े की रणनीति का ही हिस्सा है और यह धड़ा चुनाव के नतीजे आने तक इसी तरह सक्रिय रह सकता है. पार्टी के लिए यही बड़ी चुनौती है कि व्यवस्था (ऑर्डर) बनी रहे. लेकिन जिस तरह नेतृत्व को लेकर दो पीढिय़ों में टकराव की स्थिति पैदा हुई है, उससे यही लगता है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के आने तक बीजेपी का चुनाव अभियान और अंतर्कलह साथ-साथ चलती रहेगी.

जाहिर है कि कभी मोदी की ब्रांडिंग करने वाले आडवाणी अब उन्हें आगे बढ़ाने का काम नहीं करेंगे, जिससे निश्चित तौर से मोदी शरणम् बीजेपी की धार कम होगी. इसलिए अमेरिका जाकर मोदी की ब्रांडिंग करने वाले राजनाथ को अब ऐलान करना पड़ा है कि संसदीय बोर्ड ही आपसी सहमति के साथ पीएम उम्मीदवार का फैसला करेगा.

अपनों के बीच ही मोदी नामंजूर
जब 2005 में पहली बार अमेरिका ने मोदी को वीजा देने से इनकार किया था, तो बीजेपी ने संसद में जबरदस्त विरोध जताया था. लेकिन इस बार जब भारतीय सांसदों के एक समूह ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को चिट्ठी लिखकर वीजा नहीं देने की नीति जारी रखने की अपील की, तो पार्टी का कोई बड़ा नेता मोदी के पक्ष में नहीं बोला. मोदी की अंतरराष्ट्रीय छवि भी उनकी राह में एक रोड़ा है.

पार्टी के अन्य मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह भी मन से मोदी के साथ नहीं खड़े हैं. इन दोनों नेताओं को भी इस बात का मलाल रहता है कि गुजरात से 'बेहतर’ विकास करने के बावजूद उन्हें मोदी जैसी तवज्जो नहीं मिलती, जबकि लोकसभा चुनाव से पहले होने वाले विधानसभा चुनाव में ये दोनों मुख्यमंत्री भी मोदी की तरह हैट्रिक लगाने का दम रखते हैं. आडवाणी की ओर से शिवराज को तुरुप के पत्ते के तौर पर इस्तेमाल करने की अहम वजह समाज के सभी तबके में उनकी स्वीकार्यता भी है, जबकि मोदी के प्रति एक वर्ग विशेष नफरत का भाव रखता है.

हाल ही में दिल्ली बीजेपी के उपाध्यक्ष और डायरेक्टर आमिर रजा हुसैन ने मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कहा, ''मोदी नेता हो सकते हैं, लेकिन मेरे नेता नहीं हैं.” इसके बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी. आडवाणी के करीबी हुसैन ने पीएम पद के लिए आडवाणी और सुषमा का समर्थन किया, तो खुद दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष विजय गोयल कह चुके हैं, ''केंद्र में अगली सरकार आडवाणीजी के नेतृत्व में एनडीए की बनेगी.”

टीम आडवाणी में लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, शाहनवाज हुसैन, अनंत कुमार, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, वेंकैया नायडु और महासचिव मुरलीधर राव माने जाते हैं. कर्नाटक में बी.एस. येद्दियुरप्पा की वापसी की योजना मोदी ने बनाई तो आडवाणी समर्थक अनंत कुमार ने विरोध की कमान संभाली और सुषमा, मुरलीधर राव और संगठन मंत्री रामलाल भी अनंत के साथ खड़े हो गए, जिससे येद्दियुरप्पा की वापसी की योजना फिलहाल खटाई में है.

पार्टी का एक खेमा चाहता है कि आडवाणी को अगले चुनाव में पार्टी को जीत तक पहुंचाने का एक आखिरी मौका अवश्य देना चाहिए. आडवाणी के करीबी एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''आखिर वे आडवाणी ही थे जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर 1984 की दो सीटों से पार्टी को 1989 में 86 और 1999 में 182 सीटों तक पहुंचाया है. गठबंधन सहयोगियों को मिला लें तो एनडीए की कुल 303 सीटें थीं. अब सारे सहयोगी कहां गए?” एक अन्य नेता का कहना है कि आडवाणी ने पार्टी को सींचा है. वे कहते हैं, ''मोदी का बस हल्ला है. उन्होंने न सिर्फ पार्टी को बांट दिया है, बल्कि सहयोगियों को छांट दिया है.”

एनडीए में मोदी पर भारी आडवाणी
बीजेपी के भीतर मोदी विरोधी हवा अब जोर पकड़ रही है और आडवाणी चुपचाप सब कुछ देख रहे हैं. सतह पर फिलहाल जो दिखता है वह यह कि आडवाणी ने अपना इस्तीफा वापस लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अनुरोध को मान लिया है. इतने वरिष्ठ नेता के लिए यह बात एक जीत जैसी ही थी कि 10 जून को इस्तीफा प्रकरण में भागवत को दखल देना पड़ा. कभी संघ की दखलंदाजी पर भृकुटि तानने वाले आडवाणी ने भी भागवत से मधुर रिश्ते बनाकर पार्टी और खुद के बीच का मध्यस्थ बना लिया. अब बीजेपी के किसी भी फैसले में आडवाणी की अनदेखी का मतलब, संघ को नजरअंदाज करना होगा.

मोदी की राह में सबसे बड़ी अड़चन एनडीए का कमजोर होना है, जबकि आडवाणी के नाम पर एनडीए का दायरा बढ़ सकता है. वैसे बीजेपी और संघ को बेहद करीब से जानने वाले एक नेता बताते हैं, ''भारत में अब तक जितने प्रधानमंत्री बने हैं, वे आकस्मिक ही बने हैं. नेहरू के समय कांग्रेस सरदार पटेल के पक्ष में थी, लेकिन महात्मा गांधी ने नेहरू को तरजीह दी. लाल बहादुर शास्त्री भी अचानक ही बने.

फिर इंदिरा गांधी बनीं, लेकिन तब मोरारजी देसाई दावेदार थे. देसाई का सपना 1977 में पूरा हुआ, जब 15 दलों को साथ लेकर वे आगे बढ़े. राजीव, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल भी उसी श्रेणी में आते हैं. यहां तक कि वाजपेयी जब बने तो कार्यकर्ताओं में माहौल आडवाणी के पक्ष में था, लेकिन गठबंधन के लिए आडवाणी ने वाजपेयी का नाम आगे बढ़ा दिया. 2004 में भी सोनिया गांधी के नाम पर जनादेश मिला, वे राष्ट्रपति भवन तक गईं. लेकिन अचानक मनमोहन सिंह पीएम हो गए.” निश्चित तौर से आडवाणी से पंगा लेकर आगे बढ़ रहे मोदी दुधारी तलवार पर चल रहे हैं, जहां उनको खुद को साबित करने की बड़ी चुनौती है.

क्षत्रप भी मोदी के साथ नहीं
संघ भी यह मानने को मजबूर हो चुका है कि आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता को दरकिनार करना पार्टी के हित में नहीं है. हालांकि संघ यह भी स्वीकार कर चुका है कि मोदी पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता हैं जिनके बिना काम नहीं चलेगा. भागवत ने 5 जुलाई को निजी मुलाकात के लिए आडवाणी को नागपुर मुख्यालय में न्योता देकर बातचीत की. अब तक आडवाणी ने यही साबित किया है कि वे तमाम स्थितियों में आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं.

यही वजह है कि अब तक पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए मोदी के नाम का ऐलान नहीं किया है. आगामी विधानसभा चुनाव में मोदी का इम्तिहान हो जाएगा. राजनाथ सिंह फिलहाल छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए मोदी का कार्यक्रम तय करने में जुटे हैं. हालांकि इन राज्यों में स्थानीय बीजेपी नेतृत्व मजबूत स्थिति में है, जिनके रिश्ते मोदी के साथ बहुत अच्छे नहीं हैं. तो सूची जारी होने से पहले वरिष्ठ नेताओं ने मोदी को रिपोर्ट करने से इनकार कर दुविधाजनक स्थिति पैदा कर दी थी.

अगर राज्यवार भी देखा जाए तो उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत से कोई बड़ा नेता मोदी के पक्ष में खड़ा नहीं दिखता. बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड जहां पार्टी मोदी का जादू चलने की संभावना देख रही है, वहां भी आडवाणी-मोदी दो धड़े दिखते हैं. पार्टी नेताओं का मानना है कि अगर मोदी ध्रुवीकरण से उम्मीद पाले बैठे हैं, तो यह उनकी रणनीतिक भूल है क्योंकि आडवाणी को राम रथ यात्रा के जरिए लहर पैदा करने और पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में लगभग पांच साल लग गए थे जबकि मोदी के पास खुद को पूरे देश में स्थापित करने का समय नहीं है.

संघ के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि विधानसभा चुनाव के नतीजों पर बहुत कुछ निर्भर करेगा. वे कहते हैं, ''हम देखना चाहते हैं कि क्या कांग्रेस विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश बीजेपी के पक्ष में वोटों में तब्दील हो पाता है या नहीं. इससे यह भी साफ होगा कि कौन-सा नेता एनडीए को मजबूत करने की सबसे अच्छी स्थिति में होगा.”

साफ है कि मोदी का रास्ता उतना भी आसान नहीं है. दौड़ में अभी आडवाणी डटे हुए हैं और उनको अगर खेलने नहीं दिया गया तो वे खेल बिगाडऩे का भी दम रखते हैं, इस बात को संघ भी समझ चुका है.
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