यह बात है दिसंबर 2002 की जब एक बड़े ही तनावपूर्ण चुनाव अभियान का अंतिम चरण चल रहा था. मैं नरेंद्र मोदी के साथ एक छोटे-से विमान में बैठकर जामनगर से अहमदाबाद जा रहा था, जहां उन्हें शाम को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ एक रैली को संबोधित करना था. झुककर नीचे देखते हुए उन्होंने मुझसे पूछा: ‘‘आपको क्या लग रहा है?’’ मैंने कहा कि ‘‘माहौल तो काफी उत्साहजनक दिख रहा है.’’ तभी एकाएक उन्होंने एक और सवाल दागा: ‘‘और अगर हम कहीं हार गए तो?’’ मैं चौंककर मुस्कराया और वे भी मुस्करा उठे. और उन्होंने आगे जोड़ा, ‘‘लेकिन मैंने कम-से-कम अच्छे ढंग से प्रचार अभियान चलाया. अपनी तरफ से जितना हो सकता था, किया.’’
मोदी के लिए खराब से खराब नतीजों के बारे में सोच-विचार की हर वजह थी. 2002 में उनके खिलाफ लगी ताकतें दुर्जेय नजर आ रही थीं. उदार बुद्धिजीवी और मीडिया जो उन्हें गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार मानता था, इसके अलावा यह कोई गोपनीय बात नहीं थी कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के आसपास रहने वाला एक ताकतवर धड़ा उनको लेकर उत्साहित नहीं था. किसी भी तरह की चुनावी बदकिस्मती मसलन उनके भारी जीत दर्ज न कर पाने को उनके राजनैतिक करियर की समाप्ति की तरह बताया जाता. मोदी के लिए यह करो या मरो की लड़ाई थी.
अहमदाबाद तक की वह छोटी उड़ान दुर्लभ से दुर्लभ क्षणों में से एक साबित हुई: जब एक ऐसे व्यक्ति के दिमाग में संदेह की झलक दिखी थी, जो आज राजनैतिक निर्णय लेने के मामले में अंतिम शब्द होने की प्रतिष्ठा हासिल कर चुका है. इसके पहले मोदी में मैंने कभी भी कोई हिचक नहीं देखी-1990 के दशक के अंतिम वर्षों के उन अंधेरे दिनों में भी नहीं जब उन्हें कमोबेश गुजरात में जाने से भी रोक दिया गया था. इसके बाद मैंने कभी भी उनमें ध्येय के प्रति भावना को डगमगाते नहीं देखा. मोदी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनका आत्मसंकल्प आपको हैरत में डाल दे.
20 दिसंबर को जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों ने यह खुलासा किया कि किस सीमा तक गुजरात अपने सबसे लंबे समय तक रहे मुख्यमंत्री के साथ डटे रहने को दृढ़ है, तो यह आभास हो गया कि इस बार जो देखा जा रहा था, वह राज्य का एक और चुनाव भर नहीं था: मोदी एक राष्ट्रीय घटना बनने के मुहाने पर है. यहां तक कि उनके कट्टर आलोचक-और भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान में अब भी उनका वर्चस्व है-भी अनिच्छा से यह बात स्वीकार करने लगे कि 62 वर्ष के इस गुजराती के रूप में वे ऐसे व्यक्ति से निपट रहे हैं जो न सिर्फ चुनावी राजनीति के कायदों को नया आकार देने की क्षमता रखता है, बल्कि भारत के भ्रमित दोहरेपन से भी मुकाबला कर रहा है.
मोदी एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिनसे आप या तो प्यार कर सकते हैं या नफरत कर सकते हैं, लेकिन आप उन्हें नजरअंदाज किसी भी सूरत में नहीं कर सकते.
गुजरात में उनकी लगातार तीसरी जीत के बाद निश्चित रूप से मोदी को राष्ट्रीय भूमिका देने और यहां तक कि अगले आम चुनाव के लिए उन्हें बीजेपी का प्रधानमंत्री घोषित करने की मांग भी जोर पकड़ सकती है. अभी तक इसके लिए जोर देने वालों में सोशल मीडिया पर सक्रिय उत्साही लोगों का एक समूह, वाइब्रैंट गुजरात की ऊर्जा और जोश से प्रभावित कारोबारी जगत के दिग्गज, एकेडमिक और मीडिया प्रतिष्ठानों से अलग कुछ असामान्य बुद्धिजीवी और कुछ ऐसे मुट्ठीभर राजनैतिक कार्यकर्ता शामिल रहे हैं. ये लोग केंद्र की यूपीए सरकार की विफलता को भुना सकने में बीजेपी की नाकामी से खासे खफा रहते हैं.
पिछले छह महीने में बीजेपी में मतभेद ज्यादा स्पष्ट तौर पर दिखने के साथ ही ‘मोदी को पीएम बनाओ’ की मांग करने वाला तबका तेजी से बढ़ा है और उसमें न सिर्फ बीजेपी की तरफ झुकाव रखने वाला मतदाता, पार्टी का जमीनी कार्यकर्ता बल्कि जनमत निर्माण करने वाले अभिजात लोगों का एक खासा बड़ा समूह भी शामिल हुआ है. मोदी का लगातार बढ़ता राष्ट्रीय आकर्षण जनमत सर्वेक्षणों में भी मजबूती से दिखने लगा था.
यह रुख किसी विपरीत दिशा में सोचने वाली सनक को प्रदर्शित नहीं कर रहा. मोदी बीजेपी के पटल पर वैल्यू एडिशन के तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं को ला सकते हैं. पहला, युवाओं का वोट. गुजरात ने साफ तौर पर यह दिखा दिया है कि मोदी को सबसे उत्साहजनक समर्थन 35 साल से नीचे के लोगों में मिला है. इससे ही समझा जा सकता है कि मोदी की चुनावी रैली में किसी रॉक कंसर्ट वाला मूड क्यों होता है. वे मोदी के विकास के सपने को बेचने और इसका कुछ हिस्सा सचाई में तब्दील कर सकने की क्षमता से जज्बाती तौर पर आकर्षित हुए हैं.
एक ऐसी पार्टी में जिसे अकसर पुरातनपंथी माना जाता है, मोदी अत्यंत आधुनिकतावादी आवेग वाले नेता हैं. उनके 3डी प्रचार अभियान को एक गैर-जरूरी हथकंडा माना जा रहा था, हेलिकॉप्टर की तरह जो राजनैतिक रैलियों में उसे हैरत से देखने वाले लोगों की अतिरिक्त भीड़ जुटाने के मामले में हमेशा कामयाब रहा है. लेकिन मोदी का गणित यह था कि गुजरात के आकांक्षापूर्ण स्वभाव के लोगों के अनुरूप इसे उनके तकनीक प्रेमी रवैए की मिसाल माना जाएगा.
लालची राजनैतिक वर्ग का व्यावहारिक विकल्प
गुजरात के अनुभव ने महिलाओं के मन पर मोदी की पकड़ को भी साबित किया है. कोई सामाजिक मनोविज्ञानी ही इस बारे में बेहतर व्याख्या कर सकता है कि यह आकर्षण सिर्फ उनकी अपरिष्कृत मर्दानगी के इर्दगिर्द केंद्रित है, उनके अविवाहित होने की स्थिति (कुछ इसी वजह से ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को भी फायदा मिलता रहा है) के प्रति या मामला और जटिल है? वजह जो भी हो, यह आकर्षण एक ऐसी पार्टी को फायदा पहुंचा रहा है जो अपने सामाजिक ढांचे में महिलाओं और युवाओं को एक कमजोर कड़ी के रूप में देखती रही है.
मोदी की राजनैतिक ताकत की तीसरी विशेषता बीजेपी के आधारभूत सामाजिक धड़े-मध्य वर्ग को प्रेरित करने की उनकी क्षमता है. यह प्रशंसक वर्ग मोदी की तीन तरह की महसूस की जा रही ताकत के लिए उनका ऋणी रहता हैरू तीव्र विकास के उनके जुनून, निर्णय लेने की उनकी क्षमता और उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी. नब्बे के दशक में एक काफी छोटा-सा मध्य वर्ग बीजेपी के पीछे चलता था क्योंकि उसे अन्य राजनैतिक वर्ग से ‘अलग’ तरह का माना जाता था. आज काफी बड़ा, ज्यादा कट्टर और ज्यादा आकांक्षी मध्य वर्ग कुछ संकीर्ण, अपना पेट भरने वाले और बिकाऊ नेताओं के गुट के मुकाबले मोदी को व्यावहारिक विकल्प के रूप में देख रहा होगा.
पहले भी मोदी ने एक बड़े राजनैतिक समुदाय को गले लगाने के लिए सफल प्रयोग किया है. 2002 के गोधरा दंगों के बाद, जिसे मुसलमानों के खिलाफ बहुसंख्यकों की सहज प्रतिक्रिया बताया गया, मोदी अयोध्या के दिनों वाले हिंदू वोट बैंक को फिर से तैयार करने के प्रलोभन से बचे. इसकी जगह उन्होंने गुजराती अस्मिता का आह्वान किया, जिसने ‘‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’’ थीम को कुछ बड़े और गैर-विवादास्पद रूप में स्थापित किया. इस प्रक्रिया में उन्होंने जातिगत धु्रवीकरण पर अंकुश लगा दिया जो 1980 के दशक में कांग्रेस के उभार की विशेषता थी.
कहा जाता है कि गुजरात भारत नहीं है और भारत के गौरव के आह्वान का मोदी का दांव हिंदीपट्टी के जातिगत और सामुदायिक ध्रुवीकरण वाले परिवेश में आकर डगमगा जाएगा. इस तर्क में कुछ दम है. लेकिन मोदी के आलोचक इस संभावना का ध्यान रखने में भी तो नाकाम रहे हैं कि कोई भी सार्थक राष्ट्रीय अभियान सिर्फ गुजरात के परिप्रेक्ष्य में विकसित किसी नजरिए की कार्बन कॉपी नहीं हो सकता.
कभी न खेला गया ओबीसी कार्ड
मोदी के पास दो कार्ड हैं, जिनको सुरक्षित रखा गया है. पहला वर्ग की बात, जिसे मोदी ने गुजरात चुनाव अभियान के अंतिम दौर में राहुल गांधी की बातों का जवाब देते हुए सरसरी तौर पर छुआ था. उन्होंने कुछ जनसभाओं में कहा, ‘‘आपके पिता, उनके नाना और उनकी मां प्रधानमंत्री रह चुके हैं. लेकिन मेरे पिता तो कभी सरपंच भी नहीं रहे हैं.’’ यह असल में संपन्न वर्ग और गांधी परिवार के देश पर अपना हक समझने की असाधारण भावना, दोनों पर सीधा हमला था.
दूसरा सुरक्षित कार्ड है मोदी का पिछड़े वर्ग से जुड़ा होना. उन्होंने कभी अपने ओबीसी दर्जे को याद नहीं किया है, थोड़ा भी नहीं, क्योंकि जातिवाद उनके सबको गले लगाने वाले भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्धता के खिलाफ जाता है. लेकिन यह एक ऐसा विषय है जिसका सार्वजनिक मंचों पर शायद ही कभी ढिंढोरा पीटा जाता रहा हो. यह ऐसा संदेश है जो कानाफूसी के जरिए कहीं तेजी से फैलता है. सैद्धांतिक रूप से तो मोदी के पास ओबीसी कार्ड का इस्तेमाल कर अपनी व्यापक अपील को और बढ़ाने का हथियार मौजूद है. उत्तर प्रदेश और बिहार के नेता यह जानते हैं और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर भी सामने आकर उनसे टकराना उनके लिए तकलीफदेह होता है.
बीजेपी को मोदी की ताकत मालूम है, लेकिन दो बातों को लेकर अंदेशा है. पहला, मोदी को बहुत ज्यादा व्यक्तिवादी के रूप में देखा जाता है. आरएसएस का प्रचारक रहते हुए मोदी को भी निर्देश लेने और उस पर अमल करने का प्रशिक्षण मिला है. इसके बावजूद वे तर्क पसंद करने वाले भारतीय हैं.
संघ की अंतिम सत्ता पर उनके लगातार सवाल उठाने से आरएसएस के कई पुराने लोगों में चिंता है. दूसरी बात, मोदी के बारे में यह धारणा बनी है कि उनमें गठबंधन की राजनीति की असंतुष्ट दुनिया के लोगों को साथ लेकर चल सकने लायक लचीलेपन का अभाव है. बीजेपी अगर शीर्ष राजनैतिक पद के लिए उम्मीदवार के रूप में उनके नाम की घोषणा करती है तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार निश्चित रूप से एनडीए से बाहर हो जाएंगे. ऐसे में पार्टी के भीतर यह अंदेशा है कि बीजेपी फिर से 1990 और 1996 की तरह अलग-थलग पड़ जाएगी.
ये ऐसे असल मुद्दे हैं जिनका सामना मोदी सिर्फ एक तरीके से कर सकते हैं: उनका जनसमर्थन ही इसका जवाब दे. हू-ब-हू इसी तरीके से वाजपेयी 1996 की 13 दिन की सरकार और 1998 के चुनाव में ऐसी ही समस्याओं से निपटे थे. साफ तौर पर कहा जाए तो बीजेपी के पास इस बात के अलावा और कोई विकल्प नहीं है कि जल्दी ही मोदी का अभिषेक किया जाए और गांधीनगर के संचालन केंद्र से उन्हें अपना राष्ट्रीय व्यक्तित्व बनाने के लिए समय दिया जाए.
ऐसा नहीं हुआ तो बीजेपी भन्नाए, बेपरवाह और मुरझाए समर्थकों के साथ आम चुनाव के प्रचार अभियान में उतरेगी. इस तरह के रवैए से सामने आने वाले चुनावी नतीजे का अनुमान लगाया जा सकता है. ऐसे में पार्टी चुनाव के बाद भी केंद्रीय स्तर पर कोई सार्थक भूमिका नहीं निभा पाएगी.
संघ परिवार के भीतर अकसर यह कहा जाता है कि मोदी ने एक स्वयंसेवक के रूप में जो कुछ आत्मसात किया था, वह सब भूल गए हैं. यह सच नहीं है. उन्होंने एक खूबी को कभी नजरअंदाज नहीं कियारू धैर्य के रणनीतिक गुण पर आवेग को हावी नहीं होने दिया. गांधीनगर में उन्होंने शायद ही कभी अपनी ताकत का ज्यादा इस्तेमाल किया हो. हालांकि वे अपना अंतिम लक्ष्य जानते हैं लेकिन वे जल्दीबाजी करने वाले बेचौन व्यक्ति नहीं हैं.
मोदी बीजेपी के पास भीख मांगने नहीं जा रहे. पार्टी में नीचे से आने वाला दबाव बीजेपी को खुद उन्हें आगे करने पर मजबूर करेगा. उसके बाद ही भारत के लिए जंग औपचारिक रूप से शुरू होगी. मोदी के बारे में जानने की वजह से मैं यह कह सकता हूं कि वे जीत के लिए लड़ेंगे, जो उन्हें हमेशा मिली है.
स्वपन दासगुप्ता राजनैतिक टिप्पणीकार हैं और उन्होंने गुजरात पर गहन लेखन किया है

