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डार्क मोड

ब्रांड मोदी को कैसे मिली कामयाबी?

अपने प्रतिद्वंद्वियों को हाइ-टेक प्रचार और ओजस्वी भाषणों से करारा जवाब देने वाले नरेंद्र मोदी के पीछे मजबूती से खड़ी रही युवाओं और महिलाओं की अनुशासित फौज.

अपडेटेड 7 जनवरी , 2013

नरेंद्र मोदी ने इस बार ऐसा प्रदर्शन किया है कि उनकी अपनी पिछली कामयाबियां फीकी पड़ गई हैं. उनके विरोधी तो खैर अप्रासंगिकता की मुंडेर पर जा लटके हैं. चुनावी फतह की इस हैट्रिक ने आम लोगों की राजनीति करने वाले भारत के सबसे प्रभावशाली उस्ताद को राष्ट्रीय राजनीति की अगली कतार में ला खड़ा किया है.

नतीजे आने के तुरंत बाद राज्य बीजेपी मुख्यालय का माहौल ही सब कुछ समझने के लिए काफी था. मुख्यमंत्री का मुखौटा पहने मोदी के एक समर्थक के हाथ में टंगा प्लेकार्ड कह रहा था, ‘‘पीएम के लिए हिट और फिट.’’ दूसरे प्लेकार्ड पर लिखा था, ‘‘नफरत की राजनीति छोड़ो, विकास की राजनीति करो.’’ हिंदुत्व के प्रतीक से विकास गुरु के रूप में यह इमेज परिवर्तन जो 2007 से शुरू हुआ था, 2012 की चुनावी जीत के साथ अपने मुकाम के पास पहुंच चुका है.

रिकॉर्ड सत्तर फीसदी मतदान से जाहिर है कि युवाओं और महिलाओं ने बड़े पैमाने पर अपने जननायक को वोट दिया, लेकिन इससे आगे बढ़ें तो साफ  दिखता है कि मोदी की गरीब समर्थक योजनाओं का इस जीत में बहुत बड़ा हाथ रहा. चूंकि कोली जैसे हाशिए पर पड़े समुदाय भी इस बार बीजेपी की झेली में आ गिरे और उन्होंने केशुभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) के समर्थन में गए लेउवा पटेल वोटों से हुए मामूली नुकसान को न सिर्फ पाट दिया, बल्कि उससे कहीं ज्यादा योगदान दिया.Gujarat

गरीबों के लिए चलाई गई मोदी की कई योजनाएं, जैसे छात्रों को नि:शुल्क स्वास्थ्य सुविधा, की छाप इस जनादेश पर साफ  दिखती है. इस योजना के तहत 2011-12 में 1,200 गरीब स्कूली बच्चों के दिल का इलाज सरकारी खर्च से किया गया.

ऐसी ही एक अन्य बड़ी योजना थी गरीब कल्याण मेला, जिसे ‘‘बिचौलिया निवारण मेला’’ भी कहा गया था, जिसमें मंत्री या आला अधिकारी सीधे कार्यक्रम कर के बीपीएल परिवारों के लिए सरकारी सहायता को लाभार्थियों के हाथों में सौंपते थे. पिछले तीन साल के दौरान मोदी ने राज्यभर में ऐसे 1,000 मेले आयोजित किए और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को 15,000 करोड़ रु. का सहयोग बांटा.

इस चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी राहत उन 24 सीटों से आई जहां मुसलमान अच्छी संख्या में हैं. मोदी ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं खड़ा किया, इसके बावजूद इनमें से 60 फीसदी सीटों पर उसे जीत मिली है. कच्छ, नवसारी, वडोदरा और भरूच जिलों के कई इलाकों में कई मुसलमानों ने विकास के मुद्दे पर बीजेपी को वोट दिया और इस तरह ‘भेदभावरहित विकास’ की मोदी की नाव को पार लगा दिया.

जैसा कि बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष महबूब अली बावासाहिब कहते हैं, ‘‘उम्मीद से ज्यादा मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया.’’ कांग्रेस को 2007 की 59 सीटों में सिर्फ दो का इजाफा हुआ जबकि राज्य कांग्रेस मुखिया अर्जुन मोढवाडिय़ा और विपक्ष के नेता शक्तिसिंह गोहिल, दोनों ही चुनाव हार गए. बीजेपी को भी एक बड़ा झटका झेलना पड़ा. पार्टी को सबसे बड़ा नुकसान पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष आर.सी. फाल्दू के हारने से हुआ.Modi poster war

हालांकि बीजेपी को 2007 के मुकाबले दो सीटें कम मिली हैं, लेकिन यह ध्यान देने योग्य बात है कि सत्ता विरोधी लहर की आशंका के बावजूद इस बार चुनाव पूरी तरह मोदी के नाम पर लड़ा गया है. उन्होंने साबित कर दिया कि केवल वही छह करोड़ गुजरातियों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, दिल्ली में मौजूद बीजेपी का हाइकमान नहीं.

मोदी की विकास योजनाओं पर फिल्म बना चुके फिल्मकार और पत्रकार मयंक जैन कहते हैं, ‘‘तात्कालिक और दीर्घकालिक मतदान रणनीति दोनों में ही मोदी ने कांग्रेस को पटखनी दी है. उनका 2012 का चुनाव प्रचार तो 2009 में ही शुरू हो गया था जब उन्होंने गरीब कल्याण मेले की शुरुआत की थी.’’

कांग्रेस ने मोदी के सद्भावना अनशन को मुस्लिम समुदाय को आकर्षित करने के एक हथकंडे के रूप में देखा और प्रतिक्रिया में उसने ‘‘सत्कर्म’’ अनशन शुरू कर दिया. लेकिन मोदी 2002 के गुजरात दंगों की जांच कर रही एसआइटी से मिली क्लीन चिट के मद्देनजर अपनी राष्ट्रीय छवि को और ज्यादा समावेशी बनाने की कवायद करने में जुटे थे. इसके अलावा वे इस कार्यक्रम के माध्यम से जिला स्तर पर अपनी मशीनरी को चौकस कर रहे थे तथा बीजेपी व संघ के पुराने संपर्कों को जिंदा कर रहे थे.

उन्होंने जिस तरीके से हर जिले में सद्भावना अनशन आयोजित किया, उसी से उनकी रणनीति का अंदाजा लग जाता है. शाम साढ़े पांच बजे अनशन समाप्त होने के बाद मोदी स्थानीय प्रशासन में कमियों को दूर करने के लिए जिले के अफसरों के साथ बैठक रखते थे और बाद में बीजेपी के प्रमुख जिला कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में इसका जायजा लेते थे. इन बैठकों में जाने से पहले वे सभी जरूरी आंकड़े इकट्ठे करा लेते थे. कांग्रेस और मीडिया जब 18 सितंबर, 2011 को अहमदाबाद में हुए सद्भावना अनशन में मुस्लिम टोपियों पर चर्चा में मसरूफ  थी, उस वक्त मोदी दरअसल सालभर बाद होने वाले चुनावों की तैयारी में जुटे थे.

कांग्रेस के प्रचार में मोदी पर लगातार प्रतिक्रियाएं दी जा रही थीं जबकि मुख्यमंत्री ने अपने विज्ञापन प्रबंधकों और रणनीतिकारों को साफ निर्देश दिए थे कि ऐसा बिल्कुल नहीं लगना चाहिए कि वे और उनकी पार्टी कोई प्रतिक्रिया दे रही है. उन्हें जब भी लगा कि प्रतिक्रिया देने की जरूरत है, उन्होंने संयम रखा और मौका आने पर निशाना साधा. कांग्रेस ने जब घर नू घर (अपना घर) योजना अगस्त में घोषित की और गरीबों के लिए सस्ते मकान बनाने का वादा किया, मोदी चुप रहे लेकिन मतदान से महज एक पखवाड़े पहले अपने घोषणापत्र में उन्होंने वही वादा कर दिया.

पिछले साल मोदी ने अमेरिका में पढ़े कुछ समाजशास्त्रियों के माध्यम से एक निजी सर्वेक्षण करवाया था. तब इस बाबत रिपोर्ट आई थीं कि राज्य में सत्ता विरोधी लहर है. नतीजों में इस बात की सटीक पुष्टि तो नहीं हुई, लेकिन यह बात जरूर सामने आई कि लोगों को मोदी के आत्मप्रचार की खुराक कुछ ज्यादा ही दी जा रही है और कुछ हलकों में उनकी छवि ‘काफी शहरी और कॉर्पोरेट’ किस्म की बन रही है.

यह दरअसल वाइब्रेंट गुजरात अभियान से बने एक माहौल का भी परिणाम था, इसके अलावा कांग्रेस ने भी प्रचार किया था कि उनकी सरकार ‘करोड़पतियों’ की सरकार है. मोदी ने अपनी इस छवि को सुधारने के लिए जनवरी में कदम उठाए, उन्होंने कॉर्पोरेट आयोजनों में जाना छोड़ दिया और बुनियादी स्तर के कार्यक्रमों में लग गए. काफी तेजी से मुख्यमंत्री के पोस्टर और होर्डिंग उतार दिए गए और विपक्ष को इसकी भनक तक नहीं लग सकी.

कांग्रेस ने 2011 के मध्य में ही मोदी के खिलाफ एक हाइ प्रोफाइल प्रचार शुरू कर दिया था जिसमें ‘‘हिसाब दो, जवाब दो’’ जैसे कार्यक्रम की शृंखला भी शामिल थी जिसमें उनके ऊपर भ्रष्टाचार और खराब प्रशासन के मुद्दे पर हमले किए गए थे. इस साल की शुरुआत में कांग्रेस ने सरदार संदेश यात्रा और जुलाई में तटवर्ती इलाकों के लिए किनारा बचाओ यात्रा शुरू की, लेकिन कार्यक्रम जितना जल्दी शुरू हुआ, उतनी ही जल्दी खत्म भी हो गया. मोदी ने जब 11 सितंबर को विवेकानंद युवा विकास यात्रा की शुरुआत की, तब तक कांग्रेस का तरकश खाली हो चुका था.

इस यात्रा में मोदी ने महीने भर के भीतर 150 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा करके सौ से ज्यादा सभाओं को संबोधित किया. इस तरह से पहले कांग्रेस द्वारा किए गए प्रचार का असर पूरी तरह साफ हो गया. सद्भावना मिशन की तरह ही इस यात्रा में भी उन्होंने अपने स्थानीय विधायकों की छवि को दुरुस्त करने का काम किया. इससे उन्हें अधिकतर विधायकों को दोबारा लड़वाने में मदद भी मिली. जैसा कि राजनैतिक विश्लेषक विद्युत ठाकुर कहते हैं, ‘‘जब कांग्रेस का चुनाव प्रचार दिसंबर में पूरे जोर से शुरू हुआ, मोदी प्रचार के दूसरे दौर में पहुंच चुके थे क्योंकि पहले चरण के तौर पर वे विवेकानंद यात्रा समाप्त कर चुके थे.’’ मोदी के चुनाव प्रचार अभियान की टाइमिंग की कोई काट कांग्रेस के पास नहीं थी.

दूसरे चरण के प्रचार में भी मोदी का जोर केंद्र में कांग्रेस का भ्रष्टाचार पर ही रहा और उन्होंने इस बार भी वोटरों से अपील की कि वे गुजरात को ‘‘लुटेरों’’ के हाथ में न सौंपें. वे कांग्रेस को रक्षात्मक बने रहने को मजबूर किए रहे और लगातार तेवर बदलते हुए ‘‘सोनियाबेन’’ और ‘‘राहुल बाबा’’ को उनके हमलों का करारा जवाब देते रहे.

सोनिया ने जब 10 दिसंबर को डाकोर और सिद्धपुर के तीर्थस्थलों से अपना प्रचार शुरू किया, तो मुख्यमंत्री ने इसका अर्थ कुछ इस तरह निकाला, ‘‘कांग्रेस को लगता है कि पावन जगहों से अपना प्रचार शुरू करके वह अपने पापों को धो लेगी, लेकिन चिंता मत कीजिए क्योंकि गुजरात के लोगों ने उसे राज्य से जड़ से उखाड़ देने का निश्चय कर लिया है.’’

राहुल ने जब भिलोडा की जनसभा में महात्मा गांधी को अपना ‘‘वैचारिक गुरु’’ बताया तो मोदी मध्य गुजरात की अपनी रैली में तुरंत उसका जवाब दे बैठे, ‘‘राहुल बाबा, अगर गांधीजी आपके गुरु हैं तो कांग्रेसियों को उनकी दी हुई आखिरी सलाह भी आपको याद रखनी चाहिए-कांग्रेस पार्टी को खत्म कर दो.’’

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि नरेंद्र मोदी ने अकेले दम पर कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.

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