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डार्क मोड

बराक हुसैन का विभाजित अमेरिका

अमेरिकी राष्‍ट्रपति को चार साल कार्यकाल और मिल गया है, उन्‍हें विरासत में ऐसा देश मिला है जो वर्ग, नस्‍ल और लिंग के आधार पर बुरी तरह बंट गया है.

अपडेटेड 1 दिसंबर , 2012

अमेरिका में किसी राष्ट्रपति का दोबारा चुना जाना एक गैर-रोमांचक घटना होती है. क्योंकि इसमें पहले वाली जीत का जोश नहीं होता. बराक हुसैन ओबामा, जैसा कि साफ नजर आता है कि एक अश्वेत व्यक्ति हैं और उनके कीनियाई पिता कभी अमेरिकी नागरिक नहीं रहे. ऐसे शख्स का स्पष्ट तौर पर दूसरी बार राष्ट्रपति चुना जाना किसी महान उपलब्धि की घोषणा से कहीं ज्यादा आने वाली पीढिय़ों के लिए भरोसे का घोषणा-पत्र है. यह खुद पर यकीन जताने का मौका भी है. अमेरिका के कुल 11.8 करोड़ मतदाताओं में से जिन 6.06 करोड़ लोगों ने ओबामा को चुना है, वे उम्मीद के साहस को ही व्यक्त कर रहे थे.

ओबामा के पहले कार्यकाल को फीकी आर्थिक वृद्धि, ऊंची बेरोजगारी और राजनैतिक टकराव की वजह से पंगु हो चुकी विधायिका के लिए जाना जाता है और वहां की 16 फीसदी आबादी अब भी गलती से और घातक रूप में यह सोचती है कि ओबामा मुसलमान हैं. ऐसे में इस अश्वेत राष्ट्रपति को दोबारा चुनकर अमेरिकियों ने यह दिखा दिया है वे पूरे होशो-हवास से वह करने में सक्षम हैं जिसका सपना मार्टिन लूथर किंग ने देखा था.

49 साल पहले, अगस्त के उस दिन उस अमेरिका में जहां तब तक भी अश्वेत को नौकरी, मकान या वोट का अधिकार नहीं था, किंग ने यह उम्मीद जताई थी कि एक दिन उनके बच्चे ''एक ऐसे देश में रहेंगे जहां उनके बारे में कोई धारणा उनकी चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्र के आधार पर बनाई जाएगी.” इन सबके बावजूद (चुनाव के दिन भी बेरोजगारी की दर 7.9 फीसदी थी) ओबामा को फिर से चुनकर अमेरिकियों ने यह दिखा दिया है कि गैर-नस्लीय राजनीति आखिरकार एक सच्चाई बन गई है.

यह उनके देश के इतिहास का एक निर्णायक बिंदु है, ऐसा बिंदु जिसे उनके राष्ट्रपति अपने विजय भाषण में अपने ट्रेडमार्क, बिल्कुल सही उतार-चढ़ाव वाले लहजे, उच्च स्तर की वाक्पटुता के साथ कहते हैं, ''हम उस हद तक विभाजित नहीं हैं जितना कि हमारी राजनीति से लगता है. हम दरअसल उतने कड़वे स्वभाव वाले नहीं है जितना कि जानकार हमारे बारे में मानते या सोचते हैं. हम अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के योग से बड़े हैं...हम एक उदार अमेरिका, विनम्र अमेरिका, एक सहिष्णु अमेरिका में भरोसा करते हैं जिसके दरवाजे किसी प्रवासी की बेटी के सपनों को पूरा करने के लिए खुले हैं, जो हमारे स्कूलों में पढ़ती है और हमारे ध्वज की शपथ लेती है. अमेरिका को वे बंधन ही असाधारण बनाते हैं जिनकी वजह से वह पृथ्वी का सबसे विविधता वाला देश बना हुआ है."US election

कड़े संघर्ष वाले 9 प्रमुख राज्यों में से सात में ओबामा की विजय ने यह साबित किया है कि आबादी की विविधता ही उनके लिए तकदीर बन गई है. उन्होंने अश्वेत से लेकर हिस्पैनिक और कॉलेज शिक्षित महिला वोटरों के रूप में अपने समर्थकों का नया गठजोड़ बनाया है. अमेरिकियों ने टकटकी लगाए देख रही दुनिया को बुलेट से नहीं बल्कि बैलेट से अचंभित और प्रभावित कर दिया है. यह 2012 में फिर हुआ, जो 2008 में हुआ था.

इतिहास तो निश्चित रूप से एक ही बार बन सकता है और चार साल पहले यह बना था, जब पहले अफ्रीकी-अमेरिकी राष्ट्रपति व्हाइट हाउस में पहुंचे थे. टीवी, रेडियो पर और ऑनलाइन खबरों में दुनिया ने इस धरती पर सबसे धनी, सबसे बड़ी सैन्य ताकत वाले देश को खुद को और चार वर्षों के लिए ऐसे व्यक्ति के साथ रिश्ते बनाने का प्रण करते देखा जो परंपरागत स्थापना से अलग सोचता है और 'इस ग्रह को गर्म बनाने वाली विध्वंसक ताकतों’ पर बोलता है. इससे यह उम्मीद जगी है कि आखिरकार अब अमेरिकी राष्ट्रपति ऊर्जा लॉबी की ताकत के सामने सच का आईना रखेंगे.

यह 17 महीनों के सुस्त और कड़वे अभियान का सहज दिखने वाला अंत था, जिस पर दोनों पक्षों ने कुल मिलाकर करीब 3 अरब डॉलर खर्च किए. यह अमेरिकी इतिहास का सबसे खर्चीला और (इस पर विवाद हो सकता है) सबसे कड़वाहट भरा अभियान साबित हुआ जिसके तहत पूरे देश में रिकॉर्ड 20 लाख नकारात्मक राजनैतिक विज्ञापन जारी हुए.

बोस्टन यूनिवर्सिटी में मास कम्युनिकेशन के प्रोफेसर जॉन कैरोल कहते हैं, ''यह राष्ट्रपति चुनाव अभियान सच्चाई की दुनिया से परे था.” और जब चुनाव प्रचार खत्म हुआ और नतीजे आ गए तो सबने राहत की सांस ली. यह 51 वर्षीय ओबामा और 65 वर्षीय मिट रोमनी के बीच बेहद कड़वाहट भरे चुनाव प्रचार का अंत था. जैसा कि ओबामा की तरह के ही शब्दों के एक और जादूगर सैमुअल जॉनसन ने मिल्टन के पैराडाइज लॉस्ट के बारे में लिखा—कोई नहीं चाहता था कि यह अब और आगे जारी रहे.

क्या नतीजे से किसी के लिए स्थिति में बदलाव आएगा? वाशिंगटन के अनुभवी परंपरावादी विशेषज्ञ जॉन गिजी कहते हैं, ''बहुत ज्यादा नहीं.” वे अब्राहम लिंकन के एक उद्धरण का हवाला देते हैं, जब लिंकन ने अपने पैर के अंगूठे में लगी चोट के बारे में कहा था, ''मैं इतना बड़ा हो गया हूं कि रो नहीं सकता इससे इतनी तकलीफ होती है कि हंस नहीं सकता.” यह मौजूदा चुनावी जीत में दिख रही जबरदस्त विडंबना की ओर संकेत है.

इससे एक डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति के लिए नतीजा जस का तस रहा है जो कि अब भी ऐसे कार्यकारी ढांचे के शीर्ष पर हैं जहां उनके लिए हाथ-पैर चलाना मुश्किल होगा. प्रतिनिधिसभा पर रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण है और सीनेट में डेमोक्रेट प्रभावी हैं. अगले हफ्ते वाशिंगटन में जब कांग्रेस चुनाव बाद के विधायी सत्र के लिए जुटेगी, तो दोबारा निर्वाचित राष्ट्रपति और सांसदों के पास उस बात पर आम सहमति बनाने के लिए सिर्फ 49 दिन होंगे जिसे अमेरिका का 'फिस्कल क्लिफ’ कहा जा रहा है.

काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस में सीनियर फेलो एडवर्ड अल्डेन जोर देकर कहते हैं, ''फिलहाल शेष दुनिया के लिए जो बात मायने रखती है, वही अमेरिका के लिए भी मायने रखती है, एक मजबूत अर्थव्यवस्था और आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी बने रहना. क्योंकि हम पिछले 80 वर्ष की सबसे बुरी मंदी से बाहर निकलने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं.”

साफ  है कि ओबामा के लिए अपने दूसरे कार्यकाल में विदेश नीति के मामले में पहली प्राथमिकता अपने घरेलू 'फिस्कल क्लिफ’ या वित्तीय घाटे को कम करने की दिशा में आगे बढऩा होना चाहिए. अमेरिकी इमिग्रेशन और व्यापार नीति विशेषज्ञ अल्डेन ने जोर दिया कि 'दूसरी पारी में ओबामा पहले कार्यकाल के ओबामा के रास्ते पर ही आगे चलेंगे’ और प्रशांत पार साझेदारी वार्ताओं तथा विश्व व्यापार संगठन के बहुपक्षीय सेवा समझौतों के मुताबिक भारत को खुदरा बाजार और सर्विस सेक्टर को खोलने के लिए बाध्य करने की कोशिश करेंगे. क्या भारत अमेरिकी राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल से यही उम्मीद कर सकता है जो अपने डेस्क पर महात्मा गांधी का चित्र रखते हैं और अपने एशियाई 'केंद्र बिंदुओं’ के साथ तोलते हुए अपनी विदेश नीति को नए सिरे से संतुलित करना चाहते हैं?

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में इंडिया प्रोजेक्ट की डायरेक्टर तन्वी मदान कहती हैं कि द्विपक्षीय संबंध काफी परिपक्व हो चुके हैं और अब वे एक समान स्तर पर आ गए हैं. चार साल पहले हिलेरी क्लिंटन पर ओबामा के निंदित और जल्दबाजी में दिए कटाक्ष को याद करते हुए वे कहती हैं, ''हम यह कह सकते हैं कि 2012 के चुनाव प्रचार में 2008 के मुकाबले भारत से आउटसोर्सिंग पर कम नकारात्मक बयान देखे गए.”

सीमा पार पाकिस्तान की बात करें तो यह मानना उचित होगा कि वहां ओबामा के फिर से चुने जाने पर गहरी निराशा हुई होगी. ओबामा वही राष्ट्रपति हैं जिन्होंने ओसामा बिन लादेन को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करते हुए ऐबटाबाद में चुपके से सील टीम सिक्स को भेजा था. चुनाव के एक दिन पहले बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के एक जनमत सर्वेक्षण में यह पाया गया था कि रोमनी की जीत की तमन्ना रखने वाले सिर्फ दो देश पाकिस्तान और इज्राएल हैं. लेकिन पाकिस्तानी चिढ़ उसे बुनियादी सच से दूर नहीं ले जा सकती.

रश्मि रौशन लाल वाशिंगटन डी.सी. में पत्रकार हैं.

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