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डार्क मोड

खंड-खंड समाज: महिलाओं की रहनुमाई

गर्भपात पर मिट रोमनी के रूढि़वादी विचारों के चलते भी महिलाएं बराक ओबामा की समर्थक बनीं.

अपडेटेड 1 दिसंबर , 2012

राष्ट्रपति बराक ओबामा का सबसे पसंदीदा शब्द है—उम्मीद. चार साल पहले वे उम्मीद और बदलाव के नारे के साथ सत्ता में आए थे. आज एक बार फिर अमेरिकी जनता ने उन्हें इस नारे को 'आगे बढ़ाने’ का मौका दिया है. आगे यानी 'फॉरवर्ड’, 2012 के चुनाव में खुद ओबामा का नारा था. शिकागो के मैकॉर्मिक प्लेस में ओबामा ने कहा था, ''हमारे भविष्य को लेकर मैं इतना आशावादी कभी नहीं रहा और मैं आपसे इस उम्मीद को बनाए रखने को कह रहा हूं

कांटे की टक्कर वाली भविष्यवाणियों को धत्ता बताते हुए ओबामा ने 2012 का चुनाव जीतकर अपनी उम्मीद कायम रखी है. इस उम्मीद को जगाने में अमेरिकी आबादी में 52 फीसदी हिस्सा रखने वाली महिला मतदाताओं ने उनकी मदद की है. एग्जिट पोल के आंकड़ों के मुताबिक, महिला मतदाताओं के मामले में ओबामा की मिट रोमनी पर दो अंकों की बढ़त है.

जाहिर है, ज्यादातर कामयाब पुरुषों में लोगों को खींचने का गुण होता है और ओबामा के साथ जुड़ी महिलाओं की ताकत इसमें चार चांद लगाती है. अपने संबोधन में ओबामा ने अपनी हमसफर मिशेल के बारे में कहा था, ''आज मैं जो भी हूं, वह उस महिला के बगैर नहीं होता जिसने 20 साल पहले मुझसे शादी करने का फैसला किया था. मैं इसे सबके सामने कहना चाहता हूं. मिशेल, मैंने कभी तुमसे इतनी मुहब्बत नहीं की थी. देश की पहली महिला के बतौर पूरे अमेरिका से तुम्हें मिलने वाले प्यार से ज्यादा गौरवशाली क्षण मेरे लिए कभी नहीं रहा.”

कोलंबस की ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में विमेन, जेंडर ऐंड सेक्सुअलिटी स्टडीज विभाग की डॉ. वेंडी स्मूथ का कहना है कि महिला मतदाता आम तौर पर उन उम्मीदवारों को पसंद करती हैं जो देखने में सहज होते हैं. यूनिवर्सिटी में हुई एक चुनावी रैली में श्रोताओं के बीच से एक महिला ने चीखकर कहा था, ''मैं तुमसे प्यार करती हूं.”

ओबामा ने जवाब दिया, ''मैं भी करता हूं, लेकिन मुझे आपके वोट की जरूरत है.” इस बार के चुनाव में महिला मतदाताओं की दो चिंताएं थीं. पहली चिंता नौकरी को लेकर थी जिसके जाने का डर समूचे परिवार पर असर डाल सकता था. दूसरी चिंता अपनी देह पर अधिकार और आत्मसम्मान से जुड़ी थी कि आने वाली सरकार उन्हें यह अधिकार देगी या नहीं. रिपब्लिकन उम्मीदवार के गर्भपात विरोधी नजरिए ने महिला मतदाताओं को उनसे दूर कर दिया.

अंत तक आते-आते ओबामा और रोमनी के बीच का फर्क बुनियादी मुद्दों पर जाहिर होने लगा. रोमनी ने सार्वजनिक तौर पर कह डाला कि सत्ता में आते ही वे नियोजित मातृत्व के लिए सरकारी अनुदान को बंद कर देंगे. ओबामा के इस पसंदीदा कार्यक्रम के तहत महिलाओं को गर्भपात के लिए सरकार से मदद मिलती है जो सबसे बड़ी सरकारी सहायता में से एक है. ओहायो के डेलावायर में रोमनी ने कहा, ''मैंने बार-बार कहा है कि मैं जीवन का समर्थक हूं. मैं वैसा ही राष्ट्रपति भी रहूंगा.

सत्ता में आते ही तत्काल मैं नियोजित मातृत्व के लिए सरकारी अनुदान को बंद कर दूंगा. यह मेरे बजट का हिस्सा नहीं होगा.” रोमनी अब जब अपनी हार के कारणों का मंथन करेंगे, तो उन्हें समझ में आएगा कि उन्होंने इसी से अपनी संभावना पर पानी फेर दिया. इस चुनाव में करीब साढ़े पांच करोड़ अविवाहित महिलाएं मतदाता थीं और रोमनी के इन्हीं विचारों के चलते वे ओबामा के खेमे में आ गईं.

मतदान से एक दिन बाद इन्वेस्टर्स बिजनेस डेली और टीआइपीपी के संयुक्त सर्वे में पाया गया कि 63 फीसदी एकल महिलाएं ओबामा के पक्ष में थीं जबकि रोमनी के पक्ष में ऐसी 23 फीसदी महिलाएं थीं. सीएनएन के एक एग्जिट पोल में पाया गया कि ओबामा के साथ ऐसी 55 फीसदी महिलाएं थीं जबकि 44 फीसदी ने रोमनी को वोट दिया.

शिकागो के हाइड पार्क स्थित एक मतदान केंद्र में एक 42 वर्षीय एशियाई-अमेरिकी महिला शेरी थॉमस ने कहा, ''मैं इस बात को लेकर चिंतित थी कि अगर रोमनी जीत गए तो क्या होगा. मुझे नहीं लगता कि मेरे और मेरे पति के अलावा किसी और को यह तय करने का अधिकार है कि मैं अपनी देह के साथ क्या करती हूं और क्या नहीं.”

रोमनी के रिपब्लिकन साथियों ने महिलाओं को और दूर करने का काम किया. मिसूरी के टॉड अकिन और इंडियाना के रिचर्ड मुर्डोक ने बलात्कार पर अपने 'संवेदनहीन’ नजरिए से लोगों को चौंका दिया. जाहिर है, महिलाओं के गुस्से से उनकी यूएस सीनेट की कुर्सी छिन गई और वे चुनाव हार गए. 

ऐसा नहीं है कि ओबामा की जीत में सिर्फ  महिलाओं का हाथ है. 2008 में ओबामा को महिलाओं, युवाओं, अफ्रीकी-अमेरिकी, लैटिनों और एशियाई मूल के मतदाताओं ने व्हाइट हाउस पहुंचाया था. इस चतुरंगी गठजोड़ को इस बार थामे रहना मुश्किल था क्योंकि उम्मीद का उनका नारा बदहाल अर्थतंत्र की वास्तविकताओं से बेमेल था. इसके बावजूद ओबामा के प्रचार तंत्र ने इन्हें जोडऩे में काफी अहम योदगान दिया. न्यूयॉर्क टाइम्स के एक एग्जिट पोल के मुताबिक, इस बार 93 फीसदी अफ्रीकी और 70 फीसदी से ज्यादा हिस्पानी व एशियाई मूल के लोगों ने ओबामा में अपनी आस्था जताई.

पिछली बार के मुकाबले असली बदलाव श्वेत नौकरीपेशा अमेरिकियों के वोट में आया जो 2008 में 41 फीसदी था जबकि इस बार 36 फीसदी रहा. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अपने चुनाव क्षेत्र ओहायो में उन्होंने ऑटो क्षेत्र को 85 अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज देकर 10 लाख से ज्यादा कामगारों की नौकरी बचा ली थी. इनमें अधिकतर श्वेत अमेरिकी थे और इन्होंने ओबामा को उसका फल दिया.

अब अमेरिका की आगे की राह क्या होगी? पिछले चुनाव में ओबामा के वोटर रहे लेकिन इस बार उनसे मुंह फेर लेने वाले 25 वर्षीय कानून के छात्र निकोलस बार्सिलोना कहते हैं, ''मैंने रोमनी को इसलिए वोट दिया क्योंकि मुझे लगा, फिलहाल देश को उनकी जरूरत है. देश विचारधारात्मक विभाजन का शिकार हो चुका है जहां रोजगार जैसे असली मुद्दे गायब हैं.”

मोटे तौर पर इस बार भी यह युवा वोट ओबामा के साथ ही रहा, हालांकि जानकारों को लगता है कि कई पेशेवर युवा रोमनी के 1.2 करोड़ रोजगार के वादे में फंस गए. ओबामा के सामने असली चुनौती अपनी जीत से पैदा हुए यथास्थितिवाद के एहसास को इन युवाओं में पैठने से रोकने की है.

रोजगार सृजन के रोमनी के वादे के बावजूद एग्जिट पोल दिखाते हैं कि हर चार में से तीन वोटर का कहना था कि ओबामा की नीतियां मध्यवर्ग या गरीबों की मदद करेंगी जबकि 54 फीसदी का मानना था कि रोमनी की नीतियां अमीरों के पक्ष में हैं. कई अर्थों में यह चुनाव दो हिस्सों में बंट चुके अमेरिका के बीच था जिसमें ऐसा लगता है कि एक हिस्से की जीत हुई है. 

ओबामा को दोबारा राष्ट्रपति चुनकर अमेरिकियों ने आस्था जताई है कि वे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाएंगे. खुद ओबामा उन महिलाओं, युवाओं और अफ्रीकी व लातिनी मूल के लोगों को निराश नहीं करना चाहेंगे जिन्होंने अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति को दूसरा मौका दिया है.

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