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डार्क मोड

द. एशियाई प्यादों में फेरबदल का मौका

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के मद्देनजर भारत के साथ अमेरिकी रिश्ते बदलेंगे.

अपडेटेड 1 दिसंबर , 2012

राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के दोबारा निर्वाचित होने का मतलब है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग अमेरिकी विदेश नीति की शीर्ष प्राथमिकता रहेगी. ओबामा पाकिस्तान और यमन में ड्रोन (मानव रहित विमानों से) हमले जारी रखेंगे और शायद उत्तरी अफ्रीका में जंग के नए मोर्चे खोल दें. ओबामा के लिए पाकिस्तान सबसे मुश्किल द्विपक्षीय संबंध रहेगा, जिसे उन्हें साधना ही होगा. वे शायद पाकिस्तान को नियंत्रित करने की दिशा में काम करेंगे. अफगानिस्तान पर पहले की अपेक्षा अधिक सहयोग की वजह से भारत-अमेरिका संबंध और मजबूत होंगे.

2008 के अपने पहले निर्वाचन से ही ओबामा ने आतंकवाद को अपनी विदेश नीति की सर्वोच्च प्राथमिकता बना रखा है. हालांकि उन्होंने आतंकवाद के आरोपियों को यातना देने पर प्रतिबंध लगा दिया है और ग्वांटानामो जेल को बंद करने की कोशिश की है लेकिन उन्होंने वैश्विक जिहाद पर लगातार हमले जारी रखे हैं.

2009 के शुरू में मैंने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अल क़ायदा पर उनकी नीति की समीक्षा के एक कार्यक्रम की अध्यक्षता की थी और हमने पाकिस्तान में अल क़ायदा को ''भंग करने, तितर-बितर करने और पराजित करने” और उसे अफगानिस्तान में फिर से घुसने से रोकने की अमेरिकी नीति बनाई थी. हालांकि उस दिशा में काफी प्रगति हुई है लेकिन काम अभी खत्म नहीं हुआ है.

पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंध परेशान करने वाले और पेचीदा रहे हैं. इस शताब्दी में एक ओर वाशिंगटन पाकिस्तान के साथ बहुत उदार और दानशील रहा है. 9/11 के बाद से अमेरिका ने सैनिक और आर्थिक मदद के तौर पर इस्लामाबाद को 25 अरब डॉलर दिए हैं. सैनिक सहायता में 18 एफ-15 युद्धक विमान, 500 अत्याधुनिक मध्यम दूरी के हवा से हवा में मार करने वाले मिसाइल (एएमआरएएएम), छह सी-130 मालवाहक विमान, 20 कोबरा हमलावर हेलिकॉप्टर और एक पेरी क्लास का युद्धक विमान शामिल हैं.

कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस के अनुसार इनमें से आधी सहायता जॉर्ज बुश के जमाने में दी जा चुकी थी जबकि बाकी आधी ओबामा के जमाने में दी गई. 2001 के बाद से इज्राएल को छोड़कर किसी दूसरे देश को इतनी अमेरिका सहायता नहीं मिली है.

दूसरी तरफ अफगानिस्तान में पाकिस्तान और अमेरिका एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं. कई मायनों में हम अफगानिस्तान में प्रॉक्सी युद्ध लड़ रहे हैं. अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, नाटो और 40 से भी अधिक देशों के सैनिक काबुल में निर्वाचित करजई सरकर की मदद कर रहे हैं. और भारत भी ऐसा ही कर रहा है. पाकिस्तान सिर्फ मौखिक तौर पर करजई सरकार का समर्थन करता है जबकि वह उसके दुश्मन अफगान तालिबान को सहयोग दे रहा है.

आइएसआइ तालिबान नेतृत्व को क्वेटा, कराची और वजीरिस्तान में पनाह देती है, उसके लड़ाकों को प्रशिक्षण देती है और अफगान सरकार और नाटो के ठिकानों पर योजनाबद्ध हमलों में उनकी मदद करती है. हजारों गिरफ्तार तालिबान लड़ाकों से नाटो की पूछताछ में यह बात सामने आई है कि विद्रोह की सफलता में पाकिस्तानी मदद की बड़ी भूमिका है.

अमेरिका अल क़ायदा और पाकिस्तान के भीतर उनसे जुड़े आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ ड्रोन युद्ध भी कर रहा है, हालांकि पाकिस्तानी संसद और विदेश मंत्रालय ने साफ तौर पर ड्रोन हमले बंद करने की अपील की है. हर दिन अमेरिकी ड्रोन पाकिस्तान के अंदर संभावित ठिकानों की निगरानी करते हैं.

2004 से 30 सितंबर, 2012 के बीच ड्रोन ने पाकिस्तान में 346 हमले किए, जिनमें से करीब 300 ओबामा की नजरों के सामने हुए. ड्रोन ने अल क़ायदा के नेतृत्व को खत्म कर दिया है लेकिन ये हमले लश्कर-ए-तैयबा और इमरान खान समेत पाकिस्तानी नेताओं के लिए अमेरिका विरोधी प्रदर्शनों के आधार बन गए हैं.

और फिर ऐबटाबाद का साया भी तो है. आखिर किस तरह बेहद महत्वपूर्ण लक्ष्य नंबर एक ओसामा बिन लादेन पांच साल से अधिक समय तक पाकिस्तान की मुख्य सैन्य एकेडमी से सिर्फ 800 मीटर के फासले पर छुपा रह सकता है? एक पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा कि यह एक 'अनूठा संयोग’ हो सकता है लेकिन क्या इस पर विश्वास किया जा सकता है? जिस नेवी सील हमले में अल क़ायदा नेता मारा गया था उसके कुछ दिनों बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने लिखा कि ''जनरलों को वास्तव में पता था और वह ये भी जानते थे कि वह बच जाएगा. या तो यह पाकिस्तानी खूफिया एजेंसी आइएसआइ का निकम्मापन था या फिर उसकी मिलीभगत लेकिन दोनों हाल में यह बात ठीक नहीं है.

अफगानिस्तान में 2014 में नाटो अफगान नेतृत्व को बागडोर सौंप देगा. यह अमेरिका-पाकिस्तान के संबंधों के लिए बड़ी चुनौती होगी और भारत के लिए इसके काफी निहितार्थ होंगे. ओबामा अफगानिस्तान के साथ दीर्घकालीन सैन्य भागीदारी के लिए प्रतिबद्ध हैं जिसके तहत वे अपने 20,000 से अधिक सैनिक और सलाहकार अफगानिस्तान में ही रखना चाहते हैं ताकि ड्रोन अड्डों की हिफाजत हो और अफगान सेना को मदद भी दी जा सके.

अगर पाकिस्तान तालिबान को काबुल पर अपना दबाव बढ़ाने और हेलमंद और कांधार प्रांतों में नाटो फौज द्वारा बहुत मुश्किल से जीते हुए इलाकों को वापस लेने के लिए उकसाता है तो इसका मतलब होगा कि पाकिस्तान अमेरिका को दक्षिण एशिया से बाहर निकालने के लिए प्रतिबद्ध है. ऐसी स्थिति में कई अमेरिकी अफगानिस्तान में अमेरिका की पराजय के लिए पाकिस्तान पर इल्जाम लगाएंगे और ऐसा करने के लिए उनके पास उचित कारण भी होगा.

भारत को अफगान युद्ध में दूर तक ले जाया जाएगा. भारत पहले से ही काबुल का समर्थक है और 2001 से अब तक दो अरब डॉलर की सहायता दे चुका है. भारत तालिबान विरोधी नॉर्दर्न एलाएंस का एक बड़ा क्षेत्रीय मित्र देश हो सकता है. अमेरिका-पाकिस्तान प्रॉक्सी या छद्म युद्ध भारत-अमेरिका-पाकिस्तान प्रॉक्सी युद्ध की शक्ल भी अख्तियार कर सकता है. अपने पहले कार्यकाल में अफगानिस्तान में भारत के सहयोग को लेकर ओबामा जरा संकोच में थे. लेकिन दूसरे दौर में इसमें शायद बदलाव आएगा.

पाकिस्तान के पास एक बेहतर विकल्प भी है. वह अल क़ायदा से पूरी तरह अलग होकर तालिबान पर अपने रसूख का इस्तेमाल करे और काबुल के साथ गंभीर राजनैतिक बातचीत करने के लिए तालिबान को प्रोत्साहित करे. अब यह पाकिस्तान की पसंद पर निर्भर करता है कि वह ऐसा करेगा या नहीं.

अगर ऐसा नहीं होता है तो अमेरिका और भारत को एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना होगा ताकि पाकिस्तान और उसकी फौज को नियंत्रण में रखा जा सके. पहले से ही यह संकेत मिल रहे हैं कि दोनों अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर एक-दूसरे के साथ हैं. पिछली भारत-अमेरिकी सैन्य बातचीत में अफगानिस्तान के भविष्य पर काफी लंबी बात हुई थी जो दोनों के संयुक्त बयान से भी स्पष्ट है. ओबामा के दूसरे कार्यकाल से ज्यादा की उम्मीद है.

ब्रूस रिडेल सीआइए के पूर्व समीक्षक हैं और ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की विदेश नीति में वरिष्ठ फेलो हैं.

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