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ममता की विदाई के बाद उल्टी गिनती शुरू

ममता बनर्जी की समर्थन वापसी से कांग्रेस को न केवल नए सहयोगी की दरकार रहेगी, बल्कि सुधारों के उत्साह पर भी फिरेगा पानी.

अपडेटेड 1 अक्टूबर , 2012

इस महत्वपूर्ण लड़ाई में ममता बनर्जी ने अपने सेलफोन को हथियार की तरह लहराया. कोलकाता के टाउन हॉल में 18 सितंबर को मीडियाकर्मियों से खचाखच भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता ने कहा कि उन्होंने सरकार द्वारा एफडीआइ की इजाजत देने के कुछ समय बाद ही 14 सितंबर को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक एसएमएस भेजा था.

सरकार ने चार क्षेत्रों-रिटेल, एविएशन, गैर-न्यूज ब्रॉडकास्टिंग और पावर एक्सचेंजों में एफडीआइ की राह आसान करने की घोषणा की थी. ममता ने बताया कि उनके एसएमएस का कोई जवाब नहीं मिला. उन्होंने अपने परंपरागत नाटकीय अंदाज में आगे कहा, ‘‘आम तौर पर मैं व्यक्तितगत संवाद के बारे में नहीं बताती, लेकिन आज मैं खुलासा कर रही हूं कि मैंने चार दिन पहले सोनिया जी को एक मैसेज भेजकर कहा था कि मैं केंद्र सरकार के निर्णय से सहमत नहीं हूं.

लेकिन मुझे इसका कोई जवाब नहीं मिला. मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था. कोई यदि मेरा सिर काट दे और फिर भी साथ रहने को कहे तो ऐसा नहीं चल सकता.’’ उनके फैसले को लेकर कोई भ्रम नहीं था. तृणमूल कांग्रेस के सभी छह मंत्रियों ने शुक्रवार 21 सितंबर को प्रधानमंत्री को इस्तीफा सौंप दिया साथ ही टीएमसी ने समर्थन वापसी की भी घोषणा कर दी.UPA

हालांकि कांग्रेस ऊपर से बेफिक्र दिखने की कोशिश कर रही है. केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने टीएमसी मंत्रियों के इस्तीफे के बाद कहा कि सरकार के पास पर्याप्त सांसद हैं, वहीं कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि यूपीए सरकार अल्पमत में नहीं है. जाहिर है सरकार को समाजवादी पार्टी और बीएसपी से मिल रहे समर्थन के जारी रहने का अनुमान है.

लेकिन 19 सांसदों वाले सबसे बड़े सहयोगी दल टीएमसी के समर्थन वापस लेने के बाद अब सरकार कभी सहज नहीं हो सकती. समर्थन वापसी से एक दिन पहले 10 जनपथ के अपने आवास पर सोनिया ने तत्काल ही अहमद पटेल, ए.के. एंटनी और पी. चिदंबरम जैसे वरिष्ठ कांग्रेसियों के साथ बैठक की. वहां का माहौल ज्यादा यथार्थवादी था. उनमें से एक नेता ने कैबिनेट सहयोगी को एसएमएस किया, ‘‘यह अंत की शुरुआत है. ’’

कांग्रेस कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग का मिजाज पढऩे में पूरी तरह से विफल रही. उसने ममता बनर्जी की 14 सितंबर की धमकी को ज्यादा तवज्जो नहीं दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार रिटेल में एफडीआइ लाने, एलपीजी सब्सिडी सीमित करने और डीजल की कीमत में 5 रु. की वृद्धि के निर्णय को 72 घंटे के अंदर वापस ले. कांग्रेस के प्रबंधकों को यह गलतफहमी थी कि वे उसी तरह से गीदड़-भभकी दे रही हैं जैसा कि उन्होंने जुलाई में राष्ट्रपति चुनावों के दौरान दिया था और बाद में म्याउं-म्याउं करते हुए सही रास्ते पर आ गई थीं.

वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने 17 सितंबर को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिना कुछ सोचे उनके बयान को झल्लाहट भरा बता दिया और एफडीआइ पर निर्णय को वापस लेने से इनकार किया.

कांग्रेस को लगता था कि ममता ज्यादा से ज्यादा यही कर सकती हैं कि अपने मंत्रियों से इस्तीफा दिलवा दें और बाहर से समर्थन कर दें. कांग्रेस के एक महासचिव तो एक लतीफा सुना रहे थे कि इससे रेल मंत्रालय को उनके अनर्थकारी चंगुल से बाहर निकाला जा सकेगा. लेकिन घटनाक्रम बदला और कांग्रेस को पूरे देश के साथ ही राष्ट्रीय टीवी चैनलों से बनर्जी के समर्थन वापसी के निर्णय की जानकारी मिली.

टीएमसी प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ने अपने इरादों की गंभीरता जाहिर करने के लिए हरसंभव कोशिश की थी. वे कोलकाता के 14 से 17 सितंबर तक के चार दिन के दौरे पर गए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से तीन बार मिलीं. उन्होंने 15 सितंबर को राज्यपाल एम.के. नारायणन द्वारा आयोजित डिनर के दौरान मुखर्जी से अकेले में मुलाकात करने का अनुरोध किया. उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने मुखर्जी से कहा कि उन्हें हाल के घटनाक्रम से ‘बहुत ज्यादा तकलीफ’ पहुंची है और उनसे सरकार तक उनकी भावना को पहुंचाने की बात कही.

क्षति नियंत्रण
ममता को मनाने की कोशिश नाकाम
UPA
कांग्रेस ने 19 सितंबर के बाद नुकसान की भरपाई की कोशिश शुरू की. चिदंबरम ने दिल्ली में पत्रकारों से कहा, ‘‘हमने उनसे चार दिन पहले ही बात करने की कोशिश की.’’ कांग्रेस सूत्रों ने ऐसे कई फोन कॉल का विवरण बताना शुरू कर दिया कि चिंदबरम, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया और उनके राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने ममता को कितनी बार फोन किया. लेकिन टीएमसी प्रमुख का दावा है कि सरकार ने बस 14 सितंबर को कैबिनेट की बैठक से कुछ घंटे पहले ही रिटेल में एफडीआइ पर उन्हें मनाने की कोशिश की थी, जबकि उस समय वे डीजल की कीमत में वृद्धि के खिलाफ रैली की तैयारियों में व्यस्त थीं.

उनका कहना था कि उनके समर्थन वापसी की घोषणा के बाद किसी ने बात नहीं की. मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआइ तो एजेंडे में ही शामिल नहीं था, जबकि एविएशन सेक्टर में विदेशी एयरलाइंस को निवेश की इजाजत देने के लिए 13 सितंबर को मंत्रियों के बीच कैबिनेट नोट जारी किया गया था.

लेकिन प्रधानमंत्री ने एक और सहयोगी दल को अपनी योजना की जानकारी दी थी. उन्होंने 12 सितंबर को ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता शरद पवार से कहा था कि 14 सितंबर को कैबिनेट की बैठक में शामिल होने के लिए वे दिल्ली में उपस्थित रहें क्योंकि उस दिन ‘‘प्रस्तावित रिटेल में एफडीआइ सहित कई और महत्वपूर्ण फैसले किए जाएंगे.’’ मनमोहन जानते थे कि सुधार समर्थक पवार उनका साथ देंगे.

प्रधानमंत्री जब 22 अगस्त को यूपीए की समन्वय समिति की बैठक में रिटेल में एफडीआइ का प्रस्ताव लेकर आए थे, उस समय ममता मौजूद थीं. तब ममता ने कहा था कि वे इस मुद्दे पर बाद में उनसे अलग से बात करेंगी. इसके बाद 14 सितंबर की दोपहर को पीएमओ के अधिकारियों ने ममता से उनके मोबाइल और लैंडलाइन नंबर पर संपर्क साधने की कोशिश की. उन्होंने फोन नहीं उठाया. इसके बाद प्रधानमंत्री ने केंद्रीय रेल मंत्री मुकुल रॉय को फोन किया, जो उस समय दिल्ली में ही थे.

रॉय ने प्रधानमंत्री से कहा कि वे बैठक में नहीं आ पाएंगे क्योंकि उन्हें उसी शाम को कोलकाता में मुखर्जी के नागरिक अभिनंदन में शामिल होना है. इसके बावजूद मनमोहन आक्रामक सुधारों की शृंखला शुरू करने से नहीं हिचके. उन्होंने अपनी छवि बचाने के लिए सरकार को दांव पर लगा दिया. जैसा कि टीएमसी के एक सांसद ने व्यंग्यपूर्वक कहा, ‘‘ यह अमेरिकी मीडिया द्वारा प्रधानमंत्री पर किए जा रहे हमले की प्रतिक्रिया है.’’

योजना आयोग की बैठक के बाद मनमोहन अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों चिदंबरम, पवार, कमलनाथ और सुशील कुमार शिंदे से मिले. प्रधानमंत्री ने उन्हें बताया कि उन्होंने ममता से बात करने की कितनी कोशिश की है. उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें यह पता है कि शुक्रवार की शाम को कैबिनेट की बैठक खत्म होने तक रॉय दिल्ली में ही थे, जबकि उन्होंने कहा था कि वे कोलकाता में रहेंगे.

चिदंबरम ने कहा कि उन्होंने पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने भी फोन नहीं उठाया. कमलनाथ ने कहा कि ममता का यह निर्णय राजनैतिक है. उन्होंने कहा, ‘‘ममता का एजेंडा चुनाव है. वे अपना मन नहीं बदलने वाली हैं. ’’

प्रधानमंत्री ने एक बार फिर 16 सितंबर को शाम 7 बजे और 8.30 बजे ममता से फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन उनका यह प्रयास बेकार साबित हुआ. इसके बाद 17 सितंबर को सोनिया ने ममता से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

नए सहयोगियों की तलाश
मायावती-मुलायम बनाएंगे सरकार? 
कांग्रेस में अब आम राय है कि इस समय बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की नेता मायावती और समाजवादी पार्टी (सपा) नेता मुलायम सिंह को एक-दूसरे के सामने करने का दांव लगाना चाहिए. कांग्रेस को ऐसा लगता है कि इनमें कोई भी फिलहाल चुनाव नहीं चाहता. कांग्रेस के एक महासचिव कहते हैं, ‘‘मायावती भी सरकार में शामिल होने को राजी हो सकती हैं. वे इस समय केंद्र या राज्य कहीं पर भी सत्ता में नहीं हैं. ’’ सोनिया ने कांग्रेस शासित सभी राज्यों से कह दिया है कि वे एक साल में सब्सिडी वाले छह सिलिंडर की जगह नौ सिलिंडर दें. एक केंद्रीय मंत्री ने खुलासा किया, ‘‘हम डीजल की कीमत वृद्धि को भी वापस लेते हुए 5 रु. की जगह 3 रु. कर सकते हैं.’’

लेकिन फिलहाल मायावती और मुलायम, दोनों कांग्रेस को खूब पसीना छुड़ा रहे हैं. मायावती ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी यूपीए की ‘जन विरोधी’ नीतियों पर 9 अक्तूबर को अंतिम निर्णय लेगी. मुलायम ने 19 सितंबर को कहा, ‘‘अब तो कांग्रेस को होश में आ जाना चाहिए. उसने लोगों को महंगाई और भ्रष्टाचार के अलावा और दिया ही क्या है.’’

यह सरकार के एक संभावित साझेदार की भाषा तो नहीं लगती, लेकिन ममता से उनकी करीबी के बावजूद कांग्रेस की उम्मीद बरकरार है. ममता 12 सितंबर को कोलकाता में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिली थीं. सूत्रों के अनुसार, इस दौरान बनर्जी ने केंद्र सरकार की ‘‘जन विरोधी’’ नीतियों और बढ़ते भ्रष्टाचार से लड़ाई में उनका सहयोग मांगा था.

कांग्रेस के लगातार सहयोगी रहे डीएमके जैसे दल भी इस बात से खफा हैं कि डीजल कीमत में बढ़ोतरी के बारे में उनसे मशविरा नहीं किया गया. सपा नेता रामगोपाल यादव कहते हैं, ‘‘कांग्रेस तो ऐसे व्यवहार कर रही है जैसे खुद उसके पास बहुमत हो. ’’ ज्यादातर सहयोगियों का भी ऐसा ही मानना है.

ममता ने कहा था, ‘‘मुझे एक समन्वय बैठक के लिए बुलाया गया था, लेकिन यह एक साधारण बैठक थी. ’’ लेकिन जब डीएमके ने घोषणा की कि कीमत वृद्धि पर 20 सितंबर को होने वाले ‘भारत बंद’ में सपाए बीजेपी और वाम दलों के साथ वह भी शामिल होगा, तो मनमोहन ने एक झटके में कई दुश्मनों को अविश्वसनीय रूप से साथ कर दिया: डीएमके और एआइडीएमके, टीएमसी और वामदलए वामदल और बीजेपी, सपा और बीजेपी.

बीजेपी ने फिलहाल यह निर्णय लिया है कि वह चुपचाप यह इंतजार करेगी कि यूपीए सरकार खुद अपने अंतर्विरोधों के बोझ से ही छटपटा कर दम तोड़ दे. लालकृष्ण आडवाणी ने 19 सितंबर को कहा, ‘‘टीएमसी के समर्थन वापस लेने के बाद अब सरकार के ढहने में बस कुछ ही समय बचा है.’’

भारत बंद के बाद बीजेपी राष्ट्रपति मुखर्जी से मिलकर यह अनुरोध करेगी कि ‘‘मल्टी ब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआइ, के सरकार के निर्णय पर चर्चा करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए. आडवाणी ने याद दिलाया कि मुखर्जी ने सदन के नेता के रूप में 7 दिसंबर, 2011 को लोकसभा में कहा था कि बिना आम राय बने सरकार एफडीआइ पर आगे नहीं बढ़ेगी.

भरोसे का उठा जनाजा
बड़े पैमाने पर सुधार दूर की कौड़ी 
उस भावना को फिर से जगाने की प्रधानमंत्री की बेकरारी का क्या होगा, जिससे उपभोक्ता और निवेशक का विश्वास पैदा होता है, क्या उनका यह निर्णय सरकार को मौजूदा अनिश्चितता से बचा सकेगा. 15 सितंबर को योजना आयोग की बैठक में (जिसमें 2012 से 2017 के बीच 8.2 फीसदी वृद्धि हासिल करने का लक्ष्य तय किया गया.

प्रधानमंत्री ने आर्थिक वृद्धि के तीन तरह के परिदृश्यों को सामने रखकर अपने अंदर के सिंह को दिखा दिया. पहले परिदृश्य को उन्होंने ‘‘मजबूत समावेशी वृद्धि’’ (8.2 फीसदी), दूसरे को ‘अपर्याप्त पहल’ (6 से 6.5 फीसदी) और तीसरे को ‘नीतिगत अड़चन’ (मौजूदा 5 फीसदी जैसी वृद्धि) बताया. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘मुझे विश्वास है कि हम लोग पहले परिदृश्य को हासिल कर सकते हैं. इसके लिए कुछ साहस और कुछ जोखिम लेने की जरूरत होगी. ’’

सेंसेक्स खुशी से उछल पड़ा और एक दिन में ही इसमें 400 अंकों की बढ़त हो गई. लंबे समय से शासन की निष्क्रियता की शिकायत कर रहे उद्योग-व्यापार जगत ने इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई. लेकिन इस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री न सिर्फ एक महत्वपूर्ण सहयोगी को, बल्कि आम आदमी का समर्थन भी खो सकते हैं, जिसने उन्हें इस कुर्सी पर बिठाया है. डीजल की कीमत में वृद्धि और सब्सिडी वाले सिलिंडर की सीमा तय करना वित्तीय सुधारों के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत हैं, लेकिन जल्दी ही मतदाता के रूप में सामने आने वाले आम आदमी को यह नहीं भाने वाला है जो तीन साल से दो अंकों की महंगाई से वैसे ही पिस रहा है.

छोटी अवधि के लिहाज से देखें तो यह दोनों उपाय महंगाई को बढ़ाएंगे और आम आदमी पर बोझ और बढ़ेगा. डीजल की कीमत में वृद्धि से महंगाई करीब 1 फीसदी तक बढ़ सकती है. अपने बचाव में सरकार का दावा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में डीजल का इस्तेमाल सिर्फ 15 फीसदी होता है, इसलिए उसके मुख्य आधार किसानों पर इसका कोई असर नहीं पडऩे वाला. 

हालांकि दो से तीन साल की लंबी अवधि में वित्तीय घाटे में अच्छे सुधार से महंगाई का दबाव कम होगा, लेकिन ऐसा करने के लिए सरकार को डीजल की कीमत को पूरी तरह से नियंत्रण मुक्त करना होगा, जिसका मतलब यह है कि कीमतों को 10 से 15 रु. प्रति लीटर तक और बढऩे दिया जाए. इसी तरह खाद्य पदार्थों और उर्वरक की सब्सिडी को भी तर्कसंगत बनाना होगा.

वित्त मंत्री चिदंबरम ने 17 सितंबर को पत्रकारों को बताया कि विकास के बावजूद सरकार अगर 2012-13 में वित्तीय घाटे को 5.1 फीसदी पर रखने का लक्ष्य हासिल कर ले तो उसे ‘भाग्यशाली’ ही कहा जाएगा. राजनैतिक रूप से अल्पमत में आ चुकी सरकार के लिए आगे डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी करना और सब्सिडी को तर्कसंगत बनाना लगभग असंभव होगा.

सरकार के लिए चिंता की बात यह भी है कि इन कदमों को अब वापस लेने से न सिर्फ वित्तीय लक्ष्य पीछे जाएगा बल्कि उसकी विश्वसनीयता को भी चोट पहुंचेगी. वैसे, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया ने किसी तरह के रोलबैक से इनकार किया है, लेकिन परदे के पीछे यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी बीच का रास्ता निकालने पर काम कर रही हैं. एफडीआइ सुधार से जमीनी स्तर पर ज्यादा कुछ हासिल हो सकेगा, इसे लेकर संदेह ही है. यदि बड़े राज्य मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी के एफडीआइ की इजाजत मानने से इनकार कर दें तो यह पटाखा भी फुस्स हो सकता है.

अब तक 16 राज्यों ने खुदरा कारोबार में एफडीआइ का घोषित रूप से विरोध किया है और सिर्फ 12 राज्यों ने इसका समर्थन किया है. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और बीजेपी शासित सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसका साफ तौर पर विरोध किया है. भारतीय बाजार के बड़े हिस्से में जब घुसने को ही जगह न मिले तो वॉलमार्ट और टेस्को के लिए भारी निवेश करने में रुचि दिखाने की संभावना कम ही है.

अलबत्ता एविएशन सेक्टर में बड़े निवेश की संभावना थोड़ी बेहतर लग रही है. ऐसी खबरें आ रही हैं कि अबू धाबी की एतिहाद एयरलाइंस ने जेट एयरवेज में कुछ हिस्सेदारी लेने में रुचि दिखाई है. हालांकि, इससे एविएशन सेक्टर की लंबे समय से चली आ रही समस्याएं इतनी जल्दी हल होने वाली नहीं हैं. इंडिया टुडे के अर्थशास्त्रियों के बोर्ड (बॉक्स देखें) की आम राय से पता चलता है कि सिर्फ  एफडीआइ वृद्धि दर को 2010-11 के 8.4 फीसदी तक ले जाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

आर्थिक वृद्धि की रफ्तार के मामले में सबसे गंभीर ब्रेकर इन्फ्रास्ट्रक्चर है. कई जगह से मंजूरी लेने की बाधाओं ने इस सेक्टर को ठप कर दिया है. एक अधिकारी के मुताबिक, एक साल के भीतर सड़क क्षेत्र के कम-से-कम 37 प्रोजेक्ट को पर्यावरण और वन संबंधी मंजूरी की समस्या की वजह से अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है. सड़कों पर निजी निवेश में तेजी से गिरावट आई है. इस अधिकारी ने कहा, ‘‘आपको वन संबंधी मंजूरी मिल जाती है तो पर्यावरण संबंधी मंजूरी नहीं मिलेगी.’’ यानी कोई न कोई अड़चन आ जाएगी.

चिदंबरम को लगता है कि उनके पास इस तरह की अड़चनों को दूर करने का रास्ता है: प्रस्तावित राष्ट्रीय निवेश बोर्ड (एनआइबी) प्रस्ताव के मुताबिक, एनआइबी की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे और इस एक जगह ही एक निश्चित आकार से ऊपर की सभी परियोजनाओं को मंजूरी दे दी जाएगी. एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सरकार ने यह समझ लिया है कि अंतर-मंत्रालयी मतभेदों को दूर करने के लिए जीओएम अप्रभावी साबित हुआ है.

समस्या वाले असल मंत्रालय हैं: वन, कोयला, खनन और ऊर्जा. एनआइबी को अधिकार देने के लिए कारोबारी नियमों में बदलाव करना पड़ेगा, जिसका मतलब यह है कि इन मंत्रालयों से मंजूरी देने का अधिकार लेना पड़ेगा. इस अधिकारी का कहना है, ‘‘यही विवाद की जड़ होगा.’’ इससे सभी बड़ी परियोजनाओं की जिम्मेदारी भी सीधे प्रधानमंत्री के कंधों पर आ जाएगी. कोयला घोटाले में हाथ जला चुके प्रधानमंत्री एनआइबी के विचार को शायद ही स्वीकार करेंगे.

कुछ अफसरशाहों का कहना है कि यह बोर्ड और नुकसान पहुंचाने वाला ही साबित होगा. एक अधिकारी कहते हैं, ‘‘आप एक व्यवस्था जिसमें मंजूरी काफी निचले स्तर पर (मान लीजिए, क्षेत्रीय वन अधिकारी) दी जाती है, से ऐसी व्यवस्था की तरफ  बढऩे की बात कर रहे हैं जिसमें सारे निर्णय सर्वोच्च स्तर यानी प्रधानमंत्री द्वारा लिए जाएंगे. वे विफलता के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराने की भूमिका तैयार कर रहे हैं.’’

सुधारों पर वार
नौकरशाहों की सिविल नाफरमानी
अफसरशाही भी प्रधानमंत्री को विफलता से बचाने के लिए मदद की इच्छुक नहीं दिख रही. अफसरशाहों में अब भी अपने एक साथी पूर्व टेलीकॉम सचिव सिद्धार्थ बेहुरा के साथ 2जी मामले में हुए व्यवहार की टीस बरकरार है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘‘हम बदला लेने को प्रतिबद्ध हैं.’’ परिस्थितियों ने अफसरशाहों के लिए कुछ न करने के कठिन रुख को आसान बना दिया है. कई अफसरशाहों को नहीं लगता कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पाएगीए यानी उनका टकराव का दौर भी कम ही रहेगा.

कुछ का कहना है कि मान लें कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर ले तो भी उसके साथ नजदीकी रखने से भला नहीं होने वाला है क्योंकि यूपीए के फिर सत्ता में लौटने की संभावना कम ही है. जो लोग 2014 में सेवा में रहने या रिटायरमेंट के बाद ऊंचा ओहदा पाने की हसरत रखते हैं, वे यूपीए से दूरी बनाना ही बेहतर समझ रहे हैं. एक अफसरशाह कहते हैं, ‘‘वे दिन गए जब हम रिटायरमेंट के बाद नौकरी के लिए सरकार पर निर्भर रहते थे. अब कई अफसरशाह निजी क्षेत्र की नौकरियों में जा रहे हैं.’’

यह तथ्य कि अफसरशाही यूपीए का साथ देने में कम फायदा देख रही है, उस सरकार के लिए बुरी खबर ही है जो सुधारों को लागू करने के लिए अधिकारियों की तलाश कर रही है. मनमोहन की सुधारवादी घोषणाओं ने जनता का ध्यान कोयला घोटाले से शायद हटा दिया होए लेकिन भ्रष्टाचार का दानव उनका पीछा नहीं छोडऩे वाला. जब शोर-शराबा अपने चरम पर था, 2जी घोटाला फिर से खबरों में आ गया.

2जी पर गठित संयुक्त संसदीय समिति के सामने 18 सितंबर को गवाही देते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव (जो घोटाला होने के दौरान वित्त सचिव थे) ने कहा कि जो भी निर्णय हुए, उनमें प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री चिदंबरम भी शामिल थे. मनमोहन सोचते थे कि 2जी से पीछा छूट गया है, लेकिन यह फिर सामने आ गया है और यह आगे आने वाली भयंकर मुसीबतों का संकेत है.

-साथ में देवेश कुमार

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